बुधवार, २३ जून, २०२१

काय रे मेघराजा कवी गजानन गोपेवाड

 *काय रे मेघराजा*

           


*काय रे मेघराजा,*

*असं शोभतं का तूला...*

*नेत्यासारखच तू पण,*

*राजकारणीच झाला....*


उमेदवारा सारखा तू पण,

लई जोशातच आलास...

तीनचार दिवस प्रचाराचा,

पाऊस पाडून गेलास....


गडगडाटाच भाषण ऐकून,

भोळा शेतकरी सुखावला....

तुझ्या आश्वासनात येऊन,

भुमित मतदान करुन गेला..


नेत्यासारखच तुझंही,

जल्लोषात स्वागत झालं...

इतका कोसळलास की,

तुला मोह आवरता नाही आलं...


विहीर ,बंधारे फोडून,

नदी, नाल्याला पूर आला...

कुठे बियाणे दडपून,

तर कुठे खरडूनच नेला...


 मतदारा सारखीच

शेतकऱ्याची गत झाली..

मातीत जीव ओतूनही,

दूबार पेरणीची वेळ आली...


धरणीच पोट फाडून,

अंकुर हिम्मतीने वर आले...

आईच्या दुधा विना,

बळ मिळेल का रे त्याले...


जगवायचच झालं तर,

वरपाण्यावरही जगतं...

बाळ सध्दृढ होण्यासाठी,

आईचच दूध लागतं...


उद्योग, व्यापाऱ्याच्या मदतीने,

हे सरकार चालतही असंल...

पण अंगात बळ कुठून येईल

जर जगाचा पोशिंदाच नसंल...


*ढगाळ आश्वासने देऊन,*

*सांगना कुठे रे गेलास...*

*काय रे मेघराजा'', तू पण*

*राजकारणी झालास........

मामाच पत्र कविता गजानन गोपेवाड

 *●काहीतरी संपलय●*


मामाचं पत्र हरवलंय की 

पत्र लिहिणारा मामाचं हरवलाय ?

एक काहीतरी नक्कीच हरवलंय !


कोंबड्याचं आरवणं थांबलंय की 

ती सकाळ व्हायचीच थांबलीय ?

एक काहीतरी नक्कीच थांबलय !


पाटीवर अभ्यास लिहायचा राहिलाय 

की आमची पाटी कोरीच राहिलीय ?

एक काहीतरी नक्कीच राहिलंय !


मऊ वरण-भात करपलंय 

की आमची जीभच करपलीय ?

एक काहीतरी नक्कीच करपलय !


संवाद कमी झालाय 

की विसंवाद वाढलाय ?

एक काहीतरी नक्कीच झालंय


आमचं वय वाढलंय 

की आमच्यातलं अंतर वाढलंय ?

एक काहीतरी नक्कीच वाढलंय


शुभं करोति म्हणायचं विसरलोय 

की शुभ म्हणजे काय तेच विसरलोय ?

एक काहीतरी नक्कीच विसरलोय !


रामाची गोष्ट संपली आहे 

की प्रत्येक गोष्टीतला रामच संपलाय ?


एक काहीतरी नक्कीच संपलय..!!🎻

लक्षणराव किर्लोस्कर

 *लक्ष्मणराव काशिनाथ किर्लोस्कर*

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*किर्लोस्कर उद्योग समूहाचे संस्थापक*

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*जन्म - २० जून  इ.स. १८६९*


लक्ष्मणराव काशिनाथ किर्लोस्कर (लकाकि) 

 २० जून, इ.स. १८६९ 

 २६ सप्टेंबर, इ.स. १९५६

    हे मराठी,हे भारतीय उद्योजक होते.ते किर्लोस्कर उद्योग समूहाचे संस्थापक होते.इ.स. १८८८ साली त्यांनी बेळगावात सायकल दुरुस्तीचे दुकान थाटत व्यावसायिक क्षेत्रात आपले पहिले पाऊल टाकले.शेतीसाठी त्यांनी बनवलेले लोखंडी नांगर हे पुढे विस्तारलेल्या किर्लोस्कर समूहाचे पहिले उत्पादन होते. किर्लोस्करवाडी येथे त्यांनी इ.स. १९१० साली कारखाना काढला; तसेच कारखान्यातील कर्मचाऱ्यांसाठी औद्योगिक वसाहत स्थापली.किर्लोस्कर समूहाची धुरा त्यांच्यानंतर त्यांचे पुत्र शंतनुराव किर्लोस्कर यांनी सांभाळली.


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

ब्लेझ पास्काल

 *📐📐📐ब्लेझ पास्काल📐📐📐*

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*फ्रेंच गणितज्ञ, भौतिकशास्त्रज्ञ, संशोधक, लेखक*

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*जन्मदिन - १९ जून  इ.स. १६२३*


ब्लेझ पास्काल (देवनागरी लेखनभेद: ब्लेस पास्कल; फ्रेंच: Blaise Pascal ; 

  *१९ जून इ.स. १६२३* 

 *१९ ऑगस्ट इ.स. १६६२*

  हा फ्रेंच गणितज्ञ,भौतिकशास्त्रज्ञ,संशोधक,लेखक व होता.त्याने आरंभीच्या काळात मूलभूत व उपयोजित विज्ञानात, विशेषकरूनद्रव पदार्थांच्या भौतिक गुणधर्मांबद्दल महत्त्वपूर्ण संशोधन केले. एवांगेलिस्ता तॉरिचेल्ली याने दाब व निर्वाताविषयी पहिल्यांदा प्रतिपदलेल्या संकल्पनांचे स्पष्टीकरण पास्कालाने मांडले. त्यांच्या अलौकिक बुद्धिमत्तेमुळे आधुनिक विचारवंतांमधील त्यांचे स्थान अनन्यसाधारण गणले जाते. त्यांचा जन्म क्लेरमाँ-फेराँ येथे झाला. १६२६ मध्ये त्यांची आई मृत्यू पावली व १६३१ मध्ये पास्काल कुटुंबाने पॅरिसला प्रयाण केले.

ब्लेझ पास्कालचे वडील उत्तम गणितज्ञ होते आणि त्यांच्या मार्गदर्शनाखालीच पास्कार अभ्यास न करता प्रथम लॅटिन व ग्रीक भाषांवर प्रभुत्व मिळवावे अशी त्यांच्या वडिलांची इच्छा होती. तथापि वयाच्या बाराव्या वर्षीच त्यांनी भूमितीच्या अभ्यासास सुरुवात केली व चौदाव्या वर्षापासून ते वडिलांसह रोबेर्व्हाल, मेर्सेन इ. भूमितिविज्ञांच्या साप्ताहिक बैठकींना हजर राहू लागले. १६३९ मध्येच त्यांनी ‘शांकवामध्ये [⇨ शंकुच्छेद] अंतर्लिखित केलेल्या षट्कोनाच्या विरुद्ध बाजूंच्या जोड्यांचे छेदबिंदू एकरेषीय असतात’ हे आता त्यांच्यात नावाने ओळखण्यात येणारे व प्रक्षेपय भूमितीत [⇨ भूमिति] महत्त्वाचे म्हणून मानण्यात येणारे प्रमेय मांडले. १६४० साली पास्कार कुटुंब या भूमितिविज्ञांच्या Brouillon project या ग्रंथाच्या आधारे शांकवांवरील निबंधांचा एक ग्रंथ (Essai pour les coniques) लिहून पूर्ण केला. या असामान्य ग्रंथामुळे त्यांना लहान वयातच पुष्कळ प्रसिद्धी लाभली व देकार्तसारख्या गणितज्ञांना सुद्धा त्यांचा हेवा वाटला.

