रविवार, ६ मार्च, २०२२

गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳 ➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿ *👳🏻‍♂️👳🏻‍♂️बाबा पृथ्वीसिंह आझाद👳🏻‍♂️👳🏻‍♂️*

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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*👳🏻‍♂️👳🏻‍♂️बाबा पृथ्वीसिंह आझाद👳🏻‍♂️👳🏻‍♂️*


( भारतीय क्रांतिकारी - गदर पार्टी के संस्थापकों मे से एक )


   *जन्म : १५ सप्टेंबर १८९२*

(रायपुरानी,पटियाला,पंजाब,भारत)


       *मृत्यू :  ६ मार्च १९८९*

                  (वय ९६)

                   (भारत)


व्यवसाय : भारतीय स्वातंत्र्य कार्यकर्ता

वर्ष सक्रिय : १९०७–१९८९

प्रसिद्ध : भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम

लाहोर षड्यंत्र चाचणी

भागीदार : कै.आझाद देवी

संतान : अजितसिंग भट्टी, प्रज्ञा कुमार


बाबा पृथ्वी सिंह आजाद (१८९२ - १९८९) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी, क्रान्तिकारी  तथा गदर पार्टी के संस्थापकों में से एक थे। स्वतंत्रता के पश्चात वे पंजाब के भीम सेन सचर सरकार में मन्त्री रहे। वे भारत की पहली संविधान सभा के भी सदस्य रहे। सन १९७७ में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया।


पृथ्वी सिंह को 'जिन्दा शहीद' भी कहा जाता है। उन्हें लाहौर षड्यंत्र केस में फांसी की सजा सुनायी गयी थी जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया था। स्वतन्त्रता संग्राम में उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। उन्हें सेल्युलर जेल में रखा गया था । उनकी 'लेनिन के देश में' नामक पुस्तक बहु चर्चित पुस्तकों में से एक है। आजादी के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय अजय भवन में जीवन पर्यन्त रहे।


*किस्सा कुछ यूं था: रोज सामने मौत की बाल्टी देख कर भी डरे नहीं पृथ्वीसिंह आजाद*


भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले कुछ ऐसे क्रांतिकारी भी रहे, जिन्हें आजादी मिलने के बाद भुला दिया गया। या तो उन्हें जानबूझकर भुलाया गया या फिर उनके बारे में कहीं कोई जानकारी दर्ज थी ही नहीं, इसलिए देश उन्हें भूल गया। ऐसे ही क्रांतिवीर थे पृथ्वीसिंह आजाद, जिनके बारे में छुटपुट जानकारी ही देश के सामने आ सकी। बाबा पृथ्वीसिंह आजाद ऐसे क्रांतिवीर थे, जिनके जीवन का प्रत्येक क्षण देश की स्वतंत्रता के लिए अर्पित था। १५ सितंबर १८९२ को पंजाब के सर्कपुर टावर, जिला अम्बाला में जन्मे पृथ्वीसिंह आजाद कुछ कमाने के लिए कई देशों की यात्रा करते हुए अमेरिका पहुंचे थे। वहां वे भारत की आजादी के लिए लड़ रही 'गदर पार्टी' में शामिल हो गए।


गदर पार्टी के आह्वान पर वे अपने साथियों के साथ वापस भारत लौटे और अम्बाला की सैनिक छावनियों में भारतीय सैनिकों को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने की प्रेरणा देने लगे। दुर्भाग्य से ८ दिसम्बर १९१४ को उन्हें बंदी बनाकर लाहौर की सेंट्रल जेल भेज दिया गया। उन्हें लाहौर षड्‌यंत्र केस में अन्य कई क्रांतिकारियों के साथ अभियुक्त बनाया गया।


न्यायालय ने उक्त केस में २४ क्रांतिकारियों को फांसी का दंड घोषित किया। उन क्रांतिकारियों में बाबा पृथ्वीसिंह आजाद भी थे। उस समय जेल में फांसी देने के बाद शवों को नहलाया नहीं जाता था। जेल परिसर में जेल के ही कर्मचारियों द्वारा शव को जला दिया जाता था। अतः राजबंदियों की मांग थी कि जिस दिन हमें फांसी दें, उसके पहले स्नान करने की व्यवस्था करें। मगर क्रूर अंग्रेजी शासक क्रांतिकारियों को मानसिक प्रताड़ना देने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते थे।


जेल में बाबा पृथ्वीसिंह आजाद की कोठरी के सामने रोज एक बाल्टी पानी रख दिया जाता था। क्रांतिकारियों को लगता था कि आज उन्हें फांसी दी जाएगी। ऐसी मानसिक क्रूरता लगातार १४ दिनों तक की गई। किंतु इससे न तो बाबा पृथ्वीसिंह आजाद डिगे, न ही कोई अन्य क्रांतिकारी।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

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