मंगळवार, १८ जानेवारी, २०२२

गाथा बलिदानाची

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*🇮🇳🇮🇳गाथा बलिदानाची🇮🇳🇮🇳*

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           *महाराणा प्रताप*


(महापराक्रमी वीर राजा,मेवाड़ के एक राजपूत शासक थे।)


        *जन्म : ०९ मई १५४०*

(कुम्भलगढ़ दुर्ग,पाली,राजस्थान,भारत)


     *निधन : १९ जनवरी १५९७*

                  (उम्र ५६)

                    चावड़


शासनावधि : १५७२ – १५९७


राज्याभिषेक : २८ फ़रवरी १५७२


पूर्ववर्ती : उदयसिंह द्वितीय


उत्तरवर्ती : महाराणा अमर सिंह


संतान : अमर सिंह, भगवान दास

                     (१७ पुत्र)


पूरा नाम : महाराणा प्रताप सिंह 

                सिसोदिया


घराना : सिसोदिया


पिता : उदयसिंह द्वितीय


माता : महाराणी जयवंताबाई


धर्म : सनातन धर्म


महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया  उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। उनका जन्म राजस्थान के कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जयवंत कँवर के घर हुआ था। लेखक जेम्स टॉड़ के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म मेवाड़ के कुंभलगढ में हुआ था । इतिहासकार विजय नाहर के अनुसार राजपूत समाज की परंपरा व महाराणा प्रताप की जन्म कुंडली व कालगणना के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म पाली के राजमहलों में हुआ। १५७६ के हल्दीघाटी युद्ध में ५०० भील लोगो को साथ लेकर राणा प्रताप ने आमेर सरदार राजा मानसिंह के ८०,००० की सेना का सामना किया। हल्दीघाटी युद्ध में राणा पूंजा जी का योगदान सराहनीय रहा। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने आपना अश्व दे कर महाराणा को बचाया। प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें १७,००० लोग मारे गए। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा की हालत दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती चली गई । २५,००० आदिवासीयो को १२ साल तक चले उतना अनुदान देकर भामाशाह भी अमर हुआ।


🤱 *जन्म स्थान*

महाराणा प्रताप के जन्मस्थान के प्रश्न पर दो धारणाये है । पहला महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था क्योंकि महाराणा उदयसिंह एवम जयवंताबाई का विवाह कुंभलगढ़ महल में हुआ। दूसरी धारणा यह है कि जन्म पाली के राजमहलों में हुआ।महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवंता बाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था। लेखक विजय नाहर की पुस्तक हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप के अनुसार जब प्रताप का जन्म हुआ था उस समय उदयसिंह युद्व और असुरक्षा से घिरे हुए थे। कुंभलगढ़ किसी तरह से सुरक्षित नही था। जोधपुर का राजा मालदेव उन दिनों उत्तर भारत मे सबसे शक्तिसम्पन्न था। एवं जयवंता बाई के पिता एवम पाली के शाषक सोनगरा अखेराज मालदेव का एक विश्वसनीय सामन्त एवं सेनानायक था। इस कारण पाली और मारवाड़ हर तरह से सुरक्षित था। अतः जयवंता बाई को पाली भेजा गया। वि. सं. ज्येष्ठ शुक्ला तृतीया सं १५९७ को प्रताप का जन्म पाली मारवाड़ में हुआ। प्रताप के जन्म का शुभ समाचार मिलते ही उदयसिंह की सेना ने प्रयाण प्रारम्भ कर दिया और मावली युद्ध मे बनवीर के विरूद्ध विजय श्री प्राप्त कर चित्तौड़ के सिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया। भारतीय प्रशासनिक सेवा से सेवानिवत्त अधिकारी देवेंद्र सिंह शक्तावत की पुस्तक महाराणा प्रताप के प्रमुख सहयोगी के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म स्थान महाराव के गढ़ के अवशेष जूनि कचहरी पाली में विद्यमान है। यहां सोनागरों की कुलदेवी नागनाची का मंदिर आज भी सुरक्षित है। पुस्तक के अनुसार पुरानी परम्पराओं के अनुसार लड़की का पहला पुत्र अपने पीहर में होता है। इतिहासकार अर्जुन सिंह शेखावत के अनुसार महाराणा प्रताप की जन्मपत्रिका पुरानी दिनमान पद्धति से अर्धरात्रि १२/१७ से १२/५७ के मध्य जन्मसमय से बनी हुई है। ५/५१ पलमा पर बनी सूर्योदय ०/० पर स्पष्ट सूर्य का मालूम होना जरूरी है इससे जन्मकाली इष्ट आ जाती है। यह कुंडली चित्तौड़ या मेवाड़ के किसी स्थान में हुई होती तो प्रातः स्पष्ट सूर्य का राशि अंश कला विक्ला अलग होती। पण्डित द्वारा स्थान कालगणना पुरानी पद्धति से बनी प्रातः सूर्योदय राशि कला विकला पाली के समान है। डॉ हुकमसिंह भाटी की पुस्तक सोनगरा सांचोरा चौहानों का इतिहास १९८७ एवं इतिहासकार मुहता नैणसी की पुस्तक ख्यातमारवाड़ रा परगना री विगत में भी स्पष्ट है "पाली के सुविख्यात ठाकुर अखेराज सोनगरा की कन्या जैवन्ताबाई ने वि. सं. १५९७ जेष्ठ सुदी ३ रविवार को सूर्योदय से ४७ घड़ी १३ पल गए एक ऐसे देदीप्यमान बालक को जन्म दिया। धन्य है पाली की यह धरा जिसने प्रताप जैसे रत्न को जन्म दिया।


💁‍♂ *जीवन*


राणा उदयसिंह केे दूसरी रानी धीरबाई जिसे राज्य के इतिहास में रानी भटियाणी के नाम से जाना जाता है, यह अपने पुत्र कुंवर जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी | प्रताप केे उत्तराधिकारी होने पर इसकेे विरोध स्वरूप जगमाल अकबर केे खेमे में चला जाता है |


महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक मेंं २८ फरवरी, १५७२ में गोगुन्दा में होता हैै, लेकिन विधि विधानस्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक १५७२ ई. में ही कुुंभलगढ़़ दुुर्ग में हुआ, दूूूसरे राज्याभिषेक में जोधपुर का राठौड़ शासक राव चन्द्रसेेन भी उपस्थित थे |


राणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल ११ शादियाँ की थी उनके पत्नियों और उनसे प्राप्त उनके पुत्रों पुत्रियों के नाम है:-


महारानी अजाब्दे पंवार :- अमरसिंह और भगवानदास

अमरबाई राठौर :- नत्था

शहमति बाई हाडा :-पुरा

अलमदेबाई चौहान:- जसवंत सिंह

रत्नावती बाई परमार :-माल, गज, क्लिंगु

लखाबाई :- रायभाना

जसोबाई चौहान :- कल्याणदास

चंपाबाई जंथी :- कल्ला, सनवालदास और दुर्जन सिंह

सोलनखिनीपुर बाई :- साशा और गोपाल

फूलबाई राठौर :-चंदा और शिखा

खीचर आशाबाई :- हत्थी और राम सिंह

महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर १५७२ ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गया, इसी क्रम में मानसिंह (१५७३ ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, १५७३ ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,१५७३ ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और हमें हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध देखने को मिला |


🤺 *हल्दीघाटी का युद्ध*


मुख्य लेख: हल्दीघाटी का युद्ध

यह युद्ध १८ जून १५७६ ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। भील सेना के सरदार राणा पूंजा भील थे । इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी।


इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया। इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध मे राणा पूंजा भील का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गया।


इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर एेसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी। आप इस युद्ध की अधिक गहराई में जानकारी हल्दीघाटी युद्ध लेख पर पढ सकते हे।


🏇 *दिवेेेेर का युुद्ध*


राजस्थान के इतिहास १५८२ में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को "मेवाड़ का मैराथन" कहा |


💎 *सफलता और अवसान*


.पू. १५७९ से १५८५ तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उल्झा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने १५८५ ई. में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को और भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत ३६ महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया , उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था , पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत १५८५ ई. में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए, परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही १९ जनवरी १५९७ में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई।


महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सीधरने के बाद अागरा ले आया।


'एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।


महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया के मृत्यु पर अकबर की प्रतिक्रिया

अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था, पर उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं थी, हालांकि अपने सिद्धांतों और मूल्यों की लड़ाई थी। एक वह था जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था , जब की एक तरफ ये थे जो अपनी भारत मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जनता था की महाराणा जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए।


महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है। अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-


अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी


गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी


नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली


न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली


गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी


निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी


अर्थात्


हे गेहलोत राणा प्रतापसिंघ तेरी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निश्वास के साथ आंसू टपकाए। क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धुरे को बांए कंधे से ही चलाता रहा। तेरी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया। तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया।


अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना पूरा जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और उनके स्वामिभक्त अश्व चेतक को शत-शत कोटि-कोटि प्रणाम।


