सोमवार, ६ सप्टेंबर, २०२१

ध्यान साधना

गजानन गोपेवाड 

👌इसे सेव कर सुरक्षित कर ले। ऐसी पोस्ट कम ही आती है।


विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियों द्वारा किया गया अनुसंधान)


■ काष्ठा = सैकन्ड का  34000 वाँ भाग

■ 1 त्रुटि  = सैकन्ड का 300 वाँ भाग

■ 2 त्रुटि  = 1 लव ,

■ 1 लव = 1 क्षण

■ 30 क्षण = 1 विपल ,

■ 60 विपल = 1 पल

■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,

■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )

■3 होरा=1प्रहर व 8 प्रहर 1 दिवस (वार)

■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,

■ 7 दिवस = 1 सप्ताह

■ 4 सप्ताह = 1 माह ,

■ 2 माह = 1 ऋतू

■ 6 ऋतू = 1 वर्ष ,

■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी

■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,

■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग

■ 2 युग = 1 द्वापर युग ,

■ 3 युग = 1 त्रैता युग ,

■ 4 युग = सतयुग

■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग

■ 72 महायुग = मनवन्तर ,

■ 1000 महायुग = 1 कल्प

■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )

■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )

■ महालय  = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म )


सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यहीं है जो हमारे देश भारत में बना हुआ है । ये हमारा भारत जिस पर हमे गर्व होना चाहिये l

दो लिंग : नर और नारी ।

दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।

दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)।

दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।


तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।

तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।

तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।

तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।

तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु।

तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।

तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।

तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।

तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।

तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।

तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।

तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।

तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।


चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।

चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।

चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।

चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।

चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।

चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।

चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।

चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।

चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।

चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।

चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।

चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।

चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।

चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।

चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।

चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।

चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।


पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।

पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।

पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।

पाँच  उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।

पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।

पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।

पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।

पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।

पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।

पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।

पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।

पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।

पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।


छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।

छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।

छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।

छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच),  मोह, आलस्य।


सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।

सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।

सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।

सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।

सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।

सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।

सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।

सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।


सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।

सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।

सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।

सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।

सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।

सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।


आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।

आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।

आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।

आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।

आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।


नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।

नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।

नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।

नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।


दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।

दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।

दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।

दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।

दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।


*उक्त जानकारी शास्त्रोक्त 📚 आधार पर... हे.....💐

जय श्री राम राधे कृष्णा राधे श्याम🙏🙏

                                                ऐसी जानकारी बार-बार नहीं आती, और आगे भेजें, ताकि लोगों को सनातन धर्म की जानकारी हो  सके आपका आभार धन्यवाद होगा


1-अष्टाध्यायी               पाणिनी

2-रामायण                    वाल्मीकि

3-महाभारत                  वेदव्यास

4-अर्थशास्त्र                  चाणक्य

5-महाभाष्य                  पतंजलि

6-सत्सहसारिका सूत्र      नागार्जुन

7-बुद्धचरित                  अश्वघोष

8-सौंदरानन्द                 अश्वघोष

9-महाविभाषाशास्त्र        वसुमित्र

10- स्वप्नवासवदत्ता        भास

11-कामसूत्र                  वात्स्यायन

12-कुमारसंभवम्           कालिदास

13-अभिज्ञानशकुंतलम्    कालिदास  

14-विक्रमोउर्वशियां        कालिदास

15-मेघदूत                    कालिदास

16-रघुवंशम्                  कालिदास

17-मालविकाग्निमित्रम्   कालिदास

18-नाट्यशास्त्र              भरतमुनि

19-देवीचंद्रगुप्तम          विशाखदत्त

20-मृच्छकटिकम्          शूद्रक

21-सूर्य सिद्धान्त           आर्यभट्ट

22-वृहतसिंता               बरामिहिर

23-पंचतंत्र।                  विष्णु शर्मा

24-कथासरित्सागर        सोमदेव

25-अभिधम्मकोश         वसुबन्धु

26-मुद्राराक्षस               विशाखदत्त

27-रावणवध।              भटिट

28-किरातार्जुनीयम्       भारवि

29-दशकुमारचरितम्     दंडी

30-हर्षचरित                वाणभट्ट

31-कादंबरी                वाणभट्ट

32-वासवदत्ता             सुबंधु

33-नागानंद                हर्षवधन

34-रत्नावली               हर्षवर्धन

35-प्रियदर्शिका            हर्षवर्धन

36-मालतीमाधव         भवभूति

37-पृथ्वीराज विजय     जयानक

38-कर्पूरमंजरी            राजशेखर

39-काव्यमीमांसा         राजशेखर

40-नवसहसांक चरित   पदम् गुप्त

41-शब्दानुशासन         राजभोज

42-वृहतकथामंजरी      क्षेमेन्द्र

43-नैषधचरितम           श्रीहर्ष

44-विक्रमांकदेवचरित   बिल्हण

45-कुमारपालचरित      हेमचन्द्र

46-गीतगोविन्द            जयदेव

47-पृथ्वीराजरासो         चंदरवरदाई

48-राजतरंगिणी           कल्हण

49-रासमाला               सोमेश्वर

50-शिशुपाल वध          माघ

51-गौडवाहो                वाकपति

52-रामचरित                सन्धयाकरनंदी

53-द्वयाश्रय काव्य         हेमचन्द्र


वेद-ज्ञान:-


प्र.1-  वेद किसे कहते है ?

उत्तर-  ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है।


प्र.2-  वेद-ज्ञान किसने दिया ?

