शुक्रवार, १६ एप्रिल, २०२१

काही लोकांना काहिच वास येत नाही

 *_आजची माहिती_*


*_📕काही लोकांना कोणताच वास कळत नाही, असे का ?📕_*

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_खरपूस भाकरीचा, खमंग फोडणीचा वास आपली भूक चाळवत असतो. सुगंधी फुलांचा वास मनाला आनंद देऊन जात असतोअशा वासांच्या वेगवेगळ्या छटा आपण अनुभवत असतो गटाराशेजारून जाताना आपण अगोदरच नाक दाबून घेत असतो काही आजारांमध्ये घाण वास येत असल्याची जाणीव सतत होत राहते. पण काही व्यक्तींना सुगंधी-दुर्गंधी असा कोणताच वास कळत नाही. हा एक प्रकारवा आजार आहे. या व्यक्तींना कसलाच वास येत नाही, तर काही जणांची वास येण्याची क्षमता कमी झालेली असते. आपल्या नाकातील काही त्वचा ही वास समजण्यासाठी तयार झालेली असते. या त्वचेमध्ये वास समजण्यासाठी चेतातंतू असतात. कोणत्याही वासाचे कण हवेद्वारे नाकात पोहोचले की, हे चेतातूंतू उद्दीपित होतात. चेतातंतूद्वारे ह्या संवेदनेचे वहन मेंदूमधील वासाच्या केंद्रात केले जाते व वास कळतो._

     _नाकातील त्वचा जर जाड झाली असेल, सर्दी झालेली असेल, नाकातील हाड वाढलेले असेल, नाकात पॉलीप (वाढ) असेल ; तर या अडथळ्यामुळे नाकातील वास समजणाऱ्या त्वचेपर्यंत गंध पोहोचू शकत नाही व वास येत नाही. अपघाताने मेंदूमधील वासाच्या केंद्राला वा वास नेणाऱ्या चेतातंतूस इजा झाली, तर वास कळत नाही. याच भागात गळू, गाठ झाल्यास, मेंदूच्या आवरणाचा दाह झाल्यासही वास कळत नाही. सतत द्रोमाइडच्या वाफेमुळेही वास समजत नाहीसे होते. मधुमेह, सिफीलीस यामध्ये चेतातंतूंना सूज आल्यास वास कळत नाही. अशा वास न येणाऱ्या व्यक्तींना त्यामुळे चवीतील सूक्ष्म फरकही समजत नाहीसे होते._

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*_संकलन : गजानन गोपेवाड_*

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*_डॉ.जगन्नाथ दीक्षित, डाॅ.अंजली दीक्षित_*

_यांच्या 'मेडिकल जनरल नॉलेज' या पुस्तकातून_

17 एप्रिल बेंजामिन फ्रँकलिन स्मृतिदिन

 *बेंजामिन फ्रँकलिन स्मृतिदिन*


*वैज्ञानिक, संशोधक*


*जन्मदिन - १७ एप्रिल १७०६*


बेंजामिन फ्रैंकलिन हे संशोधक, वैज्ञानिक, राजकीय विचारक, राजकारणी, लेखक, व्यंगकार होते. बेंजामिन फ्रैंकलिन यांनी संयुक्त राष्ट्रांचे प्रारुप आणि संविधान बनविण्यासाठी सहाय्य केले. तसेच  वैज्ञानिक कार्यामध्ये  इलेक्ट्रिसिटी, गणित आणि नकाशे बनवणे सामील आहेत. बेंजामिन फ्रैंकलिन सारखे लेखक आपल्या बुद्धी आणि ज्ञानामुळे आळखले जातात. त्यांनी रिचड्स यांचे अल्मनैक प्रसिद्ध केले. त्यांनी बायोफोकल ग्लास चा शोध लावला आणि पहिली यशस्वी अमेरिकन लेंडींग लायब्ररी ची स्थापना केली.


अमेरिकन इतिहासातील एक मोठे मिथक म्हणून आजही ज्याची नोंद आहे, ते म्हणजे बेंजामिन फ्रॅंकलिन आणि त्यांचा पतंग. शाळेच्या पुस्तकातून आपण वाचत आलो की, बेन्जामिन महाशय एकदा बाहेर पडले असतांना, अचानक आलेल्या भर वादळात त्यांनी आपला पतंग उडवला आणि त्या पतंगावर वीज कोसळली. अशा प्रकारे बेंजामिन यांनी अपघाताने का होईना, विजेचा शोध लावला.


सुदैवाची गोष्ट अशी की, बेंजामिन यांचे नशीब त्यावेळी त्याहून जोरदार होते. अहो, जर ती वीज खरोखरच त्या पतंगावर पडली असती, तर आमचे बेंजामिन महाशय त्यानंतर झालेल्या अमेरिकेच्या ऐतिहासिक स्वातंत्र्य जाहीरनाम्यावर सही करण्यास उपस्थित राहू शकले नसते. एवढेच नव्हे १७३२ ते १७५८ या काळात दर वर्षी प्रसिद्ध होणारे Poor Richard’s Almanac हे बेंजामिन यांनी टोपण नावाने लिहिलेले पंचांगही निघाले नसते. स्पष्ट म्हणायचे झाले तर त्या वादळी हवामानात पतंग उडवण्यातून त्यांचा वेडेपणा दिसून आला असता.


गंमत म्हणजे अशा प्रकारचा विजेचा प्रयोग करू पाहाणारा बेंजामिन हे काही पहिलेच शोधक नव्हते. आणि या संबंधातील सत्य काय ते काळजीपूर्वक तपासले असता असे आढळून आले की, बेंजामिन यांच्या कोणत्याही खासगी डायरीत आपल्या या पतंग उडवण्याच्या प्रयोगाची नोंद नाही. 


एक मात्र खरे की फ्रॅंकलिन यांनी एक ऑक्टोबर १७५२ रोजी लिहिलेल्या एका पत्रात पतंग कसा तयार करावा आणि वादळाच्या वेळी कसा उडवावा, याचा  बारीकसारीक तपशील दिलेला आहे. एक उत्तम शास्त्रज्ञ या नात्याने त्यांनी असा कोणताही प्रयोग केल्याचे लिहून ठेवलेले नाही. आणि तसे त्यांनी केलेही नसते. त्यांनी जे काही तोंडी वर्णन केले, ते जोसेफ प्रिस्टले या तत्कालीन नावाजलेल्या संशोधकाने लिहून घेतले होते. ही नोंद इतिहासकारांना पुरेशी आहे.


संकलक - गजानन गोपेवाड

16 एप्रिल गाथा बलिदानाची भाई रणधीर सिंह

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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               *भाई रणधीर सिंह*                        

   (क्रांतिकारी एवं सामाजिक सुधारक)                                                                                                                   


      *जन्म : ७ जुलाई, १८७८*                                                                                

            (लुधियाना , पंजाब)

      *मृत्यु : १६ अप्रैल १९६१*

          (लुधियाना, पंजाब)

नागरिकता : भारतीय

पार्टी : कांग्रेस

विद्यालय : क्रिश्चियन कॉलेज

भाषा : पंजाबी

जेल : यात्रा १७ वर्ष

रचना : लेखनी और काव्य प्रतिभा

अन्य जानकारी : रणधीर सिंह सामाजिक सुधारों के प्रबल समर्थक थे।


रणधीर सिंह प्रसिद्ध सिक्ख नेता और क्रांतिकारी थे। वे अस्पृश्यता के विरोधी और महिलाओं के अधिकारों के पक्षधर थे।


💁‍♂️ *जन्म एवं परिचय*

रणधीर सिंह का जन्म ७जुलाई, १८७८ ई. में पंजाब के लुधियाना ज़िले में हुआ था। उन्होंने लाहौर के क्रिश्चियन कॉलेज में शिक्षा पाई। तत्कालीन प्रमुख सिख नेताओं से परिचय के बाद रणधीर सिंह 'सिंह सभा' आंदोलन में सम्मिलित हो गए। उनकी सशस्त लेखनी और काव्य प्रतिभा से इस आंदोलन को बड़ा बल मिला। रणधीर सिंह केवल पंजाबी भाषा में ही लिखते थे। अध्ययन के द्वारा उन्होंने सिख जीवन दर्शन का गहन ज्ञान प्राप्त किया। आजीविका के लिए रणधीर सिंह ने कुछ वर्ष तहसीलदार के रूप में काम किया और उसके बाद खालसा कॉलेज अमृतसर में अध्यापक बन गए।                          


🔮 *सामाजिक सुधारों के समर्थक*

रणधीर सिंह अस्पृश्यता के विरोधी और महिलाओं के अधिकारों के पक्षधर थे। रणधीर सिंह का कहना था कि "विद्यालयों के पाठ्यक्रम में धार्मिक शिक्षा का समावेश हो और उसे विदेशी प्रभाव से मुक्त रखा जाए।"


⚔️ *ब्रिटिश सरकार के विरोधी*

प्रथम विश्वयुद्ध (१९१४-१९१८) के समय ब्रिटिश सरकार ने रकाबगंज गुरुद्वारा की बाहरी दीवार गिरा देने का आदेश दिया तो भाई रणधीर सिंह के विचारों में एकदम परिवर्तन आया। वे ब्रिटिश विरोधी हो गए। भारतीय सेना को भी विद्रोह के लिए तैयार किया गया। १९१५ में रणधीर सिंह ने ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने का निश्चय किया।


⛓️⛓️ *आजीवन कारावास*

पर पहले ही भेद खुल जाने के कारण भाई रणधीर सिंह और उनके साथी गिरफ़्तार कर लिए गए। भाई को आजीवन कारावास की सजा मिली। १७ वर्ष जेल में रहकर जब वे बाहर आए, उस समय तक देश की राजनीतिक स्थिति बदल चुकी थी। रणधीर सिंह कांग्रेस की अहिंसक राजनीति का समर्थन नहीं कर सके और उसके आलोचक बने रहे।


🪔 *निधन*

१६ अप्रैल,१९६१ को रणधीर सिंह का देहांत हो गया।

                                                                                                                                                                                                                                   

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳   

*🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏*

संकलन -)

गजानन गोपेवाड

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

बुधवार, १४ एप्रिल, २०२१

गाथा बलिदानाची गुरू नानक देव

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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                *गुरु नानक देव*


       *जन्म : १५ अप्रैल, १४६९*

        (तलवंडी, पंजाब, भारत)

       *मृत्यु : २२ सितंबर, १५३९*

                 (भारत)                                                 पिता :  कालू

माता : तृप्ता

पत्नी : सुलक्खनी

संतान : श्रीचन्द,लक्ष्मीदास

कर्म भूमि : भारत

कर्म-क्षेत्र : समाज सुधारक

मुख्य रचनाएँ : जपुजी, तखारी' राग के बारहमाहाँ

भाषा : फ़ारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी , ब्रजभाषा, खड़ीबोली

प्रसिद्धि : सिक्खों के प्रथम गुरु

नागरिकता : भारतीय

उत्तराधिकारी : गुरु अंगद देव

अन्य जानकारी: गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में पैगम्बर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्म-सुधारक, समाज-सुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबन्धु आदि सभी के गुण उत्कृष्ट मात्रा में समेटे हुए थे।

गुरु नानक  सिक्खों के प्रथम गुरु (आदि गुरु) थे। इनके अनुयायी इन्हें 'गुरु नानक', 'बाबा नानक' और 'नानकशाह' नामों से संबोधित करते हैं। गुरु नानक २० अगस्त,१५०७ को सिक्खों के प्रथम गुरु बने थे। वे इस पद पर २२ सितम्बर,१५३९ तक रहे।


❇️ *परिचय*

पंजाब के तलवंडी नामक स्थान में १५ अप्रैल, १४६९ को एक किसान के घर गुरु नानक उत्पन्न हुए। यह स्थान लाहौर से ३० मील पश्चिम में स्थित है। अब यह 'नानकाना साहब' कहलाता है। तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। नानक के पिता का नाम कालू एवं माता का नाम तृप्ता था। उनके पिता खत्री जाति एवं बेदी वंश के थे। वे कृषि और साधारण व्यापार करते थे और गाँव के पटवारी भी थे। गुरु नानक देव की बाल्यावस्था गाँव में व्यतीत हुई। बाल्यावस्था से ही उनमें असाधारणता और विचित्रता थी। उनके साथी जब खेल-कूद में अपना समय व्यतीत करते तो वे नेत्र बन्द कर आत्म-चिन्तन में निमग्न हो जाते थे। इनकी इस प्रवृत्ति से उनके पिता कालू चिन्तित रहते थे।


💁‍♂️ *आरंभिक जीवन*

सात वर्ष की आयु में वे पढ़ने के लिए गोपाल अध्यापक के पास भेजे गये। एक दिन जब वे पढ़ाई से विरक्त हो, अन्तर्मुख होकर आत्म-चिन्तन में निमग्न थे, अध्यापक ने पूछा- पढ़ क्यों नहीं रहे हो? गुरु नानक का उत्तर था- मैं सारी विद्याएँ और वेद-शास्त्र जानता हूँ। गुरु नानक देव ने कहा- मुझे तो सांसारिक पढ़ाई की अपेक्षा परमात्मा की पढ़ाई अधिक आनन्दायिनी प्रतीत होती है, यह कहकर निम्नलिखित वाणी का उच्चारण किया- मोह को जलाकर (उसे) घिसकर स्याही बनाओ, बुद्धि को ही श्रेष्ठ काग़ज़ बनाओ, प्रेम की क़लम बनाओ और चित्त को लेखक। गुरु से पूछ कर विचारपूर्वक लिखो (कि उस परमात्मा का) न तो अन्त है और न सीमा है। इस पर अध्यापक जी आश्चर्यान्वित हो गये और उन्होंने गुरु नानक को पहुँचा हुआ फ़क़ीर समझकर कहा- तुम्हारी जो इच्छा हो सो करो। इसके पश्चात् गुरु नानक ने स्कूल छोड़ दिया। वे अपना अधिकांश समय मनन, ध्यानासन, ध्यान एवं सत्संग में व्यतीत करने लगे। गुरु नानक से सम्बन्धित सभी जन्म साखियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं कि उन्होंने विभिन्न सम्प्रदायों के साधु-महत्माओं का सत्संग किया था। उनमें से बहुत से ऐसे थे, जो धर्मशास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित थे। अन्त: साक्ष्य के आधार पर यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि गुरु नानक ने फ़ारसी का भी अध्ययन किया था। 'गुरु ग्रन्थ साहब' में गुरु नानक द्वारा कुछ पद ऐसे रचे गये हैं, जिनमें फ़ारसी शब्दों का आधिक्य है।