📚🎞 *फिल्म एवं साहित्य में*


पहले पहल १९४६ में जयंत देसाई के निर्देशन में महाराणा प्रताप नाम से श्वेत-श्याम फिल्म बनी थी। २०१३ में सोनी टीवी ने 'भारत का वीर पुत्र – महाराणा प्रताप' नाम से धारावाहिक प्रसारित किया था जिसमें बाल कुंवर प्रताप का पात्र फैसल खान और महाराणा प्रताप का पात्र शरद मल्होत्रा ने निभाया था।


⚜ *कुछ महत्वपूर्ण तथ्य*


इतिहासकार विजय नाहर की पुस्तक हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप के अनुसार कुछ तथ्य उजागर हुए।


१. महाराणा उदय सिंह ने युद्ध की नयी पद्धति -छापा मार युद्ध प्रणाली इजाद की। वे स्वयं तो इसका प्रयोग नहीं कर सके परन्तु महाराणा प्रताप ,महाराणा राज सिंह एवं छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसका सफल प्रयोग करते हुए मुगलों पर सफलता प्राप्त की ।


२. महाराणा प्रताप मुग़ल सम्राट अकबर से नहीं हारे । उसे एवं उसके सेनापतियो को धुल चटाई । हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप जीते|महाराणा प्रताप के विरुद्ध हल्दीघाटी में पराजित होने के बाद स्वयं अकबर ने जून से दिसंबर १५७६ तक तीन बार विशाल सेना के साथ महाराणा पर आक्रमण किए, परंतु महाराणा को खोज नहीं पाए, बल्कि महाराणा के जाल में फंसकर पानी भोजन के अभाव में सेना का विनाश करवा बैठे। थक हारकर अकबर बांसवाड़ा होकर मालवा चला गया। पूरे सात माह मेवाड़ में रहने के बाद भी हाथ मलता अरब चला गया। शाहबाज खान के नेतृत्व में महाराणा के विरुद्ध तीन बार सेना भेजी गई परंतु असफल रहा। उसके बाद अब्दुल रहीम खान-खाना के नेतृत्व में महाराणा के विरुद्ध सेना भिजवाई गई और पीट-पीटाकर लौट गया। ९ वर्ष तक निरंतर अकबर पूरी शक्ति से महाराणा के विरुद्ध आक्रमण करता रहा। नुकसान उठाता रहा अंत में थक हार कर उसने मेवाड़ की और देखना ही छोड़ दिया।


३. ऐसा कुअवसर प्रताप के जीवन में कभी नहीं आया कि उसे घांस की रोटी खानी पड़ी अकबर को संधि के लिए पत्र लिखना पड़ा हो। इन्हीं दिनों महाराणा प्रताप ने सुंगा पहाड़ पर एक बावड़ी का निर्माण करवाया और सुंदर बगीचा लगवाया| महाराणा की सेना में एक राजा, तीन राव, सात रावत, १५००० अश्वरोही, १०० हाथी, २०००० पैदल और १०० वाजित्र थे। इतनी बड़ी सेना को खाद्य सहित सभी व्यवस्थाएं महाराणा प्रताप करते थे। फिर ऐसी घटना कैसे हो सकती है कि महाराणा के परिवार को घांस की रोटी खानी पड़ी। अपने उतरार्ध के बारह वर्ष सम्पूर्ण मेवाड़ पर सुशाशन स्थापित करते हुए उन्नत जीवन दिया ।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन-)गजानन गोपेवाड  

उमरखेड जिल्हा - यवतमाळ ४४५२०६

कुतूहल : रेशीम


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           *🤔 【 कुतूहल 】 🤔*  

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*🖥️✒️संकलन✒️💻*

गजानन गोपेवाड 

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*कुतूहल : रेशीम*


बॉम्बिक्स मोरी ( Bombyx mori) हा कीटक रेशीम तयार करतो. त्याची अंडी, अळी, कोश आणि पतंग अशा चार जीवनावस्था असून त्याचे मुख्य खाद्य तुतीच्या झाडाची पाने असतात. रेशीम मिळवण्यासाठी या कीटकाची पैदास केली जाते, या व्यवसायाला  सेरीकल्चर असे म्हणतात. अळीची वाढ पूर्ण होत आली की तिच्या दोन प्रकारच्या लालोत्पाद्क ग्रंथीसारख्या दिसणाऱ्या, ग्रंथीतून चिकट स्त्राव निर्माण होतो. डोक्याजवळ असणाऱ्या स्पिनरेट या अवयवातून हा स्त्राव बाहेर पडतो. या स्त्रावाचा हवेशी संबंध आल्यावर त्याचे दोन जुळे धागे बनतात. हे धागे ‘फायब्रॉईन’ या प्रथिनापासून बनलेले असतात. दुसऱ्या ग्रंथीतून ‘सेरीसीन’ हा चिकट गोंदासारखा पदार्थ निर्माण होतो. या सेरीसीनमुळे हे धागे एकमेकांशी चिकटले जातात. एका कोशाभोवती ६०० ते ९०० मीटर इतक्या लांबीचा सलग धागा असतो. कोशातून पतंग बाहेर पडताना त्याच्या शरीरात प्रथिन पचन करणारी विकरे तयार होतात. या विकरांमुळे रेशीम धागा खराब होतो. रेशीम मिळवण्यासाठी आपण या जीवांना कोश अवस्थेत असताना गरम पाण्यात टाकून मारतो, जेणेकरून त्यांचा नैसर्गिकरीत्या पतंग बनण्याअगोदरच लांबलचक सलग रेशीम धागा काढणे शक्य होते. गरम पाण्यात टाकल्यामुळे त्या कोशातील धाग्यांतील सेरीसीन विरघळले जाते. सेरीसीन गेलेले नाही असे रेशीम बाजारात ‘रॉ सिल्क’ नावाने प्रसिद्ध असते. जे कोश नीट पद्धतीने उलगडले जात नाहीत आणि ज्यातील रेशीम धागा तुकडे तुकडे होऊन निघतो त्याला ‘स्पन सिल्क’ असे म्हणतात. नैसर्गिक चमक असणारे रेशीम धागे अत्यंत नाजूक आणि अंदाजे दहा मिक्रोमीटर व्यासाचे असतात. ४०० ग्रॅम रेशीम बनवण्यासाठी साधारणपणे  २.००० ते ३,००० कोशांना बळी दिले जाते.


निसर्गाच्या या मुलायम देणगीला विज्ञानाच्या साहाय्याने, अमेरिकेतील मिशिगन येथील ‘क्रेग बायोक्राफ्ट’ प्रयोगशाळेत आणि ‘वायोमिंग’ आणि ‘नोत्रे देम’ विद्यापीठाच्या जैवतंत्रज्ञान संशोधन-सहकार्याने कोळय़ाची जनुके रेशीमकिडय़ाच्या शरीरात घालून अधिक ताकदीचे आणि अधिक स्थितीस्थापकत्व असलेले रेशीम किंवा स्पायडर-सिल्क  बनवण्याचे प्रयत्न यशस्वी झाले आहेत. तसेच बोस्टन येथील टफ्टस् मेडिकल सेंटरमध्ये मानवी ऊतीप्रमाणे भासणारे रेशीम बनवण्याचा प्रयत्न जैवतंत्रज्ञानाच्या वापराने केला गेला. अस्थिबंध आणि स्नायुबंध  इत्यादीच्या विकारांत  पुनर्रचनात्मक शस्त्रक्रियेसाठी अशा रेशीमचा वापर करता येतो. मूळ रेशीम किडय़ात देखील आता जैव तंत्रज्ञानाने अधिक गुणवत्तेचे रेशीम बनवणारी जनुके घालण्याचा जगभरात प्रयत्न चालूच आहे.



–डॉ. नंदिनी विनय देशमुख

मराठी विज्ञान परिषद, मुंबई.

Written By_लोकसत्ता टीम

संकेतस्थळ : www.mavipa.org      

ईमेल : office@mavipamumbai.org

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गाथा बलिदानाची *बॕरिस्टर नाथ बापू पै*

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*🇮🇳🇮🇳गाथा बलिदानाची🇮🇳🇮🇳*

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        *बॕरिस्टर नाथ बापू पै*

             (स्वातंत्र्य सैनिक)


        जन्म : २५ सप्टेंबर १९२२

               वेंगुर्ला , भारत

  *मृत्यू : १८ जानेवारी १९७१*

                 (वय ४८)

राजकीय पक्ष : प्रजा सोशलिस्ट     

                     पार्टी

खासदार, लोकसभा : १९५७–

                                १९७१

मतदार संघ : राजापूर

 

नाथ बापू पै हे स्वातंत्र्य सैनिक, संसदपटू आणि निष्णात घटनातज्ञ. जन्म वेंगुर्ले येथे. तेथेच प्राथमिक शिक्षण. बेळगावच्या लिंगराज कॉलेजमधून अर्थशास्त्र घेऊन बी. ए. (१९४७). नंतर लंडनच्या लिंकन्स इनमधून बार अट लॉ (१९५५). त्यांचे वडील लहानपणीच वारले. आई तापी आणि वडीलबंधू अनंत (भाई) यांच्या संस्कारांचा नाथांच्या व्यक्तिमत्त्वाच्या घडणीत मोठा वाटा होता. संस्कृत, मराठी, इंग्रजी या भाषांवर त्यांनी लहानपणीच प्रभुत्व मिळविले व वक्तृत्व गुणाचाही परिपोष केला. विल्यम शेक्सपिअर, पर्सी शेली, जॉर्ज बायरन इत्यादींच्या साहित्याचे आणि विदग्ध संस्कृत वाङ्‌मयाचे परिशीलनही त्यांनी केले होते. १९६० साली क्रिस्टल मिशेल या ऑस्ट्रियन युवतीशी त्यांनी विवाह केला. त्या सध्या व्हिएन्ना येथे भारत सरकारच्या परराष्ट्र विभागात काम करतात. महाविद्यालयात असतानाच त्यांनी स्वातंत्र्य चळवळीत भाग घेण्यास सुरुवात केली.