उत्तर-  ईश्वर ने दिया।


प्र.3-  ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?

उत्तर-  ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।


प्र.4-  ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?

उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण         के लिए।


प्र.5-  वेद कितने है ?

उत्तर- चार ।                                                  

1-ऋग्वेद 

2-यजुर्वेद  

3-सामवेद

4-अथर्ववेद


प्र.6-  वेदों के ब्राह्मण ।

        वेद              ब्राह्मण

1 - ऋग्वेद      -     ऐतरेय

2 - यजुर्वेद      -     शतपथ

3 - सामवेद     -    तांड्य

4 - अथर्ववेद   -   गोपथ


प्र.7-  वेदों के उपवेद कितने है।

उत्तर -  चार।

      वेद                     उपवेद

    1- ऋग्वेद       -     आयुर्वेद

    2- यजुर्वेद       -    धनुर्वेद

    3 -सामवेद      -     गंधर्ववेद

    4- अथर्ववेद    -     अर्थवेद


प्र 8-  वेदों के अंग हैं ।

उत्तर -  छः ।

1 - शिक्षा

2 - कल्प

3 - निरूक्त

4 - व्याकरण

5 - छंद

6 - ज्योतिष


प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?

उत्तर- चार ऋषियों को।

         वेद                ऋषि

1- ऋग्वेद         -      अग्नि

2 - यजुर्वेद       -       वायु

3 - सामवेद      -      आदित्य

4 - अथर्ववेद    -     अंगिरा


प्र.10-  वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?

उत्तर- समाधि की अवस्था में।


प्र.11-  वेदों में कैसे ज्ञान है ?

उत्तर-  सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान।


प्र.12-  वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?

उत्तर-   चार ।

        ऋषि        विषय

1-  ऋग्वेद    -    ज्ञान

2-  यजुर्वेद    -    कर्म

3-  सामवे     -    उपासना

4-  अथर्ववेद -    विज्ञान


प्र.13-  वेदों में।


ऋग्वेद में।

1-  मंडल      -  10

2 - अष्टक     -   08

3 - सूक्त        -  1028

4 - अनुवाक  -   85 

5 - ऋचाएं     -  10589


यजुर्वेद में।

1- अध्याय    -  40

2- मंत्र           - 1975


सामवेद में।

1-  आरचिक   -  06

2 - अध्याय     -   06

3-  ऋचाएं       -  1875


अथर्ववेद में।

1- कांड      -    20

2- सूक्त      -   731

3 - मंत्र       -   5977

          

प्र.14-  वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ?                                                                                                                                                              उत्तर-  मनुष्य-मात्र को वेद पढने का अधिकार है


प्र.15-  सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?

उत्तर-  ऋग्वेद।


प्र.16-  वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?

उत्तर-  वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 43 हजार वर्ष पूर्व । 


प्र.17-  वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों का क्या नाम है ?

उत्तर- 

1-  न्याय दर्शन  - गौतम मुनि।

2- वैशेषिक दर्शन  - कणाद मुनि।

3- योगदर्शन  - पतंजलि मुनि।

4- मीमांसा दर्शन  - जैमिनी मुनि।

5- सांख्य दर्शन  - कपिल मुनि।

6- वेदांत दर्शन  - व्यास मुनि।


प्र.18  शास्त्रों के विषय क्या है ?

उत्तर-  आत्मा,  परमात्मा, प्रकृति,  जगत की उत्पत्ति,  मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक  ज्ञान-विज्ञान आदि।


प्र.19  प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?

उत्तर-  केवल ग्यारह।


प्र.20  उपनिषदों के नाम बतावे ?

उत्तर-  

01-ईश ( ईशावास्य )  

02-केन  

03-कठ  

04-प्रश्न  

05-मुंडक  

06-मांडू  

07-ऐतरेय  

08-तैत्तिरीय 

09-छांदोग्य 

10-वृहदारण्यक 

11-श्वेताश्वतर ।


प्र.21  उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?

उत्तर- वेदों से।

प्र.22- चार वर्ण।

उत्तर- 

1- ब्राह्मण

2- क्षत्रिय

3- वैश्य

4- शूद्र


प्र.23- चार युग।

1- सतयुग - 17,28000  वर्षों का नाम ( सतयुग ) रखा है।

2- त्रेतायुग- 12,96000  वर्षों का नाम ( त्रेतायुग ) रखा है।

3- द्वापरयुग- 8,64000  वर्षों का नाम है।

4- कलयुग- 4,32000  वर्षों का नाम है।

कलयुग के 5122  वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक।

4,27024 वर्षों का भोग होना है। 


पंच महायज्ञ

       1- ब्रह्मयज्ञ   

       2- देवयज्ञ

       3- पितृयज्ञ

       4- बलिवैश्वदेवयज्ञ

       5- अतिथियज्ञ

   

स्वर्ग  -  जहाँ सुख है।

नरक  -  जहाँ दुःख है।.


*#भगवान_शिव के  "35" रहस्य!!!!!!!!


भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है।


*🔱1. आदिनाथ शिव : -* सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है।


*🔱2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : -* शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।


*🔱3. भगवान शिव का नाग : -* शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।


*🔱4. शिव की अर्द्धांगिनी : -* शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।


*🔱5. शिव के पुत्र : -* शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।


*🔱6. शिव के शिष्य : -* शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।


*🔱7. शिव के गण : -* शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। 


*🔱8. शिव पंचायत : -* भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।


*🔱9. शिव के द्वारपाल : -* नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।


*🔱10. शिव पार्षद : -* जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।


*🔱11. सभी धर्मों का केंद्र शिव : -* शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।


*🔱12. बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय : -*  ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।


*🔱13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव : -* भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।


*🔱14. शिव चिह्न : -* वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।


*🔱15. शिव की गुफा : -* शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा 'अमरनाथ गुफा' के नाम से प्रसिद्ध है।


*🔱16. शिव के पैरों के निशान : -* श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं। ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं। इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं। कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।


रुद्र पद- तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्‍वर का मंदिर में शिव के पदचिह्न हैं जिसे 'रुद्र पदम' कहा जाता है। इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर शिव के पदचिह्न हैं।


तेजपुर- असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में शिव के दाएं पैर का निशान है।


जागेश्वर- उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के पास शिव के पदचिह्न हैं। पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।


रांची- झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर 'रांची हिल' पर शिवजी के पैरों के निशान हैं। इस स्थान को 'पहाड़ी बाबा मंदिर' कहा जाता है।


*🔱17. शिव के अवतार : -* वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।


*🔱18. शिव का विरोधाभासिक परिवार : -* शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है। स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।


*🔱19.*  ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर उनका निवास है। जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।


*🔱20.शिव भक्त : -* ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।


*🔱21.शिव ध्यान : -* शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।


*🔱22.शिव मंत्र : -* दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।


*🔱23.शिव व्रत और त्योहार : -* सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में शिव व्रत रखे जाते हैं। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।


*🔱24.शिव प्रचारक : -* भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया। इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है। दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।


*🔱25.शिव महिमा : -* शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।


*🔱26.शैव परम्परा : -* दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।


*🔱27.शिव के प्रमुख नाम : -*  शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।


*🔱28.अमरनाथ के अमृत वचन : -* शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। 'विज्ञान भैरव तंत्र' एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।


*🔱29.शिव ग्रंथ : -* वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।


*🔱30.शिवलिंग : -* वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।


*🔱31.बारह ज्योतिर्लिंग : -* सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो


शिवलिंग के बारह खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।


 दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया।


*🔱32.शिव का दर्शन : -* शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।


*🔱33.शिव और शंकर : -* शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं- शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। अत: शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है। हालांकि शंकर को भी शिवरूप माना गया है। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।


*🔱34. देवों के देव महादेव :* देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।


~शिवालय

शनिवार, ४ सप्टेंबर, २०२१

हँपी बर्थ डे गुगल

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*४ सप्टेंबर - हॅप्पी बर्थडे गुगल* 

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स्थापना - ४ सप्टेंबर १९९८


इंटरनेटवरील प्रत्येक प्रश्नाला उत्तर देणारा आपला मित्र म्हणजे गुगल. वास्तविक गुगलची स्थापना ४ सप्टेंबर १९९८ ला झाली आहे. गुगल कंपनीच्या स्थापनेपासून २००४ पर्यंत गुगल आपला ४ सप्टेंबर या दिवशी वाढदिवस साजरा करत होती. परंतु २००५ पासून गुगलने २७ सप्टेंबर हा दिवस वाढदिवसासाठी जाहीर केला. या पाठीमागचे कारण म्हणजे २७ सप्टेंबर रोजी सर्वात अधिक पेज व्हू मिळाल्याची घोषणा करण्यात आली होती आणि याच दिवशी आपला वाढदिवस साजरा करण्यात यावा असा गुगलचा अट्टाहास होता, तेव्हापासून गुगलचा वाढदिवस २७ सप्टेंबर रोजी करण्यास सुरुवात झाली.


४ सप्टेंबर १९९८ रोजी गूगल पहिल्यांदा जगासमोर आलं होतं. मेन्लो पार्कमधील सुसान वोजसिकी गॅरेजमध्ये लॅरी पेज आणि सर्गे ब्रेन यांनी गुगलची स्थापना केली होती. खरंतर ‘Google’चं नाव ठेवायचं होतं ‘Googol’. पण स्पेलिंग मिस्टेकमुळे ‘Google’ असं झालं आणि तेच नाव पुढे प्रसिद्ध झालं. त्याआधीही पेज आणि ब्रेन यांनी गूगलचं नाव ‘बॅकरब’ असं ठेवलेलं. मात्र, त्यानंतर गूगल असं नाव करण्यात आले.


१९९७ साली कंपनीने डोमेन रजिस्टर केलं आणि अधिकृतपणे गुगल असे नाव ठेवण्यात आले. गुगल ही जगातील एक मोठी कंपनी असून, केवळ भूतकाळात समाधान मानणारी नाही. त्यांनी त्यांच्या मुख्य शोधयंत्रात सुधारणा केली असून, इतर अनेक उपकरणांवर त्याचा वापर कसा वाढवता येईल याचा विचार केला आहे. १९९८ मध्ये गुगलने तंत्रज्ञानाचे जग नाटय़मयरीत्या बदलून टाकले व सर्च इंजिन म्हणजे शोधयंत्र कायमचे सुधारून टाकले. गुगलने जग बदलले, अब्जावधी लोक ऑनलाइन आले. इंटरनेटची विक्रमी वाढ झाली. आता तुम्ही तुमच्या खिशातील छोटय़ाशा मोबाइलवर असलेल्या गुगलने कुठल्याही प्रश्नाचे उत्तर शोधू शकता. एवढेच नव्हे. गुगल आपल्या डुडल साठीही प्रसिद्ध आहे. २००२ साली गुगलने पहिल्यांदा डुडल तयार केलं. जगप्रसिद्ध व्यक्तींची जयंती-पुण्यतिथी, महत्त्वाचे कार्यक्रम, महत्त्वाचे वर्धापनदिन इत्यादींसाठी गुगल आपल्या होमपेजवर डुडलद्वारे प्रसिद्ध करते.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