👦🏻 *बचपन*

गुरु नानक की अन्तमुंखी-प्रवृत्ति तथा विरक्ति-भावना से उनके पिता कालू चिन्तित रहा करते थे। नानक को विक्षिप्त समझकर कालू ने उन्हें भैंसे चराने का काम दिया। भैंसे चराते-चराते नानक जी सो गये। भैंसें एक किसान के खेत में चली गयीं और उन्होंने उसकी फ़सल चर डाली। किसान ने इसका उलाहना दिया किन्तु जब उसका खेत देखा गया, तो सभी आश्चर्य में पड़े गये। फ़सल का एक पौधा भी नहीं चरा गया था। ९ वर्ष की अवस्था में उनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। यज्ञोपवीत के अवसर पर उन्होंने पण्डित से कहा - दया कपास हो, सन्तोष सूत हो, संयम गाँठ हो, (और) सत्य उस जनेउ की पूरन हो। यही जीव के लिए (आध्यात्मिक) जनेऊ है। ऐ पाण्डे यदि इस प्रकार का जनेऊ तुम्हारे पास हो, तो मेरे गले में पहना दो, यह जनेऊ न तो टूटता है, न इसमें मैल लगता है, न यह जलता है और न यह खोता ही है।                           👫🏻 *विवाह*


सन १४८५ ई. में नानक का विवाह बटाला निवासी, मूला की कन्या सुलक्खनी से हुआ। उनके वैवाहिक जीवन के सम्बन्ध में बहुत कम जानकारी है। २८ वर्ष की अवस्था में उनके बड़े पुत्र श्रीचन्द का जन्म हुआ। ३१ वर्ष की अवस्था में उनके द्वितीय पुत्र लक्ष्मीदास अथवा लक्ष्मीचन्द उत्पन्न हुए। गुरु नानक के पिता ने उन्हें कृषि, व्यापार आदि में लगाना चाहा किन्तु उनके सारे प्रयास निष्फल सिद्ध हुए। घोड़े के व्यापार के निमित्त दिये हुए रुपयों को गुरु नानक ने साधुसेवा में लगा दिया और अपने पिताजी से कहा कि यही सच्चा व्यापार है। नवम्बर, सन् १५०४ ई. में उनके बहनोई जयराम (उनकी बड़ी बहिन नानकी के पति) ने गुरु नानक को अपने पास सुल्तानपुर बुला लिया। नवम्बर,१५०४ ई. से अक्टूबर १५०७ ई. तक वे सुल्तानपुर में ही रहें अपने बहनोई जयराम के प्रयास से वे सुल्तानपुर के गवर्नर दौलत ख़ाँ के यहाँ मादी रख लिये गये। उन्होंने अपना कार्य अत्यन्त ईमानदारी से पूरा किया। वहाँ की जनता तथा वहाँ के शासक दौलत ख़ाँ नानक के कार्य से बहुत सन्तुष्ट हुए। वे अपनी आय का अधिकांश भाग ग़रीबों और साधुओं को दे देते थे। कभी-कभी वे पूरी रात परमात्मा के भजन में व्यतीत कर देते थे। मरदाना तलवण्डी से आकर यहीं गुरु नानक का सेवक बन गया था और अन्त तक उनके साथ रहा। गुरु नानक देव अपने पद गाते थे और मरदाना रवाब बजाता था। गुरु नानक नित्य प्रात: बेई नदी में स्नान करने जाया करते थे। कहते हैं कि एक दिन वे स्नान करने के पश्चात् वन में अन्तर्धान हो गये। उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। परमात्मा ने उन्हें अमृत पिलाया और कहा- मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ, मैंने तुम्हें आनन्दित किया है। जो तुम्हारे सम्पर्क में आयेगें, वे भी आनन्दित होगें। जाओ नाम में रहो, दान दो, उपासना करो, स्वयं नाम लो और दूसरों से भी नाम स्मरण कराओं। इस घटना के पश्चात् वे अपने परिवार का भार अपने श्वसुर मूला को सौंपकर विचरण करने निकल पड़े और धर्म का प्रचार करने लगे। मरदाना उनकी यात्रा में बराबर उनके साथ रहा।


👨‍🦯 *यात्राएँ*

गुरु नानक की पहली 'उदासी' (विचरण यात्रा) अक्तूबर , १५०७ ई. में १५१५ ई. तक रही। इस यात्रा में उन्होंने हरिद्वार, अयोध्या, प्रयाग, काशी, गया, पटना, असम, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वर, सोमनाथ, द्वारिका, नर्मदातट, बीकानेर, पुष्कर तीर्थ, दिल्ली, पानीपत, कुरुक्षेत्र, मुल्तान, लाहौर आदि स्थानों में भ्रमण किया। उन्होंने बहुतों का हृदय परिवर्तन किया। ठगों को साधु बनाया, वेश्याओं का अन्त:करण शुद्ध कर नाम का दान दिया, कर्मकाण्डियों को बाह्याडम्बरों से निकालकर रागात्मिकता भक्ति में लगाया, अहंकारियों का अहंकार दूर कर उन्हें मानवता का पाठ पढ़ाया। यात्रा से लौटकर वे दो वर्ष तक अपने माता-पिता के साथ रहे।

उनकी दूसरी 'उदासी' १५१७ ई. से १५१८ ई. तक यानी एक वर्ष की रही। इसमें उन्होंने ऐमनाबाद, सियालकोट, सुमेर पर्वत आदि की यात्रा की और अन्त में वे करतारपुर पहुँचे।

तीसरी 'उदासी' १५१८ ई. से १५२१ ई. तक लगभग तीन वर्ष की रही। इसमें उन्होंने रियासत बहावलपुर, साधुबेला (सिन्धु), मक्का, मदीना, बग़दाद, बल्ख बुखारा, क़ाबुल, कन्धार, ऐमानाबाद आदि स्थानों की यात्रा की। १५२१ ई. में ऐमराबाद पर बाबर का आक्रमण गुरु नानक ने स्वयं अपनी आँखों से देखा था। अपनी यात्राओं को समाप्त कर वे करतारपुर में बस गये और १५२१ ई. से १५३९ ई. तक वहीं रहे।             🌀 *व्यक्तित्व*

गुरुनानक का व्यक्तित्व असाधारण था। उनमें पैगम्बर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्म-सुधारक, समाज-सुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबन्धु सभी के गुण उत्कृष्ट मात्रा में विद्यमान थे। उनमें विचार-शक्ति और क्रिया-शक्ति का अपूर्व सामंजस्य था। उन्होंने पूरे देश की यात्रा की। लोगों पर उनके विचारों का असाधारण प्रभाव पड़ा। उनमें सभी गुण मौजूद थे। पैगंबर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्मसुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबंधु आदि सभी गुण जैसे एक व्यक्ति में सिमटकर आ गए थे। उनकी रचना 'जपुजी' का सिक्खों के लिए वही महत्त्व है जो हिंदुओं के लिए गीता का है।


✍️ *रचनाएँ और शिक्षाएँ*

'श्री गुरु-ग्रन्थ साहब' में उनकी रचनाएँ 'महला १' के नाम से संकलित हैं। गुरु नानक की शिक्षा का मूल निचोड़ यही है कि परमात्मा एक, अनन्त, सर्वशक्तिमान, सत्य, कर्त्ता, निर्भय, निर्वर, अयोनि, स्वयंभू है। वह सर्वत्र व्याप्त है। मूर्ति-पूजा आदि निरर्थक है। बाह्य साधनों से उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। आन्तरिक साधना ही उसकी प्राप्ति का एक मात्र उपाय है। गुरु-कृपा, परमात्मा कृपा एवं शुभ कर्मों का आचरण इस साधना के अंग हैं। नाम-स्मरण उसका सर्वोपरि तत्त्व है, और 'नाम' गुरु के द्वारा ही प्राप्त होता है। गुरु नानक की वाणी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से ओत-प्रोत है। उनकी वाणी में यत्र-तत्र तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक स्थिति की मनोहर झाँकी मिलती है, जिसमें उनकी असाधारण देश-भक्ति और राष्ट्र-प्रेम परिलक्षित होता है। उन्होंने हिंन्दूओं-मुसलमानों दोनों की प्रचलित रूढ़ियों एवं कुसंस्कारों की तीव्र भर्त्सना की है और उन्हें सच्चे हिन्दू अथवा सच्चे मुसलमान बनने की विधि बतायी है। सन्त-साहित्य में गुरु नानक ही एक ऐसे व्यक्ति हैं; जिन्होंने स्त्रियों की निन्दा नहीं की, अपितु उनकी महत्ता स्वीकार की है। गुरुनानक देव जी ने अपने अनु‍यायियों को जीवन की दस शिक्षाएँ दी-


ईश्वर एक है।

सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो।

ईश्वर सब जगह और प्राणी मात्र में मौजूद है।

ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता।

ईमानदारी से और मेहनत कर के उदरपूर्ति करनी चाहिए।

बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएँ।

सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा माँगनी चाहिए।

मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए।

सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं।

भोजन शरीर को ज़िंदा रखने के लिए ज़रूरी है पर लोभ-लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।                             🔷 *भक्त कवि गुरु नानक*

पंजाब में मुसलमान बहुत दिनों से बसे थे जिससे वहाँ उनके कट्टर 'एकेश्वरवाद' का संस्कार धीरे - धीरे प्रबल हो रहा था। लोग बहुत से देवी देवताओं की उपासना की अपेक्षा एक ईश्वर की उपासना को महत्व और सभ्यता का चिह्न समझने लगे थे। शास्त्रों के पठन पाठन का क्रम मुसलमानों के प्रभाव से प्राय: उठ गया था जिससे धर्म और उपासना के गूढ़ तत्व को समझने की शक्ति नहीं रह गई थी। अत: जहाँ बहुत से लोग जबरदस्ती मुसलमान बनाए जाते थे वहाँ कुछ लोग शौक़ से भी मुसलमान बनते थे। ऐसी दशा में कबीर द्वारा प्रवर्तित 'निर्गुण संत मत' एक बड़ा भारी सहारा समझ पड़ा।


☮️ *निर्गुण उपासना*

गुरुनानक आरंभ से ही भक्त थे अत: उनका ऐसे मत की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक था, जिसकी उपासना का स्वरूप हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को समान रूप से ग्राह्य हो। उन्होंने घर बार छोड़ बहुत दूर दूर के देशों में भ्रमण किया जिससे उपासना का सामान्य स्वरूप स्थिर करने में उन्हें बड़ी सहायता मिली। अंत में कबीरदास की 'निर्गुण उपासना' का प्रचार उन्होंने पंजाब में आरंभ किया और वे सिख संप्रदाय के आदिगुरु हुए। कबीरदास के समान वे भी कुछ विशेष पढ़े लिखे न थे। भक्तिभाव से पूर्ण होकर वे जो भजन गाया करते थे उनका संग्रह (संवत् १६६१) ग्रंथसाहब में किया गया है। ये भजन कुछ तो पंजाबी भाषा में हैं और कुछ देश की सामान्य काव्य भाषा हिन्दी में हैं। यह हिन्दी कहीं तो देश की काव्यभाषा या ब्रजभाषा है, कहीं खड़ी बोली जिसमें इधर उधर पंजाबी के रूप भी आ गए हैं, जैसे चल्या, रह्या। भक्त या विनय के सीधे सादे भाव सीधी सादी भाषा में कहे गए हैं, कबीर के समान अशिक्षितों पर प्रभाव डालने के लिए टेढ़े मेढ़े रूपकों में नहीं। इससे इनकी प्रकृति की सरलता और अहंभावशून्यता का परिचय मिलता है। संसार की अनित्यता, भगवद्भक्ति और संत स्वभाव के संबंध में उन्होंने कहा हैं -


इस दम दा मैनूँ कीबे भरोसा, आया आया, न आया न आया।

यह संसार रैन दा सुपना, कहीं देखा, कहीं नाहि दिखाया।

सोच विचार करे मत मन मैं, जिसने ढूँढा उसने पाया।

नानक भक्तन दे पद परसे निसदिन राम चरन चित लाया


जो नर दु:ख में दु:ख नहिं मानै।

सुख सनेह अरु भय नहिं जाके, कंचन माटी जानै

नहिं निंदा नहिं अस्तुति जाके, लोभ मोह अभिमाना।

हरष सोक तें रहै नियारो, नाहि मान अपमाना

आसा मनसा सकल त्यागि कै जग तें रहै निरास।

काम, क्रोध जेहि परसे नाहि न तेहिं घट ब्रह्म निवासा

गुरु किरपा जेहि नर पै कीन्हीं तिन्ह यह जुगुति पिछानी।

नानक लीन भयो गोबिंद सो ज्यों पानी सँग पानी।


📝 *प्रकृति चित्रण*


गुरु नानक देव, तलवंडी, पंजाब

गुरु नानक की कविता में कहीं-कहीं प्रकृति का बड़ा सुन्दर चित्रण मिलता है। 'तखारी' राग के बारहमाहाँ (बारहमासा) में प्रत्येक मास का हृदयग्राही वर्णन है। चैत्र में सारा वन प्रफुल्लित हो जाता है, पुष्पों पर भ्रमरों का गुंजन बड़ा ही सुहावना लगता है। वैशाख में शाखाएँ अनेक वेश धारण करती हैं। इसी प्रकार ज्येष्ठ-आषाढ़ की तपती धरती, सावन-भादों की रिमझिम, दादर, मोर, कोयलों की पुकारें, दामिनी की चमक, सर्पों एवं मच्छरों के दर्शन आदि का रोचक वर्णन है। प्रत्येक ऋतु की विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है।                                        🟡 *पंजासाहब*

मुख्य लेख : पंजासाहब

सिक्ख तीर्थ पेशावर जाने वाले मार्ग पर तक्षशिला से एक स्टेशन आगे तथा हसन अब्दाल से दो मील दक्षिण में पंजासाहब स्थान स्थित है।


🔮 *राग और रस*

गुरु नानक की वाणी में शान्त एवं श्रृंगार रस की प्रधानता है। इन दोनों रसों के अतिरिक्त, करुण, भयानक, वीर, रौद्र, अद्भुत, हास्य और वीभत्स रस भी मिलते हैं। उनकी कविता में वैसे तो सभी प्रसिद्ध अलंकार मिल जाते हैं, किन्तु उपमा और रूपक अलंकारों की प्रधानता है। कहीं-कहीं अन्योक्तियाँ बड़ी सुन्दर बन पड़ी हैं। गुरु नानक ने अपनी रचना में निम्नलिखित उन्नीस रागों के प्रयोग किये हैं- सिरी, माझ, गऊड़ी, आसा, गूजरी, बडहंस, सोरठि, धनासरी, तिलंग, सही, बिलावल, रामकली, मारू, तुखारी, भरेउ, वसन्त, सारंग, मला, प्रभाती।


🌀 *भाषा*

भाषा की दृष्टि से गुरु नानक की वाणी में फ़ारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी , ब्रजभाषा, खड़ीबोली आदि के प्रयोग हुए हैं। संस्कृत, अरबी और फ़ारसी के अनेक शब्द ग्रहण किये गये हैं। १५२१ तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, फ़ारस और अरब के मुख्य-मुख्य स्थानों का भ्रमण किया।            🪔 *मृत्यु*

गुरु नानक की मृत्यु सन् १५३९ ई. में हुई। इन्होंने गुरुगद्दी का भार गुरु अंगददेव (बाबा लहना) को सौंप दिया और स्वयं करतारपुर में 'ज्योति' में लीन हो गए। गुरु नानक आंतरिक साधना को सर्वव्यापी परमात्मा की प्राप्ति का एकमात्र साधन मानते थे। वे रूढ़ियों के कट्टर विरोधी थे। गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक,योगी,गृहस्थ,धर्मसुधारक,समाजसुधारक,कवि,देशभक्त और विश्वबंधु-सभी के गुण समेटे हुए थे।                                                                                                                                                                                                                                 

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳   

🙏🙏🙏 *शुभ प्रभात*🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

सोमवार, १२ एप्रिल, २०२१

जागतिक आरोग्य संघटना स्थापन

 *👨‍⚕️👩‍⚕️👨‍⚕️७ एप्रिल १९४८👨‍⚕️👩‍⚕️👨‍⚕️*

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*जागतिक आरोग्य संघटना स्थापना*

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जागतिक आरोग्य संघटना :

*(वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनायझेशन, WHO)* 

      ही एक आंतरराष्ट्रीय सहकार्याने कार्य करणारी संस्था असून ती राष्ट्रसंघाच्या आरोग्य यंत्रणेचा व पॅरिस येथील ‘आंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक आरोग्य कार्यालया’चा (Office Internationale d’hygiene Publique) वारसा पुढे चालवीत आहे. *‘आंतरराष्ट्रीय महत्त्वाचे रोगप्रतिबंधक व रोगनियंत्रक कार्य करणे’* हे या संस्थेचे ध्येय आहे. असे प्रयत्न करणाऱ्या संस्था पूर्वीही होत्या.