वडिलांच्या हिशेबाच्या कामात मदत करण्याच्या उद्देशाने पास्कार यांनी बेरीज व वजाबकी करणारे एक यंत्र तयार करण्याची योजना १६४२ मध्ये आखली; हे यंत्र तयार करण्याचा व त्याचे वितरण करण्याचा एकाधिकार त्यांना १६४९ मध्ये प्राप्त झाला, तथापि ते महाग व क्लिष्ट असल्याने त्याचा फारसा प्रसार होऊ शकला नाही.                      

*🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏*

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

ज्येष्ठा मास,शुक्ल पक्ष, *नवमी*,हस्त नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,ग्रीष्म ऋतु,युगाब्ध ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

शनिवार, १९ जून २०२१.

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                        *प्रभात दर्शन*

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प्रियो भवति दानेन 

               प्रियवादेन चापरः,

मन्त्रं मूल बलेनान्यो 

              यः प्रियः प्रिय एव सः।


*भावार्थ - कुछ लोग उपहार देने पर प्रिय बनते हैं जबकि कुछ मनोहर बातों से, कुछ अन्य मन्त्रबल से प्रिय बनते हैं, पर जिन्हें आप प्रिय हैं, वो आपके प्रिय ही हैं (बिना कुछ किये ही)।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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गाथा बलिदानाची

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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            *दादा धर्माधिकारी*       

     *(शंकर त्रिम्बक धर्माधिकारी)* 

     (स्वंतन्त्रता सेनानी तथा लेखक)

        *जन्म : १८ जून १८९९*

          (बैतूल ज़िला,मध्य प्रदेश)

       *मृत्यु : १ दिसम्बर १९८५*

नागरिकता : भारतीय

प्रसिद्धि : स्वतन्त्रता सेनानी तथा लेखक

धर्म : हिन्दू

जेल यात्रा : 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के दौरान इन्हें गिरफ़्तार किया गया था।

संबंधित लेख : महात्मा गाँधी, असहयोग आन्दोलन, भारत छोड़ो आन्दोलन

विशेष : दादा धर्माधिकारी को हिन्दी, संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती और अंग्रेज़ी भाषाओं का अच्छा ज्ञान था।

कृतियाँ : 'अहिंसक क्रांति की प्रक्रिया', 'क्रांतिशोधक', 'गांधीजी की दृष्टी अगला कदम', 'युवा और क्रांति', 'समग्र सर्वोदय दर्शन' आदि।

अन्य जानकारी : दादा धर्माधिकारी 'गांधी सेवा संघ' के सक्रिय कार्यकर्ता थे। 'भारत छोड़ो आन्दोलन' की गिरफ्तारी से छूटने पर वे मध्य प्रदेश असेम्बली के सदस्य और संविधान परिषद के सदस्य चुने गए थे।

                           शंकर त्रिम्बक धर्माधिकारी  भारत के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, लेखक और गाँधीवादी चिंतक थे। ये 'गाँधी सेवा संघ' के सक्रिय कार्यकर्ताओं में से एक थे। आप 'दादा धर्माधिकारी' के नाम से अधिक जाने जाते थे। दादा धर्माधिकारी ने अपना अधिकांश समय दलितों और महिलाओं के उत्थान में लगाया। हिन्दी, संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती और अंग्रेज़ी भाषाओं का इन्हें अच्छा ज्ञान था। एक लेखक के रूप में इनकी दो दर्जन से भी अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं।


💁🏻‍♂️ *जन्म तथा शिक्षा*

दादा धर्माधिकारी का जन्म १८ जून,१८९९ को मध्य प्रदेश के बैतूल ज़िले में हुआ था। जब वे नागपुर में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, उसी समय महात्मा गाँधी ने 'असहयोग आन्दोलन' प्रारम्भ कर दिया। इस समय दादा धर्माधिकारी ने शिक्षा छोड़ दी और विद्यालय त्याग दिया। उन्होंने औपचारिक शिक्षा की कोई डिग्री नहीं ली थी, किन्तु स्वाध्याय से ही अपने समय के विचारको में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था।


☣️ *विभिन्न भाषाओं के ज्ञाता*

                        दादा धर्माधिकारी हिन्दी, मराठी, गुजराती, बंगला, संस्कृत और अंग्रेज़ी भाषाओ के अच्छे ज्ञाता थे।                                                        💥 *क्रांतिकारी गतिविधियाँ*

                        दादा धर्माधिकारी ने 'तिलक विद्यालय', नागपुर में शिक्षक के रूप में कार्य आरंभ किया। वे स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय भाग लेते रहे। १९३५ से वे वर्धा में जाकर रहने लगे। 'गांधी सेवा संघ' के वे सक्रिय कार्यकर्ता थे। दादा धर्माधिकारी का प्रमुख नेताओं से निकट का संपर्क था। 'भारत छोड़ो आन्दोलन' की गिरफ्तारी से छूटने पर वे मध्य प्रदेश असेम्बली के सदस्य और संविधान परिषद के सदस्य चुने गए थे। आचार्य विनोबा भावे के 'भूदान आन्दोलन' में भी उन्होंने आगे बढ़कर भाग लिया।


🔹 *दलितों का उत्थान*

दादा धर्माधिकारी ने अपने जीवन का लंबा समय दलितों और महिलाओं के उत्थान में लगाया। दादा वैचारिक क्रांति के पक्षधर थे। उनकी मान्यता थी कि समाज में परिवर्तन के लिए लोगों के विचारों में परिवर्तन आवश्यक है।


📚 ✍️ *कृतियाँ*

एक लेखक के रूप में भी दादा धर्माधिकारी ने अच्छा नाम कमाया था। हिन्दी, मराठी और गुजराती में उनकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं। उनकी कुछ कृतियाँ इस प्रकार हैं-


अहिंसक क्रांति की प्रक्रिया (हिन्दी)

आपल्या गणराज्याची घडण (मराठी)

क्रांतिशोधक (हिन्दी)

गांधीजी की दृष्टी (हिन्दी)

गांधीजी की दृष्टी अगला कदम (हिन्दी, जर्मन)

नये युग की नारी (हिन्दी)

नागरिक विश्वविद्यालय - एक परिकल्पना (मराठी)

प्रिय मुली (मराठी)

मानवनिष्ठ भारतीयता (हिन्दी, मराठी)

मैत्री (मराठी)

युवा और क्रांति (मराठीत, क्रांतिवादी तरुणांनो)

लोकतंत्र विकास और भविष्य (मराठीत, लोकशाही विकास आणि भविष्य)

समग्र सर्वोदय दर्शन (मराठीत, सर्वोदय दर्शन)

निधन

🪔 *निधन*                                                                 दादा धर्माधिकारी का निधन १ दिसम्बर,१९८५ को हुआ। 

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

*🙏🙏विनम्र अभिवादन🙏🙏🙏*

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संकलन -)गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

ज्येष्ठा मास,शुक्ल पक्ष, *अष्टमी*,उ.फा.नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,ग्रीष्म ऋतु,युगाब्ध ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

शुक्रवार, १८ जून २०२१.