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गाथा बलिदानाची

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*🇮🇳🇮🇳गाथा बलिदानाची🇮🇳🇮🇳*

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     *भारतीय राजकारणातील* 

                 *भीष्माचार्य*

      *पितामह दादाभाई नौरोजी*      

                      *दोर्डी* 

      *जन्म : ४ सप्टेंबर १८२५*

     (वर्सोवा,मुंबई,महाराष्ट्र,भारत)

           मृत्यू : ३० जून १९१७    

         (महालक्ष्मी,मुंबई,भारत)

दादाभाई नौरोजी : *ब्रिटनमधील खासदार*

कार्यकाळ : १८९२ – १८९५

मागील : फ्रेडरिक थॉमस पेंटोन

पुढील : विल्यम फ्रेडरिक बार्टन 

             मस्से-मेंवरिंग


राजकीय पक्ष : भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस

आई : माणकबाई नौरोजी दोर्डी

वडील : नौरोजी पालनजी दोर्डी

पत्नी : गुलबाई

निवास : लंडन युनायटेड किंग्डम

व्यवसाय : बॅरिस्टर

धर्म : पारशी


हे पारशी विचारवंत,शिक्षणतज्ज्ञ, कापूस-व्यापारी व भारतीय स्वातंत्र्यलढ्यातल्या राजकारण्यांच्या पहिल्या पिढीतील होते. त्यांनी लिहिलेल्या पॉव्हर्टी ॲन्ड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया (अर्थ: भारतातील अ-ब्रिटिश राजवट आणि गरिबी) या पुस्तकाने भारतातील संपत्तीचा ओघ ब्रिटनकडे कसा वाहिला जात होता, याकडे लक्ष वेधले. इ.स. १८९२ ते इ.स. १८९५ या कालखंडात ते ब्रिटिश संसदेच्या कनिष्ठ गृहात संसदसदस्य होते. ब्रिटिश संसदेत निवडून गेलेले ते पहिलेच आशियाई व्यक्ती ठरले. भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस या पक्षाच्या स्थापनेचे श्रेय ए.ओ. ह्यूम व दिनशा एडलजी वाच्छा यांच्यासह दादाभाई नौरोजींना दिले जाते.


दादाभाई नौरोजी यांना भारताचे पितामह म्हणून ओळखतात. ते भारतीय राष्ट्रवादाचे प्रणेते होते. भारतीय अर्थशास्त्राचे जनक. जहाल व मवाळ यांच्यात सुवर्णमध्य साधणारे नेते. भारतीय स्वराज्याचे पहिले उद्गाते. इंग्रजांच्या मतदारसंघातून निवडून येणारे व तेथील हाउस ऑफ कॉमन्सचे सभासद बनणारे ते पहिले भारतीय. भारताच्या लुटीच्या सिद्धान्ताचे जनक. १८८३ साली ब्रिटिशांकडून त्यांना जस्टिस ऑफ पीस हा क़िताब देण्यात आला.


मुंबईच्या एल्फिन्स्टन महाविद्यालयात नियुक्त होणारे ते पहिले भारतीय. ते रा.गो. भांडारकर यांचे आवडते भारतीय प्राध्यापक होते. महंमद अली जिना हे त्यांचे खाजगी सचिव होते.


➡ *रस्ता*


मुंबईच्या गिरगांव भागात जेथे दादाभाई रहात होते त्या रस्त्याला नौरोजी स्ट्रीट म्हणतात. याच रस्त्यावर स्टुडंट्स लिटररी सायंटिफिक सोसायटीची कमळाबाईंची शाळा आहे.


💁‍♂ *जीवन प्रवास*


१८४५ - स्टुडंट्स लिटररी सायंटिफिक सोसायटी ही संस्था स्थापन करण्यात सहभाग. १८८५ - भारतीय राष्ट्रीय कॉ्ंग्रेसचे संस्थापक सदस्य. १८८६, १८९३ व १९०६ - भारतीय राष्ट्रीय कॉग्रेसचे अध्यक्षपद. ज्ञान प्रसारक मंडळींची स्थापना,बॉम्बे असोसिएशन ची स्थापना, लंडन इंडियन असोशिएशन , आणि ईस्ट इंडिया असोशिएशन ची स्थापना.


💎 *बाह्य दुवे*


"डॉ. दादाभाई नौरोजी, 'द ग्रँड ओल्ड मॅन ऑफ इंडिया', वोहुमन.ऑर्ग - दादाभाई नौरोजींचा समग्र जीवनपट" (इंग्रजी मजकूर).


📚 *दादाभाई नौरोजींवरील पुस्तके*


दादाभाई नौरोजी (चरित्र, गंगाधर गाडगीळ)

दादाभाई नौरोजी : भारतीय राजकारणातील भीष्माचार्य (व्यक्तिचित्रण, निंबाजीराव पवार)

नवरोजी ते नेहरू (गोविंद तळवलकर)

भारताचा स्वातंत्र्य संघर्ष (बिपीनचंद्र)

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

श्रावण मास,कृष्ण पक्ष, *द्वादशी*,पुष्य नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,वर्षा ऋतु,युगाब्ध ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

शनिवार, ०४ सप्टेंबर २०२१.

