गुरुवार, ७ एप्रिल, २०२२

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

चैत्र मास,शुक्ल पक्ष,*षष्ठी*,मृगशिरा नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,बसन्त ऋतु,युगाब्द ५१२४,विक्रम संवत-२०७९, 

गुरुवार, ०७ एप्रिल २०२२.

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                        *प्रभात दर्शन*

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नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य 

                 न चायुक्तस्य भावना,

न चाभावयत: शांतिर

                शांतस्य कुत: सुखम्।


*भावार्थ -  जिस मनुष्य का मन इंद्रियों अर्थात् धन, लोभ, आलस्य आदि में लिप्त है, उसके मन में भावना (आत्मज्ञान) नहीं होती, और जिस मनुष्य के मन में भावना नहीं होती, उसे किसी भी प्रकार से शान्ति नहीं मिलती और जिसके मन में शान्ति न हो, उसे सुख कहां से प्राप्त होगा, अत: सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियन्त्रण होना बहुत आवश्यक है।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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सोमवार, ४ एप्रिल, २०२२

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

चैत्र मास,शुक्ल पक्ष,*चतुर्थी*,कृतिका नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,बसन्त ऋतु,युगाब्द ५१२४,विक्रम संवत-२०७९, 

मंगलवार, ०५ एप्रिल २०२२.

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                         *प्रभात दर्शन*

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मुक्ताभिमानी मुक्तो हि 

               बद्धो बद्धाभिमान्यपि।

किवदन्तीह सत्येयं 

               या मतिः सा गतिर्भवेत्॥


*भावार्थ:- स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है, और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है। यह कथन सत्य ही है, कि जैसी बुद्धि होती है, वैसी ही गति होती है।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳 ➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿ *बाबू जगजीवन राम* (स्वतंत्रता सेनानी एवं राजनेता)

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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                                                                   *बाबू जगजीवन राम*

   (स्वतंत्रता सेनानी एवं राजनेता)

                                                                             *जन्म : ५ एप्रिल १९०८*

(भोजपुर का 'चंदवा गाँव', बिहार)

*मृत्यु : ६ जुलाई १९८६*

                                                                      अन्य :  नाम बाबूजी                                          पिता : शोभा राम 

संतान : पुत्री- मीरा कुमार

नागरिकता : भारतीय

प्रसिद्धि : दलित वर्ग के मसीहा के रूप में याद किया जाता है।

पार्टी : कांग्रेस और जनता दल

पद : श्रम मंत्री, रेल मंत्री, कृषि मंत्री, रक्षा मंत्री और उप-प्रधानमंत्री आदि पदों पर रहे।

शिक्षा : स्नातक

विद्यालय : कलकत्ता विश्वविद्यालय

भाषा : हिन्दी,अंग्रेज़ी

जेल यात्रा : भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल यात्रा की।

अन्य जानकारी : बाबूजी सासाराम क्षेत्र से आठ बार चुनकर संसद में गए और भिन्न-भिन्न मंत्रालय के मंत्री के रूप में कार्य किया। वे १९५२ से १९८४ ई. तक लगातार सांसद चुने गए।

                                                                                                                        जगजीवन राम  आधुनिक भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष जिन्हें आदर से 'बाबूजी' के नाम से संबोधित किया जाता था। लगभग ५० वर्षो के संसदीय जीवन में राष्ट्र के प्रति उनका समर्पण और निष्ठा बेमिसाल है। उनका संपूर्ण जीवन राजनीतिक, सामाजिक सक्रियता और विशिष्ट उपलब्धियों से भरा हुआ है। सदियों से शोषण और उत्पीड़ित दलितों, मज़दूरों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए जगजीवन राम द्वारा किए गए क़ानूनी प्रावधान ऐतिहासिक हैं। जगजीवन राम का ऐसा व्यक्तित्व था जिसने कभी भी अन्याय से समझौता नहीं किया और दलितों के सम्मान के लिए हमेशा संघर्षरत रहे। विद्यार्थी जीवन से ही उन्होंने अन्याय के प्रति आवाज़ उठायी। बाबू जगजीवन राम का भारत में संसदीय लोकतंत्र के विकास में महती योगदान है।


🙍🏻‍♂️ *जन्म*

एक दलित के घर में जन्म लेकर राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर छा जाने वाले बाबू जगजीवन राम का जन्म बिहार की उस धरती पर हुआ था जिसकी भारतीय इतिहास और राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। बाबू जगजीवन राम का जन्म ५ अप्रैल १९०८ को बिहार में भोजपुर के चंदवा गांव में हुआ था। उनका नाम जगजीवन राम रखे जाने के पीछे प्रख्यात संत रविदास के एक दोहे - प्रभु जी संगति शरण तिहारी, जगजीवन राम मुरारी, की प्रेरणा थी। इसी दोहे से प्रेरणा लेकर उनके माता-पिता ने अपने पुत्र का नाम जगजीवन राम रखा था। उनके पिता शोभा राम एक किसान थे, जिन्होंने ब्रिटिश सेना में नौकरी भी की थी।


📖 *शिक्षा*

इन्होंने स्नातक की डिग्री कलकत्ता विश्वविद्यालय से १९३१ में ली।


🇮🇳 *स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग*

जगजीवन राम उस समय महात्मा गाँधी के नेतृत्व में आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाले दल में शामिल हुए, जब अंग्रेज़ अपनी पूरी ताक़त के साथ आज़ादी के सपने को हमेशा के लिए कुचल देना चाहते थे। पृथक् निर्वाचन क्षेत्रों के लिए अंग्रेजों ने अपनी सारी ताक़त झोंक दी थी। मुस्लिम लीग की कमान जिन्ना के हाथ में थी और वे अंग्रेजों के हाथ की कठपुतली बने थे।


गाँधी जी ने साम्राज्यवादी अंग्रेजों के इरादे को भांप लिया था कि स्वतंत्रता आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए अंग्रेज़ों की फूट डालो, राज करो नीति को बाबूजी ने समझा। हिन्दू मुस्लिम विभाजन कर अंग्रेज़ों ने दलितों और सवर्णों के मध्य खाई बनाने प्रारम्भ की, जिसमें वह सफल भी हुए और दलितों के लिए 'निर्वाचन मंडल', 'मतांतरण' और 'अछूतिस्तान' की बातें होने लगीं। महात्मा गांधी ने इसके दूरगामी परिणामों को समझा और आमरण अनशन पर बैठ गए। यह राष्ट्रीय संकट का समय था। इस समय राष्ट्रवादी बाबूजी ज्योति स्तंभ बनकर उभरे। उन्होंने दलितों के सामूहिक धर्म-परिवर्तन को रोका और उन्हें स्वतंत्रता की मुख्यधारा से जोड़ने में राजनीतिक कौशल और दूरदर्शिता का परिचय दिया। इस घटना के बाद बाबूजी दलितों के सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। वह बापू के विश्वसनीय और प्रिय पात्र बने और राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गए।


💂‍♂️ *अंग्रेज़ों का विरोध*

१९३६ में २८ साल की उम्र में ही उन्हें बिहार विधान परिषद का सदस्य चुना गया था। 'गवर्मेंट ऑफ इंडिया एक्ट' १९३५ के अंतर्गत १९३७ में अंग्रेज़ों ने बिहार में कांग्रेस को हराने के लिए यूनुस के नेतृत्व में कठपुतली सरकार बनवाने का निष्फल प्रयत्न किया। इस चुनाव में बाबूजी निर्विरोध निर्वाचित हुए और उनके 'भारतीय दलित वर्ग संघ' के १४ सदस्य भी जीते। उनके समर्थन के बिना वहां कोई सरकार नहीं बन सकती थी। यूनुस ने बाबूजी को मनचाहा मंत्री पद और अन्य प्रलोभन दिये, किंतु बाबूजी ने उस प्रस्ताव को तुरंत ठुकरा दिया। यह देखकर गांधी जी ने 'पत्रिका हरिजन' में इस पर टिप्पणी करते हुए इसे देशवासियों के लिए आदर्श और अनुकरणीय बताया। उसके बाद बिहार में कांग्रेस की सरकार में वह मंत्री बनें किन्तु कुछ समय में ही अंग्रेज़ सरकार की लापरवाही के कारण महात्मा जी के कहने पर कांग्रेस सरकारों ने इस्तीफा दे दिया। बाबूजी इस काम में सबसे आगे रहे। मुंबई में ९ अगस्त १९४२ को महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ किया तो जगजीवन राम सबसे आगे थे। योजना के अनुसार उन्हें बिहार में आन्दोलन तेज करना था लेकिन दस दिन बाद ही गिरफ्तार कर लिए गये।                                           💠 *राजनीति में सफलता*

बाबूजी के प्रयत्नों से गांव - गांव तक डाक और तारघरों की व्यवस्था का भी विस्तार हुआ। रेलमंत्री के रूप में बाबूजी ने देश को आत्म-निर्भर बनाने के लिए वाराणसी में डीजल इंजन कारख़ाना, पैरम्बूर में 'सवारी डिब्बा कारख़ाना' और बिहार के जमालपुर में 'माल डिब्बा कारख़ाना' की स्थापना की।

सन १९४६ में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार में शामिल होने के बाद वह सत्ता की उच्च सीढ़ियों पर चढ़ते चले गए और तीस साल तक कांग्रेस मंत्रिमंडल में रहे। पांच दशक से अधिक समय तक सक्रिय राजनीति में रहे बाबू जगजीवन राम ने सामाजिक कार्यकर्ता, सांसद और कैबिनेट मंत्री के रूप में देश की सेवा की। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि श्रम, कृषि, संचार, रेलवे या रक्षा, जो भी मंत्रालय उन्हें दिया गया उन्होंने उसका प्रशासनिक दक्षता से संचालन किया और उसमें सदैव सफ़ल रहे। किसी भी मंत्रालय में समस्या का समाधान बड़ी कुशलता से किया करते थे। उन्होंने किसी भी मंत्रालय से कभी इस्तीफ़ा नहीं दिया और सभी मंत्रालयों का कार्यकाल पूरा किया।