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                         *प्रभात दर्शन*

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         *"कोई भी सम्बन्ध आत्मीय अनुभूति के बल पर ही टिकते हैं। जहाँ गहरी आत्मीयता नही, वो सम्बन्ध ही नही हैं, मात्र दिखावा है इसीलिए कहा गया है कि सम्बन्ध रक्त से नहीं, परिवार से नही, मित्रता से नही, व्यवहार से नही, अपितु.. मात्र आत्मीय अनुभूति से ही बनते और निर्वहन किए जाते हैं। जहाँ अनुभूति ही नहीं, आत्मीयता ही नहीं .. वहाँ अपनापन कहाँ से आएगा"*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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गाथा बलिदानाची

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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                  *स्वराज्यजननी*

               *राजमाता जिजाऊ*

*(जिजाबाई शहाजीराजे भोसले)*


   *जन्म : १२ जानेवारी १५९८*

(सिंदखेडराजा,बुलढाणा,महाराष्ट्र)


        *मृत्यू : १७ जून १६७४*

        (पाचड,रायगडचा पायथा)


वडील : लखुजीराव जाधव

आई : म्हाळसाबाई उर्फ 

           गिरिजाबाई

पती : शहाजीराजे भोसले

संतती : छत्रपती शिवाजीराजे भोसले, संभाजी शहाजी भोसले

राजघराणे : भोसले

चलन : होन


जिजाबाई (इतर नावे: जिजामाता,जिजाऊ,राजमाता,माँसाहेब,इत्यादी) ह्या मराठा साम्राज्याचे संस्थापक छत्रपती शिवाजी महाराजांच्या आई होत्या.सिंदखेडचे लखुजी जाधव हे जिजाबाईंचे वडील व आईचे नाव म्हाळसाबाई होते. जाधव हे देवगिरीच्या यादव घराण्याचे वंशज होते.डिसेंबर इ.स. १६०५ मध्ये जिजाबाईंचा शहाजीराजांशी दौलताबाद येथे विवाह झाला.


🔱 *भोसले व जाधवांचे वैर*


पुढे लखुजी जाधव व शहाजीराजे भोसले यांच्यात राजकीय बेबनाव निर्माण झाला, एकदा एक हत्ती पिसाळला होता, हत्तीस पकडण्यास २ पथके तयार केली पहिले जाधवांचे त्याचे नेतॄत्व दत्ताजीराव जाधव लखुजी जाधव यांचा मुलगा व जिजाबाई यांचा भाऊ. दुसरे पथक भोसले यांचे त्याचे नेतृत्व शरफोजी भोसले शहाजीराजे भोसले यांचे बंधू करत होते. यात दोघांचे भांडण झाले व संभाजी भोसले यांनी दत्ताजीराव जाधवास ठार केले. हे लखुजी जाधवास समजताच त्यांनी रागाने संभाजी भोसले यांस ठार केले. हे सर्व शहाजीराजांना समजताच ते समशेर घेऊन सासर्‍यावर चालून आले यात शहाजीराजे भोसल्यांच्या दंडावर वार लागला.


या प्रसंगानंतर जिजाबाईंनी आपल्या पतीशी एकनिष्ठ राहत आपल्या माहेराशी संबंध तोडले. नात्यांना, भावनांना बाजूला सारून आपल्या कर्तव्यात कसल्याही प्रकारचा कसूर न होऊ देता धैर्याने आणि खंबीरपणे आल्या प्रसंगाला सामोरे जाण्याचा जिजाबाईंचा हा गुण शिवाजी राजांत पुरेपूर उतरला होता.


🌀 *अपत्ये*


जिजाबाईंना एकूण आठ अपत्ये होती. त्यापैकी सहा मुली व दोन मुलगे होते. त्यांचा थोरला मुलगा संभाजी हा शहाजी राजांजवळ वाढला तर शिवाजी राजांची संपूर्ण जबाबदारी जिजाबाईंवर होती.


जिजाबाईंना पहिले अपत्य झाले त्याचे नाव तो सहा महिन्याचा झाल्यानंतर आपल्या मृत दीराच्या नावाप्रमाणे संभाजी ठेवले. त्‍यानंतर त्यांना ४ मुले झाली; चारही दगावली. ७ वर्षाचा काळ निघून गेला. १९ फेब्रुवारी १६३०, फाल्गुन वद्य तृतीया, शके १५५१ या दिवशी सूर्यास्ताच्या वेळी शिवनेरी येथे जिजाबाई यांना मुलगा झाला. मुलाचे नाव शिवाजी ठेवले.


⚜ *मुलाचे संगोपन व राजकारभार*


शिवाजी राजे १४ वर्षांचे असताना शहाजीराजांनी त्यांच्या हाती पुण्याची जहागीर सुपूर्त केली. अर्थातच जहागीरीची वहिवाट लावण्याची जबाबदारी जिजाबाईंवर येऊन पडली. कुशल अधिकार्‍यांसमवेत जिजाबाई आणि शिवाजी राजे पुण्यात येऊन दाखल झाले. निजामशाही, आदिलशाही आणि मुघलांच्या सततच्या स्वार्‍यांमुळे पुण्याची अवस्था अतिशय भीषण होती. अशा प्रतिकूल परिस्थितीत त्यांनी दादोजी कोंडदेव यांच्या सोबत नेटाने पुणे शहराचा पुनर्विकास केला.सोन्याचा नांगर घडवून त्यांनी शेतजमीन नांगरली, स्थानिक लोकांना अभय दिले. शिवाजी राजांच्या शिक्षणाची जबाबदारी पेलली. जिजाबाईंनी शिवाजी राजांना पारतंत्र्यात सुरू झालेल्या आणि  रामायण,महाभारतातील गोष्टी सांगितल्या.सीतेचे हरण करणार्‍या रावणाचा वध करणारा राम किती पराक्रमी होता, बकासुराचा वध करून दुबळ्या लोकांची सुटका करणारा भीम किती पराक्रमी होता,वगैरे. जिजाबाईंनी दिलेल्या या संस्कारांमुळेच .शिवाजीराजे घडले.जिजाबाईंनी नुसत्याच गोष्टी सांगितल्या नाहीत तर सदरेवर शेजारी बसवून राजकारणाचे पहिले धडेही दिले.


शिवरायांच्या मनात कर्तृत्वाची ठिणगी टाकतानाच जिजाबाईंनी त्यांना राजनीतीही शिकविली. समान न्याय देण्याची वृत्ती आणि अन्याय करणाऱ्याला कठोरात कठोर शिक्षा देण्याचे धाडस दिले . शस्त्रास्त्रांच्या प्रशिक्षणावर स्वत: बारकाईने लक्ष ठेवले . शहाजीराजांची कैद व सुटका, अफझलखानाचे संकट, आग्रा येथून सुटका अशा अनेक प्रसंगांत शिवरायांना जिजाबाईंचे मार्गदर्शन लाभले. शिवराय मोठ्या मोहिमांवर असताना, खुद्द जिजाबाई राज्यकारभारावर बारीक लक्ष ठेवत असत. आपल्या जहागिरीत त्या जातीने लक्ष घालत. सदरेवर बसून स्वत: तंटे सोडवत.


🔮 *जीवन*


शहाजी राजे बंगळूरात वास्तव्यास असतांना शिवाजीराजांच्या आई व वडिलांची चोख जबाबदारी जिजाबाईंनी मोठया कौशल्याने पेलली. सईबाईंच्या पश्चात संभाजी राजांचीही संपूर्ण जबाबदारी त्यांनी उचलली.


राजांच्या प्रथम पत्‍नी, सईबाईंचे भाऊ बजाजी निंबाळकर यांना जुलमाने बाटवण्यात आले होते. त्यांची हिंदू धर्मात परत येण्याची इच्छा होती, राजांचाही त्याला पाठिंबा होता. या धर्मराजकारणात जिजाबाई राजांच्या पाठीशी ठाम उभ्या राहिल्या. एवढेच नव्हे तर राजांची कन्या सखुबाईंना, बजाजी निंबाळकरांच्या मुलाला देऊन त्यांनी राज-सोयरीक साधली आणि बजाजींना पूर्णपणे धर्मात परत घेतले. या संपूर्ण प्रकरणात त्यांचा द्रष्टेपणा व सहिष्णूता दिसून येते.