   इतिहास : भयंकर साथीचे रोग संसर्गामुळे पसरतात आणि अशा संसर्ग झालेल्या व्यक्तींचा विलग्नवास करण्याचे *(इतरांपासून अलग ठेवण्याचे, क्वारंटाइनाचे)* महत्त्व अगदी प्राचीन काळापासून लोकांना पटले होते. *चौदाव्या शतकात अशा विलग्नवासाची व्यवस्था भूमध्य समुद्रावरील बंदरात होती.*


विलग्नवासामुळे रोगांचा प्रसार नेहमी थांबेच असे नाही, कारण त्या काळी रोगप्रसाराच्या कारणांचे ज्ञानच अपुरे होते. निरनिराळ्या देशांतील बंदरांत विलग्नवास व्यवस्था निरनिराळी असे, तसेच त्याकरिता केलेले कायदेही एकाच प्रकारचे नसत त्यामुळे व्यापारउदीमाला बराच अडथळा येई. १८५२ पासून या कायद्यांच्या एकसूत्रीकरणाचे प्रयत्न झाले, परंतु विसाव्या शतकाच्या सुरुवातीस सूक्ष्मजंतुशास्त्राची भक्कम पायावर स्थापना होऊन रोगप्रतिबंधाच्या मूलतत्त्वांबद्दल बरेचसे एकमत होईपर्यंत या कामी विशेष प्रगती झाली नाही. विलग्नवासविषयक नियमांमुळे साधारण एकसूत्रीपणा आल्यानंतर या कार्यासाठी एखादी आंतरराष्ट्रीय यंत्रणा असावी, असा विचार प्रबळ झाला. अशा यंत्रणेची मुख्य उद्दिष्टे खालीलप्रमाणे असावीत हा विचारही पटू लागला.


*(१) स्‍वास्थ्यसंरक्षणविषयक आंतरराष्ट्रीय संकेतांचा अर्थ लावून त्यांत वेळोवेळी होणाऱ्या बदलांचा अभ्यास करणे त्या संकेतांचा भंग होत असल्याच्या तक्रारीबद्दल अधिकृत मत प्रदर्शित करणे.*

 

*(२) रोगविज्ञानात होत असलेल्या प्रगतीचा अभ्यास करण्यासाठी परिषदा भरवून त्यानुसार आंतरराष्ट्रीय संकेत व कायदे यांत बदल सुचविणे.*        


*(३) साथीच्या रोगांबद्दल जागतिक माहिती गोळा करून ती सर्व देशांना पुरविणे.*


   अशा माहितीच्या आधारावरच विलग्नवासविषयक नियम करण्यात येतात. १९०२ मध्ये या उद्दिष्टपूर्तीसाठी अखिल अमेरिकन आरोग्य संस्था स्थापण्यात आली. १९०९ मध्ये *पॅरिस* येथे *‘आंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक आरोग्य कार्यालय’* स्थापण्यात आले. ही संस्थाच पहिली जागतिक स्वरूपाची संस्था असून ती १९४७ ते १९५० च्या दरम्यान जागतिक आरोग्य संघटनेत विलीन झाली.


   यापूर्वी कित्येक वर्षे आंतरराष्ट्रीय सहकार्याने सोडवण्यासारख्या अनेक प्रश्नांकडे लोकांचे लक्ष वेधले गेले होते. उदा., औषधिद्रव्ये व रक्तरसापासून (रक्तातील घन पदार्थविरहित रक्तद्रवापासून) बनविलेल्या लसींचे प्रमाणीकरण, रोगांचे सर्वमान्य असे नामाभिधान ठरविणे, जन्ममृत्यूंची माहिती एकत्र करून पुरविणे व मादक पदार्थांविषयी (अफू, कोकेन वगैरेंविषयी) वैद्यकीय माहिती पुरविणे वगैरे. रोगासारख्या संकटाविरुद्ध आंतरराष्ट्रीय आघाडी उभारावयाची असेल, तर त्यासाठी प्रत्येक राष्ट्रातील जनतेची आरोग्यपातळी वाढविणे हाच एक कायमचा आणि खरा टिकाऊ उपाय आहे, याचीही जाणीव होऊ लागली. रोगसंसर्ग कमी होण्यासाठी राष्ट्राराष्ट्रांनी आपापसांत बांध उभे करणे हे प्रभावी साधन होऊ शकत नाही, हेही पटू लागले होते. पॅरिस येथील संस्थेच्या घटनेत अशा तऱ्हेच्या जागतिक प्रयत्नांना वाव नसल्यामुळे १९२१ मध्ये राष्ट्रसंघाने अशी जागतिक आरोग्य यंत्रणा उभी केली, ही एक सुदैवाचीच गोष्ट मानली पाहिजे.

*🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏*

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा - यवतमाळ ४४५२०६

गाथा बलिदानाची डॉ पंजाबराव देशमुख

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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      *डाॕ. पंजाबराव देशमुख*

           ( भाऊसाहेब देशमुख)                                                                                                   *जन्म :  २७ डिसेंबर १८९८*

             (पापळ,अमरावती)

*मृत्यू :   १० एप्रिल १९६५*

                   (दिल्ली)

                                                                                          मूळ आडनाव - कदम                                 राष्ट्रीयत्व : भारतीय

टोपणनावे : भाऊसाहेब

नागरिकत्व : भारतीय

शिक्षण : डॉ.

प्रशिक्षणसंस्था : श्री शिवाजी शिक्षण संस्था

पेशा : समाज सेवक,राजकारण

मूळ गाव : पापळ

राजकीय पक्ष : भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस

जोडीदार : विमलाबाई

'भूतकाळ विसरा,तलवार विसरा,जातिभेद पुरा,सेवाभाव धरा' हे पंजाबराव देशमुखांचे ब्रीदवाक्य होते.                                          पंजाबराव देशमुख उच्च शिक्षण घेऊन ते स्वातंत्र्य लढ्यात सामील झाले. इ.स. १९३६ च्या निवडणुकीपश्चात ते शिक्षणमंत्री झाले. स्वतंत्र भारतात ते भारताचे कृषी मंत्री होते. विदर्भात शिक्षणाचा प्रसार व्हावा म्हणून त्यांनी श्री शिवाजी शिक्षण संस्था काढली. या संस्थेच्या पश्चिम विदर्भात म्हणजे अमरावती विभागात अंदाजे १,०००च्या वर शाळा आहेत. महाविद्यालये, अभियांत्रिकी पदवी, तसेच पदविका तंत्रनिकेतन, कृषी महाविद्यालय, वैद्यकीय महाविद्यालय अशी अनेक महाविद्यालये सुरू करून त्या संस्था शिक्षण क्षेत्रात फार मोठे योगदान देत आहेत.                                          💁‍♂️   *संक्षिप्त जीवन*

 

१९२७- शेतकरी संघाच्या प्रचारासाठी 'महाराष्ट्र केसरी' हे वर्तमानपत्र चालविले.


वैदिक वाङ्मयातील धर्माचा उद्गम आणि विकास' या प्रबंधाबद्दल डॉक्टरेट.


१९३३ - शेतकऱ्यांची कर्जातून मुक्तता करणारा कर्ज लवाद कायदा पारiत करण्यात मोठा वाटा. त्यामुळे त्यांना हिंदुस्थानच्या कृषक क्रांतीचे जनक म्हणतात.


१९२६ - मुष्टिफंड या माध्यमातून गरीब होतकरू विद्यार्थ्यांसाठी श्रद्धानंद छात्रालय काढले.


१९२७ - शेतकरी संघाची स्थापना.


१९३२ - श्री. ए. डब्ल्यू. पाटील यांच्या सहकार्याने श्री शिवाजी शिक्षण संस्थेची स्थापना.


? - ग्रामोद्धार मंडळाची स्थापना.


१९५० - लोकविद्यापीठाची स्थापना (पुणे), त्याचे नंतर यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र मुक्त विद्यापीठात रूपांतर झाले.


१९५५ - भारत कृषक समाजाची स्थापना व त्याच्याच विद्यमाने 'राष्ट्रीय कृषी सहकारी खरेदी विक्री संघाची स्थापना.


१९५६ - अखिल भारतीय दलित संघाची स्थापना.


१८ ऑगस्ट १९२८ - अमरावती अंबाबाई मंदिर अस्पृश्यांसाठी खुले व्हावे म्हणून सत्याग्रह .


१९३० - प्रांतिक कायदे मंडळावर निवड. शिक्षण, कृषी, सहकार खात्याचे मंत्री


लोकसभेवर १९५२, १९५७, १९६२ तीन वेळा निवड.


१९५२ ते ६२ केंद्रीय मंत्रिमंडळात कृषिमंत्री. भारताचे पहिले कृषिमंत्री.


देवस्थानची संपत्ती सरकारने ताब्यात घेऊन विधायक कार्य करावे या उद्देशाने १९३२ मध्ये हिंदू देवस्थान संपत्ती बिल मांडले.


प्राथमिक शिक्षकांच्या समस्या सोडवण्यासाठी प्राथमिक शिक्षक संघाची स्थापना.


१९६० - दिल्ली येथे जागतिक कृषी प्रदर्शन भरवले.

                                                                                              ✴️  *डॉ.पंजाबराव देशमुख यांचे : चरित्र & कार्य"*


बहुजनांच्या शिक्षणाचे शिल्पकार आणि कृषिक्रांतीचे अग्रदूत भाऊसाहेब डॉ.पंजाबराव देशमुख यांचे चरित्र आणि कार्य हिमलयापेक्षा उत्तुंग आहे हे नव्याने सांगण्याची गरज नाही.देशातील शेतकरी आणि महाराष्ट्रातील शिक्षणाची अवस्था भाऊसाहेबांनी अनुभवली होती.


"चिखलात पाय आणि पायात काटा,अशाच वाटा ग्रामीण विद्यार्थ्यांच्या वाट्याला असतात" या वास्तवाचे भान असलेल्या भाऊसाहेबांचा जन्म २७ डिसेंबर १८९८ रोजी अमरावती जिल्ह्यातील पापड या गावी झाला. शेतकरी कुटुंबात जन्मास आलेल्या पंजाबरावांच्या आईचे नाव राधाबाई आणि वडील शामरावबापू असे होते. इयत्ता ३ री पर्यंतचे शिक्षण पापड या गावीच झाले. ४था वर्ग नसल्याने एक वर्ष पुन्हा ३ र्याच वर्गात शिक्षण घ्यावे लागले.पुढे भाऊसाहेबांचे आजोळ सोनेगावच्या जवळच असलेल्या चांदूर रेल्वेच्या प्राथमिक शाळेत चौथा वर्ग पूर्ण केला.


माध्यमिक शिक्षण (कारंजा) लाड येथे तर matric चे शिक्षण अमरावतीच्या हिंदू हायस्कूल मधून पूर्ण केले.


पुण्याच्या फर्ग्युसन कॉलेज मधून इंटरमिडीएटचे शिक्षण घेऊन उच्च शिक्षणासाठी भाऊसाहेब इंग्लंड ला गेले.तेथे त्यांनी ‘वेद वाड:मयातील धर्माचा उद्गम आणि विकास'(१९२०)मध्ये OXFORD विद्यापीठाच्या डॉक्टरेट (पी.एच.डी.) हि पदवी संपादन केली. प्रतिकूल परिस्थितीशी सामना करत इच्छाशक्ती आणि आत्मविश्वासाच्या बळावर प्रकांडपांडित्य संपादन करणारे भाऊसाहेब कधीच पोथीनिष्ठ नव्हते तर ते होते कृतीनिष्ट.


बहुजनांचे दु:ख दूर करणारे डॉक्टर व अन्याय दूर करण्यासाठी झगडणारे ते Baristar होते.


*"भाऊसाहेबांचे शैक्षणिक व सामाजिक कार्य"*


🏛️ *महाराष्ट्राच्या शिक्षणाचे शिल्पकार*                                                      दोन भाऊ-त्यात भाऊसाहेब पंजाबराव देशमुख व कर्मवीर भाऊराव पाटील हे आहेत. देशातील सर्वात मोठ्या श्री शिवाजी शिक्षण संस्थेची स्थापना भाऊसाहेबांनि १९३१ मध्ये अमरावती येथे केली.यानंतर विदर्भाचा ‘शैक्षणिक विकास भारतीय शेती शेतकरी आणि बहुजन उद्धाराची चळवळ' हे भाऊसाहेबांच्या जीवनाचे ध्येय ठरले.बहुजनांच्या शिक्षणातील अडचण हि प्रतीगाम्यांची मनुवादी विचारधारा आहे हि मनुवादी विचारधारा नेस्तनाभूत करण्यासाठी अखंड प्रयत्न केले.शोषितांचे उद्धारकर्ते आणि कृषकांचे कैवारी असलेल्या भाऊसाहेबांनी "जगातील शेतकऱ्यांनो संघटीत व्हा" हा मंत्र दिला.देशाचे कृषिमंत्री असताना १९५९ ला शेतकऱ्यांसाठी ‘जागतिक कृषि प्रदर्शनाचे" आयोजन केले.तसेच जपानी भातशेतीचा त्यांचा प्रयोग उल्लेखनीय आहे.ते कृषि विद्यापीठाच्या कल्पनेचे जनक आहेत.