तत्कालीन भूमिगत चळवळींमध्ये त्यांचा मोठा वाटा होता. टपाल-कचेऱ्या लुटणे, पोलीस-कचेऱ्यांवर हल्ला करणे इ. कारणांसाठी त्यांच्यावर त्यावेळी खटले भरण्यात आले. तुरुंगातील बेदम मारामुळे त्यांच्या हृदयावर विपरीत परिणाम झाला. १९४६ च्या प्राथमिक शिक्षकांच्या संपात, तसेच गोवामुक्ती आंदोलनात ते सहभागी झाले. १९४७ साली ते इंग्लंडला गेले. तेथील इंटरनॅशनल नाथ पै युनियन ऑफ सोशॅलिस्ट यूथचे ते सहा वर्षे अध्यक्ष होते. मजूर पक्षाच्या कामगार संघटनांतून काम करीत असताना फ्रेनर ब्रॉक्वे, रेजिनल्ड सरेनसन इ. मजूर नेत्यांशी त्यांचा निकटचा संबंध आला. गोवामुक्तीसाठी रोममध्ये पोर्तुगीज वकिलातीसमोर त्यांच्या नेतृत्वाखाली जोरदार निदर्शने करण्यात आली होती. ज्ञानसंपन्नत्ता व अखंड व्यासंगीवृत्ती तसेच गरिबांविषयीची कळकळ, हे त्यांचे स्थायीभाव होते. बेळगावच्या प्रश्नावर त्यांनी सतत लढा दिला. साराबंदी चळवळीत प्रामुख्याने भाग घेतले (१९६०). त्याच वर्षीच्या सरकारी नोकरांच्या संपाचे ते प्रमुख होते. त्यात त्यांना अटक झाली.


लोकसभेत त्यांचा स्पष्टवक्तेपणा, निर्भयपणा व चिकित्सक अभ्यास हे गुण दिसून येत. सुसंस्कृत राजकारणी (जंटलमन पोलिटिशिअन) अशा शब्दांत पं. नेहरूंनी त्याचा गौरव केला आहे. जगातील अनेक राष्ट्रांच्या राज्यघटनांचा त्यांचा सखोल अभ्यास होता. गोलकनाथ प्रकरणात सर्वोच्च न्यायालयाच्या निर्णयाविरुद्ध लोकसभेत त्यांनी घटनादुरुस्ती विधेयक मांडले. ‘ज्या घटनेत दुरुस्ती होऊ शकत नाही, ती मृतवत होय’, असे त्यांनी ठणकावून सांगितले. त्यांच्या या विधेयकाची राष्ट्रीय पातळीवर चर्चा झाली. रोजगारी हा मूलभूत हक्क आहे आणि तो देता येत नसेल, तर सरकारने बेकारी भत्ता मंजूर करावा, असेही एक विधेयक त्यांनी मांडले होते. आणि आणीबाणीत न्यायालयात दाद मागता येत नाही, म्हणून घटनेतील त्या संबंधीचे ३५९ वे कलम रद्द करावे, असेही विधेयक त्यांनी मांडले. आपली वाणी व बुद्धी त्यांनी जनहितासाठी राबविली. शासनसत्तेचे अधिष्ठान तत्त्वतः लोकशक्तीत असते, अशी त्यांची धारणा होती. कोकण रेल्वे व कोकण विकासासाठी ते आयुष्यभर झगडले.


१९७० मध्ये महाबळेश्वर येथे झालेल्या मराठी साहित्य संमेलनाचे ते उद्‌घाटक होते. चेकोस्लोव्हाकिया व हंगेरी या देशांतील रशियन सैनिकी कारवायांविरुद्ध लोकसभेत त्यांनी केलेली भाषणे उल्लेखनीय आहेत (१९५६). अशी त्यांची अत्यंत महत्त्वाची निवडक भाषणे लोकशाहीची आराधना (१९७२) या पुस्तकात संग्रहीत केलेली आहेत. हुतात्म्यांना श्रद्धांजली वाहण्यासाठी १७ जानेवारी १९७१ रोजी ते बेळगावला गेले. तेथील सभेत भाषण झाल्यावर हृदयविकाराने त्यांचे आकस्मिक निधन झाले.

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद*🇮🇳🇮🇳🇮🇳

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा - यवतमाळ ४४५२०६

सोमवार, १७ जानेवारी, २०२२

क्लाइड टॉमबॉ* 🔭🔭🔭🔭🔭🔭🔭🔭🔭🔭🔭 *खगोलशास्त्रज्ञ* ☄☄☄☄☄☄☄☄☄☄☄ *प्लूटो ह्या बटुग्रहाचा शोध लावला*

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                     *क्लाइड टॉमबॉ*

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                   *खगोलशास्त्रज्ञ*

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*प्लूटो ह्या बटुग्रहाचा शोध लावला*

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*स्मृतिदिन - १७ जानेवारी १९९७*


क्लाईड टॉमबॉघ यांनी १९३० मध्ये प्लूटो  शोधला. टॉमबॉघ यांनी  प्लूटो शोधल्यापासून ही सौरमालेतील नेहमीच  सर्वात वादग्रस्त गोष्ट राहिली आहे. त्याला खगोल शास्त्रज्ञांनी बरेच वेळा तो  ग्रह, बटू ग्रह,नेपचूनचा भरकटलेला चंद्र तर कधी चक्क धुमकेतू  असे वर्गीकरण करण्याचा प्रयत्न केला आहे. न्यू होरायझन्स प्रथम जानेवारी २००६ मध्ये जेंव्हा  टॉमबॉघ यांची  रक्षा घेऊन प्लूटो  कडे निघाले तोपर्यंत तो ग्रह म्हणूनच ओळखला जात होता.  पण  त्यानंतर फक्त काही महीन्यांनंतर तो  एक बटू-ग्रह  किंवा 'प्लुटॉईड' म्हणून ओळखला जाऊ लागला. त्याची आता   'लघुग्रह संख्या १३४३४०' अशी नोंद करण्यात आली आहे. 

"प्लूटो हा खडक आणि बर्फ यांपासून तयार झालेला आणि त्याला पाच उपग्रह असले  तरी सूध्धा वर्गीकरणाचा वादविवाद अजूनही आहे."त्याचे तापमान -२३०C आहे आणि वातावरणात वर वर जावे तसा तो उबदार होत जातो.

प्लूटो १९३० मध्ये शोधला गेला तेंव्हा त्याला नाव देण्यासाठी एक स्पर्धा घेण्यात आली होती तेंव्हा ११ वर्षाच्या वेनेशिया बर्नी हिने प्लूटो हे नाव दिले. त्याबद्दल तिला पाच पौंडाची नोट बक्षीस म्हणून मिळाली होती,कैलीस्टो,आयोप्लूटो हा बुध आणि इतर चंद्र ग्यानिमिद,टायटन,युरोपा,ट्राइटन व चंद्र यांचापेक्षा लहान आहे.मागील २० वर्ष त्याच्या २४८ वर्षांच्या परिभ्रमण काळात प्लूटो हा नेपच्यून पेक्षा सूर्याच्या जवळ आला असून. त्यामुळे नेपच्यून ९ क्रमांकावर गेला असून प्लूटो ८ व्या क्रमांकावर आला आहेकाही खगोलशास्त्रज्ञाच्या गृहितकाप्रमाणे प्लूटो हा एक नेपच्यून चा भरकटलेला चंद्र असून त्याने नेपच्यून चे वातावरण ओढुन घेतले आणि स्वतःची कक्षा तयार केली.सूर्याचा प्रकाश प्लूटोवर पोहोचण्यासाठी ५ तास लागतात.त्याचे आकाश एवढे गडद दिसते की आकाशात दिवसा सुधा तारे दिसतात. पृथ्वीवारुन प्लूटोकडे बघने म्हणजे ३० मैलांवरून अक्रोड बघने असे आहे.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा-यवतमाळ ४४५२०६

रविवार, १६ जानेवारी, २०२२

ज्ञान विज्ञान ऊती किंवा पेशीजाल


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   @ संकलन @

  गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *ऊती किंवा पेशीजाल म्हणजे काय ?* 

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जगातील सर्व सजीवांचे शरीर अतिशय सूक्ष्म अशा पेशींनी तयार झालेले असते. केवळ सूक्ष्मदर्शक यंत्राच्या साहाय्याने या पेशी आपण पाहू शकतो. एखादे घर जसे असंख्य चिरेबंदी दगड किंवा विटांनी बांधले जाते तसेच कार्य येथे पेशी करत असतात. प्रत्येक पेशी ही तीन घटकांनी संपन्न होते. पेशीचे आवरण, पेशीद्रव, केंद्रक हे ते घटक.


