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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳
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*मास्टर अवध बिहारी*
*(भारत के स्वतन्त्रता प्राप्ति संग्राम के क्रान्तिकारी सेनानी)*
*जन्म : १८६९ (दिल्ली)*
*फांसी : ११ मई १९१५*
(अम्बाला)
नागरिकता : भारतीय
विशेष योगदान : अवध बिहारी ने वायसराय लार्ड हार्डिंग्ज पर बम प्रहार किया तथा लारेंस गार्डस बम कांड में भी मुख्य भूमिका निभाई।
"मैं चाहता हूं भयंकर अशांति फैले, जिसमें यह विदेशी शासन और भारत की गुलामी भस्म हो जाए. क्रांति की आग से भारत कुंदन होकर निकले, हमारे जैसे हजार-दो हजार लोग नष्ट भी हो जाएंगे तो क्या.’’
मातृभूमि की सेवा के लिए व्यक्ति की शिक्षा, आर्थिक स्थिति या अवस्था कोई अर्थ नहीं रखती. दिल्लीवासी क्रांतिवीर अवधबिहारी ने केवल २५ वर्ष की अल्पायु में ही अपना शीश मां भारती के चरणों में समर्पित कर दिया.
अवधबिहारी का जन्म चांदनी चौक दिल्ली के मोहल्ले कच्चा कटरा में १४ नवम्बर सन १८८९ को हुआ था. इनके पिता श्री गोविन्दलाल श्रीवास्तव जल्दी ही स्वर्ग सिधार गये, अब परिवार में अवधबिहारी उनकी मां तथा एक बहिन रह गयी, निर्धनता के कारण प्रायः इन्हें भरपेट रोटी भी नहीं मिल पाती थी, पर अवधबिहारी बहुत मेधावी थे. गणित में सदा उनके सौ प्रतिशत नंबर आते थे. उन्होंने सब परीक्षाएं प्रथम श्रेणी और कक्षा में प्रथम आकर उत्तीर्ण कीं. छात्रवृत्ति और ट्यूशन के बल पर अवधबिहारी ने सेंट स्टीफेंस काॅलिज से १९०८ में प्रथम श्रेणी में स्वर्ण पदक लेकर बी.ए किया. काॅलिज के एक अंग्रेज अध्यापक ने इनकी प्रतिभा और कार्यक्षमता देखकर कहा था कि -
"ऐसे बुद्धिजीवी युवकों से अंग्रेजी शिक्षा और सभ्यता के प्रसार में बहुत सहायता मिल सकती है, पर उन्हें क्या पता था कि वह युवक आगे चलकर ब्रिटिश शासन की जड़ें हिलाने में ही लग जाएगा."
दिल्ली में उनकी मित्रता मास्टर अमीरचंद आदि क्रांतिकारियों से हुई, जो बम-गोली के माध्यम से अंग्रेजों को देश से भगाना चाहते थे. मास्टर अमीरचन्द, लाला हनुमन्त सहाय, मास्टर अवध बिहारी, भाई बालमुकुन्द और बसन्त कुमार विश्वास द्वारा लार्ड हार्डिंग नामक ब्रिटिश वायसराय को जान से मार डालने की एक क्रान्तिकारी योजना बनाई. २३ दिसम्बर सन १९१२ को दिल्ली के चांदनी चौक स्थित पंजाब नेशनल बैंक की छत से वायसराय लार्ड हार्डिंग की शोभा यात्रा में इन्होंने एक भीषण बम फेंका. वायसराय हाथी पर बैठा था. निशाना चूक जाने से वह मरा तो नहीं, पर बम से उसके कंधे, दायें नितम्ब और गर्दन में भारी घाव हो गये. शासन ने इसकी जानकारी देने वाले को एक लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणा की. शासन ने कुछ लोगों को पकड़ा, जिनमें से दीनानाथ के मुखबिर बन जाने से इस विस्फोट में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गये. न्यायालय में अवधबिहारी पर यह आरोप लगाया गया कि बम में प्रयुक्त टोपी उन्होंने ही बसंतकुमार के साथ मिलकर लगायी थी. उन दिनों देश में अनेक विस्फोट हुए थे, अवधबिहारी को उनमें भी शामिल दिखाया गया, सजा सुनाते हुए न्यायाधीश ने लिखा -
"अवधबिहारी जैसा शिक्षित और मेधावी युवक किसी भी जाति का गौरव हो सकता है, यह साधारण व्यक्ति से हजार दर्जे ऊंचा है, इसे फांसी की सजा देते हुए हमें दुख हो रहा है."
११ मई सन १९१५ ई. इनकी फांसी की तिथि निर्धारित की गयी. फांसी से पूर्व इनकी अंतिम इच्छा पूछी गयी तो इन्होंने कहा कि -
"अंग्रेजी साम्राज्य का नाश हो."
जेल अधिकारी ने कहा कि जीवन की इस अंतिम वेला में तो शांति रखो,तो अवधबिहारी ने कहा -
‘‘कैसी शांति, मैं तो चाहता हूं भयंकर अशांति फैले, जिसमें यह विदेशी शासन और भारत की गुलामी भस्म हो जाए, क्रांति की आग से भारत कुंदन होकर निकले, हमारे जैसे हजार-दो हजार लोग नष्ट भी हो जाएंगे तो क्या."
यह कहकर उन्होंने फंदा गले में डाला और वन्दे मातरम् कहकर रस्सी पर झूल गये.
🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳
*🙏🙏विनम्र अभिवादन🙏🙏*
संकलन -)गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र
उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६
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