राजांच्या सर्व स्वार्‍यांचा, लढायांचा तपशील त्या ठेवत. त्यांच्या खलबतांत, सल्ला मसलतीत भाग घेत. राजांच्या गैरहजेरीत स्वत: राज्याची धुरा वहात. शिवाजी राजे आग्र्याच्या कैदेत असताना राज्याची पूर्णत: जबाबदारी उतारवयातही जिजाबाईंनी कौशल्याने निभावून नेली.


शिवाजी राजांचा राज्याभिषेक व हिंदवी स्वराज्याची स्थापना पाहून राज्याभिषेकानंतर बारा दिवसांनी १७ जून १६७४ ला त्यांनी स्वतंत्र हिंदवी स्वराज्यात शेवटचा श्वास घेतला, आपल्या वयाच्या ८० व्या वर्षी जिजाबाईंचे रायगडाच्या पायथ्याशी असलेल्या पाचाड गावी वृद्धापकाळाने निधन झाले,या गावी राजमाता जिजाबाईंची समाधी आहे.


जिजाबाई ही आपल्या मनात तयार असलेली हिंदवी स्वराज्याची संकल्पना प्रत्यक्षात साकार करण्यासाठी छत्रपती शिवरायांना ज्ञान, चारित्र्य, चातुर्य, संघटन व पराक्रम अशा राजस व सत्त्वगुणांचे बाळकडू देणार्‍या राजमाता होय.


📚 *पुस्तके*


राजमाता जिजाबाईंचे गुणवर्णन करणारी अनेक पुस्तके आहेत, त्यांपैकी काही ही-


जिजाऊंची निष्ठा (काव्यसंग्रह, कवयित्री - मेधा टिळेकर

जेधे शकावली

शिवभारत

जिजाऊ (डॉ प्रतिमा इंगोले )

जिजाई : मंदा खापरे 

गाऊ जिजाऊस आम्ही : इंद्रजीत भालेराव

अग्निरेखा


🎞 *चित्रपट*


जिजाबाईंची भूमिका असणारे अनेक मराठी चित्रपट व मराठी नाटके आहेत. शिवाजी राजांवरच्या चित्रपट-नाटकांत जिजाबाईंचे पात्र बहुधा असते. परंतु जिजाबाईंवर स्वतंत्र असे फारच थोडे चित्रपट निघाले, त्यांपैकी काही हे :-


राजमाता जिजाऊ (दिग्दर्शक - यशवंत भालकर)

स्वराज्यजननी जिजामाता (दूरचित्रवाणी मालिका,निर्माते : अमोल कोल्हे)


  *जय जिजाऊ...जय शिवराय*


 *🚩🚩हर हर महादेव...🚩🚩*

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

*🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏*

संकलन -गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

बुधवार, १६ जून, २०२१

मित्रप्रेम कविता) :गजानन गोपेवाड

 *मित्र वेडेच असतात !!*


केंव्हाही येतात केंव्हाही जातात

मनाची दारं उघडीचं टाकतात  

आपल्या सुखात खळखळून हसतात

आपल्या दुःखात पिळवटून रडतात

                  मित्र   वेडेच असतात.!!


 जवळची नातीसुद्धा परकी होतात 

 दिलं ,घेतलं हिशाोबातअडकतात

 तिथं हेच सावरायलाच असतात

 सावरलंकी अलगद बाजुलाही सरकतात

                 मित्र  वेडेच असतात.!!


रक्ताच्या नात्याचे नसतात .

अग्निसमक्ष जोडलेले नसतात

 एखाद्या अवचित हळव्या क्षणी

 अद्वैत साधून मनात शिरतात

                 मित्र वेडेच असतात.!!


  सारे माझे तयांना ठाऊक असते

  सारे तयांचे मला ठाऊक असते

  कोठे काय बोलायचे उमजलेले असते

  काय ओठांच्या आत हवे माहित असते.

              मित्र वेडेच असतात.!!


 बालपणीचे निरागस बंध

 तारुण्यातील उनमत्त  गंध

 प्रौढपणीचा समजदार संग

 अवघे आयुष्य माझे रंगारंग 

              मित्र  वेडेच असतात.!!


मैत्री  खरंच अशी अनमोल असते. 

प्रत्येक जीवाने अनुभवायाचीअसते.

पण....पण.....

खुळ्या सोनेरी उन्हासारखी

आयुष्यात मैत्री जुळावी लागते.

               मित्र वेडेच असतात !!


असे मित्र आणि  मैत्री हि कोठेही विकत मिळत नाही , तेंव्हा आपल्या जवळच्या मित्रांना जपा 

गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र 



झाडे लावा झाडे जगवा

 *इवलंसं रोपटं मी*

*तू म्हणालास तर मरून जाईन,*


*ओंजळभर पाणी दे मला*

*आयुष्यभर तुझ्या कामी येईन,*


*दिलं जीवदान मला तर*

*तुला जगायला प्राणवायू देईन,*


*जगवलंस मला तर* 

*तुझ्या देवांसाठी फुलं देईन,*


*फुलवलंस मला तर*

*तुझ्या मुलांसाठी फळं देईन.*


*तळपत्या उन्हामध्ये* 

*तुझ्या कुटुंबाला सावली देईन,*


*तुझ्या सानुल्यांना खेळावया*

*माझ्या खांद्यावर झोका देईन,*


*तुझ्या आवडत्या पाखरांना*

*मायेचा मी खोपा देईन,*


*कधी पडला आजारी तर* 

*तुझ्या औषधाला कामी येईन,*


*झालो बेईमान जरी मी* 

*शेवटी तुझ्या सरणाला कामी येईन.*

        

             *🌿एक रोपटं🌿*


 *🌴🌴झाडे लावा झाडे जगवा*🌴🌴

ऐक जनजागृती आव्हान गजानन  गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र 



मंगळवार, १५ जून, २०२१

गाथाबलीदानाची

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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        *देशबंधू चितरंजन दास*


         *जन्म : ५ नवम्बर १८७०*

   (तेलीरबाग,ढाका,ब्रितानी भारत)


     *मृत्यु : १६ जून १९२५*

                   (उम्र ५५)

                  (दार्जिलिंग)


राष्ट्रीयता : भारतीय


व्यवसाय : वकील (बैरिस्टर)

पदवी : "देशबन्धु"


प्रसिद्धि कारण : भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रमुख नेताओं में से एक


राजनैतिक पार्टी : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (१९२३ से पहले)

स्वराज पार्टी (१९२३–१९२५)


जीवनसाथी : बसन्ती देवी


देशबन्धु चितरंजनदास सुप्रसिद्ध भारतीय नेता, राजनीतिज्ञ, वकील, कवि, पत्रकार तथा भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रमुख नेता थे। उन्होंने कई बड़े स्वतंत्रता सेनानियों के मुकद्दमे भी लड़े।


चितरंजन दास का जन्म ५ नवंबर १८७० को कोलकाता में हुआ। उनका परिवार मूलतः ढाका के बिक्रमपुर का प्रसिद्ध परिवार था। चितरंजन दास के पिता भुबनमोहन दास कलकत्ता उच्च न्यायालय के जाने-माने वकीलों में से एक थे। वे बँगला में कविता भी करते थे। उनका परिवार वकीलों का परिवार था।


सन्‌ १८९० ई. में बी.ए. पास करने के बाद चितरंजन दास आइ.सी.एस्‌. होने के लिए इंग्लैंड गए और सन्‌ १८९२ ई. में बैरिस्टर होकर स्वदेश लौटे। शुरू में तो वकालत ठीक नहीं चली। पर कुछ समय बाद खूब चमकी और इन्होंने अपना तमादी कर्ज भी चुका दिया।