शिक्षण,शेती,सहकार,अश्पृश्योद्धार,जातीभेद निर्मुलन,धर्म इ.विविध क्षेत्रात त्यांनी अवाढव्य कार्य केले.ग्रामीण समाज पोथीनिष्ठ आणि परंपरानिष्ट असल्याने त्यांच्यात अज्ञान, अंधश्रद्धा, दैववाद, अवैज्ञानिकता, देवभोळेपणा खच्चून भरल्यामुळेच हा समाज शिक्षणापासून वंचित राहिला हे त्यांना ठाऊक होते.तसेच ब्राम्हणी वर्णवर्चस्ववाद हा ग्रामीण बहुजन समाजाला पद्धतशीरपणे शिक्षणापासून दूर ठेवण्यासाठीचा प्रयत्न होता. खऱ्या अर्थाने भारतातील बहुजन समाज हा गुलामगिरीच्या शृंखलांनी जखडलेला होता आणि १०% सेटजी,भटजी,लाद्जी हा वर्ग सरकारी वर्ग नोकऱ्या, उच्चपदे, सोयी सवलतीचा लाभ घेत होता.


जुलै १९२६ नंतर भारतात परत आल्यावर चातुर्वर्णप्रणीत जातीव्यवस्था , अश्पृश्यता, अज्ञान,दारिद्र्य,पारतंत्र्य यासाठी स्वत:ला पूर्णत: वाहून घेतले.१९२७ सालच्या मोशीच्या हिंदुसभेचा अधिवेशनाचा डॉ.पंजाबराव देशमुखांनी ताबा घेतला व आपल्या ओजस्वी भाषणातून सबंध श्रोतावर्ग काबीज केला. चातुर्वर्ण, अश्पृश्यता, जातीभेद याचा निषेध ठराव वामनराव घोरपडे यांनी मांडला व भाऊसाहेब याला अनुमोदन देताना म्हणाले, "आमची गुलामगिरी नष्ट करण्याकरिता अस्पृशता निवरनासारख्या सुधारनाच्या चिठ्ठ्या हिंदूधर्माला जोडून आम्ही त्याची भोके बुजविण्याचा प्रयत्न करीत आहोत.चातुर्वर्ण व्यवस्थेचा रांजन दुरुस्त झाला नाही तर तो रांजनच फोडून टाकण्यास आम्ही मागे पुढे पाहणार नाही." हे भाऊसाहेबांचे उर्वरित कार्य शिवश्री.पुरुषोत्तम खेडेकर,डॉ.आ.ह.साळुंके,इतिहासाचार्य मा.म.देशमुखान्सारख्या कोट्यावधी बहुजन बांधवांनी १२ जानेवारी २००५ रोजी मातृतीर्थ सिंधखेडराजा येथे शिवधर्माचे प्रगटन करून केले आहे.आता चातुर्वर्ण व्यवस्थेचा रांजन फुटल्यामुळे डॉ.बाबासाहेब आंबेडकरांना अभिप्रेत असलेली स्वातंत्र्य,समता,न्याय,बंधुता अशी लोकशाही या देशात अस्तित्वात येईल.


डॉ.पंजाबराव देशमुखांच्या बहुजन उद्धाराच्या कार्यावर चिडलेल्या मनुवाद्यांनी त्यांच्या खुनाचाही प्रयत्न केला.पण भाऊसाहेब डगमगले नाहीत,पुढे त्यांनी २६ नोव्हेम्बर १९२७ रोजी सोनार कुटुंबात जन्मलेल्या कु.विमल वैद्य या युवतीशी आंतरजातीय विवाह करून मराठा-सुवर्णकार नातेसंबंध जुळवून आणले.त्यांनी १९३० मध्ये अस्पृश्य पित्तर केला.तसेच हिंदू देवस्थान संपत्ती बिल १९३२ मध्ये आणले.भाऊसाहेबांनी डॉ.बाबासाहेबांसोबत १९२७ मध्ये अमरावती येथील अंबादेवी मंदिर प्रवेशासाठी सत्याग्रह केला.मंदिर प्रवेशामागे ईश्वर भक्तीचा त्यांचा उद्देश नव्हता.भाऊसाहेबांचा देवावर विश्वासच नव्हता.ते म्हणत ,"मूर्तीत देव असेल तर मूर्तीत देव घडविणारा कारागीर हा देवाचा बापच ठरेल."


खरोखरच आजही डॉ. भाऊसाहेबांचे कार्य शिक्षण क्षेत्रात काम करणाऱ्या शिक्षक, संस्थाचालक,शिक्षणतज्ञाना तसेच बहुजन समाजाला प्रेरणादायी आहे.


अश्या या महामानवाच्या नावाने व त्यांच्याच कार्यप्रणालीवर चालणारी डॉ.पंजाबराव देशमुख राष्ट्रीय शिक्षक परिषद ही विद्यार्थी,शिक्षक व समाजहिता साठी कार्य करत असते.ज्यांना ज्यांना यात प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहभाग घेता येईल अशा सर्वांनी सहभाग घेवून समाजऋण फेडावे.

   📚 *पंजाबराव देशमुखांच्या जीवनावरील पुस्तके*

सूर्यावर वादळे उठतात. (नाटक, लेखक बाळकृष्ण द. महात्मे)      🏅 *सन्मान*

विदर्भातील अकोला येथे असलेल्या कृषी विद्यापीठाला डाॅ. पंजाबराव देशमुखांचे नाव दिले आहे.                                                                                                                                

                                            

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳  

🙏🙏🙏 *शुभ प्रभात*🙏🙏🙏

 संकलन -)गजानन गोपेवाड

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

गाथाबलीदानाची राणा सागा

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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              *राणा सांगा*

       *(महाराणा संग्राम सिंह)*                                                 (एक वीर प्रतापी राजपूत शासक)

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*जन्म :      १२ अप्रैल १४८४*                                                     *मृत्यू :       १७ मार्च १५२७*                                                                महाराणा संग्राम सिंह उदयपुर में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे तथा राणा रायमल के सबसे छोटे पुत्र थे।                                                    राणा साँगा (शासनकाल १५०९ से १५२८ ई.) को *'संग्राम सिंह'* के नाम से भी जाना जाता है। वह राणा रायमल (शासनकाल १४७३ से १५०९ ई.) का पुत्र और उत्तराधिकारी था। इतिहास में संग्राम सिंह मेवाड़ का राजा साँगा के नाम से प्रसिद्ध था। उसने अपने शासन काल में दिल्ली, मालवा और गुजरात के विरुद्ध अभियान किया।। राणा साँगा महान् योद्धा था और तत्कालीन भारत के समस्त राज्यों में से ऐसा कोई भी उल्लेखनीय शासक नहीं था, जो उससे लोहा ले सके।


🏇 *युद्ध की आवश्यकता*

बाबर के भारत पर आक्रमण के समय राणा साँगा को आशा थी कि वह भी तैमूर की भाँति दिल्ली में लूट-पाट करने के उपरान्त स्वदेश लौट जायेगा। किंतु १५२६ ई. में राणा साँगा ने देखा कि इब्राहीम लोदी को 'पानीपत के युद्ध' में परास्त करने के बाद बाबर दिल्ली में शासन करने लगा है, तब उसने बाबर से युद्ध करने का निर्णय कर लिया। मालवा के महमूद ख़िलजी को युद्ध में हराने के बाद राणा साँगा का प्रभाव आगरा के निकट एक छोटी-सी नदी पीलिया ख़ार तक धीरे-धीरे बढ़ गया था। लेकिन सिंधु-गंगा घाटी में बाबर द्वारा मुग़ल साम्राज्य की स्थापना से राणा साँगा को ख़तरा बढ़ गया। राणा साँगा ने बाबर को भारत से खदेड़ने और कम-से-कम उसे पंजाब तक सीमित रखने के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं।


📝 *बाबर का कथन*

बाबर ने राणा साँगा पर संधि तोड़ने का दोष लगाया। उसका कहना था कि- "राणा साँगा ने मुझे हिन्दुस्तान आने का न्योता दिया और इब्राहिम लोदी के ख़िलाफ़ युद्ध में मेरा साथ देने का वायदा किया था, लेकिन जब मैं दिल्ली और आगरा फ़तह कर रहा था, तो उसने पाँव भी नहीं हिलाये।"


🔮 *राणा साँगा के सहायक*

इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि राणा साँगा ने बाबर के साथ क्या समझौता किया था। हो सकता है कि उसने एक लम्बी लड़ाई की कल्पना की हो और सोचा हो कि जब तक वह स्वयं उन प्रदेशों पर अधिकार कर सकेगा, जिन पर उसकी निगाह थी। या शायद उसने यह सोचा हो कि दिल्ली को रौंद कर लोदियों की शक्ति को क्षीण करके बाबर भी तैमूर की भाँति लौट जायेगा। बाबर के भारत में ही रुकने के निर्णय ने परिस्थिति को पूरी तरह से बदल दिया। इब्राहिम लोदी के छोटे भाई महमूद लोदी सहित अनेक अफ़ग़ानों ने यह सोच कर राणा साँगा का साथ दिया कि अगर वह जीत गया, तो शायद उन्हें दिल्ली की गद्दी वापस मिल जायेगी। मेवात के शासक हसन ख़ाँ मेवाती ने भी राणा साँगा का पक्ष लिया। लगभग सभी बड़ी राजपूत रियासतों ने राणा की सेवा में अपनी-अपनी सेनाएँ भेजीं।


🛡️ *जिहाद का नारा*

राणा साँगा की प्रसिद्धि और बयाना जैसी बाहरी मुग़ल छावनियों पर उसकी प्रारम्भिक सफलताओं से बाबर के सिपाहियों का मनोबल गिर गया। उनमें फिर से साहस भरने के लिए बाबर ने राणा साँगा के ख़िलाफ़ 'जिहाद' का नारा दिया। लड़ाई से पहले की शाम उसने अपने आप को सच्चा मुस्लिम सिद्ध करने के लिए शराब के घड़े उलट दिए और सुराहियाँ फोड़ दी। उसने अपने राज्य में शराब की ख़रीद-फ़रोख़्त पर रोक लगा दी और मुसलमानों पर से सीमा कर हटा दिया। बाबर ने बहुत ध्यान से रणस्थली का चुनाव किया और वह आगरा से चालीस किलोमीटर दूर खानवा नामक स्थान पर पहुँच गया। पानीपत की तरह ही उसने बाहरी पंक्ति में गाड़ियाँ लगवा कर और उसके साथ खाई खोद कर दुहरी सुरक्षा की पद्धति अपनाई। इन तीन पहियों वाली गाड़ियों की पंक्ति में बीच-बीच में बन्दूक़चियों के आगे बढ़ने और गोलियाँ चलाने के लिए स्थान छोड़ दिया गया।


🤺 *खानवा का युद्ध*


'खानवा की लड़ाई' (१५२७) में ज़बर्दस्त संघर्ष हुआ। बाबर के अनुसार साँगा की सेना में २००,००० से भी अधिक सैनिक थे। इनमें १०,००० अफ़ग़ान घुड़सवार और इतनी संख्या में हसन ख़ान मेवाती के सिपाही थे। यह संख्या भी, और स्थानों की भाँति बढ़ा-बढ़ा कर कही गई हो सकती है, लेकिन बाबर की सेना निःसन्देह छोटी थी। साँगा ने बाबर की दाहिनी सेना पर ज़बर्दस्त आक्रमण किया और उसे लगभग भेद दिया। लेकिन बाबर के तोपख़ाने ने काफ़ी सैनिक मार गिराये और साँगा को खदेड़ दिया गया। इसी अवसर पर बाबर ने केन्द्र-स्थित सैनिकों से, जो गाड़ियों के पीछे छिपे हुए थे, आक्रमण करने के लिए कहा। ज़जीरों से गाड़ियों से बंधे तोपख़ाने को भी आगे बढ़ाया गया।                               ✴️ *साँगा की पराजय*

बाबर की कुशल सैन्य क्षमता और उसके तोपख़ानों से साँगा की सेना बीच में घिर गई और बहुत से सैनिक मारे गये। राणा साँगा की पराजय हुई। राणा साँगा बच कर भाग निकला ताकि बाबर के साथ फिर संघर्ष कर सके, परन्तु उसके सामन्तों ने ही उसे ज़हर दे दिया जो इस मार्ग को ख़तरनाक और आत्महत्या के समान समझते थे। इस प्रकार राजस्थान का सबसे बड़ा योद्धा अन्त को प्राप्त हुआ। साँगा की मृत्यु के साथ ही आगरा तक विस्तृत संयुक्त राजस्थान के स्वप्न को बहुत धक्का पहुँचा।


'खानवा की लड़ाई' से दिल्ली-आगरा में बाबर की स्थिति सुदृढ़ हो गई। आगरा के पूर्व में ग्वालियर और धौलपुर जैसे क़िलों की शृंखला जीत कर बाबर ने अपनी स्थिति और भी मज़बूत कर ली। उसने हसन ख़ाँ मेवाती से अलवर का बहुत बड़ा भाग भी छीन लिया। फिर उसने मालवा स्थित चन्देरी के मेदिनी राय के विरुद्ध अभियान छेड़ा। राजपूत सैनिकों द्वारा रक्त की अंतिम बूँद तक लड़कर जौहर करने के बाद चन्देरी पर बाबर का राज्य हो गया। बाबर को इस क्षेत्र में अपने अभियान को सीमित करना पड़ा, क्योंकि उसे पूर्वी उत्तर प्रदेश में अफ़ग़ानों की हलचल की ख़बर मिली।

                                                                                                                        

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳  

🙏🙏🙏 *शुभ प्रभात*🙏🙏🙏

 संकलन -)

गजानन गोपेवाड

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

महात्मा जोतिबा फुले

 ++++ *जोतीराव गोविंदराव फुले* ++++

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~~~~ *महात्मा 👳‍♀️जोतिबा फुले*~~~~

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*वैज्ञानिक दृष्टिकोन असलेले मराठी लेखक,विचारवंत आणि समाजसुधारक*

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*जन्मदिन - एप्रिल ११, इ.स. १८२७*


महात्मा जोतीबा फुले (११ एप्रिल इ.स. १८२७ - २८ नोव्हेंबर इ.स. १८९०) हे मराठी लेखक, विचारवंत आणि समाजसुधारक होते. त्यांनी सत्यशोधक समाजाची स्थापना केली. शेतकरी आणि बहुजन समाजांच्या समस्यांना केंद्रस्थानी ठेऊन पुरोगामी विचारांची मांडणी केली. महाराष्ट्रातील स्त्री शिक्षणास प्रोत्साहन देऊन मुहुर्तमेढ रोवली. त्यांनी भारतातील मुलींची पहिली शाळा १८४८ साली पुणे येथे भिडेंच्या वाड्यात उघडली. आपल्या पुरोगामी विचारांची निर्भयपणे मांडणी केली व स्वत:चे विचार आचरणात आणले

२३ सप्टेंबर इ.स. १८७३ रोजी महात्मा फुले यांनी सत्यशोधक समाजाची स्थापना केली. पुरोहितांकडून होणाऱ्या अन्यायापासून, अत्याचारापासून व गुलामगिरीतून तथाकथित शूद्रातिशूद्र समाजाची मुक्तता करणे व त्यांना हक्काची जाणीव करून देणे हे सत्यशोधक समाजाचे ध्येय होते.