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                         *प्रभात दर्शन*

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          *"मनुष्य के लिए सुख और आनंद का भंडार भीतर ही है। उसकी झलक बाहर भी दिखाई देती है, पर वह केवल झलक ही है। शास्त्र का कथन ठीक ही है कि यदि सत्य वस्तु, ब्रह्म या परमात्मा का रूप जानना हो, तो हमें अपने चित्त को क्षण भर के लिए स्थिर बनाना पड़ेगा। इसे साधना-धर्म का अंग कहते हैं। इसलिए स्थायी सुख-प्राप्ति के लिए हमें धर्म का आश्रय लेना पड़ेगा। धर्म ही हमें वर्तमान मुहूर्त के क्षणिक सुख के बदले भविष्य में होने वाले अक्षय सुख का मार्ग बताता है। "*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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शुक्रवार, ३ सप्टेंबर, २०२१

लहान मुले माती का खातात


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   *📒📒📒 @ संकलन @📒📒📒*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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               🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📕 *लहान मुले माती का खातात ?* 📕


नवीनच रांगायला शिकलेली मुले जे दिसेल ते तोंडात घालतात. काही मुले माती खातात, पेन्सिल खातात.

हयाचे कारण काय ते आता पाहू. आहारात लोह व कॅल्शियम या क्षारांची कमतरता असल्यास, मुलाला वरचे अन्न सुरू न केल्यास, अॅनेमिया वा रक्तक्षय (कोणत्याही कारणामुळे) असल्यास मुले माती खातात. काही मुलांमध्ये, त्यांच्याकडे कोणी लक्ष देत नाही ही भावना वाढीस लागल्यानेही ते माती, पेन्सिली बगैरे खाऊन सर्वांचे लक्ष स्वतःकडे वेधून घ्यायचा प्रयत्न करतात. कृमींची लागण झालेली मुलेही माती खातात. माती खाल्ल्याने कृमींची लागण होऊ शकते. मुलाला लोहक्षार जास्त प्रमाणात दिल्याने मुले माती खाणे बंद करतात. तसे न झाल्यास मानसिक कारणांचा शोध घ्यावा लागतो. माती खाणाऱ्या मुलाच्या पाठीत धपाटा मारताना मातेने या कारणांकडे थोडे लक्ष दिल्यास त्याचे माती खाणे थांबू शकेल.


*डाॅ.अंजली दिक्षित व डाॅ.जगन्नाथ दिक्षित*

*यांच्या 'मेडिकल जनरल नॉलेज' पुस्तकातून*

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बहिरे मुल मुकेही असतात


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   *📒📒📒 @ संकलन @📒📒📒*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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               🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📕 *बहिरे मूल मुकेही असते का?* 📕


बहिरेपणा म्हणजे कमी अधिक प्रमाणात ऐकू न येणे, हे तुम्हाला माहीत असेलच. आपल्या कानाचे बाह्यकर्ण, मध्यकर्ण आणि अंतर्कर्ण असे तीन भाग असतात. या तीन भागांपैकी एकात जरी दोष असला, तरी बहिरेपणा येऊ शकतो. याखेरीज मेंदूपासून निघणारी आठवी नस किंवा मेंदूचा ध्वनिज्ञानकेंद्राचा भाग यांपैकी कोठेही दोष असेल, तरीही ऐकू येत नाही.


काही मुले जन्मताच मूकबधिर असतात. म्हणजे त्यांना ऐकूही येत नाही व बोलताही येत नाही. ही एक जन्मजात अशी बरी न होणारी व्याधी आहे. ऐकणे आणि बोलणे यांचा जवळचा संबंध आहे. आपण बोलायला कसे शिकतो, ते आता पाहू, लहान बाळाला आवाज आल्यास ते तिकडे वळून पाहायला लागते. येणारा आवाज आणि त्यासोबत होणाऱ्या तोंडाच्या, ओठांच्या हालचाली यावर बालकाचे बारीक लक्ष असते! आपले अनुकरण करतच ते पहिल्यांदा "बाऽऽऽवा", "ताऽऽता" असे शब्द बोलते. ऐकू न आल्यास साहजिकच त्याला बोलता येत नाही. दुसरे महत्त्वाचे म्हणजे ऐकू न आल्याने सभोवतालच्या परिस्थितीचे त्याला पुरेसे आकलनही होत नाही. त्यामुळे मुलाला भोवतालच्या गोष्टींबाबत रस वाटत नाही व त्याचा एकूणच विकास नीट होत नाही. यावरून बहिरे मूल बऱ्याचदा मुके असल्याचे तुम्हाला आढळेल किंबहुना बहिरे

असल्यानेच ते मुकेही असते.


लहान बाळाने आवाजाला प्रतिसाद दिला नाही, तर तात्काळ त्याच्या कानांची तपासणी करून घ्यावी. बहिरेपणाचे निदान झाल्यास बोलण्यासाठीचे विशेष प्रशिक्षण मुलाला द्यावे लागते. अर्थात असे शिक्षण देणाऱ्या संस्था संख्येने फार कमी आहेत. मात्र असे शिक्षण दिल्यास मूकबधिर मुले काही प्रमाणात स्वावलंबी बनू शकतात.