 वनस्पतीपेशीत आवरण जास्त घट्ट असलेल्या पेशीद्रवाचे बनते. तसे प्राणिजपेशीत आढळत नाही. प्रत्येक पेशीला अन्न, प्राणी व प्राणवायू लागतो. तसेच जन्म, वाढ, कार्य व ठरावीक काळाने मृत्यू हे चक्र ठरलेलेच असते. पेशींची पूर्ण वाढ झाली की केंद्रकाचे दोन भाग होतात व पेशींचे द्विभाजन सुरू होते. पेशीद्रव प्रत्येक तुकड्याभोवती गोळा होऊन ही क्रिया पूर्ण होते. पेशीविभाजन सतत चालू असल्याने प्राण्याच्या शरीराला पेशींचा सतत पुरवठा चालू राहतो. या पेशी विभाजनाला एकच अपवाद आहे. तो म्हणजे मेंदूच्या पेशी. त्यांची संख्या जन्मत:च निश्चित असते. त्यात वयानुसार फक्त घटच होत जाते.


जरी प्राणी व मानव एकाच बीजाच्या फलितातुन जन्माला येत असला तरी बीजांडफलनाच्या क्षणी मूळ पेशी (स्टेम सेल) फलित अंड्याच्या अंतर्भागात अस्तित्वात असतात. त्यातून शरीरात निरनिराळी कार्य करणाऱ्या निरनिराळ्या आकारांच्या पेशींची निर्मिती केली जाते. अशा पेशींच्या विशिष्ट कार्य करणाऱ्या समूहाला ऊती किंवा 'पेशीजाल' असे म्हटले जाते. अस्थिपेशी, ग्रंथीपेशी, स्नायूपेशी, रक्तातील पांढऱ्या व तांबड्या पेशी, चरबीच्या पेशी, आच्छादक पेशी, संयोगी पांढरे तंतू, संयोगी लवचिक तंतू व मज्जापेशी अशी नावाप्रमाणेच विशिष्ट कार्ये या विशिष्ट पेशीजालाकडून पार पडतात. याखेरीज शरीरातील महत्त्वाचा अवयव म्हणजे डोळा, हृदय, यकृत, मूत्रपिंड, फुप्फुसे, त्वचा यांची निर्मिती त्यांच्या कार्याला अनुरूप अशा पेशीजालातून केली जाते. उदाहरणार्थ, यकृतपेशी फक्त पित्तनिर्मिती करतात. मूत्रपिंडात नेफ्रॉन समूह मूत्रनिर्मिती करतो, हृदयाचे स्नायू जन्मापासून अखेरपर्यंत सतत कार्यरत राहतात.


ऊती वा पेशीजालाच्या पुनर्निर्माणावर दोन पद्धतीत नियंत्रण असते. कुठेही इजा झाली, कापले व अंतर्गत इंद्रियांमध्ये बिघाड झाला, तर तेथील रक्तपुरवठ्याद्वारे यावर तातडीने मदतीला सुरुवात होते. कापल्याजागी खपली धरणे हे यांचे पहिले स्वरूप. नंतर यथावकाश त्वचेचा थर पुन्हा आच्छादला जातो. यकृताचे व त्वचेचे पेशीजाल या बाबतीत अत्यंत जागरूक असते. याउलट अस्थिपेशीजाल या पुनर्निर्मितीसाठी काही आठवडे घेतात. तुटलेली हाडे जोडायला शरीर सहा ते दहा आठवडे घेते, मात्र शस्त्रक्रियेनंतरचे टाके सातव्या दिवशीही काढता येतात. एक गोष्ट मात्र लक्षात ठेवायलाच हवी. फार मोठ्या पेशीजालाचा नाश झाल्यास त्यांची जागा तशाच ऊती वा पेशीजाल्याने कधीच भरली जात नाही. यावेळी फक्त अच्छादनाचे वा मुत्रपेशींची जागा भरून काढण्याचे काम विशिष्ट प्रकारचा तंतुयुक्त पेशींद्वारे केले जाते. शरीरावरचे मोठे कायम राहणारे व्रण, शरीरातील मोठा अवयव काढला तर त्या जागी भरून येणारे पेशीजाल हे विशिष्ट कार्य करीत नाही, तर फक्त जागा भरून काढते. एकाच प्रकारचे कार्य करणाऱ्या ऊतींचा संचय इंद्रियाचे कार्य करतो.


संपूर्ण शरीरातील गुंतागुंतीची अनेक कार्ये विशिष्ट प्रकारच्या ऊती वा पेशीजालांनी सहजपणे पार पडतात; पण या साऱ्यांची निर्मिती मात्र काही मोजक्या मूळ पेशींतून होते, हे निसर्गाचेच एक गुपित आहे.


'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*

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कुतुहल मध आणि मधमाशी


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           *🤔 【 कुतूहल 】 🤔*  

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*🖥️✒️संकलन✒️💻*

गजानन गोपेवाड 

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*कुतूहल : मध आणि मधमाशी*


निसर्गातील क्षुल्लक वाटणारे कीटक त्यांच्या बहुमोल कर्तृत्वाने गेली कित्येक शतके मानवजातीसाठी मोठे योगदान देत आहेत. मधमाशी, रेशीमकिडा आणि लाखनिर्मिती करणारा कीटक त्यांच्यात असणाऱ्या क्षमतेमुळे हे शक्य झाले आहे.


मधमाशी तर अविश्रांत परागीभवन करीत असते, त्यामुळे मानवाला अन्नधान्य मिळण्यासाठी यांचीच अप्रत्यक्ष मदत होते. मध हा चविष्ट आणि आरोग्यपूर्ण पदार्थ मधमाश्यांच्या परिश्रमामुळे निर्माण होत असतो. मधनिर्मिती ही टप्प्याटप्प्याने चालणारी प्रक्रिया आहे. कामकरी माश्या वसंत आणि ग्रीष्म ऋतूत फुलातून आपल्या खास मुख-अवयवाने मधुरस आणि पराग घेऊन येतात. हे करत असताना एका खेपेमध्ये त्या कमीत कमी शंभर फुलांना भेट देतात. त्यांच्या शरीरात असणाऱ्या खास पिशवीत किंवा ‘हनी-स्टमक’मध्ये हा मधुरस लाळेबरोबर मिसळला जातो. या पिशव्या पूर्ण भरल्या की त्या पोळय़ाकडे परत येऊन पोळय़ात राहणाऱ्या कामकरी माश्यांच्या ताब्यात हा मध देतात. हा मधुरस एका माशीच्या मुखातून दुसऱ्या माशीच्या मुखात देताना त्यात विविध विकरे मिसळली जातात. यामुळे त्याचा सामू आणि रासायनिक गुणधर्म बदलतो. एका माशीकडून दुसऱ्या माशीकडे जाताना मधाचे निर्जलीकरण होतेच, शिवाय मधाच्या पोळय़ावर तो पसरून सुकला जातो. शिवाय इतर मधमाश्या आपले पंख सतत फडफडवत राहतात आणि मधात असलेले ७० टक्के पाणी हळूहळू १७ ते २० टक्के इतक्या प्रमाणावर येते. या मधाची मधमाश्यांना स्वत:साठी गरज असते. त्यांच्या पोषणासाठी ते मध आणि पराग सेवन करत असतात. नव्या अळय़ांना खास आहार दिला जातो. राणी बनणार असेल तर तिला रॉयल-जेली आहार मिळतो. आपल्या अन्नाच्या साठवणीकरिता त्यांनी हे अफाट काम केलेले असते.


मधमाशीच्या या नैसर्गिक आहारात आता विज्ञानाने खूपच प्रगती केली आहे. मध टिकावा म्हणून मधमाश्या पोळय़ाला बी-वॅक्सचे किंवा मक्षिकामेणाचे बूच लावतात बी-वॅक्स हा नैसर्गिक, पर्यावरणस्नेही, जलरोधक, जिवाणूविरोधक आणि बुरशीविरोधक असा असल्याने त्याचा अनेक ठिकाणी उपयोग करता येतो. यात प्रोपोलीस किंवा सेरा अल्बा हा नैसर्गिक पदार्थ असतो. या पदार्थाची निर्मिती कामकरी मधमाशी तिच्या पोटाकडच्या खंडात असलेल्या आठ ग्रंथींमधून करते. यात मेदाम्लाची इस्टर्स आणि अल्कोहोलच्या लांब  शृंखला असलेली रसायने असतात. मधमाश्या डंख मारतात या समजामुळे त्यांची पोळी जाळून त्यांचा नायनाट करणे हे मानवजातीला खूप महागात पडू शकते. मधमाशी नाहीशी झाली तर आपणदेखील संपलोच हे लक्षात ठेवावे!


 -डॉ. नंदिनी विनय देशमुख

मराठी विज्ञान परिषद, मुंबई.

Written By_लोकसत्ता टीम

संकेतस्थळ : www.mavipa.org      

ईमेल : office@mavipamumbai.org

ज्ञान विज्ञान उत्क्रांती म्हणजे काय?


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    @ संकलन गजानन गोपेवाड 

  

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *उत्क्रांती म्हणजे काय ?* 📙 

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*भाग - १ (१/६)*


*ही कहाणी सुरू होते खूप खूप वर्षांपूर्वी म्हणजे जवळजवळ साडेचार अब्ज वर्षांपूर्वी.