*'सर्वसाक्षी जगत्पती । त्याला नकोच मध्यस्ती ॥'*

      हे समाजाचे घोष वाक्य होते. सत्यशोधक समाजाने गुलामगिरी विरुद्ध आवाज उठविला आणि सामाजिक न्यायाची व सामाजिक पुनर्रचनेची मागणी केली. सत्यशोधक समाजातर्फे पुरोहिताशिवाय विवाह लावण्यास सुरुवात केली. मराठीत मंगलाष्टके रचली. समाजातील विषमता नष्ट करणे व तळागाळातील समाजापर्यंत शिक्षण पोहचवणे हे सत्यशोधक समाजाचे ध्येय होते.शिक्षणाचे महत्त्व पटवून देणार्‍या त्यांच्या कवितेच्या खालील ओळी प्रसिद्ध आहेत. –


*“ विद्येविना मती गेली। मतिविना नीती गेली।*

*नीतिविना गती गेली। गतिविना वित्त गेले।*

*वित्ताविना शूद्र खचले। इतके अनर्थ एका अविद्येने केले।। ”*

       जोतीरावांनी त्यांच्या पत्नी सावित्रीबाईंना शिक्षण देऊन शिक्षणकार्यास प्रवृत्त केले. शाळेच्या मुख्याध्यापकपदी आरूढ झालेली भारतातील पहिली महिला म्हणजे सावित्रीबाई. त्याचप्रमाणे स्वतंत्रपणे फक्त स्त्रियांसाठी शाळा काढणारे महात्मा फुले पहिले भारतीय होत.

वाचनाची अतिशय आवड असल्यामुळे शिवाजी महाराजांचे चरित्र व थॉमस पेन या विचारवंताच्या *‘राईटस् ऑफ मॅन’* या ग्रंथाचा त्यांच्यावर विशेष प्रभाव पडला. बहुजन समाजाचे अज्ञान,दारिद्रय आणि समाजातील जातिभेद पाहून ते अतिशय अस्वस्थ होत असत. ही सामाजिक परिस्थिती सुधारण्याचा त्यांनी निश्चय केला. त्याप्रमाणे आपल्या पत्नी सावित्रीबाईंना त्यांनी साक्षर केले. १८४८ साली पुण्यामध्ये बुधवार पेठेतील भिडे यांच्या वाड्यात पहिली मुलींची शाळा काढून तेथील शिक्षिकेची जबाबदारी सावित्रीबाईंवर सोपविली. महाराष्ट्रातील स्त्री शिक्षणाची ही मुहूर्तमेढ ठरली. तसेच अस्पृश्य मुलांसाठी पुण्याच्या वेताळपेठेत १८५२ मध्ये त्यांनी शाळा स्थापन केली. त्यांच्या या कार्याला सनातन्यांकडून सतत विरोध होत असे. पण जोतीराव आपल्या भूमिकेवर ठाम असत. समाज सुधारण्याच्या कार्याला गती देण्यासाठी व व्यापक करण्यासाठी १८७३ साली त्यांनी *‘सत्यशोधक समाजा’* ची स्थापना केली. ‘कोणताही धर्म ईश्वराने निर्माण केलेला नाही आणि चातुर्वण्य व जातिभेद ही निर्मिती मानवाचीच आहे’

मानवाने गुण्यागोविंदाने रहावे असे त्यांचे मत होते. त्यांनी लिहिलेल्या *‘शेतकर्याचे आसूड’* या पुस्तकातून महाराष्ट्रातील शेतकऱ्यांची विदारक दुर्दशा आणि दारिद्रयाची वास्तवता विशद केली आहे. या पुस्तकाद्वारे विशाल दृष्टिकोनाचा क्रांतिकारक म्हणून ही जोतीरावांचे दर्शन होते. *‘नीती हाच मानवी जीवनाचा आधार आहे’* हा विचार मांडणारे जोतीराव एक तत्वचितक व्यत्तिमत्त्व म्हणूनही आपल्यासमोर येतात.

सार्वजनिक सत्यधर्म' हा सत्यशोधक समाजाचा प्रमाण ग्रंथ मानला जातो.या समाजाचे मुखपत्र म्हणून *'दीनबंधू'* हे साप्ताहिक चालविले जात असे. तुकारामाच्या अभंगांचा त्यांचा गाढा अभ्यास होता. अभंगांच्या धर्तीवर त्यांनी अनेक *'अखंड'* रचले. त्यांना सामाजिक विषमतेचे जागतिक भान होते. आपला *'गुलामगिरी'* ग्रंथ अमेरिकेतील कृष्णवर्णीयांना त्यांनी समर्पित केला. *'अस्पृश्यांची कैफियत'* हा महात्मा फुलेंचा अप्रकाशित ग्रंथ आहे. सार्वजनिक सत्यधर्म हा त्यांचा ग्रंथ त्यांच्या मृत्यूनंतर इ.स. १८९१ मध्ये प्रकाशित झाला.

*🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏*

संकलन -)

गजानन गोपेवाड

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

बुधवार, ७ एप्रिल, २०२१

रांजणवाडी म्हणजे काय?

 *_आजची माहिती_*


*_📙रांजणवाडी म्हणजे काय ?📙_*

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_रांजणवाडी होण्याचा अनुभव आपण कधी ना कधी तरी घेतलेला असतोच. 'काहीतरी चोरून खाल्ल्यावर रांजणवाडी होते बरं का !' असंही कोणी आपल्याला गमतीने म्हटलेले असते. रांजणवाडी हा डोळ्यांचा आजार आहे. पापण्यांच्या मुळाशी पू साठायला लागून हा रोग होतो. आपल्या पापण्यांच्या मुळाशी तैलग्रंथी असतात. त्यांना 'झीज' ग्रंथी असे म्हणतात. या ग्रंथीचे तोंड बंद होऊन आता ग्रंथीतील स्राव साठून त्यामध्ये जंतुसंसर्ग होतो व त्यामुळे या ठिकाणी पूर साठावयास लागतो. पापणी लाल, सोडलेली दिसते. डोळ्यांची उघडझाप करताना दुखते. स्पर्शाने वेदना होतात यालाच रांजणवाडी असे आपण म्हणतो._

     _रांजणवाडी पिकल्यावर आपोआप फुटते व पू निघून गेल्यावर पापणी पूर्ण बरी होते. रांजणवाडीची नुसती सुरुवात असल्यास गरम पाण्यात कपडा बुडवून त्याने शिकल्याने रांजणवाडी एक दोन दिवसांत जिरू शकते. जिरली नाही तर तरी पिकण्यासाठी शेकल्याने मदत होते व ती लवकर फुगून फुटते. सुजेच्या सुरुवातीस पू निघण्यासाठी पापणी दाबून प्रयत्न करू नये. त्यामुळे कधी कधी तेथील जंतुसंसर्ग रक्तवाहिन्यांद्वारे मेंदूमध्ये नेला जाऊन मेंदूमध्ये संसर्ग होऊ शकतो._

     _शेकणे या उपायांसोबतच आणखी एक उपाय घरच्या घरी करता येतो. लसणाच्या पाकळीचा रस सकाळ संध्याकाळ दोन दिवस लावला तर रांजणवाडी जिरते. वारंवार रांजणवाडी होणे हे शरीराची रोगप्रतिकार शक्ती कमी झाल्याचे लक्षण असू शकते. त्यामुळे असे होणार्‍या व्यक्तींनी डॉक्टरांचा सल्ला घ्यावा. एखादे वेळी त्यांना मधुमेहही झालेला असू शकतो._

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*_संकलन : गजानन गोपेवाड _*

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*_डॉ.जगन्नाथ दीक्षित, डाॅ.अंजली दीक्षित_*

_यांच्या 'मेडिकल जनरल नॉलेज' या पुस्तकातून_

गोष्टींचा वार शनिवार वाचन उपक्रम राबविताना अग्निपंख शै स, प्रमुख महाराष्ट्र राज्य गजानन गोपेवाड

अग्निपंख फाऊंडेशन महाराष्ट्र राज्य (ऊमरखेड) पीन 445206

 

गाथा बलीदानाची

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*🇮🇳🇮🇳 गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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           *मास्टर दा सूर्य सेन*                                     (चटगाँव सशस्त्र क्रांति के नायक)

                                                             *जन्म : २२ मार्च, १८९४*

(चटगाँव,अविभाजित बंगाल, ब्रिटिश भारत)

                                                                        *मृत्यु : १२ जनवरी १९३४*

        (बंगाल,आज़ाद भारत)

                                                                        अन्य नाम :- मास्टर सूर्य सेन                                                            अभिभावक :- रामनिरंजन

नागरिकता :- भारतीय

प्रसिद्धि :- स्वतंत्रता सेनानी

विद्यालय :- 'बहरामपुर कॉलेज', बहरामपुर

शिक्षा :- बी. ए.

विशेष योगदान :- वर्ष १९२३ तक मास्टर सूर्य सेन ने चटगाँव के कोने-कोने में क्रांति की अलख जगा दी थी।

अन्य जानकारी :- आपने २३ दिसम्बर, १९२३ को चटगाँव में आसाम-बंगाल रेलवे के ट्रेजरी ऑफिस को लूटा। उन्हें सबसे बड़ी सफलता 'चटगाँव आर्मरी रेड' के रूप में मिली थी।

                                             भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले प्रसिद्ध क्रांतिकारियों और अमर शहीदों में गिने जाते हैं। भारत भूमि पर अनेकों शहीदों ने क्रांति की वेदी पर अपने प्राणों की आहुति देकर आज़ादी की राहों को रोशन किया है। इन्हीं में से एक सूर्य सेन 'नेशनल हाईस्कूल' में उच्च स्नातक शिक्षक के रूप में कार्यरत थे, जिस कारण लोग उन्हें प्यार से 'मास्टर दा' कहते थे। "चटगाँव आर्मरी रेड" के नायक मास्टर सूर्य सेन ने अंग्रेज़ सरकार को सीधे चुनौती दी थी। सरकार उनकी वीरता और साहस से इस प्रकार हिल गयी थी की जब उन्हें पकड़ा गया, तो उन्हें ऐसी हृदय विदारक व अमानवीय यातनाएँ दी गईं, जिन्हें सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।                                    🔥 *क्रांतिकारी गतिविधियाँ*

युवा सूर्य सेन के हृदय में स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना दिन-प्रतिदिन बलवती होती जा रही थी। इसीलिए वर्ष १९१८ में चटगाँव वापस आकर उन्होंने स्थानीय स्तर पर युवाओं को संगठित करने के लिए "युगांतर पार्टी" की स्थापना की" अधिकतर लोग यह मानते थे कि तत्कालीन युवा वर्ग केवल हिंसात्मक संघर्ष ही करना चाहता था, जो कि पूर्णत: गलत था। स्वयं सूर्य सेन ने भी जहाँ एक और युवाओं को संगठित किया, वहीँ वह 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' जैसे अहिंसक दल के साथ भी जुड़े थे। वे 'भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस' की चटगाँव ज़िला कमेटी के अध्यक्ष भी चुने गए थे। अपने देशप्रेमी संगठन के कार्य के साथ ही साथ वह नंदनकानन के सरकारी स्कूल में शिक्षक भी नियुक्त हुए और यहीं से "मास्टर दा" के नाम से लोकप्रिय हो गए। नंदनकानन के बाद में वह चन्दनपुरा के 'उमात्रा स्कूल' के भी शिक्षक रहे।


💥 *गुरिल्ला युद्ध का निश्चय*

वर्ष १९२३ तक "मास्टर दा" ने चटगाँव के कोने-कोने में क्रांति की अलख जगा दी। साम्राज्यवादी सरकार क्रूरतापूर्वक क्रांतिकारियों के दमन में लगी हुई थी। साधनहीन युवक एक ओर अपनी जान हथेली पर रखकर निरंकुश साम्राज्य से सीधे संघर्ष रहे थे तो वहीं दूसरी और उन्हें धन और हथियारों की कमी भी सदा बनी रहती थी। इसी कारण मास्टर सूर्य सेन ने सीमित संसाधनों को देखते हुए सरकार से गुरिल्ला युद्ध करने का निश्चय किया और अनेक क्रांतिकारी घटनाओं को अंजाम दिया। उन्हें पहली सफलता तब मिली, जब उन्होंने दिन-दहाड़े २३ दिसम्बर, १९२३ को चटगाँव में आसाम-बंगाल रेलवे के ट्रेजरी ऑफिस को लूटा। किन्तु उन्हें सबसे बड़ी सफलता 'चटगाँव आर्मरी रेड' के रूप में मिली, जिसने अंग्रेज़ सरकार को झकझोर कर रख दिया। यह सरकार को खुला सन्देश था की भारतीय युवा मन अब अपने प्राण देकर भी दासता की बेड़ियों को तोड़ देना चाहता है।


🌀 *'भारतीय प्रजातान्त्रिक सेना' का गठन*

सूर्य सेन ने युवाओं को संगठित कर "भारतीय प्रजातान्त्रिक सेना" नामक एक सेना का संगठन किया। उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों के दल ने, जिसमें गणेश घोष, लोकनाथ बल, निर्मल सेन, अम्बिका चक्रवर्ती, नरेश राय, शशांक दत्त, अरधेंधू दस्तीदार, तारकेश्वर दस्तीदार, हरिगोपाल बल, अनंत सिंह, जीवन घोषाल और आनंद गुप्ता जैसे वीर युवक और प्रीतिलता वादेदार व कल्पना दत्त जैसी वीर युवतियाँ भी थीं। यहाँ तक की एक चौदह वर्षीय किशोर सुबोध राय भी अपनी जान पर खेलने गया।


🔫 *सैनिक शस्त्रागार की लूट*

पूर्व योजनानुसार १८ अप्रैल,१९३० को सैनिक वस्त्रों में इन युवाओं ने गणेश घोष और लोकनाथ बल के नेतृत्व में दो दल बनाये। गणेश घोष के दल ने चटगाँव के पुलिस शस्त्रागार पर और लोकनाथ जी के दल ने चटगाँव के सहायक सैनिक शस्त्रागार पर कब्ज़ा कर लिया। किन्तु दुर्भाग्यवश उन्हें बंदूकें तो मिलीं, किंतु उनकी गोलियाँ नहीं मिल सकीं। क्रांतिकारियों ने टेलीफ़ोन और टेलीग्राफ़ के तार काट दिए और रेलमार्गों को अवरुद्ध कर दिया। एक प्रकार से चटगाँव पर क्रांतिकारियों का ही अधिकार हो गया। तत्पश्चात् यह दल पुलिस शस्त्रागार के सामने इकठ्ठा हुआ, जहाँ मास्टर सूर्य सेन ने अपनी इस सेना से विधिवत सैन्य सलामी ली, राष्ट्रीय ध्‍वज फहराया और भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की।                              🔫 *अंग्रेज़ सैनिकों से संघर्ष*