 

♨️ *श्रम मंत्री*

१९४६ तक वह गांधी जी के हृदय में उतर गए थे। अब तक अंग्रेज़ों ने भी बाबूजी को भारतीय दलित समाज के सर्वमान्य नेता के रूप में स्वीकार कर लिया। आज़ादी के बाद जो पहली सरकार बनी उसमें उन्हें श्रम मंत्री बनाया गया। यह उनका प्रिय विषय था। वह बिहार के एक छोटे से गांव की माटी की उपज थे, जहां उन्होंने खेतिहर मज़दूरों का त्रासदी से भरा जीवन देखा था। विद्यार्थी के रूप में कोलकाता में मिल - मज़दूरों की दारुण स्थिति से भी उनका साक्षात्कार हुआ था। बाजूजी ने श्रम मंत्री के रूप में मज़दूरों की जीवन स्थितियों में आवश्यक सुधार लाने और उनकी सामाजिक, आर्थिक सुरक्षा के लिए विशिष्ट क़ानूनी प्रावधान किए, जो आज भी हमारे देश की श्रम - नीति का मूलाधार हैं।                              🔹 *मज़दूरों के हितैषी*

बाबूजी सासाराम क्षेत्र से आठ बार चुनकर संसद में गए और भिन्न-भिन्न मंत्रालय के मंत्री के रूप में कार्य किया। वे १९५२ से १९८४ तक लगातार सांसद चुने गए।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने भारत छोड़ा तो उनका प्रयास था कि पाकिस्तान की भांति भारत के कई टुकड़े कर दिए जाएं। शिमला में कैबिनेट मिशन के सामने बाबूजी ने दलितों और अन्य भारतीयों के मध्य फूट डालने की अंग्रेज़ों की कोशिश को नाकाम कर दिया। अंतरिम सरकार में जब बारह लोगों को लार्ड वावेल की कैबिनेट में शामिल होने के लिए बुलाया गया तो उसमें बाबू जगजीवन राम भी थे। उन्हें श्रम विभाग दिया गया। इस समय उन्होंने ऐसे क़ानून बनाए जो भारत के इतिहास में आम आदमी, मज़दूरों और दबे कुचले वर्गों के हित की दिशा में मील के पत्थर माने जाते हैं। उन्होंने 'मिनिमम वेजेज एक्ट', 'इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट' और 'ट्रेड यूनियन एक्ट' बनाया जिसे आज भी मज़दूरों के हित में सबसे बड़े हथियार के रूप में जाना जाता है। उन्होंने 'एम्प्लाइज स्टेट इंश्योरेंस एक्ट' और 'प्रोवीडेंट फंड एक्ट' भी बनवाया।


🏛️ *संसद में*

भारत की संसद को बाबू जगजीवन राम अपना दूसरा घर मानते थे। १९५२ में उन्हें नेहरू जी ने 'संचार मंत्री' बनाया। उस समय संचार मंत्रालय में ही विमानन विभाग भी था। उन्होंने निजी विमानन कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया और गांवों में डाकखानों का नेटवर्क विकसित किया। बाद में नेहरू जी ने उन्हें रेल मंत्री बनाया। उस समय उन्होंने रेलवे के आधुनिकीकरण की बुनियाद डाली और रेलवे कर्मचारियों के लिए कल्याणकारी योजनाएं प्रारम्भ की। उन्हीं के प्रयास से आज रेलवे देश का सबसे बड़ा विभाग है। वे सासाराम क्षेत्र से आठ बार चुनकर संसद में गए और भिन्न-भिन्न मंत्रालय के मंत्री के रूप में कार्य किया। वे १९५२ से १९८४ तक लगातार सांसद चुने गए।                 

🌀 *संगठन*

उन्हें पद की लालसा बिल्कुल न थी। जब कामराज योजना आई तो उन्होंने संगठन का काम प्रारम्भ किया। शास्त्री जी की मृत्यु के बाद जब इंदिरा जी ने प्रधानमंत्री पद संभाला तो इंदिरा जी ने बाबू जी को अति कुशल प्रशासक के रूप में अपने साथ लिया। वह भारत के लिए बहुत कठिन दिन थे।


🌴 *हरित क्रांति*

१९६२ में चीन और १९६५ में पाकिस्तान से लड़ाई के कारण ग़रीब और किसान भुखमरी से लड़ रहे थे। अमेरिका से पी.एल- ४८० के अंतर्गत सहायता में मिलने वाला गेहूं और ज्वार मुख्य साधन था। ऐसी विषम परिस्थिति में डॉ नॉरमन बोरलाग ने भारत आकर 'हरित क्रांति' का सूत्रपात किया। हरित क्रांति के अंतर्गत किसानों को अच्छे औजार, सिंचाई के लिए पानी और उन्नत बीज की व्यवस्था करनी थी। आधुनिक तकनीकी के पक्षधर बाबू जगजीवन राम कृषि मंत्री थे और उन्होंने डॉ नॉरमन बोरलाग की योजना को देश में लागू करने में पूरा राजनीतिक समर्थन दिया। दो ढाई साल में ही हालात बदल गये और अमेरिका से अनाज का आयात रोक दिया गया। भारत 'फूड सरप्लस' देश बन गया था।                                     👮‍♂️ *रक्षा मंत्री के रूप में*

छुआछूत विरोधी एक सम्मेलन में जगजीवन राम ने कहा- सवर्ण हिन्दुओं की इन नसीहतों से कि मांस भक्षण छोड़ दो, मदिरा मत पियो, सफाई के साथ रहो, अब काम नहीं चलेगा। अब दलित उपदेश नहीं, अच्छे व्यवहार की मांग करते हैं और उनकी मांग स्वीकार करनी होगी। शब्दों की नहीं ठोस काम की आवश्यकता है। मुहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों को अपना अलग देश बनाने के लिए उकसा दिया है। डॉ आम्बेडकर ने अछूतों के लिए पृथक् निर्वाचन मंडल की माग की है। राष्ट्र की रचना हमसे हुई है, राष्ट्र से हमारी नही। राष्ट्र हमारा है। इसे एकताबद्ध करने का प्रयास भारत के लोगों को ही करना है। महात्मा गाँधी ने निर्णय लिया है कि छुआछूत को समाप्त करना होगा। इसके लिए मुझे अपनी कुर्बानी भी देनी पड़े तो मैं पीछे नहीं हटूंगा। देश की आज़ादी की लड़ाई में सभी धर्म और जाति के लोगों को बड़ी संख्या में जोड़ना होगा।

१९६२ और १९६५ की लड़ाई के बाद भूख की समस्या को उन्होंने बहुत बहादुरी और सूझबूझ से परास्त किया। १९७१ में बांग्लादेश की स्थापना के पहले भारत और पाकिस्तान की लड़ाई में बाबू जी ने जिस तरह अपनी सेनाओं को राजनीतिक सहयोग दिया वह सैन्य इतिहास में एक उदाहरण है। जब कांग्रेस के तमाम पुराने नेताओं ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ दिया था, बाबू जगजीवन राम हमेशा उनके साथ रहे, किंतु उन्होंने कभी भी मूल्यों से समझौता नहीं किया।


✈️ *संचार और परिवहन मंत्री के रूप में*

इसी प्रकार संचार और परिवहन मंत्री के रूप में उन्होंने विरोध के बाद भी निजी हवाई सेवाओं के राष्ट्रीयकरण की दिशा में सफल प्रयोग किया। फलस्वरूप 'वायु सेवा निगम' बना और 'इंडियन एयर लाइंस' व 'एयर इंडिया' की स्थापना हुई। इस राष्ट्रीयकरण का प्रबल विरोध हुआ, जिसे देखते हुए सरदार पटेल भी इसे कुछ समय के लिए स्थगित करने के पक्ष में थे। बाबूजी ने उनसे कहा था - 'आज़ादी के बाद देश के पुनर्निर्माण के सिवा और काम ही क्या बचा है?' इसी समय बाबूजी के प्रयत्नों से गांव - गांव तक डाक और तारघरों की व्यवस्था का भी विस्तार हुआ। रेलमंत्री के रूप में बाबूजी ने देश को आत्म-निर्भर बनाने के लिए वाराणसी में डीजल इंजन कारख़ाना, पैरम्बूर में 'सवारी डिब्बा कारख़ाना' और बिहार के जमालपुर में 'माल डिब्बा कारख़ाना' की स्थापना की।


बाबूजी ने सरदार पटेल से कहा था - 'आज़ादी के बाद देश के पुनर्निर्माण के सिवा और काम ही क्या बचा है?'