*त्याच काळात केव्हातरी आपल्या पृथ्वीचा जन्म झाला. त्यावेळची पृथ्वी म्हणजे तप्त द्रवरूप धातू, धूळ आणि वायू यांचा गोळा होता. अनेक लक्ष वर्षे गेली आणि गोळ्याचा पृष्ठभाग हळूहळू थंड होत त्याचे रूपांतर कठीण कवचात होत गेले. हे कवच म्हणजेच खडकांनी बनलेला पृथ्वीचा पृष्ठभाग. सुरुवातीच्या काळात हा पृष्ठभाग बनत होता. आतल्या तप्त द्रवाच्या धडकांनी पुन्हा फुटत होता, पुन्हा घडत होता, जागा बदलत होता. पृथ्वीवर सापडलेल्या सर्वात पुरातन खडकाचे वय सुमारे चार अब्ज तीस लाख वर्षे आहे.

*

 पृथ्वीचा हा पृष्ठभाग बनत होता, त्याबरोबर त्या पृष्ठभागावर पाणी जमा होत होते आणि भोवती वातावरणाचा थरही बनत होता. मात्र हे वातावरण बनले होते मुख्यतः कार्बन डायऑक्साइड, मिथेन, अमोनिया, हायड्रोजन या वायुंनी. पृथ्वीभोवतीच्या वातावरणात ऑक्सिजन जवळजवळ नव्हताच. वेगवेगळ्या भौतिक व रासायनिक प्रक्रियांमधून हळूहळू अॉक्सिजनचे प्रमाण वाढत गेले. जीवसृष्टीच्या उदयाला हा बदल अत्यंत उपयुक्त ठरला. 

 

 या सगळ्यांचे मिळून बनलेले हे रसायन पृथ्वीच्या पृष्ठभागावर पसरलेले होते आणि त्यावर सतत आदळत होते सूर्याचे अतिनील किरण. त्या रसायनात घडत होता विजांचा चमचमाट. या भौतिक आणि रासायनिक प्रक्रियांमधूनच केव्हातरी पहिल्या सजीव पेशीच्या जन्माला आवश्यक असणाऱ्या वेगवेगळ्या घटकांचा मुख्यतः प्रथिने बनवणाऱ्या अमिनो अॅसिडचा उद्भव झाला.

 पृथ्वीच्या जन्मापासून आजपर्यंतच्या काळाचे शास्रज्ञांनी वेगवेगळे भाग पाडले आहेत.

 

 अगदी सुरुवातीचा सुमारे दोन अब्ज वर्षांचा काळ आर्चिअन इआॅन (आर्चिअन कल्प) या नावाने ओळखला जातो. या काळात पृथ्वीवर सजीव पेशी जन्माला आली नव्हती.

 

 आर्चिअन कल्पानंतरचा सुमारे एक अब्ज नव्वद कोटी वर्षांचा काळ प्रोटेरोझोइक इआॅन (प्रोटोरोझोइक कल्प) या नावाने ओळखला जातो.

 या दोन्ही कालखंडांना मिळून प्रिकेंब्रिअन इरा (प्रक्रेंब्रिअन युग) असेही नाव दिले आहे. पृथ्वीच्या आजवरच्या इतिहासापैकी जवळजवळ ८० टक्के काळ हा प्रिकेंब्रिअन युगानेच व्यापलेला आहे.

 *क्रमश:*


'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*

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गुरुवार, १३ जानेवारी, २०२२

पहिले भारतीय अंतरिक्ष राकेश शर्मा

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                        *राकेश शर्मा*

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*अंतरिक्षात जाणारे पाहिले भारतीय*

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*जन्मदिन - १३ जानेवारी १९४९*

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राकेश शर्मा हे अंतरिक्षात जाणारे पाहिले भारतीय आहेत.

भारताचा पहिला आणि जगाचा १३८ वा अंतराळवीर बनण्याचा सन्मान विंग कमांडर राकेश शर्मा यांनी पटकावला तो २ एप्रिल १९८४ रोजी भारत-रशिया अवकाश संशोधन मंडळ कार्यक्रमांतर्गत रशियाच्या सोयूझ टी-२ यानातून दोन रशियन अंतराळ संशोधकासमवेत राकेश शर्माने अवकाश सफरीचा अनुभव घेऊन या क्षेत्रात प्रगतीचे नवे दालन भारतीयांसाठी खुले केले.

राकेश शर्मा पंतप्रधान इंदिरा गांधी यांच्याशी अंतराळातून बोलत होते. अंतराळातून भारत कसा दिसतो, या प्रश्‍नाला त्यांनी "सारे जहाँसे अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा' असे अभिमानी उत्तर दिले होते.

पतियाळात जन्मलेला राकेश भारतीय वायू दलात वैमानिक होता.

नंतर च्या काळात त्यांचा अशोक चक्र देऊन सन्मान केल्या गेला.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा-यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

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पौष मास,शुक्ल पक्ष,*एकादशी*,कृतिका नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,शिशिर ऋतु,युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

गुरुवार, १३ जानेवारी २०२२.

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                         *प्रभात दर्शन*

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        *"कुछ बोलने और तोड़ने में केवल एक पल लगता है, जबकि बनाने और मनाने में पूरा जीवन लग जाता है। प्रेम सदैव क्षमा माँगना पसंद करता है और अहंकार सदैव क्षमा सुनना पसंद करता है... अब यह आप पर निर्भर है कि आपको अपने अंदर प्रेम का सृजन करना है अथवा अहंकार का..."*


*जीवन आपका-निर्णय आपका*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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*लोहड़ी पर्व की हार्दिक बधाई*

सोमवार, १० जानेवारी, २०२२

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             *गाथा बलिदानाची*

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            *तिरुपुर कुमारन*

          (भारतीय क्रांतिकारी)


   जन्म : ४ अक्टूबर १९०४

(चेनिमलाई,ईरोड,मद्रास प्रेसिडेंसी,ब्रिटिश इंडिया)


 *मृत्यु : ११ जनवरी १९३२* 

                  (उम्र २७)


(तिरुपुर,मद्रास प्रेसिडेंसी,ब्रिटिश इंडिया)


मृत्यु का कारण : सत्याग्रह के दौरान पुलिस की क्रूरता

राष्ट्रीयता : भारतीय


कुमारन को तिरुपुर कुमारन भी कहा जाता है! एक भारतीय क्रांतिकारी थे जिन्हों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था।


भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराने की जंग में कइयों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। किसी का लहू बहा तो कोई सालों तक जेल में बंद रहा। अंग्रेजों की यातनाएं सही, लेकिन देश के वे वीर जांबाज पीछे नहीं हटे और अपनी अंतिम सांस तक देश की आजादी के लिए लड़ते रहे।


इन्ही जांबाजों में से एक नाम है तिरुपुर कुमारन, एक ऐसा नाम जो अंग्रेजी हुकूमत की लाठी के आगे नहीं टूटा और सीना फख्र से चौड़ा कर अपने देश को स्वंतंत्र कराने की लड़ाई में कूद पड़ा।


कुमारन ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग ले अपना संपूर्ण जीवन भारत को आजाद कराने में लगा दिया, इसके बावजूद भारत के इस महान स्वतंत्रता सेनानी का नाम इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हो गया।


कुमारन ने यह जानते हुए कि उस समय ब्रिटिश सरकार के भारत में तिरंगा के फहराने पर पूरी तरह से मनाही है, राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को लहराने पर जोर दिया था।


वह तिरुपुर के रहने वाले थे और तिरुपुर में एक शांतिपूर्ण असहयोग आन्दोलन के दौरान ब्रिटिश पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। इसी आंदोलन में घायल हुए कुमारन ने अपना दम तोड़ दिया।

अपने वतन की आजादी के लिए इस शख्स ने अंग्रेजों की कई लाठियां खाई, लेकिन अपनी मातृभूमि को आजाद कराने के उद्देश्य पर वह दृढ़ हो डटे रहे।


कुमारन का जन्म भारत मद्रास प्रेसिडेंसी, चेन्नई (तमिलनाडु में वर्तमान ईरोड जिला) में चेननिमालाई में हुआ था। उन्होंने देश बंधु युवा संघ की स्थापना की और अंग्रेजों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। ११ जनवरी १९३२ को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एक विरोध मार्च के दौरान तिरुपुर में नौय्याल नदी के तट पर पुलिस हमले से बने चोटों से उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के समय, वह भारतीय राष्ट्रवादियों का ध्वज पकड़ रहे थे, जो कि अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित कोडी कथथा कुमारन (कुमारन ने ध्वज की रक्षा की) को उकसाया। 


अक्टूबर २००४ में भारत की १०० वीं जयंती पर एक स्मारक डाक टिकट जारी किया गया था।  तिरुपुर में उनके सम्मान में एक मूर्ति बनाई गई है जिसे अक्सर सार्वजनिक प्रदर्शनों के लिए एक केंद्र बिंदु के रूप में उपयोग किया जाता है।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद*🇮🇳🇮🇳🇮🇳

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

रविवार, ९ जानेवारी, २०२२

सँम्युअल काँल्ट अमेरिकन शंशोधन

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                 *सॅम्युअल कॉल्ट*

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      *अमेरिकन संशोधक*

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*स्मृतिदिन - १० जानेवारी  इ.स. १८६२*


सॅम्युअल कॉल्ट (जुलै १९, इ.स. १८१४:हार्टफर्ड, कनेक्टिकट - जानेवारी १०, इ.स. १८६२) हा अमेरिकन संशोधक होता. त्याने रिव्होल्व्हर पिस्तुलचा शोध लावला.