इस दल को अंदेशा था की इतनी बड़ी घटना पर अंग्रेज़ सरकार तिलमिला जायेगी, इसीलिए वह गोरिल्ला युद्ध हेतु तैयार थे। इसी उद्देश्य के लिए यह लोग शाम होते ही चटगाँव नगर के पास की पहाड़ियों में चले गए, किन्तु स्थिति दिन पर दिन कठिनतम होती जा रही थी। बाहर अंग्रेज़ पुलिस उन्हें हर जगह ढूँढ रही थी। वहीं जंगली पहाड़ियों पर क्रांतिकारियों को भूख-प्यास व्याकुल किये हुए थी। अंतत: २२ अप्रैल, १९३० को हज़ारों अंग्रेज़ सैनिकों ने जलालाबाद पहाड़ियों को घेर लिया, जहाँ क्रांतिकारियों ने शरण ले रखी थी। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी क्रांतिकारियों ने समर्पण नहीं किया और हथियारों से लेस अंग्रेज़ सेना से गोरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। इन क्रांतिकारियों की वीरता और गोरिल्ला युद्ध-कोशल का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस जंग में जहाँ ८० से भी ज़्यादा अंग्रेज़ सैनिक मरे गए, वहीं मात्र १२ क्रांतिकार ही शहीद हुए। इसके बाद मास्टर सूर्य सेन किसी प्रकार अपने कुछ साथियों सहित पास के गाँव में चले गए। उनके कुछ साथी कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) चले गए, लेकिन इनमें से कुछ दुर्भाग्य से पकडे भी गए।


अंग्रेज़ पुलिस किसी भी तरह से सूर्य सेन को पकड़ना चाहती थी। वह हर तरफ़ उनकी तलाश कर रही थी। सरकार ने सूर्य सेन पर दस हज़ार रुपये का इनाम भी घोषित कर दिया। जब सूर्य सेन पाटिया के पास एक विधवा स्त्री सावित्री देवी के यहाँ शरण ले रखी थी, तभी १३ जून, १९३२ को कैप्टेन कैमरून ने पुलिस व सेना के साथ उस घर को घेर लिया। दोनों और से गोलीबारी हुई, जिसमें कैप्टेन कैमरून मारा गया और सूर्य सेन अपने साथियों के साथ इस बार भी सुरक्षित निकल गए। इतना दमन और कठिनाइयाँ भी इन क्रांतिकारी युवाओं को डिगा नहीं सकीं और जो क्रांतिकारी बच गए थे, उन्होंने दोबारा खुद को संगठित कर लिया और अपनी साहसिक घटनाओं द्वारा सरकार को छकाते रहे। ऐसी अनेक घटनाओं में वर्ष १९३० से १९३२ के बीच २२ अंग्रेज़ अधिकारी और उनके लगभग २२० सहायकों की हत्याएँ की गयीं।


⛓️ *मित्र का धोखा और गिरफ्तारी*

इस दौरान मास्टर सूर्य सेन ने अनेक संकट उठाए। उनके अनेक प्रिय साथी पकडे गए और अनेकों ने यातनाएँ सहने के बजाय आत्महत्या कर ली। स्वयं सूर्य सेन एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते और अपनी पहचान छुपाने के लिए नए-नए वेश बनाते। न तो उनके खाने का ठिकाना था और न ही सोने का, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। किन्तु दुर्भाग्यवश उन्हीं का एक धोखेबाज साथी, जिसका नाम नेत्र सेन था, ईनाम के लालच में अंग्रेज़ों से मिल गया। जब मास्टर सूर्य सेन उसके घर में शरण लिए हुए थे, तभी उसकी मुखबिरी पर १६ फ़रवरी,१९३३ को उनको पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इस प्रकार भारत का महान् नायक पकड़ा गया। नेत्र सेन की पत्नी अपने पति के इस दुष्कर्म पर इतनी अधिक दु:खी और लज्जित हुई कि जब उसके घर में उसी के सामने ही एक देशप्रेमी ने उसके पति की हत्या कर दी तो उसने कोई विरोध नहीं किया। यहाँ तक की जब पुलिस जाँच करने आई तो उसने निडरता से कहा- "तुम चाहो तो मेरी हत्या कर दो, किन्तु तब भी मैं अपने पति के हत्यारे का नाम नहीं बताऊँगी, क्योंकि मेरे पति ने सूर्य सेन जैसे भारत माता के सच्चे सपूत को धोखा दिया था, जिसे सभी प्रेम करते हैं और सम्मान देते हैं। ऐसा करके मेरे पति ने भारत माता का शीश शर्म से झुका दिया है।"                                                                       🕯️ *शहादत*

सूर्य सेन के प्रमुख साथी तारकेश्वर दस्तीदार ने अब "युगांतर पार्टी" की चटगाँव शाखा का नेतृत्व संभाल लिया। उन्होंने मास्टर सूर्य सेन को अंग्रेज़ों से छुड़ाने की योजना बनाई, लेकिन योजना पर अमल होने से पहले ही यह भेद खुल गया और तारकेश्वर, कल्पना दत्ता व अपने अन्य साथियों के साथ पकड़ लिए गए। सरकार ने सूर्य सेन, तारकेश्वर दस्तीदार और कल्पना पर मुकदमा चलाने के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना की। १२ जनवरी, १९३४ को सूर्य सेन को तारकेश्वर के साथ फाँसी की सज़ा दी गई, लेकिन फाँसी से पूर्व उन्हें ऐसी अमानवीय यातनाएँ दी गयीं। निर्दयतापूर्वक हथोड़े से उनके दांत तोड़ दिए गए, नाखून खींच लिए गए, हाथ-पैर जोड़-तोड़ दिए गए और जब वह बेहोश हो गए तो उन्हें अचेतावस्था में ही खींचकर फाँसी के तख्ते तक लाया गया। क्रूरता और अपमान की पराकाष्ठा यह थी की उनकी मृत देह को भी उनके परिजनों को नहीं सोंपा गया और उसे धातु के बक्से में बंद करके 'बंगाल की खाड़ी' में फेंक दिया गया।


📝 *अंतिम पत्र*

मास्टर सूर्य सेन जी ने ११ जनवरी को अपने एक मित्र को अंतिम पत्र लिखा था कि- "मृत्यु मेरा द्वार खटखटा रही है। मेरा मन अनंत की और बह रहा है। मेरे लिए यह वो पल है, जब मैं मृत्यु को अपने परम मित्र के रूप में अंगीकार करूँ। इस सौभाग्यशील, पवित्र और निर्णायक पल में मैं तुम सबके लिए क्या छोड़ कर जा रहा हूँ? सिर्फ़ एक चीज़ - मेरा स्वप्न, मेरा सुनहरा स्वप्न, स्वतंत्र भारत का स्वप्न। प्रिय मित्रों, आगे बढ़ो और कभी अपने कदम पीछे मत खींचना। उठो और कभी निराश मत होना। सफलता अवश्य मिलेगी।" अंतिम समय में भी उनकी आँखें स्वर्णिम भविष्य का स्वप्न देख रही थीं।


🗽 *स्मारक*

चटगाँव की सेन्ट्रल जेल में फाँसी के जिस तख्ते पर सूर्य सेन और तारकेश्वर दस्तीदार को फाँसी दी गयी थी, उसे बंगलादेश की सरकार ने सूर्य सेन जी का स्मारक घोषित किया है।

भारत में कोलकाता मेट्रो के एक स्टेशन का नाम भी उनके नाम पर "मास्टर दा सूर्य सेन" रखा गया है।

सिलीगुड़ी में उनके नाम पर एक पार्क भी है, जिसका नाम "सूर्य सेन पार्क" है और जहाँ उनकी मूर्ती भी स्थापित है।

१८ अप्रैल, २०१० को 'चत्तल सेवा समिति' ने बारासात स्टेडियम में सूर्य सेन की कांस्य प्रतिमा स्थापित की, जिसका लोकार्पण मास्टर सूर्य सेन के ही एक साथी विनोद बिहारी चौधरी ने किया था।

२०१० में ही प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक आशुतोष गोवारिकर ने 'चटगाँव विद्रोह' पर आधारित मानिनी चटर्जी की पुस्तक "डू एण्ड डाये" (करो और मरो ) पर फ़िल्म बनायी थी, जिसमें सूर्य सेन का किरदार अभिनेता अभिषेक बच्चन और प्रीतिलता जी का किरदार दीपिका पादुकोण ने निभाया।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                           

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳                             

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -) गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

मेंदुतील लहरी

 🧠  *_मनोवेध_*  🧠

       

🎯 *_मेंदूतील लहरी_*

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_जागृती आणि निद्रेच्या चार स्थितींमध्ये मेंदूतील विद्युतलहरींत फरक दिसतो. मानवी मेंदूत अब्जावधी मेंदूपेशी (न्यूरॉन्स) असतात. एक मेंदूपेशी तिच्या असंख्य शाखांच्या माध्यमातून दुसऱ्या मेंदूपेशींशी जोडलेली असते. या पेशींमधून विद्युतधारा वाहत असते. मेंदूतील ही विद्युतधारा तपासता येते, तिची तरंगलांबी (वेव्हलेंग्थ) आणि वारंवारता (फ्रीक्वेन्सी) मोजता येतात, त्यांचा आलेख काढता येतो. त्यास ‘इलेक्ट्रोएन्सेफॅलोग्राम (ईईजी)’ म्हणतात. या आलेखावरून मेंदूतील लहरींचे पाच प्रकार असतात असे लक्षात येते. हे प्रकार त्यांच्या वारंवारतेवरून केले जातात. डेल्टा, थीटा, अल्फा, बीटा आणि गॅमा अशी त्यांना नावे दिली आहेत._

     _त्यातील सर्वात संथ डेल्टा लहरी; त्यांचे प्रमाण आपण गाढ झोपलेलो असतो तेव्हा जास्त असते. त्यांची वारंवारता ० ते ४ हर्ट्झ (१ हर्ट्झ वारंवारता म्हणजे ती घटना दर सेकंदाला एकदा घडते.) असते. नवजात बालकांमध्ये याचे प्रमाण सर्वात जास्त असते, वय वाढते तसे ते कमी कमी होत जाते. अशा लहरी असलेली झोप माणसाला ताजेतवाने करते. या लहरींचे प्रमाण कमी असेल, तर त्या माणसाला शांत झोप लागत नसते. म्हणजे त्याच्या मेंदूला खरी विश्रांतीच मिळत नाही. मात्र जागेपणी यांचे प्रमाण जास्त असेल, तर ते मतिमंदत्वाचे लक्षण असू शकते. मेंदूला इजा झाली असल्यास याचे जागृतावस्थेतील प्रमाण वाढते._

     _डेल्टापेक्षा गतिमान लहरी म्हणजे थीटा त्यांची वारंवारता ४ ते ८ हर्ट्झ असते. या लहरी झोपेच्या दुसऱ्या टप्प्याच्या काळात अधिक असतात. जागृतावस्थेत या लहरी अधिक असतात, तेव्हा अंत:प्रेरणा किंवा आभास होण्याची शक्यता जास्त असते. संमोहित अवस्थेतही या लहरी जास्त असतात. या लहरींच्या काळात नवीन कल्पना सुचू शकतात. पण यांचे प्रमाण जास्त असेल तर औदासीन्य, नैराश्य वाढू शकते._

     _यापेक्षा अधिक गतिमान लहरी या ८ ते १२ हर्ट्झच्या असतात. त्यांना अल्फा लहरी म्हणतात. यापेक्षा वेगवान लहरी बीटा, त्यांची वारंवारता १२ ते ४० हर्ट्झ असते. जागे असताना या लहरी अधिक असतात. डिजिटल ईईजीचा शोध लागेपर्यंत गॅमा लहरी माणसाला माहीत नव्हत्या. जुन्या ईईजी तपासणीत २५ हर्ट्झपेक्षा अधिक वेगवान लहरी नोंदवता येत नसत. आधुनिक यंत्रांमुळे त्यांची नोंद शक्य झाली आहे. या लहरी गायक/नर्तक ‘फ्लो’मध्ये असतात, तेव्हा जास्त प्रमाणात असतात._



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*_संकलन : गजानन गोपेवाड _*

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 *_📡 जय विज्ञान 🔬_*

*_दैनिक लोकसत्ता,दिनांक-२९-जुन-२०२०_*

नवनिर्मिती ची प्रेरणा

 *_🔭मराठी विज्ञान परिषदेचे🔬_*

           🤔 *_कुतूहल_* 🤔


🎯 *_नवनिर्मितीची प्रेरणा_*

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_गणितामध्ये कळीची नवनिर्मिती अनेकदा अंत:स्फूर्तीतून होते असे मानले जाते. मात्र अशी प्रेरणा आपल्या ताब्यात किंवा हुकमी नसल्यामुळे ती कशी आणि केव्हा जागृत होईल हे सांगणे अशक्यप्राय आहे. उदाहरणार्थ, थोर गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन सांगत की, त्यांच्या स्वप्नात त्यांच्या कुलदेवतेच्या जिभेवरून खाली पडणारी गणिती सूत्रे त्यांना दिसत आणि जागे झाल्यावर ते ती लिहून त्यांची सिद्धता देण्याचा प्रयत्न करत. अर्थात, रामानुजन अलौकिक गणितज्ञ होते, निसर्गाचा जणू चमत्कार होते. कारण ती बहुतांश सूत्रे बरोबर आहेत हे सिद्ध झाले असले, तरी ती मुळात इतकी सखोल व अफलातून म्हणता येतील अशी असून अगदी प्रज्ञावंत गणितीलादेखील सुचणार नाहीत हे जगजाहीर आहे._

     _म्हणजेच केवळ तार्किक संरचना- जसे की, पूर्णांकांसाठी उपलब्ध प्रमेय किंवा उपपत्ती वास्तव संख्यांसाठी सिद्ध करणे असे व्यापैकीकरण (जनरलायझेशन), हे पथदर्शी नावीन्यपूर्ण गणित निर्माण करीलच असे नाही. अनेकदा संदिग्धताही महत्त्वाची भूमिका बजावते; म्हणजे निष्कर्ष सदोष किंवा सकृद्दर्शनी विसंगत असू शकतात. तरीदेखील अटकळी, विरोधाभास आणि काही वेळा तर्कहीन वाटणारी स्थिती यांचा मागोवा गणितात उल्लेखनीय भर घालू शकतो. गणितज्ञ असे आव्हानात्मक प्रश्न सोडवण्याचा प्रयत्न करतात. काही वेळा पूर्णपणे वा आंशिकपणे ते प्रश्न सोडवले जातात, तर बरेचदा त्याला दिलेल्या चौकटीत उत्तर नाही असा निष्कर्ष मिळू शकतो. उत्तर अस्तित्वात नाही अशा निष्कर्षांना गणितात अनन्यसाधारण महत्त्व आहे. याला कारण म्हणजे कुठला रस्ता घेऊ नका याचे मार्गदर्शन मिळते. तसेच चपखल नसले तरी, आसन्न (जवळचे) उत्तर मिळवण्यासाठी नवे तंत्र विकसित करण्यास चालना मिळते. वाहत्या मार्गात आलेल्या खडकामुळे जलप्रवाह काही वेळ थांबतो, पण नंतर त्याला वळसा घालून पुढे जातो. गणिताचेही काहीसे तसेच आहे._

     _गणित ही मानवनिर्मिती आहे, मात्र तिच्या मर्यादा ओलांडून विजयी होण्याचा प्रयत्न करणेही आपल्या हाती आहे. मुख्य म्हणजे, असा प्रयास कोणीही करू शकतो. त्यासाठी साधा कागद आणि पेन्सिल ही साधने पुरेशी आहेत. जोडीला गणकयंत्र आणि संगणक असेल तर उत्तम. निष्कर्षांचे व्यापैकीकरण या सरळसोट मार्गाशिवाय अन्य वाटांनी गणिताला पुढे नेण्याचे प्रयत्न आवश्यक आहेत. यासंदर्भात अद्याप सिद्धता न मिळालेल्या गणिती अटकळींनी सुरुवात करता येईल किंवा अशी कोडी- जी धन संख्यांसाठी गुंफली आहेत ती ऋण संख्यांसाठीही खरी आहेत का, हे तपासणसुद्धा चालेल! तर करायची ना सुरुवात?_



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*_संकलन : गजानन गोपेवाड _*

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 *_📡 जय विज्ञान 🔬_*

*_दैनिक लोकसत्ता,दिनांक- २२ फेब्रुवारी २०२१_*

समतोल आहार म्हणजे काय?