पटना में आयोजित छुआछूत विरोधी सम्मेलन में उन्होंने कहा - सवर्ण हिन्दुओं की इन नसीहतों से कि मांस भक्षण छोड़ दो, मदिरा मत पियो, सफाई के साथ रहो, अब काम नहीं चलेगा। अब दलित उपदेश नहीं, अच्छे व्यवहार की मांग करते हैं और उनकी मांग स्वीकार करनी होगी। शब्दों की नहीं ठोस काम की आवश्यकता है। मुहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों को अपना अलग देश बनाने के लिए उकसा दिया है। डॉ आम्बेडकर ने अछूतों के लिए पृथक् निर्वाचन मंडल की माग की है। राष्ट्र की रचना हमसे हुई है, राष्ट्र से हमारी नही। राष्ट्र हमारा है। इसे एकताबद्ध करने का प्रयास भारत के लोगों को ही करना है। महात्मा गाँधी ने निर्णय लिया है कि छुआछूत को समाप्त करना होगा। इसके लिए मुझे अपनी कुर्बानी भी देनी पड़े तो मैं पीछे नहीं हटूंगा। देश की आज़ादी की लड़ाई में सभी धर्म और जाति के लोगों को बड़ी संख्या में जोड़ना होगा।                       🔸 *जनता दल में*

आज़ादी के बाद जब पहली सरकार बनी तो वे उसमें कैबिनेट मंत्री के रूप में शामिल हुए और जब तानाशाही का विरोध करने का अवसर आया तो लोकशाही की स्थापना की लड़ाई में शामिल हो गए। १९६९ में कांग्रेस के विभाजन के समय इन्होंने श्रीमती इन्दिरा गांधी का साथ दिया तथा कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए । १९७० में इन्होनें कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और जनता दल में शामिल हो गये थे। सब जानते हैं कि ६ फरवरी १९७७ के दिन केंद्रीय मंत्रिमंडल से दिया गया उनका इस्तीफ़ा ही वह ताक़त थी जिसने इमरजेंसी को ख़त्म किया।


🔮 *जीवनी के मुख्य बिन्दु*

जगजीवन राम ने १९२८ में कोलकाता के वेलिंगटन स्क्वेयर में एक विशाल मज़दूर रैली का आयोजन किया था जिसमें लगभग ५० हज़ार लोग शामिल हुए।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस तभी भांप गए थे कि जगजीवन राम में एक बड़ा नेता बनने के तमाम गुण मौजूद हैं।

महात्मा गांधी के आह्वान पर भारत छोड़ो आंदोलन में भी जगजीवन राम ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह उन बड़े नेताओं में शामिल थे जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत को झोंकने के अंग्रेज़ों के फैसले की निन्दा की थी। इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

वर्ष १९४६ में वह जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री बने। भारत के पहले मंत्रिमंडल में उन्हें श्रम मंत्री का दर्जा मिला और १९४६ से १९५२ तक इस पद पर रहे।

जगजीवन राम १९५२ से १९८६ तक संसद सदस्य रहे। १९५६ से १९६२ तक उन्होंने रेल मंत्री का पद संभाला। १९६७ से १९७० और फिर १९७४ से १९७७ तक वह कृषि मंत्री रहे।

इतना ही नहीं १९७० से १९७१ तक जगजीवन राम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। १९७० से १९७४ तक उन्होंने देश के रक्षामंत्री के रूप में काम किया।

२३ मार्च,१९७७ से २२ अगस्त, १९७९ तक वह भारत के उप प्रधानमंत्री भी रहे।

आपातकाल के दौरान वर्ष १९७७ में वह कांग्रेस से अलग हो गए और 'कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी' नाम की पार्टी का गठन किया और जनता गठबंधन में शामिल हो गए। इसके बाद १९८० में उन्होंने कांग्रेस (जे) का गठन किया।                                 🪔 *निधन*

६ जुलाई, १९८६ को ७८ साल की उम्र में इस महान् राजनीतिज्ञ का निधन हो गया। बाबू जगजीवन राम को भारतीय समाज और राजनीति में दलित वर्ग के मसीहा के रूप में याद किया जाता है। वह स्वतंत्र भारत के उन गिने चुने नेताओं में थे जिन्होंने देश की राजनीति के साथ ही दलित समाज को भी नयी दिशा प्रदान की।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳   

🙏🙏🙏 *शुभ प्रभात*🙏🙏🙏

संकलन -) 

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा - यवतमाळ ४४५२०६

शनिवार, २ एप्रिल, २०२२

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

चैत्र मास,शुक्ल पक्ष,*प्रतिप्रदा*,रेवती नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,बसन्त ऋतु,युगाब्द ५१२४,विक्रम संवत-२०७९, 

शनिवार, ०२ एप्रिल २०२२.

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                        *प्रभात दर्शन*

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      *🚩हिंदू  नूतन वर्षाभिनंदन*

               *चैत्र शुध्द प्रतिपदा* 

               *🚩गुढीपाडवा🚩*



*नववर्ष विक्रम सम्वत २०७९ आपके एवं आपके परिवार के लिये मंगलमय हो। माँ दुर्गा आपको एवं आपके परिवार को समस्त दैहिक, दैविक, भौतिक सुख एवं आरोग्य प्रदान करे। ॐ*


      *अपने दैनिक जीवन में अधिकाधिक सम्वत एवं तिथि का प्रयोग करें। क्योंकि हमारे सभी पर्व, व्रत, महापुरुषों के जन्मदिन एवं हमारे विवाह, जन्म एवं समस्त संस्कार इसी अनुसार मनाये जाते हैं।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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*हिन्दू नववर्ष आरंभ*



मंगळवार, २९ मार्च, २०२२

प्रभात दर्शन

  •  🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

फाल्गुन मास,कृष्ण पक्ष,*त्रियोदशी*,शतभिषा नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,बसन्त ऋतु, युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

बुधवार, ३० मार्च २०२२.

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                         *प्रभात दर्शन*

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अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च 

                   शास्त्रेभ्य: कुशलो नर:,

सर्वत: सारमादद्यात् 

                   पुष्पेभ्य इव षट्पद:।।


*भावार्थः- बुद्धिमान व्यक्ति को किसी भी व्यक्ति के केवल अच्छे गुणों का संग्रह करना चाहिए, उसकी कमियों अर्थात दुर्गुणों को अनदेखा करना चाहिए, जैसे साधु शास्त्रों में से उनका सार निकाल लेता है, जैसे भंवरा कांटे, पत्ते आदि छोड़कर फूलों मे से केवल मधु एकत्रित करता है।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

फाल्गुन मास,कृष्ण पक्ष,*द्वादशी*,घनिष्ठा नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,बसन्त ऋतु,युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

मंगलवार, २९ मार्च २०२२.

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                        *प्रभात दर्शन*

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एक एव सुहृद्धर्मो

                  निधनेऽप्यनुयाति यः,

शरीरेण समं नाशं

                  सर्वम् अन्यद्धि गच्छति।।


भावार्थः- *धर्म ही ऐसा मित्र है, जो मरणोत्तर भी साथ चलता है। अन्य सभी साधन, वस्तुएं, मित्रता व सम्बन्ध शरीर के साथ ही नष्ट अर्थात समाप्त हो जाती हैं।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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सोमवार, २८ मार्च, २०२२

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

फाल्गुन मास,कृष्ण पक्ष,*एकादशी*,श्रवण नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,बसन्त ऋतु, युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

सोमवार, २८ मार्च २०२२.

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                        *प्रभात दर्शन*

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जहाँ सूरज की किरणें हो,

वहीं उजियार होता है,


जहाँ पर हो प्रभु दर्शन,

वहीँ भव पार होता है,


जहाँ ऋषियों की वाणी हो,

वहीं उद्धार होता है,


जहाँ हो प्रेम की भाषा,

वहीं परिवार होता है..

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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रविवार, २७ मार्च, २०२२

बॅटरीसेल / घट


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   * @ संकलन @*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *बॅटरीसेल / घट* 📙 

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टॉर्च किंवा बॅटरीचे नावीन्य सध्यातरी कोणालाच वाटत नाही, किंबहुना प्रत्येक घरातून दिवे गेले, तर रात्रीच्या वेळी वापरासाठी एक बॅटरी हजर असतेच. याच कारणाने बॅटरी तयार करणारी मोठी कंपनी स्वतःला 'एव्हरेडी' म्हणवून घेते. पण याखेरीजही बॅटरीसेल्सचा किंवा ड्रायसेल्सचा उपयोग आपल्या जीवनात नेहमीच होत असतो. ट्रान्झिस्टर रेडिओ असो, टेपरेकॉर्डर असो वा कोणतेही पोर्टेबल म्हणजे इकडून तिकडे सहज नेता येण्यायोगे मशीन असो, ते सहसा या ड्रायसेल्सवरच चालते. एखादा छोटासा पेन सेल असेल वा चार ते सहा मोठे सेल्स असतील; पण आपल्या जीवनातील काही जरुरीच्या क्षणी तेच उपयोगी पडतात.


 विद्युतऊर्जा विविध प्रकारे तयार केली जाते व साठवली जाते. विद्युतघट हा प्रकार मुख्यत: रासायनिक ऊर्जेच्या निर्मितीतुन तयार केला गेला. व्होल्टानी तयार केलेला विद्युतघट हा अवजड, हलवण्यास कठीण होता. त्याच्याच पुढील आवृत्त्या डॅनियल, लेक्लांशे यांनी काढल्या. याचाच सुटसुटीत अवतार म्हणजे ड्राय बॅटरीसेल किंवा निर्द्रव विद्युतघट.


या घटात जस्ताचे बाह्यावरण ऋण ध्रुवाचे काम करते. यात मध्यभागी जस्ताशी संपर्क न येता कार्बनची कांडी ठेवलेली असते. ही घन ध्रुवाचे काम करते. सर्व घट अमोनियम व झिंक क्लोराइडच्या विशिष्ट मिश्रणाने भरला जातो. कार्बनकांडीच्या जवळचा भाग ग्राफाईट व मॅगनीज डायऑक्साइडच्या मिश्रणाने झाकला जातो. तोंड सील केल्यावर घटत्या तयार होतो. हे झाले प्राथमिक वर्णन. अलीकडच्या घटात यापेक्षा अधिक विविध परिणामकारी संयुगेही वापरली जातात. पण त्याबद्दल प्रत्येक कंपनी गुप्तता पाळते. या प्रकारचे घट वापरायला सुरुवात झाली, तेव्हा ते पावसाळ्यात चिघळत असत. हल्लीचे घट संपूर्णपणे पॉलिमर कोटेड असतात. फक्त ऋण व घन भाराच्या जागा मोकळ्या सोडलेल्या असतात. बॅटरीच्या वापरासाठी, ट्रान्झिस्टरसाठी, एखाद्या यांत्रिक मोटारच्या वापरासाठी विविध प्रकारचे ड्रायसेल्स तयार करण्यातही काही कंपन्यांनी आघाडी मिळविली आहे. काही कंपन्यांनी तर काही फेरबदल सेलमध्ये करून हेच ड्रायसेल्स पुन्हा सक्षम करण्याची (Recharge) यंत्रणाही सज्ज केली आहे. सध्या विजेवर वापरल्या जाणाऱ्या अनेक छोट्या गोष्टींचा वापर आपण करतो. लॅपटॉप, आयपॅड, मोबाइल, डिजिटल कॅमेरा, कॅल्क्युलेटर यांसाठी पुन्हा पुन्हा चार्ज करता येणारे विविध आकारांचे, प्रकारांचे व क्षमतांचे सेल वापरात आले आहेत.