कॉल्टने अगदी लहानपणी त्याच्या वडीलांच्या कापडगिरणीतील यंत्रे पाहिली होती व ती कशी चालतात याचा अभ्यास केला होता. वयाच्या १५व्या वर्षी त्याने घर सोडले व भारताला जाणाऱ्या जहाजावर तो खलाशी झाला. अमेरिकेहून भारताच्या सफरीत त्याने जहाजाचे कॅप्स्टन पाहिले व त्यावरून त्याला स्वयंचलित पिस्तुलाची कल्पना आली.

इ.स. १८३५मध्ये त्याने आपल्या या कल्पनेचा युरोपीय पेटंट घेतला व पुढील वर्षी अमेरिकन पेटंटही मिळवला. मार्च ५, इ.स. १८३६ रोजी त्याने पहिले रिव्होल्व्हर पिस्तुल पॅटरसन, न्यूजर्सी येथे तयार केले परंतु अमेरिकन लोकांनी या नवीन शोधाला अपेक्षेप्रमाणे प्रतिसाद दिला नाही व कॉल्टच्या कंपनीने इ.स. १८४२मध्ये दिवाळे काढले. इ.स. १८४६ पर्यंत त्याने नवीन पिस्तुले तयार केली नाहीत.

इ.स. १८४७मध्ये त्याने पुन्हा उत्पादन सुरू केले व स्वतः सगळे (कच्चा माल घेण्यापासून तयार पिस्तुले विकण्यापर्यंत) करण्याऐवजी त्याने पगारदार मदतनीस घेतले. यानंतर लवकरच अमेरिकन सरकारने त्याच्याकडून पिस्तुले विकत घेण्यास सुरूवात केली. यानंतर कॉल्ट व त्याच्या कंपनीने मागे वळून पाहिले नाही व आत्तापर्यंत कोट्यावधी पिस्तुले विकली आहेत.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा - यवतमाळ ४४५२०६

10 जानेवारी निरंजन घाटे जन्मदिन

 *निरंजन घाटे*


*विज्ञानलेखक*


*जन्मदिन - १० जानेवारी १९४६*


आकाशवाणीच्या विविध केंद्रांवर कार्यक्रम अधिकारी आणि केंद्रप्रमुख आणि अनेक मराठी मासिकांचे संपादक म्हणून निरंजन घाटे परिचित आहेत. १५० पुस्तके, ३०० विज्ञानकथा आणि ३००० वैज्ञानिक लेख असे निरंजन घाटे यांचे विपुल प्रमाणात लेखन आहे.


मराठी भाषेतून विज्ञान-तंत्रज्ञानाचा प्रभावी प्रसार करण्यासाठी निरंजन घाटे यांनी सातत्याने ४० वर्षे लेखन केलेले आहे. त्यांनी आघाडीवरील विज्ञान-तंत्रज्ञानाची अद्ययावत माहिती विविध नियतकालिकांमधून आणि वृत्तपत्रांच्या रविवार पुरवण्यांमार्फत मराठी वाचकांपर्यंत पोहोचवण्यासाठी विशेष प्रयत्न केले. अग्रगण्य वैज्ञानिक शोधनिबंधांमधील इंग्रजी भाषा ही विशिष्ट क्षेत्रात संशोधन करणाऱ्या संशोधकाची माहिती आणि संदर्भासाठी योजलेली असते. त्यातील जटिल कल्पना अवजड शब्दांमध्ये व्यक्त झालेल्या असतात. घाटे यांनी मराठी वाचकांसाठी वैज्ञानिक संकल्पनांमधील क्लिष्ट आशय सोप्या आणि सुबोध मराठी भाषेत प्रकट करण्यासाठी लेख व विज्ञानकथाही लिहिल्या. त्यांनी २००९ सालापर्यंत लिहिलेल्या १५० पुस्तकांपैकी अनेक वैज्ञानिक पुस्तकांचे पुनर्मुद्रण करावे लागले किंवा आवृत्त्या काढाव्या लागल्या. देशी आणि परदेशी शास्रज्ञांची चरित्रे, त्यांना आलेल्या अडचणी, त्यांची अनन्यसाधारण व्यक्तिमत्वे, त्यांच्या वैज्ञानिक कामगिऱ्या त्यांनी उलगडून दाखविल्या आहेत. पर्यावरण, उत्क्रांती यांसंबंधीचे लेखन करून त्यांनी जनजागृतीचे कार्यही केलेले आहे.


निरंजन घाटे यांनी भूशास्त्र हा विषय घेऊन पुणे विद्यापीठाची एम.एस्सी. पदवी १९६८ साली मिळवली. त्यानंतर त्याच विभागात त्यांनी सतत ९ वर्षे प्रयोगदर्शक आणि व्याख्याता म्हणून कार्य केले.


१९७७ साली त्यांना कार्यक्रम अधिकारी म्हणून नागपूर, जळगाव आणि सांगली आकाशवाणीच्या केंद्रांवर काम करण्याची संधी मिळाली. नवव्या आशियाई क्रीडा स्पर्धेच्या निमित्ताने त्यांची १९८२ साली मराठी कार्यक्रम प्रमुखपदी निवड झाली. तेथे त्यांनी लक्षणीय कामगिरी केली. त्यांची सांगली आकाशवाणीच्या केंद्रप्रमुख पदावर नेमणूक करण्यात आली. आकाशवाणीचे पदाधिकारी  म्हणून घाटे यांनी ६००पेक्षा अधिक उत्तम कार्यक्रम श्रोत्यांसाठी सादर केले. त्यांमध्ये रूपके, एकांकिका, संवाद आणि विज्ञानविषयक भाषणांचा समावेश होता. १९८३ नंतर पुण्याच्या महात्मा फुले वस्तुसंग्रहालयामध्ये घाटे यांनी प्रारंभी उपसंचालक आणि नंतर संचालक म्हणून कार्य केले. 


पंधरा वर्षांच्या सेवेनंतर त्यांनी पूर्ण वेळ लेखनासाठी द्यायचे ठरवले. तथापि पुढील काही वर्षे त्यांनी अनेक मराठी मासिकांसाठी संपादकाची भूमिका बजावली. घाटे यांनी ‘सृष्टिज्ञान’ (१९८३-९३), ‘बुवा’, ‘पैंजण’ (१९८६-९२), ‘अद्भुत कादंबरी’, ‘ज्ञानविकास’ (१९८६-९२), ‘किर्लोस्कर’ (१९९३-९४), ‘विज्ञानयुग’ या मासिकांच्या संपादक मंडळावर उत्साहाने काम केले. पुण्यातील मराठी विज्ञान परिषद, मराठी साहित्य परिषद आणि महात्मा फुले वस्तू संग्रहालय यांचे ते आजीव सदस्य आहेत.


त्यांनी सतत नावीन्याचा ध्यास बाळगल्याचे दिसून येते. त्यांच्या विज्ञान लेखनासाठी आवश्यक असणारी विशाल ग्रंथसंपदा त्यांनी मेहनतीने उभारलेली आहे. विज्ञान लेखनाप्रमाणे ते युद्धकथा, साहसकथा, हेरकथा आणि बालकुमार वाङ्मयनिर्मितीमध्ये रमतात. सभा, संमेलने, सत्कार अशा गोष्टींपासून घाटे अलिप्त असतात, परंतु अशा प्रकारच्या कार्यक्रमात भाग घेऊन त्यांनी भाषणातून सडेतोडपणे आपली आग्रही, आणि व्यवहारी मते मांडली आहेत. घाटे यांच्या ‘ज्ञानदीप’, ‘ऊर्जाविश्व’, ‘वसुंधरा’, ‘अंटार्क्टिका’, ‘आकाशगंगा’, ‘शोधवेडे शास्त्रज्ञ’, ‘जीवनचक्र’, ‘आत्मवेध’, ‘आधुनिक युद्धसाधने’, ‘स्पेसजॅक’, अशा अनेक उत्तम पुस्तकांना वाचकांची पसंती आणि विविध पुरस्कार मिळालेले आहेत. त्यांच्या पुस्तकांना आठ वेळा राज्य पुरस्कार मिळालेले आहेत. त्यांमध्ये यदुनाथ थत्ते, रेव्हरंड ना.वा. टिळक, पंजाबराव देशमुख, वि.म. गोगटे, गो.रा. परांजपे, र.द. आंबेकर यांच्या नावाने दिल्या जाणार्‍या पुरस्कारांचा विशेष उल्लेख करायला पाहिजे. मराठी विज्ञान परिषदेतर्फे १९८५  साली त्यांना उत्कृष्ट विज्ञान प्रसारक म्हणून मानपत्र मिळाले.  