*डाॅ.अंजली दिक्षित व डाॅ.जगन्नाथ दिक्षित*

*यांच्या 'मेडिकल जनरल नॉलेज' पुस्तकातून*

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कार्ल डेव्हिड जन्मदिवस

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*३ सप्टेंबर - कार्ल डेव्हिड अँडरसन जन्मदिन*

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*जन्म - ३ सप्टेंबर १९०५*     (न्यूयॉर्क)

स्मृती - ११ जानेवारी १९९१ (कॅलिफोर्निया)


अँडरसन, कार्ल डेव्हिड अमेरिकन भौतिकी विज्ञ १९३६च्या नोबेल पारितोषिकाचे सहविजेते. त्यांचा जन्म न्यूयॉर्क येथे झाला. कॅलिफोर्निया इन्स्टिट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलॉजीमध्ये अध्ययन करून १९२७ मध्ये बी. एस्. आणि १९३० मध्ये पीएच्. डी. या पदव्या त्यांनी मिळविल्या. १९३० नंतर आजपावेतो ते कॅलिफोर्निया विद्यापीठाचे सदस्य आहेत. १९३९ मध्ये त्यांची प्राध्यापकपदावर नेमणूक झाली.


१९३० मध्ये त्यांनी विश्वकिरणांमुळे (बाह्य अवकाशातून पृथ्वीकडे येणाऱ्या अतिशय भेदक किरणांमुळे) वातावरणात निर्माण होणाऱ्या आयनीकारक (विद्युत् भारित अणू, रेणू वा अणुगट निर्माण करणाऱ्या) कणांचा तीव्र चुंबकीय क्षेत्रात ठेवलेल्या बाष्पकोठीच्या [कण अभिज्ञातक] साहाय्याने अभ्यास करण्यास सुरुवात केली.


आयनकारक कणांमुळे बाष्पकोठीत तयार झालेल्या मार्गांचे चुंबकीय क्षेत्रामुळे होणाऱ्या विचलनाच्या (बदलाच्या) दिशेचे निरीक्षण करून अँडरसन यांना त्या कणावरील विद्युत् भाराचे चिन्ह ठरविणे शक्य झाले. १९३२ च्या सुमारास त्यांना विश्व किरणांमध्ये नेहमीच्या (ऋण विद्युत् भारित) इलेक्ट्रॉनाशिवाय धन विद्युत् भारित इलेक्ट्रॉन असतात, याचा निर्णायक पुरावा मिळाला. या नवीन कणाला ‘पॉझिट्रॉन’ असे नाव देण्यात आले. 


डिरॅक यांनी आपल्या इलेक्ट्रॉन-सिद्धांतामध्ये या प्रकारच्या कणाचे भाकीत केलेले होते, परंतु प्रत्यक्षात यापूर्वी या कणांचे निरीक्षण झालेले नव्हते. या शोधाकरिता अँडरसन यांना १९३६ मध्ये व्हिक्टर हेस या विश्वकिरणांसंबंधी मूलभूत संशोधन केलेल्या दुसऱ्या शास्त्रज्ञांबरोबर नोबेल पारितोषिक विभागून देण्यात आले. १९३७ मध्ये विश्वकिरणांसंबंधी संशोधन करीत असताना त्यांनी व नेडरमेयर यांनी मेसॉन या मूलकणाचा शोध लावण्यात यश मिळविले .

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

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संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

श्रावण मास,कृष्ण पक्ष, *एकादशी*,पुनर्वसु नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,वर्षा ऋतु,युगाब्ध ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

शुक्रवार, ०३ सप्टेंबर २०२१.

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                        *प्रभात दर्शन*

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          *"एक दिन हम सबको इस कारण से खो देंगे, कि कोई हमे याद नही करता तो हम किसी को याद क्यों करें। रिश्ते अनमोल होते हैं, उनका सम्मान कीजिये। ये वो अनमोल रत्न है, जो बाजार में नही बिकते।"*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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बुधवार, १ सप्टेंबर, २०२१

गाथा बलिदानाची

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*🇮🇳🇮🇳गाथा बलिदानाची🇮🇳🇮🇳*

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       🇮🇳 🛐☮👳🏻☮🛐🇮🇳


    *शिख समुदायाचे चौथे गुरु*

              *गुरु राम दास*


     जन्म : २४ सप्टेंबर १५३४

(चुना मंडी, लाहोर , पंजाब , मोगल साम्राज्य (सध्याचा पाकिस्तान )


*निधन : ०१ सप्टेंबर, १५८१* 

               (वय ४६)

(गोइंदवाल , मोगल साम्राज्य (सध्याचा भारत )


धर्म : शीख धर्म

जोडीदार : बीबी भानी

मुले : बाबा पृथ्वी चंद, बाबा महान देव, आणि गुरु अर्जन

पालक : हरी दास आणि 

             माता दया  कौर

साठी प्रसिद्ध : अमृतसर शहराचे 

                      संस्थापक 

जन्मनाव : जेठा

इतर नावे : चौथा गुरु

व्यवसाय : गुरू

धार्मिक कारकीर्द

पूर्ववर्ती : गुरु अमर दास

उत्तराधिकारी : गुरु अर्जन


            वयाच्या १२ व्या वर्षी भाई जेठा आणि त्याची आजी गोईंदवळला गेले आणि तेथे त्यांनी गुरु अमर दास यांची भेट घेतली. त्यानंतर त्या मुलाने गुरु अमर दास यांना आपले गुरू म्हणून स्वीकारले आणि त्यांची सेवा केली. गुरू अमर दास यांच्या कन्येने भाऊ जेठाशी लग्न केले आणि त्यामुळे ते गुरु अमर दास यांच्या कुटूंबाचा भाग बनले. शीख धर्माच्या पहिल्या दोन गुरूंप्रमाणेच गुरु अमर दास यांनी स्वतःची मुले निवडण्याऐवजी भाई जेठाला त्याचा उत्तराधिकारी म्हणून निवडले आणि त्याचे नाव राम दास किंवा "देवाचा सेवक किंवा गुलाम" असे ठेवले. 