 आपल्या देशात सध्या उत्तम प्रकारचे बॅटरीसेल्स सहज उपलब्ध आहेत. वापरून झाल्यावर ड्रायबॅटरीसेल निरुपयोगी होतो.


*'सृष्टी विज्ञानगाथा' 

गुरुवार, २४ मार्च, २०२२

ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ═════════════ 📙 *बाळाची गर्भावस्था व पोषण* 📙


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📙 *बाळाची गर्भावस्था व पोषण* 📙 

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मानव 'मॅमल' या गटात मोडतात. म्हणजेच सस्तन प्राणिमात्र असल्याने एकपेशीय सुरुवातीपासून जन्म होईपर्यंत आईच्या पोटात त्यांची पूर्ण वाढ होते जाते. माणसाची गर्भावस्था ही अडतीस आठवड्यांची असते. हाच काळ छत्तीस ते चाळीस आठवडे येथपर्यंत मागे पुढे होऊ शकतो. या काळातील अवस्थेलाच 'गर्भावस्था' म्हणतात व आईच्या गर्भाशयात ही सर्व वाढ होते.


गर्भाशयाला आतील बाजूने तळहाताएवढय़ा पसरट भागात जोडलेल्या अस्तराला 'प्लासेंटा' असे म्हणतात. याचे दुसरे टोक गर्भाच्या नाभीतून गर्भाला पोषणद्रव्ये रक्ताद्वारे पूरवत असते. पुरवठा करणाऱ्या रक्तनलिकांच्या या समुच्चयास 'नाळ' असे म्हणतात. बाळाची नाळ आईच्या गर्भाशयाशी आतील बाजूस जोडलेली असल्याने आईच्या रक्तातील पोषणद्रव्ये जशीच्या तशी बाळाला मिळत राहतात.


 दहाव्या आठवडय़ाच्या सुमारास बाळाचे अवयव स्पष्ट होऊ लागतात, बाविसाव्या आठवड्यात त्याच्या हृदयाच्या स्पंदनांचे ठोकेही ऐकू येऊ शकतात, तर बत्तीसाव्या आठवड्यात बाळ गर्भाशयात पूर्णपणे स्थिर स्थिती घेऊ शकते व या सर्व गोष्टी हल्ली अल्ट्रासाऊंड तपासणीद्वारे नीट दिसूही शकतात.


 गर्भावस्थेतील काही दोष असल्यास वरील तपासण्यांचा हल्ली उपयोग केला जातो. त्यावरून बाळाची वाढ, आकारमान यांचा नक्की पत्ता लागू शकतो. पूर्ण वाढ झाल्यावर अडतिसाव्या आठवड्यात एके दिवशी गर्भाशयाचे आकुंचन सुरू होते व गर्भावस्थेतील बाळ योनीमार्गे आईच्या पोटातून जगात जन्म घेते. बाळाचा जन्म झाल्यावर लगेच त्याची नाळ बांधून कापून टाकतात. याच जागी बाळाची बेंबी व नाभी काही दिवसांनी तयार होते.


*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*

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*ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ═════════════ 📙 *बायोगॅस*


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   *@ संकलन @*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *बायोगॅस*  

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अनेक प्रकारचे सेंद्रिय पदार्थ टाकाऊ म्हणून आपण फेकून देत असतो. गायीगुरांचे शेण कंपोस्ट खतासाठी अनेक वर्षे वापरले जात होते. पण त्या व्यतिरिक्त त्याचा उपयोग शक्य आहे, याचा विचार मात्र गेली ४० वर्षेच केला गेला. झाडांचा पालापाचोळा, वाया जाणारे अन्नपदार्थ, खरकटे, भाजीची देठे व टरफले या साऱ्यांचा उपयुक्त वापर करण्याची कल्पना सतत मांडली जात आहे. मात्र त्याचा पाठपुरावा करून संपूर्ण वापर केले जाणे मात्र आजही घडत नाही. या साऱ्यापासून बायोगॅसची निर्मिती सहज शक्य असते. हा गॅस घरातील गॅस शेगडीसाठी जसा वापरता येतो, तसाच मोठ्या प्रमाणावर तयार केल्यास छोट्या हॉटेलला पण पूरक म्हणून उपयोगी पडू शकतो. 


१९७० च्या दशकात गोबरगॅस या नावाने ओळखला जाणारा हा गॅस मुख्यत: गायीगुरांचे शेण व पालापाचोळा यातून निर्माण केला जात असे. घराजवळच गोठ्यालगत विटांच्या बांधकामातून गोल हौदवजा टाकी बांधून त्यात हा कच्चा माल घातला जाई. त्यावर टोपीप्रमाणे बसणारी पण दट्ट्याप्रमाणे खालीवर होऊ शकणारी यंत्रणा बसवून आतील कच्चा माल कुजून दिला जाई. या कुजण्याला मदत म्हणून स्लरी - विशिष्ट प्रकारचे जंतू असलेले पाणी - त्यात सोडल्यावर सुमारे चाळीस दिवसांनी रोजच्या गॅसचा पुरवठा सुरू होत असे. या कुजण्यातून निर्माण झालेला गाळ व पाणी हे खत म्हणून वापरता येई.


या प्रकारची गोबरगॅस संयंत्र संपूर्ण भारतात अनेकांनी बसवली. त्यासाठी ग्रामोद्योग मंडळाने प्रशिक्षण व सहाय्यसुद्धा दिले. काही वर्षांनी त्यांच्या डागडुजीची वेळ आली, तेव्हा कुचराई केल्याने अनेक ठिकाणी ही संयंत्रे बंद पडत गेली. हौदाचा गिलावा उडून होणारी गळती व लोखंडी भाग गंजणे हे त्याचे महत्त्वाचे कारण होते. या गॅसमध्ये मुख्यत: मिथेन वायू असतो. ज्वलनासाठी उपयुक्त व प्रदूषणविरहित असे त्याचे स्वरूप आहे. छोट्या गावात, दूरवरच्या वस्तीमध्ये लिक्विड पेट्रोलियम गॅसचा पुरवठा सिलिंडरद्वारे करणे कठीण असल्यास या पद्धतीचा वापर अत्यंत उपयुक्त होता. चीनमध्ये या स्वरूपाची स्थानिक संयंत्रे बसवून वापरली जात आहेत, पण आपल्याकडे मात्र हा प्रयोग मागे पडला आहे.


या गोबरगॅसच्या अवाढव्य जागा व्यापणाऱ्या व शेणाची गरज असलेल्या संयंत्रात बरेच सुटसुटीत बदल करून पुणे येथील 'आरती' (अॅप्रोप्रिएट रुरल टेक्नॉलॉजी इन्स्टिट्यूट) या संस्थेचे वैज्ञानिक डॉक्टर आनंद कर्वे यांनी बायोगॅस निर्मितीचे संयंत्र बनवले आहे. प्लास्टिकच्या एकात एक बसणाऱ्या मोठ्या पंपाचा वापर करून हे बनले आहे. गच्चीत, अंगणात कुठेही ठेवून त्याचा वापर शक्य होतो. महत्त्वाची गोष्ट यासाठी खरकटे अन्न व आसपासच्या झाडांचा, बागेचा पालापाचोळा पुरतो. शेणाची गरज लागत नसल्याने हाताळताना नकोसे वाटत नाही. याचा कसलाही वास आसपास पसरत नाही. महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे स्लरी घातल्यापासून जेमतेम तीन ते चार दिवसांत गॅसनिर्मिती सुरू होते. याचा खर्चही सहज परवडण्याजोगा आहे. कारण स्वस्त प्लॅस्टिकचा वापर त्यात केला आहे. या संयंत्राला 'अॅश्डेन' हे संशोधनाबद्दलचे मानाचे पारितोषिक दिले गेले आहे.


 उसाची चिपाडे, उसापासून साखर तयार करताना निर्माण होणारी मळी यांचा वापर करून मोठय़ा प्रमाणावर बायोगॅस तयार करावा व त्यापासून वीजनिर्मिती करावी, अशा स्वरूपाचा विचार सध्या मांडला जात आहे. अर्थातच हे प्रकल्प व्यावसायिक तत्वावरचे व प्रचंड पैसा लागणारे आहेत.


स्वस्त, स्वच्छ इंधन व कचर्याचे प्रदूषण टाळणारे इंधन म्हणून बायोगॅसकडे आपण पाहिले तर त्याची उपयुक्तता मोलाची ठरते.


*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या 

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

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फाल्गून मास,कृष्ण पक्ष,*सप्तमी*,ज्येष्ठा नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,बसन्त ऋतु,युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

गुरुवार, २४ मार्च २०२२.