 *_आजची माहिती_*


*_📙 समतोल आहार म्हणजे काय ? 📙_*

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_आपला आहार समतोल असावा, चौरस असावा हा उपदेश ऐकून आपले कान किटले असतील. 'समतोल' म्हणजे काय हा प्रश्न आपल्याला पडणे स्वाभाविक आहे. समतोल आहार म्हणजे काय ? हे समजण्यासाठी प्रथम आहारात कोणते घटक असणे आवश्यक असते, हे आपण पाहू. कार्बोदके, प्रथिने, स्निग्ध पदार्थ, जीवनसत्त्वे, क्षार, पाणी हे अन्नातील सहा प्रमुख घटक होत._

     _कार्बोदके शरीराला ऊर्जा पुरवितात. प्रथिने शरीराच्या जडणघडणीसाठी आवश्यक असतात. स्निग्ध पदार्थांपासून ऊर्जा मिळते, तसेच शरीराच्या महत्त्वाच्या क्रियाप्रक्रियांना मदत होते. अ, ब, क, ड, इ तसेच के ही जीवनसत्त्वे आपल्याला अत्यंत अल्प प्रमाणात लागतात. पण ती मिळाली नाही तर अनेक आजारांना आपल्याला सामोरे जावे लागते. त्याचप्रमाणे सोडियम क्लोराइड सारखे हे क्षारही जगण्यासाठी आवश्यक असतात. पाणी हे तर साक्षात जीवनच ! शरीराच्या वचनांपैकी सुमारे ६४% वजन पाण्याचेच असते. हे सर्व घटक शरीराला योग्य प्रमाणात मिळाले नाही तर कुपोषण, रातांधळेपणा, मुडदूस, रोगप्रतिकारशक्तीचा अभाव, अशक्तपणा, गलगंड, रक्तक्षय इ. कमी पोषणामुळे होणारे आजार वा लठ्ठपणासारखे अतिपोषणामुळे होणारे आजार होऊ शकतात. हे टाळावयाचे असल्यास समतोल आहार घेणे आवश्यक ठरेल. ज्या आहारात वर वर्णन केलेले सर्व घटक योग्य प्रमाणात असतील त्यास समतोल आहार असे म्हणतात. योग्य प्रमाणात म्हणजे व्यक्तीला आवश्यक असलेली ऊर्जा त्यातून मिळाली पाहिजे. जीवनसत्वे, क्षार, पाणी मिळाले पाहिजे. खेरीज अनपेक्षित वा आकस्मित प्रसंगासाठी जसे आजार, अपघात यासाठी अतिरिक्त पोषणही त्याद्वारे मिळायला हवे. एकूण ऊर्जेपैकी ६५ ते ७०% कार्बोदकातून, १५ ते २५ % स्निग्ध पदार्थांतून तर ५ ते १५% प्रथिनांपासून मिळावी._

     _समतोल आहाराचा आपण अंगीकार केला तर निरोगी जीवनाकडे आपली वाटचाल सुरू राहील. आपण रोजचा आपला आहार बघितला तर ज्वारी, बाजरी, गहू, तांदूळ, नाचणी अशा कार्बोदके अधिक असलेल्या अन्नपदार्थांसोबत डाळी, भाजीपाला, तेल, तूप या गोष्टी; तसेच मांस, मासे, दूध, अंडी असे प्राणीज पदार्थ आपण वापरात आणत असतो. हे सर्व अन्नपदार्थ वेगवेगळे परिपूर्ण नसतात. परंतु यातील दोन तीन पदार्थ एकत्र वापरले तर या मिश्रणाचे पोषणमूल्य वाढते. उदाहरणार्थ नुसत्या भाताऐवजी वरण-भात डाळ-तांदळाची खिचडी वरण-भाकरी इडली-सांबार इत्यादी पदार्थांमुळे आहार परिपूर्ण होतो_

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*_संकलन : गजानन गोपेवाड _*

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*_डॉ.जगन्नाथ दीक्षित, डाॅ.अंजली दीक्षित_*

_यांच्या 'मेडिकल जनरल नॉलेज' या पुस्तकातून_

तेल खावे की तुप?

 *_आजची माहिती_*


*_📒तेल खावे की तूप ?📒_*

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_कोणाला तेल आवडते तर कोणाला तूप स्वयंपाकात तेल व तुप नसेल तर तो किती बेचव लागेल. पण पोषणाच्या दृष्टीने विचार केला तर तेल व तूप हे दोन स्निग्ध पदार्थाचेच प्रकार आहेत. सर्वसामान्य वातावरणात, तापमानात द्रवस्थितीत असणाऱ्या स्निग्ध पदार्थाला तेल; तर घनस्थितीत असणाऱ्या स्निग्ध पदार्थाला तूप असे म्हणतात._

     _स्निग्ध पदार्थ शरीराला ऊर्जा पुरविण्याचे कार्य करतात. शरीरातील हृदय, मूत्रपिंडासारख्या अवयवांचे हादर्‍यांपासुन रक्षण करण्याचे कार्यही मेदाच्या आवरणामुळे होते. १ ग्रॅम स्निग्ध पदार्थापासून ९ किलोकॅलरी इतकी ऊर्जा मिळते. तेल व तूप या दोन मध्ये मूलभूत घटक म्हणजे मेदाम्ले (fat acid). तेलात असंपृक्त (Unsaturated) मेदाम्ले मोठ्या प्रमाणावर असतात. करडईच्या तेलात ७३ टक्के तर शेंगदाण्याच्या तेलात ३८ टक्के इतकी असंपृक्त मेदाम्ले असतात. याउलट वनस्पती वा गाईच्या तुपात असंपृक्त मेदाम्ले ५ टक्क्यांहूनही कमी असतात._

     _तेल व तूप खूप जास्त प्रमाणात खाल्ले तर लठ्ठपणाचा त्रास होईल. जेवणात ४० टक्क्यांहून अधिक ऊर्जा स्निग्ध पदार्थापासून मिळत असेल तर कालांतराने हृदयविकाराचा झटका येऊ शकतो. काही संशोधनात असे सिद्ध झाले आहे की, जास्त स्निग्ध पदार्थ खाणाऱ्या लोकांमध्ये मोठ्या आतड्याचा व स्तनाचा कर्करोग होण्याचे प्रमाण जास्त आहे. संपृक्त मेदाम्ले असलेल्या स्निग्ध पदार्थांमुळे (तेलांमुळे) हृदयविकारांची शक्यता कमी होते. तसेच फ्रेनोडर्मा नावाचा त्वचारोगही होत नाही. त्यामुळे आहारात तुपा पेक्षा तेलच चांगले. आपल्याला लागणाऱ्या एकूण ऊर्जेच्या २० ते २५ टक्के ऊर्जा स्निग्ध पदार्थापासून मिळवायला काहीच हरकत नाही. मात्र त्यासाठी शक्यतो तेलच खावे. त्यातही करडई, सूर्यफूल वा सोयाबीनचे तेल चांगले._

     _"खाईन तर तुपाशी..."असे म्हणण्याऐवजी "खाईन तर तेलाशी..." असे म्हणायला पाहिजे. तीळ, मोहरी व शेंगदाणा तेल समप्रमाणात एकत्र करून ते वापरावे. हृदयरोग्यांसाठी ते हितकर आहे._

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*_संकलन : गजानन गोपेवाड _*

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*_डॉ.जगन्नाथ दीक्षित, डाॅ.अंजली दीक्षित_*

_यांच्या 'मेडिकल जनरल नॉलेज' या पुस्तकातून_

उकळलेले पाणी बेचव का असते

 *_आजची माहिती_*


*_📙उकळलेले पाणी बेचव का लागते ?📙_*

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_सर्दी झाली वा पोट खराब असेल तर उकळून गार केलेले कोमट पाणी तुम्ही प्यायला असाल. असे आणि बेचव लागते हे तुमच्या लक्षात आले असेल ! असे का बरे होत असावे ?_

     _पाण्याला त्याची चव त्यात विरघळलेल्या नायट्रोजनमुळे व क्षारांमुळे असते. त्यामुळे हापशाच्या पाण्याची चव, विहिरीच्या पाण्याची चव किंवा नदी, तळे, झरे, समुद्र यांच्या पाण्याची चव वेगवेगळी लागते. पाणी गरम केल्याने त्यातील विरघळलेले वायू वातावरणात निघून जातात व क्षार तळाशी गोळा होतात. अशा प्रकारे पाण्याला चव देणारे दोन्ही घटक नाहीसे झाल्याने पाणी बेचव लागते. त्यामुळेच असे पाणी प्यावे लागू नये, असेच सर्वांना वाटत असते. असे असले तरी वारंवार अामांश होणाऱ्या व्यक्तींनी उकळून गार केलेले पाणीच प्यावे. म्हणजे त्यांना आमांशाचा त्रास होणार नाही. हगवण लागलेल्या व्यक्तींनीही उकळलेले पाणी प्यावे. चवीपेक्षा सुरक्षितता जास्त महत्त्वाची असते, हे आपण समजून घ्यायला हवे._

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*_संकलन :गजानन गोपेवाड _*

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*_डॉ.जगन्नाथ दीक्षित, डाॅ.अंजली दीक्षित_*

_यांच्या 'मेडिकल जनरल नॉलेज' या पुस्तकातून_

गणितोत्सव दिवस

 *_🔭मराठी विज्ञान परिषदेचे🔬_*


            🤔 *_कुतूहल_* 🤔


🎯 *_गणितोत्सव दिवस_*

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_नवीन वर्षांची दिनदर्शिका आली की त्यात आपले सण केव्हा आहेत हे आपण बघतो. त्याचप्रमाणे काही गणिती दिवसदेखील साजरे केले जातात. त्यातील निवडक आज पाहू._

     _अलौकिक गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन यांचा १२५ वा जन्मदिवस २२ डिसेंबर २०१२ रोजी साजरा करताना, तो दिवस भारताचा ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ म्हणून घोषित केला गेला. जेमतेम ३२ वर्षांच्या आयुष्यात तसेच प्रतिकूल आर्थिक आणि शारीरिक परिस्थितीत त्यांनी केलेले अचंबित करणारे गणिती कार्य आणि नि:स्पृह चरित्र अशा पैलूंवर त्या दिवशी युवा पिढीला प्रेरणा देणारी व्याख्याने, परिसंवाद असे कार्यक्रम देशभर घेतले जातात तसेच गणिती खेळ, कोडी व अनेक रंजक उपक्रमही आयोजित केले जातात_

     _भारतात २९ जून हा ‘राष्ट्रीय संख्याशास्त्र दिवस’ म्हणून मानला जातो. तो आहे प्रा. प्रसंताचंद्र महालनोबीस यांचा जन्मदिवस, ज्यांनी सुमारे १०० वर्षांपूर्वी संख्याशास्त्राचे शिक्षण, संशोधन आणि उपयोजन याचा पाया भारतात रचला. त्यांनी भारतीय सांख्यिकी संस्था (आयएसआय) स्थापना करून तिला जागतिक दर्जा मिळवून दिला. संयुक्त राष्ट्रांकडून दर पाच वर्षांनी एक संकल्पसूत्र घेऊन २० ऑक्टोबर रोजी ‘जागतिक संख्याशास्त्र दिवस’ साजरा केला जातो. त्याप्रमाणे २०१०, २०१५ आणि २०२० साली अनुक्रमे ‘शासकीय सांख्यिकी व्यवस्थेचे सुयश’, ‘सुव्यवस्थित आधारसामग्री, उच्चतर आयुष्य’ आणि ‘विश्वसनीय सांख्यिकी माहितीने जग जोडावे’ अशी संकल्पसूत्रे होती._

     _‘पाय’चे स्थूलमानाने मूल्य ३.१४ असे आहे. महिना/ दिवस/ वर्ष या तऱ्हेने दिनांक लिहिण्याच्या पद्धतीमुळे अमेरिकेत व इतर काही देशांत १४ मार्च हा ‘पाय दिवस’ म्हणून साजरा केला जातो. आपण दिनांक दिवस/महिना/वर्ष असे लिहीत असल्यामुळे २२ जुलै हा आपला ‘पाय दिवस’ होऊ शकतो, कारण पायचे मूल्य स्थूलमानाने २२/७ असेही लिहिले जाते._

     _काही दिवस संख्यांच्या गणिती गुणधर्मामुळे साजरे होतात जसे की, फिबोनासी संख्यांचा क्रम १, १, २, ३, ५,.. असा आहे (मागच्या २ संख्यांची बेरीज करून नवीन संख्या मिळते) तरी त्यातील पहिल्या ४ संख्या अमेरिकेच्या महिना/दिवस दिनांक पद्धतीप्रमाणे ११/२३ म्हणजे २३ नोव्हेंबर हा ‘फिबोनासी दिवस’ निर्माण करतात. कधी कधी येणारा ‘पायथागोरस प्रमेय दिवस’ हा ‘अ२ + ब२ = क२’ सूत्रात बसणाऱ्या संख्यांनी निर्माण होतो. उदाहरणार्थ, दिनांक १५ ऑगस्ट २०१७; कारण १५२ + ८२ = १७२ किंवा १६ डिसेंबर २०२० (वर्षांचे शेवटचे दोन अंक). तेव्हा हे दिवस आणि ‘ई-दिवस’, ‘वर्गमूळ दिवस’ यांसारखे इतर गणिती दिवस शोधून साजरे करा._