१५७४  मध्ये राम दास शीख धर्माचे गुरू बनले आणि १५८१ मध्ये मृत्यू होईपर्यंत शीख नेते म्हणून काम केले. अमर दासच्या मुलांकडून त्याला शत्रुत्वाचा सामना करावा लागला, गुरू-चाक म्हणून ओळखल्या जाणा-या अमर दासांनी त्यांची अधिकृत जागा स्थलांतरित केली. हे नव्याने प्रस्थापित शहर रामदासपूर हे नाव असून ते पुढे विकसित झाले व त्याचे नाव बदलून अमृतसर - शीख धर्माचे सर्वात पवित्र शहर असे नाव पडले. शीख चळवळीतील धार्मिक व आर्थिकदृष्ट्या पाठिंबा देण्यासाठी लिपिक नेमणुका आणि देणगी संकलनासाठी मांजी संघटनेचा विस्तार केल्याबद्दल शिख परंपरेतही त्यांचे स्मरण आहे. त्याने स्वत:च्या मुलाला त्याचा उत्तराधिकारी म्हणून नियुक्त केले आणि वंशजांशी संबंधित नसलेल्या पहिल्या चार गुरूंच्या विपरीत, दहाव्या शीख गुरुंपैकी पाचवे रामदासांचे थेट वंशज होते.


*चरित्र*

गुरु राम दास यांचा जन्म लाहोर (आता पाकिस्तानचा भाग) चूना मंडी येथील सोधी खत्री कुटुंबात झाला होता. त्यांचे वडील हरी दास आणि आई दया करबोथ होते. त्यापैकी त्यांचे वडील सात वर्षांचे असताना निधन झाले. त्याच्या आजीनेच त्याचे पालनपोषन केले. त्याने अमर दासची धाकटी मुलगी बीबी भानीशी लग्न केले. त्यांना पृथ्वी चांद, महादेव आणि गुरु अर्जन हे तीन मुलगे होते.


*मृत्यू आणि वारसा*


गुरु राम दास यांचे ०१ सप्टेंबर १५८१ रोजी पंजाबच्या गोविंदवल शहरात निधन झाले . 

त्याच्या तीन मुलांपैकी, राम दासांनी पाचवा शीख गुरु म्हणून त्याच्यानंतर सर्वात धाकटा अर्जन याला निवडले. उत्तराधिकारी म्हणून निवड केल्यामुळे शीख गुरूच्या उत्तरादाखल बहुतेक इतिहासात शिखांमध्ये वाद आणि अंतर्गत मतभेद निर्माण झाले. राम दास यांचा मोठा मुलगा पृथ्वी चंद हे सिख परंपरेत जबरदस्तीने अर्जनला विरोध म्हणून ओळखले जाते आणि यामुळे एक गटातील शीख समाज निर्माण झाला ज्यास अर्जनच्या अनुयायी शिखांनी मिनास (शब्दशः "घोटाळे") म्हणून संबोधले आणि त्यांनी प्रयत्न केल्याचा आरोप आहे. तरुण हरगोबिंद यांची हत्या करणे . तथापि, पृथ्वी चंद यांनी लिहिलेल्या वैकल्पिक प्रतिस्पर्धी ग्रंथांमुळे शीख गटाने वेगळीच कथा मांडली, हरगोबिंद यांच्या जीवनावरील या स्पष्टीकरणाला विरोध केला आणि रामदासांचा मोठा मुलगा त्याच्या धाकट्या भावाच्या अर्जनला समर्पित केले. प्रतिस्पर्धी ग्रंथ मतभेद मान्य करतात आणि पृथ्वी चंद यांचे वर्णन गुरु अर्जुन देव यांच्या शहादत नंतर साहिब गुरु झाल्याचे आणि रामदास यांचे नातू गुरु हरगोबिंद यांच्या उत्तरादाखल विवादास्पद होते.


*प्रभाव*


राम दास यांना शीख परंपरेने पवित्र अमृतसर शहर स्थापण्याचे श्रेय दिले जाते. राम दास ज्या भूमीत स्थायिक झाले त्या भूमिकेविषयी कथा दोन आवृत्त्या आहेत. एका गॅझेटियर रेकॉर्डवर आधारित, तुंग गावच्या मालकांकडून ही जमीन शीख देणगीने खरेदी केली गेली.


शीख ऐतिहासिक अभिलेखानुसार, राम अमरदास यांनी या जागेची निवड केली आणि त्याला गुरु दा चाक म्हटले, कारण त्याने मध्यभागी असलेल्या माणसाने तलाव असलेले नवीन शहर सुरू करण्यासाठी जमीन शोधण्यास सांगितले. सन १५७४ मध्ये आपला राज्याभिषेक, आणि  रामदासपूर म्हणून गावाची स्थापना केली. त्याने तलाव पूर्ण करून आणि त्याचे नवीन अधिकृत गुरू केंद्र आणि त्याच्या शेजारी घर बनवून सुरुवात केली. त्यांनी भारतातील इतर भागांतील व्यापारी आणि कारागीरांना आपल्याबरोबर नवीन शहरात स्थायिक होण्यासाठी आमंत्रित केले. देणग्याद्वारे वित्तपुरवठा व ऐच्छिक कार्याद्वारे बांधण्यात आलेल्या अर्जनाच्या काळात शहराचा विस्तार झाला. हे शहर अमृतसर शहर बनू लागले आणि त्याच्या पुत्राने गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब बांधल्यानंतर आणि १६०४ मध्ये नवीन मंदिरात शीख धर्माची स्थापना केल्यावर तलावाचे क्षेत्र मंदिराच्या आवारात वाढले.