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                         *प्रभात दर्शन*

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अज्ञ: सुखमाराध्य:

           सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञ:

ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्माऽपि

          तं नरं न रञ्जयति।।

          

*भावार्थः- संसार में तीन तरह के प्राणी होते हैं अज्ञ, विशेषज्ञ और मूर्ख।  अज्ञ को आसानी से समझाया जा सकता है तथा विशेषज्ञ को सुखपूर्वक समझाया जा सकता है, किंतु मूर्ख मनुष्य को ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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बुधवार, २३ मार्च, २०२२

२३ मार्च🌏🌍🌎* ⛅⛅⛅⛅⛅⛅⛅⛅⛅⛅⛅ *जागतिक हवामान दिन*

 *🌎🌍🌏२३ मार्च🌏🌍🌎*

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*जागतिक हवामान दिन*

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आज जगभरात २३ मार्च हा दिवस जागतिक हवामान दिन म्हणून साजरा केला जातो.

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हवामानाबाबत संपूर्ण जगातील लोकांमध्ये जागृती निर्माण व्हावी, लहान मुलांपासून वयोवृद्धांपर्यंत सार्यांबनाच हवामानाचे महत्त्व समजावे, हवामान चांगले राहण्यासाठी कोणती दक्षता घेतली पाहिजे, कोणकोणत्या उपाययोजना केल्या गेल्या पाहिजेत, याविषयी जाणीव आणि जागरूकता निर्माण व्हावी, या उद्देशाने २३ मार्च हा दिवस जागतिक हवामानदिन म्हणून साजरा केला जातो. गेल्या चाळीस वर्षांच्या तुलनेत मागच्या दशकात हवामानात झालेले बदल सर्वांच्याच चिंतेचा विषय बनलेले आहेत. हवामान बदलाच्या परिणामांमुळे आज भारतातीलच नव्हे, तर जगभरातील शेतीक्षेत्र ग्रासले आहे. भविष्यातही हवामान बदलाचे परिणाम कमी-जास्त प्रमाणात प्रभाव दाखवतच राहतील. त्यामुळे आपण संभाव्य परिस्थितीचा वेध घेऊन आपत्कालीन उपाययोजनांसाठी तयार राहणे आवश्यक आहे. विसाव्या शतकात मानवाने विज्ञान आणि तंत्रज्ञानाच्या क्षेत्रात मोठी प्रगती केली. पण या प्रगतीसोबतच हवामानातील बदल आणि वातावरणातील कमी होणारा संरक्षक ओझोन थर यांचे भीषण संकटही त्यातूनच उभे राहिले. जीवसृष्टीवरील दुष्परिणामाच्या रूपाने आपण ते अनुभवतो आहोत. हवामानातील बदल हा जागतिक तापमानवाढीमुळे होणारा सर्वाधिक चिंताजनक परिणाम आहे. अनेक देशांमध्ये, विशेषत: युरोप आणि अमेरिकेसारख्या देशात हवामानातील बदल स्पष्टपणे जाणवत आहेत.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड  

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

२३ मार्च शहीद दिन➖➖* 〰️〰️〰️〰️➰➰➰〰️〰️〰️〰️ भगतसिंग, राजगुरू, सुखदेव

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    *➖➖२३ मार्च शहीद दिन➖➖*

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भगतसिंग, राजगुरू, सुखदेव हे देशभक्त २३ मार्च १९३१ ला लाहोर तुरूंगात हसत हसत फाशीवर चढले.


आज शहीद स्मृती दिवस... ! 


शहिद भगतसिंग, सुखदेव नि राजगुरू यांचा स्मृतिदिन... ! 


शहिदांना त्रिवार वंदन...!


२३ मार्च १९३१ रोजी या तिघांना फाशी दिले गेले. इंग्रजांचा अधिकारी सँडर्स याच्या हत्येचा आरोप या तिघांवर होता. हे तिघे यांच्या जहाल (इंग्रजांच्या मते) देशभक्ती-देशप्रेम व निधड्या वृत्तीमुळे इंग्रजांना अतिशय डोईजड झालेच होते. संपूर्ण हिंदुस्तानात जहाल क्रांतीची धगधगती मशाल पेटली होती. कुठल्या न कुठल्या आरोपाखाली लवकरात लवकर यांचा बंदोबस्त इंग्रजांनी केलाच असता. हे तिघे व अनेक क्रांतिकारी स्वतंत्र भारताचे स्वप्न पाहत होते. इंग्रजांच्या गुलामीतून तर भारत मुक्त झाला. हजारो वीरांनी आपल्या प्राणांची-घरादाराची आहुती देऊन पारतंत्र्यातला भारत देश गुलामगिरीच्या जोखडातून सोडवून येणाऱ्या पिढीला एक खुशहाल आपला भारत देश, मोकळा श्वास घेण्यासाठी दिला. त्यावेळी इंग्रज हे एकमेव व संपूर्ण हिंदुस्तानाचे शत्रू होते. परंतु ज्या कारणांमुळे इंग्रजांनी आपली पावले इथे रोवली आणि राज्य केले तीच कारणे, अंतर्गत कलह-बंडाळ्य़ा-स्वार्थ मात्र आजही तशीच आहेत. शहीदांना सलाम ठोकले-उगाच दोनचार कार्यक्रम केले (तेही कोणाला आठवण राहिली तरच), यानिमित्ते मिडियासमोर मिरवले "अहो, म्हणून तर केला ना हा दिखावा.. नाहीतर आम्हाला काय घेणं देणं हो.. ते देशासाठी बलिदान वगैरे आम्हाला काही समजत नाही.. आणि गरजही नाही." खरेच आहे ना.


जी गोष्ट आयती ताटात फुकट वाढून मिळते त्याची किंमत नसतेच. इंग्रजांच्या तावडीतून देश स्वतंत्र झाला आणि भ्रष्टाचार- नेतेगिरी-गुंडगिरी यांच्या तावडीत अडकला, अडकतच गेला. भगतसिंग, सुखदेव, राजगुरू हे व तमाम क्रांतिकारी फक्त इतिहासाच्या पानातच राहिले. त्यातही काही ठिकाणी चक्क ते आतंकवादी होते असेही म्हटले आहे. इंग्रजांनी आतंकवादी म्हटले तर समजून घेता येईल पण चक्क आपल्यातील काही लोक त्यांना आतंकवादी म्हणतात म्हणजे.. तर कुठे गांधीजींनी या तिघांची फाशी थांबविण्यासाठी प्रयत्न का केले नाहीत हा वाद. परंतु भगतसिंग-राजगुरू-सुखदेव यांच्या विचारसरणीचा, देश स्वतंत्र का व कशातून झाला पाहिजे या दृष्टिकोनाचा कोणीही विचारच करत नाही. समोर दिसणाऱ्या शत्रूशी निदान निकराने व एकमुखाने लढता तरी येते. परंतु या न दिसणाऱ्या व तहहयात पोखरणाऱ्या आपल्यातील स्वार्थाशी-स्वार्थी प्रवृत्तींशी कसे लढायचे? 


आजकाल तर अनेक मुलांना हे क्रांतिकारी माहीत तरी असतील का, अशी शंका येते. पाठ्यपुस्तकातून धडेच्या धडे हा इतिहासच इतिहासजमा करून टाकला जात आहे. उरलासुरला एकमेव मार्गही उखडून टाकला जाताना दिसतो. निदान एखादी लाट यावी तसे ते चार-पाच सिनेमे आले म्हणून तरी बऱ्याच मुलांना यांनी केलेले महान कार्य-त्याग समजला. (दुर्दैव सिनेमे पाहून समजला पण समजला हे जास्त महत्त्वाचे).


फक्त स्वकेंद्रित होऊन जगण्याने आपण सारेच देशाला कुठे घेऊन गेलो आहोत आणि जात आहोत हे पाहिले की भीती वाटते. या सगळ्या वीरांचे बलिदान सार्थकी लागलेय का? याला आपणही जबाबदार आहोतच. मूठभर शोषण करणाऱ्यांना आपण आपले शोषण करू देतो म्हणजे आपणही तितकेच दोषी. भगतसिंग शेजाऱ्याच्या घरी जन्माला यावा आपण मात्र सुखनैव राहावे.. नाही. भगतसिंग आपल्या प्रत्येकाच्या घरी जन्माला यायला हवा.


भारताला स्वातंत्र्य मिळून देण्यासाठी हसत-हसत फासावर गेलेल्या शहीद भगतसिंग, सुखदेव व राजगुरू यांची आज पुण्यतिथी आहे. २३ मार्च १९३१ला शहीद भगतसिंग, सुखदेव व राजगुरू तिघांनाही लाहोर जेलमध्ये फाशी देण्यात आली होती. आजचा दिवस 'शहिद दिन' म्हणूनही ओळखला जातो.


*भगतसिंग*

भगतसिंग यांचा जन्म १९०७ च्या २८ सप्टेंबर रोजी बंगा येथे झाला. भगतसिंगांच्या जन्माच्या वेळी सरदार किशनसिंग आणि सरदार अजितसिंह यांची जेलमधून सुटका झाली, म्हणून हा मुलगा भाग्यवान आहे असे जाणून आजीने त्याचे नाव भगतसिंग ठेवले. जालियनवाला बागेचे हत्याकांड भगतसिंग यांच्या मनावर खोल परिणाम करून गेले होते. प्रसिद्ध क्रांतिकारक भगवतीचरण हे कॉलेजात भगतसिंगांच्या पुढे २ वर्षे होते तर सुखदेव हे त्यांचे वर्गमित्र होते. वीर सावरकरांचा प्रसिद्ध ग्रंथ 'दि इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेन्डेन्स - १८५७' भगतसिंगांना तोंडपाठ होता. घरच्या लोकांनी लग्न ठरवल्यावर त्यांनी घर सोडले. देशसेवेचे व्रत घेतल्यामुळे आपण लग्न करू शकत नाही असे वडिलांना कळवून त्यांनी त्यांची क्षमा मागितली. कानपूरला आल्यावर 'बलवंतसिंग' या नावाने त्यांनी अनेक लेख लिहिले. अनेक धाडसी सत्कार्यात ते सक्रिय होते. लाला लजपत राय यांचा पोलिसांच्या मारहाणीमुळे मृत्यू झाला. त्यांना मारणार्याि स्कॉटचा बदला घेत असताना साँडर्स तावडीत सापडल्याने साँडर्सला उडविण्यात आले. या प्रकरणात सर्वजण फरारी झाले. क्रांतिकारकांचे म्हणणे काय आहे हे जाहीररीत्या सर्वांना समजावे यासाठी त्यांनी एक योजना आखली. 'पब्लिक सेफ्टी' बिलाविरूद्ध देशभर संताप व्यक्त होत होता. या बिलावर सेंट्रल असेंबलीत चर्चा चालू असताना बटुकेश्वर दत्त आणि भगत सिंह यांनी असेंबलीत बाँब फेकून गोंधळ उडवून दिला. स्वतःहून अटक करून घेतली. कोर्टात आपली बाजू प्रभावीपणे मांडली. कोर्टाने भगतसिंग, सुखदेव आणि राजगुरू यांना फाशीची शिक्षा फर्मावली. २३ मार्च १९३१ ला 'इन्कलाब झिंदाबाद' च्या घोषणा देत ते तिघेही हसत हसत फासावर चढले.