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*_संकलन : गजानन गोपेवाड _*

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 *_📡 जय विज्ञान 🔬_*

*_दैनिक लोकसत्ता,दिनांक- ११ मार्च २०२१_*

मायक्रोफोन

 *_📗आजची माहिती 📗_*


*_🎤 मायक्रोफोन 🎤_*

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_माइक नसला, तर हल्ली प्रत्येक वक्त्याचे अडते. रेकॉर्डप्लेअरवर गाणे टेप करायचे असेल, तरी माईक लागतोच. टेलिफोनमध्ये ज्या बाजूला आपण बोलतो, त्या माऊथपीसमध्येही माईक असतोच. त्याचेच पूर्ण नाव मायक्रोफोन. या मायक्रोफोनमध्ये ध्वनीलहरींचे विद्युतलहरींत रूपांतर केले जाते. या लहरी मग जरुरीप्रमाणे अॅम्प्लीफायरकडे पाठवल्या जाऊन त्यांचे वर्धन केले जाते. वक्त्याचा रोजचा आवाज, साधे बोलणे मग पाहिजे तितक्या दूरवर, पाहिजे त्या लहान मोठ्या आवाजात ऐकवता येते. फोनवर बोलत असलो, तर हेच बोलणे जगाच्या पाठीवर दुसऱया फोनमध्ये कोठेही पाठवले जाऊ शकते. कॅसेटवर रेकॉर्ड करण्यासाठी माइकमधून आलेल्या विद्युतलहरींचाच उपयोग केला जातो._

     _मायक्रोफोनची रचना म्हणजे दोन पातळ धातुंच्या चकत्या एखाद्या सिलेंडरच्या तोंडाशी एकमेकांपासून अगदी थोडे अंतर ठेवून बसवलेल्या असतात. बाह्य चकती ही अगदी पातळ असून ध्वनिलहरींनी सहज कंप पावू शकणारी असते. तर आतील चकती जाड पण पक्की बसवलेली असते. यात मागील बाजूला एक छोटीशी बॅटरी असून तिच्यातून जाड चकतीवर सतत घनभार निर्माण केला जातो. जेव्हा ध्वनीलहरी बाह्य चकतीवर आदळतात व ती कंप पावते, तेव्हा तिच्यावर ऋणभार व आतील चकतीवरचा घनभार यांचा परिणाम होऊन ज्या विद्युतलहरी तयार होतात, त्याच अॅम्प्लीफायरकडे वा दुसऱ्या साधनाकडे पाठवल्या जातात. कंप पावण्याच्या क्षमतेनुसार या लहरींत फरक पडतो. या फरकामुळेच या लहरी जेव्हा लाऊडस्पीकरला पुरवल्या जातात तेव्हा पुन्हा जशीच्या तशी कंपने होऊन मूळ आवाजाबरहुकूम स्वर ऐकू येतात._

     _मायक्रोफोनचे अनेक आकार व प्रकार बघायला मिळतात. आपल्या नेहमीच्या परिचयाचा म्हणजे वक्त्याच्या समोर स्टँडवर उभा केलेला. याखेरीज हल्ली गायक हातात घेऊन गाणी म्हणतात, तो एक सुटसुटीत प्रकार आढळतोच. तिसरा प्रकार म्हणजे कॉलर माइक. वक्त्याच्या कॉलरलाच हा माईक अडकवलेला असतो. जेमतेम गुंडाच्या आकाराचा हा माईक वापरल्याने वक्ता येरझारा घालत सहज बोलू शकतो. याशिवाय दूरचित्रवाणी किंवा तत्सम कारणासाठी वक्त्यांच्या गळ्यात, कपड्यात लपेल, असाही छोटा माईक घातला जातो. हा माईक दिसत नाही, पण बोलणे मात्र आपल्याला ऐकू येते. कॉलरमाइकचीच ही सुधारित आवृत्ती. नाटकांसाठी वापरले जाणारे माईक हे अत्यंत संवेदनक्षम असतात. क्रिकेट मॅचमध्ये फलंदाजाच्या मागे स्टंम्पखाली वा स्टॅम्पमध्ये असेच माइक बसवण्याची पद्धत हल्ली वापरली जाते. या दोन्ही प्रकारांमध्ये हे माइक सहज दहा फुटांपर्यंतचा बारीकसारीक आवाज टिपू शकतात. त्यामुळेच नाटकातील पात्रे कुठेही असली, तरी त्यांचा आवाज सुस्पष्ट ऐकू येऊ शकतो किंवा फलंदाजाच्या बॅटला लागलेला चेंडूचा आवाजही दूरचित्रवाणीवरून आपण घरी ऐकू शकतो._

     _याखेरीज माईकचा नवीन प्रकार सध्या आपल्या देशातही वापरात येऊ लागला आहे. या प्रकाराचे नाव कॉर्डलेस माइक किंवा बग. यातील लहरींचे रूपांतर रेडिओलहरींमध्ये केले जाते. या रेडिओलहरी अॅम्प्लीफायरमध्ये नेमक्या पकडल्या जातात. या प्रकारच्या माईकला कसल्याही वायरची गरज नसते. हा माईक पाठवत असलेले संदेश पकडणारी यंत्रणा मात्र रेडिओलहरी पोहोचतील एवढ्या अंतरात लागते. कॉर्डलेस टेलिफोनचा माईक पण याच पद्धतीने काम करतो. ज्या वेळी गुप्तहेर या प्रकारचा माईक वापरतात, त्यावेळी त्याचा आकार अगदी लहान, न सापडणारा असल्याने त्याला बग म्हणतात. एखाद्या फुलदाणीतील फुलांमध्ये कोचाच्या तळाशी भिंतीवरील घड्याळामागेही तो लपवला जातो. महागडे पण शक्तिशाली उपकरण जेव्हा वापरले जाते तेव्हा या प्रकाराला 'बगिंग' असे म्हणतात थोडक्यात म्हणजे एखादा किडा ,ढेकूण जसा नकळत आपल्या आसपास वावरतो अगदी तेच यातून व्यक्त करायचे असते._

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*_संकलन : गजानन गोपेवाड _*

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*_सृष्टी विज्ञानगाथा विज्ञान व दिनविशेष मधून_*

कशास काय म्हणतात,

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💁‍♀️कशास काय म्हणतात 


जगाचे छप्पर – तिबेट

7 बेटयांचे शहर – मुंबई

सूर्यास्ताचा देश – इंग्लंड

5 नद्यांचा प्रदेश – पंजाब

धान्यांचे कोठार – प्रेअरीज प्रदेश

लवंगाची भूमी – मादागास्कर

पाचुंचे बेट – श्रीलंका

चीनचे दुख:श्रु – हो हॅंग हो नदी

7 टेकड्यांचे शहर – रोम

पूर्वेकडील व्हेनिस – कोची

निळा पर्वत – निलगिरी

नाईलची देणगी – इजिप्त

पवित्र भूमी – पॅलेस्टाईन

युरोपचे क्रीडांगण – स्वित्झरलॅंड

व्हाईट सिटी – बेलग्रेड

यंपायर्स सिटी – न्यूयार्क

भूमध्य समुद्राची किल्ली – जिब्राल्टर

भारताचे प्रवेशद्वार – मुंबई 

युरोपचा सुरुंग – बाल्कन प्रदेश

इंग्लंडचे उद्यान – पेठ

सुवर्णमंदिराचे शहर – अमृतसर

मैफल वृक्षांचा देश – कॅनडा

काळे खंड – आफ्रिका

बर्फाची भूमी – कॅनडा

युरोपचे रणक्षेत्र – बेल्जियम

गुलाबी शहर – जयपूर

राजवाड्यांचे शहर – कलकत्ता

पांढऱ्या हत्तीचा प्रदेश – सयाम

दुर्लक्षित शहर – ल्हॉसा

मोटार गाड्यांचे शहर – डेट्राईट

हजार सरोवरांचा प्रदेश – फिनलँड

उगवत्या सूर्याचा देश – जपान

मध्यरात्रीचा सूर्य – नार्वे

सोनेरी प्रवेश द्वाराचे शहर – सनफ्रान्सिस्को

गोऱ्या माणसाचे थडगे – गिनीचा किनारा

जगाचे साखरेचे कोठार – क्युबा

दक्षिण गोलार्धातील इंग्लंड – न्यूझीलंड

कंगारुंचा देश – ऑस्ट्रेलिया

अरबी समुद्राची राणी – कोची

युरोपचे गव्हाचे कोठार – युक्रेन

आसामचे अश्रु – ब्रह्मपुत्रा नदी

उत्तरेकडील व्हेमिस – स्टॉक होम


 💁‍♀️ जगातील पहिले व सर्वात मोठे 


पहिले अवकाशस्थानक – सॅल्युट – 1 ( रशिया )


पहिले अंतराळयान – स्पुटनीक – 1 (1957)


भारताला भेट देणारा पहिला युरोपीयन – मार्को पोलो


जगातील पहिली महिला पंतप्रधान – सिरीमाओ भंडारनायके


दक्षिण ध्रुवाला भेट देणारा पहिला वीर – अमुंडसेन


भारताला भेट देणारे पहिले अमेरिकन अध्यक्ष – आयसेन हॉवर


अंतराळात जाणारा पहिला सजीव -लायका नावाची कुत्री


चंद्रावर जाणारे पहिले अमेरिकन अवकाशयान (मानवसाहित) – आपोलो – 11


जगातील समुद्र प्रदक्षिण करणारा पहिला व्यक्ती – फर्डिनांड  मॅगेलन


अवकाशात पहिले उपग्रह सोडणारे पहिले राष्ट्र – रशिया


अमिरिकेने पाठविलेले पहिले उपग्रह – एक्सप्लोरर


भारताला भेट देणारे पहिले ब्रिटिश पंतप्रधान – हेरॉल्ड मॅकमिलन


पहिला अवकाशवीर – युरी गागारीन ( रशिया 12 एप्रिल 1969)


जगातील दुसरा व पहिला आफ्रिकन अंतराळ पर्यटक – मार्क शटलवर्थ  


पहिला अंतराळ पर्यटक – डेनिस टिटो (अमेरिका)



भारताला भेट देणारा पहिला चिनी प्रवासी – फहियान


सागरमार्गे भारतात येणारा पहिला प्रवासी – वास्को-द-गामा


पहिली महिला अवकाशवीर – वेलेन्टिना तेरस्कोव्हा (रशिया) 16 जुन 1963


भारताला भेट देणारे पहिले रशियन पंतप्रधान – निकोलन बुल्गानीन


अंतराळात स्पेस वॉक करणारा पहिला व्यक्ती – अलेक्सी लिओनाव


भारतावर आक्रमण करणारा पहिला युरोपीयन – सिकंदर 


जगातील पहिली महिला राष्ट्राध्यक्ष – मादिया एस्टेला पेरॉन (अर्जेन्टीना)


जिब्रास्टरची खाडी पोहून जाणारी पहिली महिला – आरती प्रधान (भारत)


चंद्रावर पाऊल टेकवणारा पहिला मानव – नील आर्मस्ट्रॉंग (20 जुलै 1969


जगातील सर्वात खोल सरोवर – बैकल सरोवर ( सैबेरिया)


जगातील सर्वात खोल महासागर – पॅसिफिक महासागर


भारतातील पहिला अवकाशवीर – राकेश शर्मा


भारतातील पहिली महिला अवकाशवीर – कल्पना चावला


जगातील सर्वात मोठे बेट – ग्रीनलँड


जगातील सर्वात उंच टॉवर – पेट्रोनॉल टॉवर (मलेशिया)


जगातील सर्वात उंच प्राणी – जिराफ


जगातील सर्वात मोठी घंटा – महान घंटा ( मॉस्को)


एवरेस्ट शिखर प्रथम सर करणारा – तेनसिंग नोर्के


जगातील सर्वात उंच शिखर – माऊंट एवरेस्ट (8852 मी.)


जगातील सर्वात मोठे वाळवंट – सहारा(आफ्रिका)


जगातील सर्वात उंच तळे – टिटिकाका


जगातील सर्वात मोठा लोकशाहीचा देश – भारत


जगातील सर्वात मोठी लिखित राज्यघटना – भारत


जगातील सर्वात उंच धरण – भाक्रा नांगल (740)


अमेरिकेचा पहिला अवकाशवीर – अॅलन शेफार्ड


अमेरिकेची पहिली अवकाशवीर – सॅली राईट


जगातील सर्वात उंच पार्क – एलोस्टोना नॅशनल पार्क (अमेरिका)


एवरेस्ट दोनदा काबील करणारा – नावांग गोम्बू


एवरेस्टवर पाऊल ठेवणारा पहिला अंध – व्हेनेसायर


जगातील सर्वात उंच पठारी प्रदेश – पामीरचे पठार (तिबेट)


प्राणवायू शिवाय प्रथम एवरेस्ट वर जाणारा – फू-दोरजी


एवरेस्टवर पाऊल ठेवणारे पहिले दांपत्य – आंद्रेज व मारिना स्टेम्फेलजी


एवरेस्ट वर पाऊल ठेवणारी पहिली महिला – जुंको तोबेई 


जपानमधील पहिला अवकाशवीर – मामोरु मोहरी


जपानमधील पहिली अवकाशवीर – चिआकी मुकाई


जगातील सर्वात मोठा बेटांचा समूह – इंडोनेशिया


जगातील सर्वाधिक लोकसंख्येचा देश – चीन


जगातील सर्वात मोठे बंदर – सिडने


जगातील सर्वात मोठी खाडी – हडसन बे ( कॅनडा)


जगातील सर्वात मोठा धबधबा – एन्जल (व्हेनेझुएला)


जगातील सर्वात मोठा पक्षी – शहामृग


जगातील सर्वात मोठे रेल्वे स्टेशन – ग्रँड सेंट्रल टर्मिनल (न्युयार्क)


जगातील सर्वात मोठे शहर – शांघाय (चीन)


जगातील सर्वात मोठा खंड – आशिया


जगातील सर्वात मोठा राजवाडा – व्हॅटीकन पॅलेस


जगातील सर्वात मोठे आखात – मारोक्कोचे आखात


जगातील सर्वात मोठा महासागर – पॅसिफिक


जगातील सर्वात मोठी मशीद – जामा मशीद,दिल्ली


जगातील क्षेत्रफळाच्या बाबतीत सर्वात मोठा देश – रशिया


जगातील सर्वात मोठे ग्रंथालय – लायब्ररी ऑफ कॉंग्रस,वॉशिंगटन


जगातील सर्वात मोठे हॉटेल – रोशिया मास्को


जगातील सर्वात मोठा त्रिभुज प्रदेश – सुंदरबन


जगातील सर्वात मोठ्या गोड्या पाण्याचे सरोवर – लेक सुपिरिअर


जगातील सर्वात मोठ्या खाऱ्या पाण्याचे सरोवर – कॅस्पियन समुद्र

⭐गजानन गोपेवाड ⭐

       

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