त्यांना मिळालेले इतर काही सन्मान : ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर पुरस्कार’ (पुणे मराठी ग्रंथालय, १९९२), ‘मो.वा. चिपळोणकर पुरस्कार’ (इंडियन फिजिक्स असोसिएशन, १९९७). घाटे यांच्या विज्ञानकथांना अनेक स्पर्धांमध्ये बक्षिसे मिळालेली आहेत. उदाहरणार्थ : ‘नवयुग कथास्पर्धा’ (१९७१,७२,७३), ‘विरंगुळा कथा स्पर्धा’ (१९७४), ‘मराठी विज्ञान परिषद, विज्ञानकथा स्पर्धा’ (१९७१,७२,७४). घाटे पुणे विद्यापीठाच्या भूशास्त्र विभागामध्ये अध्यापन करीत असताना, त्यांच्या संशोधनावर आधारित असलेले नऊ शोधनिबंध त्यांनी भूशास्त्राशी संबंधित नियतकालिकात प्रकाशित केलेले आहेत.


निरंजन घाटे यांनी शालेय आणि महाविद्यालयीन जीवनात असताना क्रिकेटच्या अनेक स्पर्धांमध्ये भाग घेऊन त्यांचे प्रावीण्य दाखवले होते. पुण्यातील सदू शिंदे लीग क्रिकेट स्पर्धांमध्ये त्यांनी १९६६ ते १९७३ या काळात चार वेळा उत्कृष्ट गोलंदाज म्हणून मानपत्रेसुद्धा मिळवली आहेत.


त्यांनी लिहिलेल्या वसुंधरा, एकविसावं शतक आणि नवे शतक या पुस्तकांना राज्य पुरस्कार मिळाले आहेत. त्यांची निवडक पुस्तके पुढीलप्रमाणे - 'वाचत सुटलो त्याची गोष्ट', 'आपल्या पूर्वजांचे विज्ञान', 'असे घडले सहस्रक', 'असे शास्त्रज्ञ असे संशोधन', 'जिज्ञासापूर्ती', 'ज्याचं करावं भलं', 'पर्यावरण प्रदूषण', 'वसुंधरा', 'वेध पर्यावरणाचा'.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

पौष मास,शुक्ल पक्ष,*अष्टमी*,रेवती नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,शिशिर ऋतु,युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

सोमवार, १० जानेवारी २०२२.

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                        *प्रभात दर्शन*

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          *"संतुष्ट जीवन, सफल जीवन से सदैव श्रेष्ठ होता है क्योंकि सफलता का मापदण्ड सदैव दूसरों के द्वारा आंकलित एवं दूसरों पर ही निर्भर होता है जबकि संतुष्टि स्वयं के मन और मस्तिष्क द्वारा निर्धारित होती है"*


*गौधन, गजधन, बाजधन*

                *और रतन धन खान,*

*जब आवे सन्तोष धन,*

                *सब धन धूरी समान*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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शनिवार, ८ जानेवारी, २०२२

गुरूगोविंद सिंग शिखाचे 10 वे धर्मगुरू

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*शीखांचे दहावे धर्मगुरु गुरु गोविंद सिंह* 

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जन्म -) ०९ जानेवारी १६६६

देहवसान -)  १७०८

शिखांचा सिख्ख धर्म हा भक्तीमार्ग शिकवतो. त्यात प्रेम आणि अहिंसा ही प्रमुख तत्त्वे आहेत. गुरुनानकांना बाबरने कारागृहात डांबले. तरीही पहिल्या ९ धर्मगुरूंनी त्यांच्या उपदेशात केवळ भक्ती अन् प्रेम यांचाच संदेश दिला. मुसलमानांचा प्रतिकार करावयास सांगितले नाही. शिखांचे ९ वे धर्मगुरु तेग बहाद्दूर यांनाही मोगलांनी हालहाल करून मारले. श्री गुरु गोविंद सिंह हे शीख धर्माचे दहावे गुरू होते. त्यांचा जन्म १६६६ मध्ये पाटना येथे गुजरीजी व श्री गुरु तेगबहादुरजी यांच्या गरीब कुटुंबात झाला. त्यावेळी गुरु तेगबहादुरजी बंगालमध्ये होते. त्यांच्या म्हणण्यानुसार गुरुजी यांचे नाम गोविंद राय असे ठेवण्यात आले होते. नंतर १६९९ मध्ये बैसाखीच्या दिनी गुरु गोविंद राय हे गुरु गोविंद सिंह बनले होते. त्यांचे बालपणाचे पाच वर्ष पाटना येथेच गेले. १६७५ मध्ये कश्मीरच्या ब्राम्हणांच्या विनंतीला मान देऊन श्री गुरु तेगबहादुरजींनी दिल्ली येथील चांदणी चौकात देहत्याग केला होता. श्री गुरु गोविंद सिंहजी ११ नोव्हेंबर १६७५ रोजी गुरु गादीवर विराजमान झाले. धर्म व समाजाच्या संरक्षणासाठी गुरु गोविंद सिंहजी यांनी १६९९ मध्ये खालसा पंथाची स्थापना केली. ‘खालसा’ म्हणजे शुद्ध, पवित्र. खालसा पंथीय ही प्रार्थना करतात, ‘परमेश्वरा, मी योग्य कारणासाठीच लढीन. मी युद्धावर जातांना मला निर्भय बनव. ‘मी युद्धात जिंकेनच’, असा आत्मविश्वास माझ्यात निर्माण कर. माझ्यात तुझ्या कीर्तनाची आवड निर्माण कर आणि मृत्यूसमयी तुझ्या चरणी विलीन करून घे.’ खालसा पंथ हा निरंकारी आहे. निरंकारी म्हणजे ईश्वराला निराकार मानणारा. याचा दुसरा अर्थ आहे ‘निरहंकार.’ ‘श्री’ हे देवीचे नाव आहे आणि भगवती म्हणजे तलवार. त्यांच्या योद्ध्यांना ‘संत-सिपाही’, असे म्हणतात. खालसा पंथाच्या माध्यमातून त्यांनी जातीय भेद नष्ट करून समानता प्रस्तापित केली. शीख बांधवामध्ये आत्म-सन्मानाची भावना वाढीस लावली. गुरु गोविंद सिंह यांना तीन पत्नी होत्या. माता जीतोजी, माता सुंदरीजी व माता साहिबकौरजी अशी त्यांची नावे होती. बाबा अजित सिंह, बाबा जुझार सिंह ही त्यांची मुले होती. ती चमकौरच्या युद्धात शौर्यमरण प्राप्त झाले होते. तर बाबा जोरावर सिंह व फतेह सिंह या लहान मुलांना सरहंदच्या नवाबने जिवंत भिंतींत पुरले होते. केसगड, फतेहगड, होलगड, आनंदगड व लोहगड हे किल्ले त्यांनी युद्धात जिंकले होते. गुरुजी दररोज गुरूवाणीचे पठण करून आपल्या भक्तांना त्याचा सविस्तर अर्थही सांगत असत. तेव्हा त्यांचे लहान भाऊ मनी सिंहजी ते लिहीत असत. सलग पाच महिने लिहून गुरुवाणी पूर्ण झाली होती. गुरु गोविंद सिंहजी यांनी ४२ वर्षापर्यंत शत्रूविरुद्ध सामना केला होता. १७०८ मध्ये त्यांनी महाराष्ट्रातील नांदेड येथील सचखंडमध्ये आपला देह त्यागला होता.

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६


सुंदरलाल बहुगुणा पर्यावरवादी

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*प्रख्यात भारतीय पर्यावरणवादी सुंदरलाल बहुगुणा*

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*जन्मदिन - ०९ जानेवारी १९२७*

        (मारोडा-टेहरी, उत्तराखंड,

 

सुंदरलाल बहुगुणा हे एक प्रख्यात भारतीय पर्यावरणवादी असून चिपको आंदोलनाचे प्रणेते आहेत.


चिपको आंदोलन

महात्मा गांधींच्या तत्त्वांना अनुसरून सुंदरलाल बहुगुणा यांनी ब्रिटिश सरकारविरुद्ध लोकांना एकत्र केले. त्यासाठी त्यांनी हिमालयातील जंगले आणि आणि पर्वतांमधून ४ हजार सातशे किलो मीटरचा पायी प्रवास केला. त्यावेळी मोठ्या प्रकल्पांमुळे हिमालयातील नाजुक पर्यावरणावर होणारे गंभीर दुष्परिणाम त्यांच्या निदर्शनास आले. त्यामुळे खेड्यांतील लोकांच्या जीवनावर होणारा परिणामही त्यांनी जवळून अनुभवला. यातूनच १९७३ साली चिपको आंदोलनाची सुरुवात झाली. जंगले व झाडे वाचवण्यासाठी सुंदरलाल बहुगुणांनी दुर्गम भागांतील खेड्यापाड्यांतील जनतेला झाडे तोडण्यासाठी आलेल्या कामगारांना थोपवण्यासाठी झाडांना मिठी मारून चिपकण्याची कल्पना दिली. तत्कालीन पंतप्रधान इंदिरा गांधी यांच्याशी चर्चा करून त्यांनी १९८० साली वृक्षतोडीवर १५ वर्षांची बंदी आणली.


टेहरीसाठी उपोषण

टेहरीसारख्या मोठ्या धरणालाही सुंदरलाल बहुगुणा यांचा विरोध होता. १९९५ साली हे धरण होऊ नये यासाठी त्यांनी ४५ दिवसांचे उपोषण केले. त्यानंतर तत्कालीन पंतप्रधान पी.व्ही. नरसिंहराव यांनी टेहरी धरणामुळे पर्यावरणावर होणाऱ्या परिणामांचा अभ्यास करण्यासाठी एक समिती नेमली. धरणाचे काम सुरूच राहिल्यांने बहुगुणांनी महात्मा गांधींच्या समाधिस्थळाजवळ बसून ७४ दिवसांचे प्रदीर्घ उपोषण केले. काम तात्पुरते थांबले. मात्र २००१ साली या धरणाचे काम परत सुरू झाल्यावर सुंदरलाल बहुगुणा यांना अटक झाली.