*राजगुरु*

शिवराम हरि राजगुरू यांचा जन्म पुणे जिल्ह्यातील खेड (सध्या राजगुरूनगर) येथे १९०८ साली झाला. जालियनवाला बाग हत्याकांडाचे पडसाद त्यांच्या मनावर चांगलेच उमटले होते. अनेक पराक्रम करून त्यांनी क्रांतिकारकांच्या मनात मानाचे स्थान मिळवले होते. लाला लजपतरायांच्या हत्येचा सूड म्हणून त्यांनी साधलेल्या अचूक नेमबाजीमूळे साँडर्स वध घडवून आणलेला होता. पुढे फरारी असताना त्यांना फितुरीमुळे अटक झाली. लाहोर मध्ये झालेल्या खटल्यात त्यांना फाशीची शिक्षा ठोठावण्यात आली.


*सुखदेव*

सुखदेव थापर यांचा जन्म लायलपूर मध्ये १५ मार्च १९०७ रोजी झाला. भगतसिंग यांनी असेंम्बलीमध्ये बाँब टाकल्यानंतर सुरू झालेल्या छापेसत्रात लाहोरमध्ये छापे टाकण्यात आले. तेव्हा काश्मिर बिल्डींगमध्ये पडलेल्या छाप्यात काही बाँब जप्त करण्यात आले होते. ते बाँब सुखदेव यांनी तयार केले होते, म्हणून त्यांनाही अटक करण्यात आली. लाहोर कटाच्या पहिल्या खटल्यात १६ आरोपींचा नेता म्हणूनच सुखदेव यांची नोंद करण्यात आली. नवे सदस्य गोळा करून त्यांना क्रांतिदलात समाविष्ट करून त्यांच्या लायकीप्रमाणे काम देण्यात सुखदेव तरबेज होते. लाहोर केसमध्ये त्यांना फाशीची शिक्षा ठोठावण्यात आली. भगतसिंग, राजगुरू बरोबर सुखदेव देखील २३ मार्च १९३१ ला लाहोर तुरूंगात फाशी गेले.

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संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

शनिवार, १९ मार्च, २०२२

सर आयझॅक न्यूटन🧲*

 *🧲🧲सर आयझॅक न्यूटन🧲🧲*

*एक थोर भौतिकशास्त्रज्ञ,गणितज्ञ व तत्त्वज्ञ*


*स्मृतिदिन - २० मार्च  इ.स. १७२७*


सर आयझॅक न्यूटन (एफ.आर.एस्.) (४ जानेवारी १६४३ - २० मार्च १७२७) हे एक थोर इंग्रज भौतिकशास्त्रज्ञ, गणितज्ञ व तत्त्वज्ञ होते. त्यांनी वैश्विक गुरुत्वाकर्षणाचा सिद्धांत मांडून केप्लर चे नियम सिद्ध केले.

गतिकीमध्ये त्यांनी न्यूटनचे तीन गतीचे नियम मांडले. त्यांनी परावर्ती दुर्बीण बनवली, व प्रकाशाचे मूलभूत रंगात विघटन करून दाखविले.

गणितामध्ये त्यांनी ग्यॉटफ्रीड लिब्नित्झ याच्याबरोबर कलन ही गणितशाखा विकसीत केली.

बालपण

सर आयझॅक न्यूटन ४ जानेवारी इ.स. १६४३ रोजी इंग्लंडमधील लिंकनशायर काउंटीच्या वूलस्थॉर्प या गावात जन्मले. आयझॅक न्यूटनचे वडील वारल्यानंतर त्यांच्या आईने दुसरे लग्न केल्यामुळे आयझॅक त्याच्या आजीजवळ राहिले. वयाच्या १२ वर्षांपर्यंत आयझॅक जेमतेम दोन वर्षे शाळेत होते. त्यांना गणिताची आवड उत्पन्न होऊ लागली होती. तेवढ्यात त्यांचे सावत्र वडील स्मिथ वारले. आपल्या नूतन बाळाला घेऊन आयझॅकची आई हाना लिंकनशायरला परत आली. तिने आयझॅकला शाळेतून काढून शेताच्या कामाला लावले. एक दिवस दुपारी आयझॅक दमूनभागून झाडाच्या सावलीत बसले होते. मंद वारा वाहत होता. आयझॅकची तीक्ष्ण बुद्धी त्यांना स्वस्थ बसू देत नव्हती. आयझॅकना वाटले, आपण वार्‍याचा वेग मोजावा. त्यांच्याजवळ वेग मोजायला काही साधन नव्हते. आयझॅकने एकदा वार्‍याच्या दिशेने उडी मारली. जिथे उडी पडली तिथे एक दगड ठेवला. मग जरा वेळाने वार्‍याच्या उलट दिशेने उडी मारली व त्या उडीच्या जागी दगड ठेवला. या दोन दगडांतील अंतर एका दोरीच्या साह्याने आयझॅक मोजत असताना त्यांचे मामा, विल्यम आयस्कॉफ शेतावर आले. विल्यम आयस्कॉफ केंब्रीजमध्ये ट्रिनिटी कॉलेजमध्ये व्यवस्थापक होते. त्यांनी विचारले, "हे तू काय करतोस?"

आयझॅक म्हणाले, "मी वार्‍याचा वेग मोजतो आहे". या उत्तराने मामा अवाक झाले. त्यांना आयझॅकची तीव्र असामान्य बुद्धी कळली. घरी जाऊन त्यांनी हानाला आयझॅकला शाळेत घालायला सांगितले. १६६१ मध्ये आयझॅक ट्रिनिटी कॉलेजमध्ये दाखल झाले. त्यांचा गुरुत्वाकर्षणाचा शोध सर्वांनाच माहीत आहे. १६६८ मध्ये त्यांनी ६ इंच लांब, एक इंच रुंद दुर्बीण शोधून काढली. आजही लंडन म्युझियममध्ये ही दुर्बीण आहे. ३१ मार्च इ.स. १७२७ ला त्यांचा मृत्यू झाला.

न्यूटनचे गती-नियम

प्रथम नियम

कोणतीही स्थिर अथवा स्थिर गतीतील वस्तु बाह्य बला शिवाय आपल्याच मूळ स्थितीत राहते.

द्वितीय नियम

कोणत्याही वस्तुच्या संवेगाच्या बदलाचा दर हा त्या वस्तूवरील बलाच्या प्रमाणात असतो.

तृतीय नियम

कोणत्याही वस्तूवरील क्रिया व प्रतिक्रिया समान व विरुद्ध दिशेने असतात.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

मारियो जे. मोलिना🧫🧫* 🧪🧪🧪🧪🧪🧪🧪🧪🧪🧪🧪 *मेक्सिकन रसायनशास्त्रज्ञ*

 *🧫🧫   मारियो जे. मोलिना🧫🧫*

🧪🧪🧪🧪🧪🧪🧪🧪🧪🧪🧪

*मेक्सिकन रसायनशास्त्रज्ञ*

⚗️⚗️⚗️⚗️⚗️⚗️⚗️⚗️⚗️⚗️⚗️

    *जन्म: १९ मार्च १९४३*

 

मारियो जे. मोलिना (स्पॅनिश: Mario José Molina-Pasquel Henríquez;

 जन्म: १९ मार्च १९४३) हा एक मेक्सिकन रसायनशास्त्रज्ञ आहे. पृथ्वीच्या वातावरणामधील अंटार्क्टिकावर पडलेले मोठे छिद्र शोधुन काढण्यासाठी त्याला पॉल जे. क्रुट्झन व फ्रँक शेरवूड रोलंड ह्या शास्त्रज्ञांच्या समवेत १९९५ सालचे रसायनशास्त्रातील नोबेल पारितोषिक देण्यात आले. नोबेल पारितोषिक मिळवणारा तो पहिला मेक्सिकन व्यक्ती आहे.   


🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

शुक्रवार, १८ मार्च, २०२२

*ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ═════════════ 📙 *बेटांची श्रुंखला*


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   @ संकलन @

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *बेटांची श्रुंखला* 

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बेट म्हणजे मुख्य जमिनीपासून समुद्रामुळे बाजूला पडलेले भूभाग. मुख्य जमिनी म्हणजे प्रमुख खंडे. भारताची बेटे म्हणजे अंदमान व निकोबार. पण अंदमान किंवा निकोबार बेटे म्हणजे बेटांची एक श्रुंखला आहेत. काही प्रमुख बेटांवर वस्ती आहे, तर काही बेटे तशीच ओसाड आहेत. जगाच्या पाठीवर जवळपास हाच प्रकार आढळतो. बहुतेक ठिकाणी अशा श्रृंखला आढळतात. मग त्या भर समुद्रात असतील किंवा एखाद्या प्रमुख भूखंडाच्या जवळपास असतील. असे का व्हावे ?