वकालत में इनकी कुशलता का परिचय लोगों को सर्वप्रथम 'वंदेमातरम्‌' के संपादक श्री अरविंद घोष पर चलाए गए राजद्रोह के मुकदमे में मिला और मानसिकतला बाग षड्यंत्र के मुकदमे ने तो कलकत्ता हाईकोर्ट में इनकी धाक अच्छी तरह जमा दी। इतना ही नहीं, इस मुकदमे में उन्होंने जो निस्स्वार्थ भाव से अथक परिश्रम किया और तेजस्वितापूर्ण वकालत का परिचय दिया उसके कारण समस्त भारतवर्ष में 'राष्ट्रीय वकील' नाम से इनकी ख्याति फैल गई। इस प्रकार के मुकदमों में ये पारिश्रमिक नहीं लेते थे।


इन्होंने सन्‌ १९०६ ई. में कांग्रेस में प्रवेश किया। सन्‌ १९१७ ई. में ये बंगाल की प्रांतीय राजकीय परिषद् के अध्यक्ष हुए। इसी समय से वे राजनीति में धड़ल्ले से भाग लेने लगे। सन्‌ १९१७ ई. के कलकत्ता कांग्रेस के अध्यक्ष का पद श्रीमती एनी बेसंट को दिलाने में इनका प्रमुख हाथ था। इनकी उग्र नीति सहन न होने के कारण इसी साल श्री सुरेंद्रनाथ बनर्जी तथा उनके दल के अन्य लोग कांग्रेस छोड़कर चले गए और अलग से प्रागतिक परिषद् की स्थापना की। सन्‌ १९१८ ई. की कांग्रेस में श्रीमती एनी बेसंट के विरोध के बावजूद प्रांतीय स्थानिक शासन का प्रस्ताव इन्होंने मंजूर करा लिया और रौलट कानून का जमकर विरोध किया। पंजाब कांड की जाँच के लिए नियुक्त की गई कमेटी में भी इन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया। इन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह का समर्थन किया। लेकिन कलकत्ते में हुए कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में इन्होंने उनके असहयोग के प्रस्ताव का विरोध किया। नागपुर अधिवेशन में इन्होंने उनके असहयोग के प्रस्ताव का विरोध किया। नापुर अधिवेशन में ये २५० प्रतिनिधियों का एक दल इस प्रस्ताव का विरोध करने के लिए ले गए थे, लेकिन अंत में इन्होंने स्वयं ही उक्त प्रस्ताव सभा के सम्मुख उपस्थित किया। कांग्रेस के निर्णय के अनुसार इन्होंने वकालत छोड़ दी और अपनी सारी सपत्ति मेडिकल कॉलेज तथा स्त्रियों के अस्पताल को दे डाली। इनके इस महान्‌ त्याग को देखकर जनता इन्हें 'देशबंधु' कहने लगी।


असहयोग आंदोलन में जिन विद्यार्थियों ने स्कूल कॉलेज छोड़ दिए थे उनके लिए इन्होंने ढाका में 'राष्ट्रीय विद्यालय' की स्थापना की। आसाम के चाय बागानों के मजदूरों की दुःस्थिति ने भी कुछ समय तक इनका ध्यान आकर्षित कर रखा था।


सन्‌ १९२१ ई. में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के लिए दस लाख स्वयंसेवक माँगे थे। उसकी पूर्ति के लिए इन्होंने प्रयत्न किया और खादी विक्रय आदि कांग्रेस के कार्यक्रम को संपन्न करना आरंभ कर दिया। आंदोलन की मजबूत होते देखकर ब्रिटिश सरकार ने इसे अवैध करार दिया। ये सपत्नीक पकड़े गए और दोनों को छह छह महीने की सजा हुई। सन्‌ १९२१  ई. में अहमदाबाद कांग्रेस के ये अध्यक्ष चुने गए। लेकिन ये उस समय जेल में थे अतएव इनके प्रतिनिधि के रूप में हकीम अजमल खाँ ने अध्यक्ष का कार्यभार सँभाला। इनका अध्यक्षीय भाषण श्रीमती सरोजिनी नायडू ने पढ़कर सुनाया। ये जब छूटकर आए उस समय आंदोलन लगभग समाप्त हो चुका था। बाहर से आंदोलन करने के बजाए इन्होंने कांउसिलों में घुसकर भीतर से अड़ंगा लगाने की नीति की घोषणा की। गया कांग्रेस में ये अध्यक्ष थे लेकिन इनका यह प्रस्ताव वहाँ स्वीकार न हो सका। अतएव इन्होंने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और स्वराज दल की स्थापना की। कांग्रेस को उनकी नीति माननी पड़ी और उनका कांउसिल प्रवेश का प्रस्ताव सितंबर, १९२३ ई. में दिल्ली में हुए कांग्रेस के अतिरिक्त अधिवेशन में स्वीकार हो गया।


प्रस्ताव के अनुसार ये काउंसिल में घुसे। इनका दल बंगाल काउंसिल में निर्विरोध चुना गया। इन्हांने मंत्रिमंडल बनाना अस्वीकार कर दिया और मंत्रियों के वेतनों को मान्यता देना नामंजूर कर मांटफोर्ड सुधारों की दुर्गति कर डाली। सन्‌ १९२४-२५ में इन्होंने कलकत्ता नगर महापालिका में अपने पक्ष के काफी लोग घुसाए और स्वयं मेयर हुए।


इन दिनों कांग्रेस पर इनके स्वराज्य दल का पूरा कब्जा था और ये स्वयं उसके कर्ता-धर्ता थे। पटना के अधिवेशन में इन्होंने कांग्रेस की सदस्यता के लिए सूत कातने की अनिवार्य शर्त को ऐच्छिक करार दिया। लगभग इसी समय गोपीनाथ साहा नामक एक बंगाली व्यक्ति ने एक अंग्रेज की हत्या की और सरकार तथा इनके दल में झगड़ा शुरू हुआ। सरकार ने एक विज्ञप्ति प्रकाशित की और संदेह में ८० लोगों की पकड़ा। कलकत्ता कार्पोरेशन ने भी सरकार की इस नीति का विरोध किया।


सन्‌ १९२४ में बंगाल की प्रांतीय परिषद् ने गोपीनाथ साहा के त्याग की प्रशंसा की तथा अभिनंदन का प्रस्ताव स्वीकार किया और इन्होंने उसे मान्यता दी। लेकिन इनकी इस नीति का भारत में तथा इंग्लैंड में गलत अर्थ लगाया गया।


सन्‌ १९२५ में उपर्युक्त सरकारी विज्ञप्ति की मुख्य धाराएँ बंगाल क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट बिल में सम्मिलित की गईं। स्वराज्य दल ने बिल अस्वीकार कर दिया किंतु सरकार ने अपने विशेष अधिकार से कानून पास करा लिया। इन्होंने राजनीतिक शस्त्र के रूप में हिंसा का प्रयोग करने की कटु आलोचना की और इस संबंध में दो पत्रक प्रकाशित किए। साथ ही इसी प्रकार का एक पत्रक इन्होंने सरकार के पास भी भेजा। सरकार ने इसे सहयोग की ओर पहला कदम समझा। इस दृष्टि से दोनों पक्षों में कुछ वार्ता शुरू होने की संभावना समझी जा रही थी कि ६ जून १९२५ को इनका देहावसान हो गया।