भागीरथी नदीच्या काठी कोटी या गावाजवळ त्यांचे पर्यावरण रक्षणाचे काम आजही (२०१७ साली) चालू आहे.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

पौष मास,शुक्ल पक्ष,*सप्तमी*,रेवती नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,शिशिर ऋतु,युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

रविवार, ०९ जानेवारी २०२२.

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                       *प्रभात दर्शन*

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       *ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना कुछ इस प्रकार की है कि ना तो हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं और ना ही स्वयं को लात मार सकते हैं। इसीलिए वास्तविक संतुलन के लिए हमारे जीवन में अच्छे मित्र एवं आलोचकों का होना अति आवश्यक है।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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शुक्रवार, ७ जानेवारी, २०२२

गॅलिलिओ गँलिली

 *गॅलेलियो गॅलिली*


*इटलीचा भौतिकशास्त्रज्ञ, गणितज्ञ, व तत्त्वज्ञ*


*स्मृतिदिन - ०८ जानेवारी  १६४२*

गॅलेलियो गॅलिली (फेब्रुवारी १५, इ.स. १५६४ - जानेवारी ८, इ.स. १६४२) हा इटलीचा भौतिकशास्त्रज्ञ, गणितज्ञ  होता.

१६०४ साली त्याला आकाशात एक नवीन उज्ज्वल तारा दिसला. १६०९ साली त्यान कुठल्याशा उपकरानाविषयी एक दंतकथेवजा अफवा ऐकली. कुणीतरी नळकांड्यात भिंग बसवून ते उपकरण बनवलं होत. त्यातून दूरवरच्या बोटी खूप स्पष्टपने दिसत. या दुर्बीणविषयीच्या अनेक कथा प्रसिद्ध आहेत. गॅलेलियोला वाटलं कि, याच दुर्बिणीतून आपण समुद्रावरच्या बोटीऐवजी जर आकाशातले ग्रहतारे न्याहाळले तर? आणि गॅलेलियोन ती दुर्बीण आकाशाकडे फक्त वळवली आणि सर्व विज्ञानाचा, खगोलशास्त्राचा इतिहासच बदलला! या दुर्बिणीतून त्यान चंद्रावरचे डोंगर आणि ज्वालामुखी बघितले. १६१० साली गुरूच निरीक्षण करून त्याभोवती फिरणारे उपग्रह, चंद्र शोधून काढले. शुक्रतारा आणि त्याच्या 'कला' यांचाही अभ्यास केला. या सगळ्या शोधावर मग त्याने 'दी स्टारी मेसेंजर' हे पुस्तकही लिहिल. गुरुभोवती चंद्र बगून 'चंद्र हे काही फक्त पृथ्वीलाच नाहीयेत, त्यामुळे पृथ्वी ही काही या विश्वात केंद्रस्थानी मानण्याचे कारण नाही; आणि कोपर्निकसच म्हणन बरोबर असल पाहिजे, असं त्याच ठाम मत झालं. या पुस्तकामुळे गॅलेलियो चक्क रातोरात हिरो बनला! पण 'या दुर्बीणीतून दिसणाऱ्या चंद्रावरचे पर्वत , डाग आनि इतरही गोष्टी या खऱ्या नसून दिशाभूल करणाऱ्या आहेत, असंच चर्च म्हणायला लागलं.व गॅलेलियो विरुद्ध खटला चालू झाला, सहा महिन्याच्या खटल्यानंतर २२ जून १६३३ रोजी जवळपास अंधत्व आलेल्या गॅलेलियोने पुन्हा हार मानली. त्याची नजरकैद चालू होती, या नजर कैदेत त्याची बरीच वर्षे नैर्याशात गेली आणि अशातच कडाक्याची थंडी पडली असता ८ जानेवारी १६४२ रोजी गॅलेलियो मृत्यूमुखी पडला.

 गॅलेलियो हा पाहिला आधुनिक शास्त्रज्ञ म्हणता येईल. त्याविषयी ब्रेख्यन एक सुंदर कलाकृतीही लिहिलीय. त्याच बोट हे इटलीच्या एका संग्रहालयात जपून ठेवलाय. अँटकिन्स नावाच्या सुप्रसिद्ध ब्रिटीश लेखकाने 'गॅलेलियोज फिंगर' नावच विज्ञानावर सुरेख पुस्तकही लिहिलंय! गॅलेलियोजेव्हा मरण पावला तेव्हा विज्ञानाच्या क्षितिजावर सूर्यच निस्तेज झाला होता!

🙏🌞🙏शुभ प्रभात🙏🌞🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

पौष मास,शुक्ल पक्ष,*षष्ठी*,उ.भा.नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,शिशिर ऋतु,युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

शनिवार, ०८ जानेवारी २०२२.

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                          *प्रभात दर्शन*

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बलवानप्यशक्तोऽसौ 

                 धनवानपि निर्धनः।

श्रुतवानपि मूर्खोऽसौ 

                 यो धर्मविमुखो जनः॥


भावार्थः- *जो व्यक्ति धर्म (कर्तव्य) से विमुख होता है, वह व्यक्ति बलवान् हो कर भी असमर्थ, धनवान् हो कर भी निर्धन तथा ज्ञानी हो कर भी मूर्ख होता है।* 

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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गुरूचे आयो युरोपा

 *७ जानेवारी १६१०*

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*गुरूचे आयो,युरोपा,गॅनिमीड व कॅलिस्टो हे चार चंद्र गॅलिलिओने दुर्बिणीद्वारे शोधले.*

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गुरू ग्रहाला एकंदर ७९ चंद्र आहेत. त्यांपैकी ठळकपणे दिसणारे चार उपग्रह गॅलिलियन उपग्रह म्हणून ओळखले जातात.


बृहस्पति सौर प्रवाहातील कुठल्याही ग्रहाचे वाजवी स्थिर अवस्थेत असलेल्या चंद्राची संख्या अधिक होते.

       सर्वात मोठे चंद्रमार्ग म्हणजे गॅलिलियो गॅलीली आणि सायमन मारिअस यांनी १६१० मध्ये स्वतंत्रपणे शोधलेले गॅलिलियन चंद्रातील चार ग्रह आणि त्या पहिल्या ऑब्जेक्ट्स होत्या ज्यांना शरीर किंवा पृथ्वी सूर्यप्रकाशास लागलेली नव्हती. १९ व्या शतकाच्या अखेरीस डझनभर लहान जोव्हिन चंद्राचे शोध लावले गेले आहेत आणि रोमन देव बृहस्पति किंवा त्यांच्या ग्रीक समूदास झ्यूसच्या चाहत्यांच्या मुलींचे नाव मिळाले आहे. ज्युपिटरच्या चंद्रमार्गांपैकी आठ नियोजित उपग्रह आहेत, ज्यात प्रोजेक्ट आणि जवळजवळ परिपत्रक कक्ष आहेत जे ज्युपिटरच्या इक्वेटोरियल प्लेनच्या संदर्भात फारशी आवडत नाहीत. गॅलिलिअन उपग्रह ग्रहांच्या वस्तुमानामुळे जवळजवळ गोलाच्या आकाराचा गोलाकार आहेत आणि जर ते सूर्यमालेत थेट कक्षेत असतील तर त्यांना (बौद्ध) ग्रहांचा विचार केला जाईल. इतर चार नियमित उपग्रह बरेच लहान आहेत आणि बृहस्पति जवळ आहेत; हे ज्युपिटरच्या रिंग्जमुळे बनलेल्या धूळचे स्रोत म्हणून काम करतात. ज्युपिटरचे चंद्रमार्ग उर्वरित अनियमित उपग्रह आहेत ज्याचा प्रोजेक्ट आणि प्रतिगामी कक्षिका बृहस्पतिपासून फार दूर आहेत आणि उच्च प्रलोभन व विलक्षणता आहेत. कदाचित या चंद्रमार्ग कदाचित सौरभांगातून गुरू ग्रहाने पकडले असतील. अठराव्या अनियमित उपग्रहांची नावे अद्याप देण्यात आलेली नाहीत.

🙏🌞🙏शुभ प्रभात🙏🌞🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 


उमरखेड जिल्हा - यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

पौष मास,शुक्ल पक्ष,*पँचमी*,पू.भा.नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,शिशिर ऋतु,युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

शुक्रवार, ०७ जानेवारी २०२२.

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                        *प्रभात दर्शन*

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        *इस चराचर जगत में लक्ष्मी चंचला है अर्थात लक्ष्मी कहीं भी स्थिर नही रहती है, नष्ट हो जाती है अथवा हस्तांतरित हो जाती है। प्राण भी नाशवान है, जीवन और यौवन भी नष्ट होने वाले हैं। इस चराचर संसार में एकमात्र धर्म, राष्ट्र और संस्कृति ही है जो स्थिर है। अतः जो जीवन धर्म, राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा के लिए अपना योगदान नही देता, ऐसा जीवन व्यर्थ हैं एवं पशु तुल्य है।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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