 याकरता थेट पुरातन काळाकडे वळावे लागते. पृथ्वीची मध्यभागापासून पृष्ठभागापर्यंतची विभागणी कोअर, मँटल व क्रस्ट अशा तीन आवरणात होते. सर्वसाधारणपणे क्रस्टची म्हणजे भूकवचाची जाडी बत्तीस ते पन्नास किलोमीटर असते. पण हीच जाडी समुद्रातळाशी जेमतेम तीन ते पाच किलोमीटर इतकी कमी होते. पृथ्वीचे मँटल किंवा मध्यावरण हे अतितप्त असते. येथील आण्विक घटकांचे विभाजन काही वेळा सुरू होते, तेव्हा समुद्रतळाशी असलेले भूकवच फोडून आतील तप्त लाव्हा बाहेर पडतो. पृथ्वीचा गाभा हा त्याहूनही तप्त असला, तरी तो प्रचंड गुरुत्वाकर्षणाच्या दाबाखाली अाकसलेला आहे. संपूर्ण पृथ्वीच्या भूकवचावर समुद्रातळाशी किमान एकशेवीस ठिकाणी अशी अतितप्त ठिकाणे भूगर्भशास्त्रज्ञांनी माहीत करून शोधून ठेवली आहेत.


 खोल समुद्राच्या पोटात या अतितप्त ठिकाणी जेव्हा ज्वालामुखीचा लाव्हा उफाळून बाहेर पडू लागतो, तेव्हा तो अर्थातच थंड होऊन त्याची शिला बनू लागते. या प्रचंड शिलाखंडाचेच बेट बनते. असे हे नवनिर्मित बेट जेव्हा पाण्यावर दिसू लागते आणि पसरते, तेव्हा भूकवचाची जाडी वाढत जाते. समुद्रतळाशी असलेल्या अतितप्त ठिकाणाची गडबड मात्र थांबलेली नसते. ज्वालामुखी पूर्ण थंडावलेला नसतो. पण वरच्या तोंडावर मात्र भले मोठे झाकण बसून ते बंद झालेले असते. या सगळ्यांची गोळाबेरीज म्हणून समुद्रतळाशी असलेल्या भूकवचाची थोडीशी हालचाल होऊ लागते. ते पुढे सरकते. म्हणजेच नवीन बेटे तयार झालेला भाग पुढे गेल्यावर पुन्हा एकदा ज्वालामुखीचा उद्रेक सुरू होतो. या ठिकाणी पुन्हा एखादे बेट तयार होते, पण जोवर अंतर्भागाचा उद्रेक थंड होत नाही, तोवर ही प्रक्रिया चालूच राहते. आता आपण जी प्रक्रिया पाहिली, ही सर्वसाधारणपणे हजारो वर्षांच्या कालावधीत घडते व बेटांमधील अंतर पंचवीस ते पंचवीसशे किलोमीटर इतके असू शकते. अशा प्रकारच्या बेटमालिका वा बेटांच्या श्रृंखला जगाच्या पाठीवर अनेक ठिकाणी सापडतात.


एक विरोधाभासही यातील काही ठिकाणी सापडतो. समुद्राच्या खोलवर भागांतील बेटांचा पृष्ठभाग कंच हिरवागार असतो. पण क्वचित तेथेच एखादे ज्वालामुखीचे तोंड (क्रेटर) धूर ओकत असते.


विविध बेटांचा माणसाने काय उपयोग केला ? एकांडे शिलेदार तेथे वस्तीला गेले. काही ठिकाणी गुन्हेगारांना शिक्षा म्हणून पाठवले गेले. मोक्याच्या ठिकाणी बेटांवर लष्करी ठाणी वसवली जाऊन आसपासच्या चार पाचशे किलोमीटरवर देखरेख ठेवायला उपयोग केला गेला. ज्या बेटांवर मुबलक पाणी उपलब्ध झाले तेथील वस्तीच वाढत गेली. छोटे देश म्हणून ही बेटे उदयाला आली आहेत. मालदीव, मॉरिशस ही अशी काही उदाहरणे तर दिएगो गाॅर्सिया हे दक्षिण हिंदी महासागरातील एकमेव बेट लष्करीदृष्ट्या फार मोक्याचे ठरले आहे. साखलीन बेटमालिका ही पॅसिफिकमधील लष्करीदृष्ट्या महत्त्वाची बेटमालिका आहे.


*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*

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*ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ═════════════ 📙 *बिग बँग / महास्फोट*


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   @ संकलन @

  *श्री. गजानन 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *बिग बँग / महास्फोट* 📙 

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जॉर्ज एडवर्ड लेमेत्रे या बेल्जियन अॅस्ट्रोफिजिसिस्टकडे बिग बँग वा महास्फोटाची कल्पना मांडण्याचे पितृत्व जाते. १८९४ साली जन्मलेल्या या शास्त्रज्ञांनी १९२७ मध्ये ही कल्पना मांडली. या कल्पनेबद्दल विविध विचार त्यांनंतर तब्बल १० वर्षे मांडले जात होते.


'साऱ्या विश्वाची उत्पत्ती एका महास्फोटामध्ये अंदाजे वीस अब्ज वर्षांपूर्वी झाली असून सर्व विश्वात सध्या विखुरलेले मूलकण एका अंडाकृती आकारात होते. त्यांचा अचानक महाप्रचंड स्फोट झाला. या स्फोटामुळे एकत्र असलेले मूलकण विलक्षण वेगाने, विलक्षण तप्तावस्थेत चहूकडे भिरकावले गेले. जसजसा यानंतरचा काळ लोटत गेला, तसतसे हे मूलकण हळूहळू गार होत गेले. त्यातूनच प्रथम विविध तारकासमूह निर्माण होत गेले. आपली आकाशगंगा ही या अनेकांतील एक. त्यानंतर आजही विश्व पसरतच असून ही क्रिया अव्याहत चालू राहणार आहे.' महास्फोटाची कल्पना थोडक्यात अशी मांडली गेली.


ही कल्पना मांडली गेल्यानंतर त्यावर विविध मते मांडली जाणे ओघानेच आले. काहींना ही कल्पनाच पूर्णत: विसंगत वाटत होती, तर काहींच्या मते ठरावीक कालांतराने विश्व आकुंचन पावून पुन्हा एकदा महास्फोट होण्याची प्रक्रिया सतत चालू राहणार होती. याशिवाय विश्व हे उत्पत्तीनंतर पसरत नसून एका 'कायमस्थिती'त असल्याचीही एक उपपत्ती जोरदारपणे मांडली जात होती. निरीक्षणे व सिद्धांत या दोन्हींच्या आधारावर ही चर्चा तब्बल तीस वर्षे चालू होती.


 यानंतरच्या अवकाश निरीक्षण व रेडिओलहरींच्या ग्रहणानंतर विश्व अफाटपणे पसरत आहे, हे लक्षात येत आहे. डॉपलर इफेक्ट म्हणजे दृश्य प्रकाशाच्या वर्णपटातल्या रेषा लाल / निळ्या टोकाकडे सरकलेल्या दिसतात. याचाही पडताळा आता मिळत आहे. अनेक आकाशगंगा लालसर रंगाचा प्रकाशलहरींचे तरंग पाठवत असल्याने विश्व पसरतच आहे, याची खात्री पटत आहे.


 संपूर्ण विश्वात पसरलेल्या अणूंची एका घनमीटरमध्ये असलेली संख्या हाही एक अभ्यासाचा व निष्कर्षांचा भाग मानला गेला आहे. अलीकडेच झालेल्या एका निरीक्षणात ही घनता जेमतेम एक अणू एका घनमीटरमध्ये एवढीच आहे; पण याहून जास्त अदृश्य पदार्थ अस्तित्वात असावेत.


 महास्फोटानंतरच्या पहिल्या काही मिनिटांतच विश्वात पसरलेल्या मूलकणांतून हेलियमचे अणू निर्माण झाले होते, हे गणित प्रथम १९४६ साली जॉर्ज गॅमी यांनी मांडले. आज विश्वात व आपल्या आकाशगंगेतील ग्रहांभोवती असलेल्या हेलियमचे प्रमाण २३ टक्के व अन्य मुलकणांचे ७७ टक्के (यात बव्हंशी हायड्रोजन) आढळते. यावरूनही महास्फोटाची कल्पना ग्राह्य मानावी लागते.


 महास्फोटानंतरच्या क्षणात प्रचंड प्रमाणात (रेडिएशन) होते व त्याचे तापमान अब्जाहून जास्त होते. प्रसरणामुळे थंडावत जाऊन आज त्याची ऊर्जा कमी झाली व तापमानही पुष्कळ कमी झाले असणारच, असा तर्क राल्फ अाल्फर व रॉबर्ट हर्मन या गॅमाँच्या सहकाऱ्यांनी १९४८ मध्ये मांडला होता. त्याची पुष्टी १९६५ मध्ये आर्नो पेंझियस व रॉबर्ट विल्सन या शास्त्रज्ञांना सापडलेल्या सूक्ष्म तरंगांच्या पार्श्वभूमीतून झाली, असा महास्फोट सिद्धांताच्या समर्थकांचा दावा आहे. या तरंगांचे तापमान शून्याखाली २७० अंश सेंटीग्रेड इतके कमी आहे.


*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*

🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ═════════════ 🌳 *बोन्साय* 🌳


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   @ संकलन @

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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🌳 *बोन्साय* 🌳 

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जपानी माणूस निसर्गप्रिय आहे. साराच निसर्ग घराच्या भिंतीत, आपल्या बागेत साठवता आला, तर या हट्टाने बोन्सायची निर्मिती जपानी कल्पकतेने केली गेली आहे. अनेक जातींची झाडे, वृक्ष, फळझाडे ही छोट्याशा कुंडीत लहान आकार कायम राखत विशिष्ट पद्धतीने जोपासायची, त्यांचे सर्व गुणधर्म मात्र कायम राखायचे अशा तंत्रातून निर्माण झालेल्या झाडाला 'बोन्साय' म्हणतात.