श्री चितरंजनदास के व्यत्तित्व के कई पहलू थे। वे उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ तथा नेता तो थे ही, वे बँगला भाषा के अच्छे कवि तथा पत्रकार भी थे। बंगाल की जनता इनके कविरूप का बहुत आदर करती थी। इनके समय के बंग साहित्य के आंदोलनों में इनका प्रमुख हाथ रहा करता था। 'सागरसंगीत', 'अंतर्यामी', 'किशोर किशोरी' इनके काव्यग्रंथ हैं। 'सांगरसंगीत' का इन्होंने तथा श्री अरविंद घोष ने मिलकर अंग्रेजी में 'सांग्ज़ आव दि सी' नाम से अनुवाद किया और उसे प्रकाशित किया। 'नारायण' नामक वैष्णव-साहित्य-प्रधान मासिक पत्रिका इन्होंने काफी समय तक चलाई। सन्‌ १९०६ में प्रारम्भ हुए 'वंदे मातरम्‌' नामक अंग्रेजी पत्र के संस्थापक मंडल तथा संपादकमंडल दोनों के ये प्रमुख सदस्य थे और बंगाल स्वराज्य दल का मुखपत्र 'फार्वर्ड' तो इन्हीं की प्रेरणा और जिम्मेदारी पर निकला तथा चला। आपने "इंडिया फार इन्डियन" नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना भी की थी।


राजनीतिक नेता के लिए आवश्यक सतत जूझते रहने का गुण इनमें प्रचुर मात्रा में विद्यमान था। ये परम त्यागी वृत्ति के महापुरुष थे। इन्होंने कवि का संवेदनक्षम हृदय और सज्जनोचित उदारता पाई थी। विरुद्ध पक्ष का मर्म-स्थान ढूँढ निकालने की असाधारण कुशलता इनमें थी। एक बार निश्चय कर लेने के बाद उसे कार्यान्वित करने के लिए ये निरंतर प्रयत्नशील रहते थे। इन्हें असाधारण लोकप्रियता मिली। बेलगाँव कांग्रेस में इन्होंने यह इच्छा व्यक्त की थी कि १४८ नंबर, रूसा रोड, कलकत्ता वाला इनका मकान स्त्रियों और बच्चों का अस्पताल बन जाए तो उन्हें बड़ी शांति मिलेगी। उनकी मृत्यु के बाद महात्मा गांधी ने सी.आर. दस स्मारक निधि के रूप में दस लाख रुपए इकट्ठे किए और भारत के इस महान्‌ सुपुत्र की यह अंतिम इच्छा पूर्ण की।


🪔 *मृत्यू*


जिस वक्त देशबंधु चितरंजन दास का राजनैतिक जीवन चरम पर था, उसी वक्त काम के बोझ तले उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। मई १९२५ में वो स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए दार्जिलिंग चले गए, लेकिन उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही चला गया। इस बीच महात्मा गांधी भी खुद उनसे मिलने दार्जिलिंग आए थे। १६ जून १९२५ को तेज बुखार के कारण उनका निधन हो गया।


चितरंजन दास की अंतिम यात्रा कोलकाता में निकाली गई, जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया। गांधी जी ने कहा, ”देशबंधु एक महान आत्मा थे। उन्होंने एक ही सपना देखा था… आजाद भारत का सपना… उनके दिल में हिंदू और मुसलमानों के बीच कोई अंतर नहीं था।”


देशबन्धु चितरंजन दास के निधन पर विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा-


एनेछिले साथे करे मृत्युहीन प्रान।

मरने ताहाय तुमी करे गेले दान॥


अपने निधन से कुछ समय पहले देशबन्धु ने अपना घर और सारी जमीन राष्ट्र के नाम कर दी। जिस घर में वे रहते थे, वहां अब चितरंजन दास राष्ट्रीय कैंसर संस्थान है। वहीं दार्जिलिंग वाला उनका निवास अब मातृ एवं शिशु संरक्षण केंद्र के रूप में राज्य सरकार द्वारा चलाया जा रहा है। दिल्ली का प्रसिद्ध आवासीय क्षेत्र 'सीआर पार्क' का नाम भी देशबंधु चितरंजन दास के नाम पर रखा गया है और यहाँ बड़ी संख्या में बंगालियों का निवास है, जो बंटवारे के बाद भारत आ गए थे। देशभर में उनके नाम पर कई बड़े संस्थानों का नाम रखा गया है। देशबंधु कॉलेज हो या फिर चितरंजन अवेन्यू ऐसे कई संस्थान हैं, जिनका देश को एक सूत्र में पिरोने वाले देशबंधु चितरंजन दास के नाम से पहचान मिली है।🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

*🙏🌹🙏 शत् शत् नमन🙏🌹🙏*

संकलन -)गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

ज्येष्ठा मास,शुक्ल पक्ष, *षष्ठी*,मघा नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,ग्रीष्म ऋतु,युगाब्ध ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

बुधवार, १६ जून २०२१.

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                         *प्रभात दर्शन*

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         प्रगाढ़ सम्बंधों के लिए सुन्दर उपाय ...


१. यदि हम नहीं जानते हैं तो हमे पूछना चाहिये।

२. यदि हम किसी बात से सहमत नहीं है तो चर्चा करनी चाहिए।

३. यदि हमें कुछ प्रिय नहीं है तो बताइये।


किन्तु चुप रहकर किसी निर्णय अथवा निष्कर्ष पर नही पहुँचना चाहिए।

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*


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आदर्श बोधकथा

 नक्की वाचा 👌🏻👌🏻१०१% आवडेल.


      एक खुप श्रीमंत माणुस असतो. त्याच्याकडे ५-६ बंगले, 🏘 महागड्या गाड्या 🚘🏎🏍 त्याला कोणत्याच गोष्टीची कमी नसते. प्रत्येक दिवशी तो खुप सारा पैसा कमवत असे💳💰. एका रात्री त्याला नेहमीच्या वेळे पेक्षा लवकर झोप आली आणि तो झोपी गेला.🛌 सकाळी डोळे उघडले तर समोर यमराज उभे.👹 तो माणुस थोडा दचकला. यमराज म्हणाले चला आता तुमची जाण्याची वेळ आली आहे🕛. त्यावर तो माणुस खुप घाबरला आणि म्हणाला की मी तुम्हाला १० करोड रुपये देतो मला आजचा दिवस द्या. त्यावर यमराज म्हणाले की, तुम्ही तुमचा आणि माझा वेळ वाया घालवत आहात. तुम्हाला आत्ताच माझ्याबरोबर यावं लागेल. त्यावर परत तो माणुस म्हणाला मी तुम्हाला ५०💰 करोड रुपये देतो मला फक्त एक तास द्या. मला माझ्या कुटुंबाला एकदा भेटायचं आहे.👪 त्यावर परत यमराज म्हणाले की खरंच तुम्ही वेळ वाया घालवत आहात.तुम्हाला आत्ताच माझ्याबरोबर यावं लागेल. परत तो माणुस म्हणाला माझी सगळी संपत्ती मी तुम्हाला देतो मला फक्त ५ मिनिट द्या.त्यावर परत यमराज म्हणाले. तुम्हाला एक मिनिटही नाही देऊ शकत मी,तुम्हाला आता या क्षणाला माझ्याबरोबर यावं लागेल. तो श्रीमंत माणुस खुप रडू लागला आणि म्हणाला मला काहीच संकेड द्या मला माझ्या मित्रांना एक पत्र लिहायचं आहे. यावर यमराज म्हणाले हा लवकर लिहा जे लिहायचं आहे ते, त्यावर त्या श्रीमंत माणसाने लिहिलेलं ते पत्र.