वडाचे झाड जेमतेम फूटभर उंचीचे, पण त्याच्या फांद्यांना पारंब्या फुटलेल्या, संत्र्याचे झाड वीतभर उंचीचे, पण त्याला लिंबासारख्या आकाराची संत्री लागलेली, तीही संत्र्याच्या चवीची... असा प्रकार बोन्साय पद्धतीत घडवला जातो.


अशा पद्धतीत विविध झाडे तयार करणे हे अत्यंत कौशल्याचे, चिकाटीचे व वनस्पतीशास्त्राची परिपूर्ण जाण असणारे काम आहे. झाडांना पुरेशी पोषण द्रव्ये देताना त्यांची वाढ मात्र कुंठीत ठेवायची, याचे तंत्र म्हणजे बोन्साय. केवळ वाढणार्‍या फांद्या छाटून बोन्साय कधीही तयार होत नाही. विशेषत: झाडाला आलेली फळे परिपूर्ण चवीची असणे हा त्यातील एक क्लिष्ट भाग ठरतो.


 बोन्साय तयार करण्याची पद्धत दिसायला साधीशीच आहे. प्रत्येक झाडाला दोन प्रकारची मुळे असतात. लांबवर जाणारी, खोल अन्नाच्या शोधात जमिनीत रोवणारी सोटमुळे व केशसंभासारखी तंतूमुळे. तंतूमुळे ही पाणी शोषून घेणे, जमिनीच्या आसपासची पृष्ठभागातील विविध रसायने गोळा करणे या कामात गुंतलेली असतात. त्यांचा झाडाला आधार देणे, वाढीला भक्कम पाठबळ देणे यात सहभाग नसतो. बोन्साय करताना मुख्य मुळे तारांनी बांधणे, वेळच्या वेळी त्यांना छाटणे, त्यांची वाढ न होऊ देणे यावर लक्ष्य केंद्रित केले जाते. ठराविक दिवसांनी ही प्रक्रिया करत राहिल्यास झाडाची वाढ खुंटते, पण झाडाचे मूळ स्वरूप कायम राहते. अर्थातच बोन्साय झाडांच्या कुंडय़ा यासाठी ठरावीक महिन्यांनी बदलत गेल्यावरच हे शक्य होते.


 बोन्सायचे कौतुक करणारी जशी मंडळी आहेत तशीच त्याला नावे ठेवणारी विरोधक मंडळीही आहेत. निसर्गाला स्वतःच्या मुठीत पकडण्याचा हा केविलवाणा प्रयत्न आहे, असे विरोधकांचे मत पडते. याउलट साराच निसर्ग माझ्या दिवाणखान्यात मी कसा मांडला आहे, असे बोन्सायचे कौतुक करणारी मंडळी म्हणतात.


एखाद्या प्रसिद्ध नावाजलेल्या व्यक्तीच्या छायेत कायम दुय्यम भूमिकेत वावरणाऱ्या मंडळींना आपण बोलीभाषेत 'बोन्साय' म्हणूनच संबोधतो, ते का, हे आता कळले ना ?


*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या 

बुधवार, १६ मार्च, २०२२

🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ════════════ 📙 *बिग बँग / महास्फोट


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   @ संकलन @

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *बिग बँग / महास्फोट* 📙 

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जॉर्ज एडवर्ड लेमेत्रे या बेल्जियन अॅस्ट्रोफिजिसिस्टकडे बिग बँग वा महास्फोटाची कल्पना मांडण्याचे पितृत्व जाते. १८९४ साली जन्मलेल्या या शास्त्रज्ञांनी १९२७ मध्ये ही कल्पना मांडली. या कल्पनेबद्दल विविध विचार त्यांनंतर तब्बल १० वर्षे मांडले जात होते.


'साऱ्या विश्वाची उत्पत्ती एका महास्फोटामध्ये अंदाजे वीस अब्ज वर्षांपूर्वी झाली असून सर्व विश्वात सध्या विखुरलेले मूलकण एका अंडाकृती आकारात होते. त्यांचा अचानक महाप्रचंड स्फोट झाला. या स्फोटामुळे एकत्र असलेले मूलकण विलक्षण वेगाने, विलक्षण तप्तावस्थेत चहूकडे भिरकावले गेले. जसजसा यानंतरचा काळ लोटत गेला, तसतसे हे मूलकण हळूहळू गार होत गेले. त्यातूनच प्रथम विविध तारकासमूह निर्माण होत गेले. आपली आकाशगंगा ही या अनेकांतील एक. त्यानंतर आजही विश्व पसरतच असून ही क्रिया अव्याहत चालू राहणार आहे.' महास्फोटाची कल्पना थोडक्यात अशी मांडली गेली.


ही कल्पना मांडली गेल्यानंतर त्यावर विविध मते मांडली जाणे ओघानेच आले. काहींना ही कल्पनाच पूर्णत: विसंगत वाटत होती, तर काहींच्या मते ठरावीक कालांतराने विश्व आकुंचन पावून पुन्हा एकदा महास्फोट होण्याची प्रक्रिया सतत चालू राहणार होती. याशिवाय विश्व हे उत्पत्तीनंतर पसरत नसून एका 'कायमस्थिती'त असल्याचीही एक उपपत्ती जोरदारपणे मांडली जात होती. निरीक्षणे व सिद्धांत या दोन्हींच्या आधारावर ही चर्चा तब्बल तीस वर्षे चालू होती.


 यानंतरच्या अवकाश निरीक्षण व रेडिओलहरींच्या ग्रहणानंतर विश्व अफाटपणे पसरत आहे, हे लक्षात येत आहे. डॉपलर इफेक्ट म्हणजे दृश्य प्रकाशाच्या वर्णपटातल्या रेषा लाल / निळ्या टोकाकडे सरकलेल्या दिसतात. याचाही पडताळा आता मिळत आहे. अनेक आकाशगंगा लालसर रंगाचा प्रकाशलहरींचे तरंग पाठवत असल्याने विश्व पसरतच आहे, याची खात्री पटत आहे.


 संपूर्ण विश्वात पसरलेल्या अणूंची एका घनमीटरमध्ये असलेली संख्या हाही एक अभ्यासाचा व निष्कर्षांचा भाग मानला गेला आहे. अलीकडेच झालेल्या एका निरीक्षणात ही घनता जेमतेम एक अणू एका घनमीटरमध्ये एवढीच आहे; पण याहून जास्त अदृश्य पदार्थ अस्तित्वात असावेत.


 महास्फोटानंतरच्या पहिल्या काही मिनिटांतच विश्वात पसरलेल्या मूलकणांतून हेलियमचे अणू निर्माण झाले होते, हे गणित प्रथम १९४६ साली जॉर्ज गॅमी यांनी मांडले. आज विश्वात व आपल्या आकाशगंगेतील ग्रहांभोवती असलेल्या हेलियमचे प्रमाण २३ टक्के व अन्य मुलकणांचे ७७ टक्के (यात बव्हंशी हायड्रोजन) आढळते. यावरूनही महास्फोटाची कल्पना ग्राह्य मानावी लागते.


 महास्फोटानंतरच्या क्षणात प्रचंड प्रमाणात (रेडिएशन) होते व त्याचे तापमान अब्जाहून जास्त होते. प्रसरणामुळे थंडावत जाऊन आज त्याची ऊर्जा कमी झाली व तापमानही पुष्कळ कमी झाले असणारच, असा तर्क राल्फ अाल्फर व रॉबर्ट हर्मन या गॅमाँच्या सहकाऱ्यांनी १९४८ मध्ये मांडला होता. त्याची पुष्टी १९६५ मध्ये आर्नो पेंझियस व रॉबर्ट विल्सन या शास्त्रज्ञांना सापडलेल्या सूक्ष्म तरंगांच्या पार्श्वभूमीतून झाली, असा महास्फोट सिद्धांताच्या समर्थकांचा दावा आहे. या तरंगांचे तापमान शून्याखाली २७० अंश सेंटीग्रेड इतके कमी आहे.


*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*

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गेऑर्ग झिमॉन ओम* *जर्मन भौतिकशास्त्रज्ञ, गणितज्ञ* *जन्मदिन - मार्च १६, इ.स. १७८९*

 *गेऑर्ग झिमॉन ओम*


*जर्मन भौतिकशास्त्रज्ञ, गणितज्ञ*


*जन्मदिन - मार्च १६, इ.स. १७८९*


गेऑर्ग झिमॉन ओम[१] (: जॉर्ज सायमन ओह्म ; जर्मन: Georg Simon Ohm) (मार्च १६, इ.स. १७८९ - जुलै ६, इ.स. १८५४) हा बव्हेरियन-जर्मन भौतिकशास्त्रज्ञ, गणितज्ञ होता. याने शाळेत शिक्षकी पेशा करताना अलेस्सांद्रो व्होल्टा या इटालियन आविष्कारकाने बनवलेल्या विद्युतरासायनिक घटावर अधिक संशोधन करण्यास आरंभ केला. या संशोधनातून घडवलेल्या स्वनिर्मित उपकरणाद्वारे याने संवाहकाच्या दोन टोकांतील विभवांतर आणि संवाहकातून वाहणारी विद्युतधारा यांच्यामधील परस्परसंबंध सिद्ध केला. हा संबंध "ओमचा नियम" म्हणून प्रसिद्ध आहे.

ओमचा नियम

संवाहकाच्या दोन टोकांत वाहणारी विद्युतधारा, त्या दोन टोकांमधील विभवांतराच्या समानुपाती असते.

संकलन )- गजानन गोपेवाड 



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