            *प्रिय मित्रहो..*

  *आज माझ्याकडे खुप पैसा आहे. मला कश्याचीच कमी नाही आहे. पण तो पैसा काय कामाचा ज्याने मी माझ्या आयुष्यातला एक मिनिट सुद्धा विकत नाही घेऊ शकत. मी माझ्या आयुष्यात एन्जॉय नाही करू शकलो. प्रत्येक दिवस, प्रत्येक तास, प्रत्येक मिनिट मी पैसा कामविण्यात घालवला. आज तोच पैसा माझ्या आयुष्यातला एक मिनिट सुद्धा मला देऊ नाही शकला. म्हणुन सांगतोय तुम्ही एन्जॉय करा. कुणी वेडा म्हटलं तरी चालेल पण आयुष्य बालपणासारख एन्जॉय करून जगा. शेवटी कमावलेल्या पैशाने सुद्धा माझ्या शेवटच्या क्षणी माझी साथ सोडली. जगा मनसोक्त जगा.*

          *मित्रानो माहीत नाही उद्या आम्ही असू की नसू म्हणून आज जे आपल्याकडे आहे ते भरभरून जगा. आयुष्यात पैसा तर नक्कीच कमवा पण तो एवढाही साठवून ठेऊ नका की आयुष्याची खरी मजा आपण कधीच घेऊ नाही शकत.*

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 *घरातून बाहेर पडताना आपल्या* *देवघरातील देवाला* *नमस्कार* *करूनच बाहेर पडा आणि घरी* *परत आल्यावरही देवाचं दर्शन* *घ्या. कारण तो भगवंत तुम्ही घरी* *यायची वाट पहात असतो.* *आपल्या घरी असा नियम बनवा* *की जेव्हा कधी तुम्ही घरातून* *बाहेर पडता, तेव्हा देवासमोर* *क्षणभर थांबून 'हे परमेश्वरा* *तुम्हीही माझ्यासोबत चला' अस* *म्हणां कारण* *- तुमच्या* *हातामध्ये* *भलेही* *लाखांच* *घड्याळ* *असेल परंतू त्यावर दाखवणारी* *वेऴ* *ही फक्त त्या*  *भगवंताच्याच हातात आहे...*


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🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

बेंजामिन फ्रेकलीन आकाशातील वीज संशोधन

 *💥⚡💥१५ जून १७५२💥⚡💥*

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*वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रँकलिनने आकाशातील वीज ही वीज असल्याचे सिद्ध केले*

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बेंजामिन फ्रैंकलिन हे संशोधक, वैज्ञानिक, राजकीय विचारक, राजकारणी, लेखक, व्यंगकार होते. बेंजामिन फ्रैंकलिन यांनी संयुक्त राष्ट्रांचे प्रारुप आणि संविधान बनविण्यासाठी सहाय्य केले. तसेच  वैज्ञानिक कार्यामध्ये  इलेक्ट्रिसिटी, गणित आणि नकाशे बनवणे सामील आहेत. बेंजामिन फ्रैंकलिन सारखे लेखक आपल्या बुद्धी आणि ज्ञानामुळे आळखले जातात. त्यांनी रिचड्स यांचे अल्मनैक प्रसिद्ध केले. त्यांनी बायोफोकल ग्लास चा शोध लावला आणि पहिली यशस्वी अमेरिकन लेंडींग लायब्ररी ची स्थापना केली.


अमेरिकन इतिहासातील एक मोठे मिथक म्हणून आजही ज्याची नोंद आहे, ते म्हणजे बेंजामिन फ्रॅंकलिन आणि त्यांचा  पतंग. शाळेच्या पुस्तकातून आपण वाचत आलो, की बेन्जामिन महाशय एकदा बाहेर पडले असतांना, अचानक आलेल्या भर वादळात त्यांनी आपला पतंग उडवला आणि त्या पतंगावर वीज कोसळली. अशा प्रकारे बेंजामिन यांनी अपघाताने का होईना, विजेचा शोध लावला.


जर ती वीज खरोखरच त्या पतंगावर पडली असती, तर आमचे बेंजामिन महाशय त्यानंतर झालेल्या अमेरिकेच्या ऐतिहासिक स्वातंत्र्य जाहीरनाम्यावर सही करण्यास उपस्थित राहू शकले नसते. एवढेच नव्हे १७३२ ते १७५८ या काळात दर वर्षी प्रसिद्ध होणारे Poor Richard’s Almanac हे बेंजामिन यांनी टोपण नावाने लिहिलेले पंचांगही निघाले नसते. स्पष्ट म्हणायचे झाले तर त्या वादळी हवामानात पतंग उडवण्यातून त्यांचा वेडेपणा दिसून आला असता.


गंमत म्हणजे अशा प्रकारचा विजेचा प्रयोग करू पाहाणारा बेंजामिन हे काही पहिलेच शोधक नव्हते. आणि या संबंधातील सत्य काय ते काळजीपूर्वक तपासले असता असे आढळून आले की बेंजामिन यांच्या कोणत्याही खासगी डायरीत आपल्या या पतंग उडवण्याच्या प्रयोगाची नोंद नाही. 


एक मात्र खरे की फ्रॅंकलिन यांनी एक ऑक्टोबर १७५२ रोजी लिहिलेल्या एका पत्रात पतंग कसा तयार करावा आणि वादळाच्या वेळी कसा उडवावा, याचा  बारीकसारीक तपशील दिलेला आहे. एक उत्तम शास्त्रज्ञ या नात्याने त्यांनी असा कोणताही प्रयोग केल्याचे लिहून ठेवलेले नाही. आणि तसे त्यांनी केलेही नसते. त्यांनी जे काही तोंडी वर्णन केले, ते जोसेफ प्रिस्टले या तत्कालीन नावाजलेल्या संशोधकाने लिहून घेतले होते. ही नोंद इतिहासकारांना पुरेशी आहे.

*🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏*

संकलन -)गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

ज्येष्ठा मास,शुक्ल पक्ष, *पँचमी*,अश्लेशा नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,ग्रीष्म ऋतु,युगाब्ध ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

मंगलवार, १५ जून २०२१.

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                        *प्रभात दर्शन*

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          *"सच्ची साधना का अर्थ किसी को पकड़ना नहीं है, वरन् सारी पकड़ को एक साथ छोड़ना है। सारी अतियों से, सभी द्वंद्वों से ऊपर उठना-उबरना है। इस सच्ची साधना से जो अपनी चेतना की लौ को द्वंद्वों की आँधियों से मुक्त कर लेते हैं, वे उस कुंजी को पा लेते हैं, जिससे सत्य का द्वार खुलता है और तभी वह साधुता प्रकट होती है, जिसकी अलौकिक सुगंध से अनेकों दूसरी सुप्त और मुरझाई आत्माएँ भी जाग्रत् होकर मुस्कराने लगती हैं।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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सोमवार, १४ जून, २०२१

अरे अरे देवा कविता गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र


विषय : - बालदिनानिमित्त चित्र काव्यलेखण .

दि . १५ / ६ / २०२१ .


शिर्षक : - *अरे अरे दैवा ...* 


अरे अरे दैवा आमच्या

हातुन काय पाप घडले ?

नशिबी बालपणीच कष्ट

करण्याला भाग पडले .


श्रीमंताच्या या मुलांना

भारी गणवेश बुट असे

 उन्हाला कहार झालायं

अनवाणी पाय भाजतसे


शिक्षणाची ओढ फार

शिकावं वाटतं आम्हा

कुटूंबाच्या भाकरीचा

पडतोच प्रश्न हा पुन्हा


प्लास्टिक अणं भंगार

जमवण्याला भटकंती

चार पैसे मिळवता मग

वाटतेच मनाला शांती


हे विश्वंभरा कृपा करावी

प्रार्थना करतोत मनोमनी

दुःख असे कोणाच्याही

वाटयाला न येवो जिवनी .

कवि :)गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र 

आर्यभट यांची आज जयंती निमित्त लेख

 #पृथ्वीस्वत:भोवती एकसारखी फिरत असते, म्हणजेच तिला दैनंदिन गती आहे हे सांगणारा पहिला शास्त्रज्ञ आर्यभट्ट यांची आज जयंती 

ते भारतीय गणितज्ञ व खगोलशास्त्रज्ञ होते . ११ ऑगस्ट इ.स. ५१९ चे कंकणाकृती सूर्यग्रहण पाहिल्याबद्दल आर्यभट्टाना  काही काळ बहिष्काराला सामोरे जावे लागले होते. लोकांच्या अज्ञानामुळे आर्यभट्टास उपेक्षा भोगावी लागली.

आर्यभटानि  ० अंशापासून ते ९० अंशापर्यंत ३/१११ अंशाच्या फरकाने सर्व कोन घेऊन त्यांचे ज्यार्ध कसे काढावेत हे सांगितलेले आहे. तसेच पृथ्वी स्वत:भोवती एकसारखी फिरत असते, म्हणजेच तिला दैनंदिन गती आहे हे सांगणारा पहिला शास्त्रज्ञ होय. वर्षाचे दिवस ३६५, घटी १५, पळे ३९, विपळे १५ इतक्या सूक्ष्म भागांपर्यंत कालमापन नोंदवून ठेवले आहे. तसेच 'पाय' नावाची गणित संकल्पनेची किंमत ६३,८३२/२०,००० आहे असेही नोंदवले आहे सूर्य सिद्धान्तावर याने लिहिलेला एक टीका ग्रंथ 'सूर्य सिद्धान्त-प्रकाश ' या नावाने प्रसिद्ध आहे.

आर्यभट्ट यांना ग्रहणाची शास्त्रीय कारणमीमांसा ज्ञात होती. अमावस्येला सूर्यग्रहण व पौर्णिमेस चंद्रग्रहण यांचा संबंध चंद्र व पृथ्वी यांच्या सावल्यांशी आहे, हे त्यांना माहीत होते. तसे त्यांनी नोंदवून ठेवले आहे. पहिला आर्यभट्ट याने सूत्रांचा उपयोग खगोलशास्त्र विषयक ग्रंथांत मोठ्या प्रमाणावर केला. अशा ग्रंथांत आकडेमोड द्यावी लागते परंतु मजकूर तर मुख्यत्वे काव्यमय व यमकात असतो. मग संख्या पद्यात बसवण्यासाठी त्या अक्षराने निर्दिष्ट करायच्या व ती अक्षरे वृत्तात बसवून श्लोकात लिहावयाची असा मार्ग आर्यभट्टाने अवलंबला. त्यामुळे अक्षरसंख्या कमी होते, शिवाय वृत्तबद्ध लिखाण होते. त्यावेळी लेखनाची साधने उपलब्ध नसल्याने त्या संख्या अशा प्रकारे लक्षात ठेवणेही सोपे जात असे. जसे --वर्गाक्षराणि वर्गेऽ वर्गेऽ वर्गाक्षराणि कात्‌ ङ मौ यः । खद्विनवके स्वरा नववर्गेऽ वर्गे नवान्त्यवर्गे वा ॥ (विकिपीडिया मधून )

आर्यभट्ट यंचे कालखंडा बाबत तसेच जन्मठिकाणा बद्दल निश्चित माहिती उपलब्ध नाही 

खाली आयुका मधील पुतळ्याचा फोटो "

संकलन :)गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र 

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दुःखाचे खरे कारण??

 


*🌹👉दुःखाचे खरे कारणं -  अपेक्षा* 


समजा आपण  एखाद्या दिवशी दोनशे रुपयांचा माठ  आणि अडीचशे रुपयांचा पुष्पगुच्छ घेऊन आलो आणि  घरी आल्या आल्या माठ हातातून पडून फुटला  तर आपल्याला अतिशय दुःख होते कारण माठ इतक्या लवकर फुटेल अशी अपेक्षाच आपण केलेली नसते.

त्याउलट 250 रुपयांचा पुष्पगुच्छ संध्याकाळपर्यंत सुकला तरी आपल्याला वाईट वाटत नाही त्याचे कारण फुले सुकणारच हे आपल्याला माहीत असते .

माठ इतक्या लवकर फुटेल असे वाटले नव्हते आणि फुटला त्यामुळे आपल्याला दुःख झाले.

परंतु फूलांकडून ती टवटवीत राहण्याची अपेक्षाच नव्हती त्यामुळे ती सुकली तरी त्याचे दुःख झाले नाही.


 👉मतितार्थ असा आहे  की,

ज्याच्याकडून जितकी अपेक्षा जास्त त्याच्याकडून तितके दुःख वाट्याला येते आणि ज्याच्या कडून अपेक्षा कमी त्याच्याकडून फारसे दुःख नाही यामुळे कोणाकडून फार मोठ्या अपेक्षा ठेवू नका आनंदी राहा मस्त रहा.

*🌹!! भवतु सब्ब मंगलम !!🌹*

👏👏🙏🙏💐💐🌹🌹

आपला दिवस ...

सुखमय , उल्हासवर्धक व आनंदी जाओ ...


*शुभेछूक :*

  गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र 


आठवणीचा पाऊस कवी गजानन गोपेवाड

 🌹अवकाळी पाऊस 🌹


आज अचानक त्याच आगमन

मोठया झपाट्यानं झालं होत

गारीच,वादळाचआणि विजेचा चमकिन 

ढगाच ढोल वाजत आलं होत


असं कधी तो नेहमी याच

आज मात्र जरा वेगळं रूप पाहिलं

रागात असावा जणू काही

सार काही हानी हानी करून गेलं


आठवणीच ठरल तो पाऊस

सर्वांच्या मनी भीती दाटविणारा

काळ कसा येतो जणू

सार जीव घेऊ पाहणारा


त्याला आवर घालणार

कुणी तरी आहे का

त्याला शांत करण्याची

बळ कुणात नाहीका


हात जोडूनि मी विनवणी केली

तरी राग त्याच्या प्रत्येकावर होता

मानवाणीच केल सार काही

असा ओरडून सांगत होता


माझ्या जीवाला भावला

तो वेडा पिसा पाऊस जणू

त्याच्या रागभरात भावना

आणि काय मी जाणू

गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र 



व्यथा शेतकरी गजानन गोपेवाड

 *सप्तरंग काव्यस्पर्धा*

*वऱ्हाडी कविता -*

*शिर्षक - व्यथा शेतकऱ्याची*

काय सांगु तुले बा

व्यथा शेतकऱ्याची

अन कास्तकाराची

गाथा गरीबीची... !!

सरकी खत अन

 बी मायगाच

 मायगाच्या जमान्यात

 ससत कवा वायाच... !!

 मनामदी माह्या बाप

 एकच गिरवतो कित्ता

  मिरगाच्या पावसाची

  लागली चिंता... !!

 बंदयाच आवडात

सरकी का सोयाबिन

तूरच पेराव मनतो

साऱ्या वावरातीन... !!

अमदाच्या सालात

गराडान घातल थैमान

 मिरगाचा पावस

मावरच लई बैमान... !!

 म्या फाडतो आता

सारे पेरणी डोबणीले

येसीन त ये बा नायत

 येजो सरणाले.... !!

 जेथ पाव तेथ पैसा

 अदल्याचा बजार

  चोपणले वाई कराले

पुडल्या सालात दाहजार... !!

 अन्नाचा घास नाय

 भेटत जीवाले

अमदाच साल सारे

 पाये आभायाले.... !!

गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र 


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