 दरम्यानच्या बांधकामात क्रियाकलाप महिमा प्रकाश वर्तक , मध्ये लिहिलेला अर्ध-ऐतिहासिक शीख हागीग्राफी आणि सर्व दहा गुरूंच्या जीवनाशी संबंधित सर्वात प्राचीन दस्तऐवजात वर्णन केलेला आहे.


*शास्त्र स्तोत्र*

राम दास यांनी गुरु ग्रंथ साहिबमध्ये ६३ स्तोत्र किंवा सुमारे दहा टक्के स्तोत्रांची रचना केली . ते एक प्रख्यात कवी होते आणि त्यांनी भारतीय शास्त्रीय संगीताच्या प्राचीन रागांमध्ये त्यांची रचना केली.

यात अनेक विषयांचा समावेश आहे:

जो स्वतःला गुरूचा शिष्य म्हणवितो त्याने सकाळ होण्यापूर्वी उठून परमेश्वराच्या नावाचा अभ्यास केला पाहिजे. पहाटेच्या वेळी, त्याने उठून स्नान केले पाहिजे आणि अमृत पाण्याच्या टाकीमध्ये आपला आत्मा स्वच्छ केला पाहिजे. या प्रक्रियेद्वारे तो खरोखरच आपल्या आत्म्याची पापे धुवून घेतो. 


देवाच्या नावाने माझे हृदय आनंदाने भरले. देवाच्या नावाचे चिंतन करणे हे माझे मोठे भविष्य आहे. देवाच्या नावाचा चमत्कार परिपूर्ण गुरुद्वारे प्राप्त होतो, परंतु केवळ एक दुर्मिळ आत्मा गुरुच्या शहाणपणाच्या प्रकाशात चालतो.


ओ मनुष्य! अभिमानाचे विष, तुला ठार मारत आहे आणि तुला देवाकडे डोळे देईल. आपले शरीर, सोन्याचा रंग, स्वार्थाने खराब झाला आहे आणि त्यास अस्पष्ट केले आहे. ग्रेडरचे भ्रम काळा होतात, परंतु अहंकार-वेड त्यांच्याशी जोडलेले आहे. 


-  गुरु ग्रंथ साहिब, जी.एस. मानसुखानी यांनी अनुवादित केले 


 शीख धर्माच्या हरिमंदिर साहिब ( सुवर्ण मंदिर ) मध्ये दररोज त्याच्या रचना गायल्या जातात . 


*विवाह भजन*


राम दास यांनी आपल्याच मुलीच्या लग्नासाठी लग्नगीत तयार केले होते. राम दास यांनी केलेल्या लावण स्तोत्रातील प्रथम श्लोक म्हणजे गुरुचे वचन मार्गदर्शक म्हणून स्वीकारणे, ईश्वरी नामाचे स्मरण करणे हा गृहस्थांच्या जीवनातील कर्तव्याचा संदर्भ आहे. दुसरा श्लोक आणि वर्तुळ एकवचनी सर्वत्र आणि स्वत: च्या खोलीत आढळतो याची आठवण करून देतो. तिसरा दिव्य प्रेमाबद्दल बोलतो. चौथे स्मरण करून देतो की दोघांचे मिलन म्हणजे असीम असलेल्या व्यक्तीचे मिलन होय. 


*मसंद सिस्टम*

मसंद यांनी गुरूपासून दूर राहणाऱ्या शिख नेते व  लांबच्या मंडळी, त्यांच्यात आपसी संवाद व्हावा व शीख उपक्रम आणि मंदिर इमारत निधी गोळा करण्यासाठी काम केले. या संस्थात्मक संघटनेने नंतरच्या दशकांमध्ये शीख धर्म वाढण्यास प्रसिद्धी दिली, परंतु नंतरच्या गुरूंच्या काळात, भ्रष्टाचार आणि वारसदारांच्या वादांच्या वेळी प्रतिस्पर्धी शीख चळवळींना वित्तपुरवठा करण्याच्या गैरवापरांमुळे ती बदनाम झाली. 🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

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संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

श्रावण मास,कृष्ण पक्ष, *दशमी*,मृगशिरा नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,वर्षा ऋतु,युगाब्ध ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

बुधवार, ०१ सप्टेंबर २०२१.

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                        *प्रभात दर्शन*

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*सबकी अपनी अपनी सोच है...*


   *कुछ लोग रावण में भी गुण देख लेते हैं, और कुछ राम में भी दोष ढूंढ लेते हैं।*


        *दोष किसी का भी नही है, ये तो मात्र इस बात पर निर्भर है कि हमारे माता ने हमें क्या संस्कार दिए हैं अर्थात हमारा लालन-पालन किस वातावरण और संस्कारों के बीच हुआ है।"*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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सोमवार, ३० ऑगस्ट, २०२१

बाळाची वाढ व विकास


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   *📒📒📒 @ संकलन @📒📒📒*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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               🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📕 *बाळाची वाढ व विकास व्यवस्थित आहे वा नाही, हे कसे ओळखावे ?* 


बन्याचदा आईवडिलांना आपल्या मुलाच्या वाढीविषयी चिंता वाटत असते तो नीट खात नाही वा अमुकच करतो, अशा तक्रारी ते करत असतात. मुलाची वाढ व विकास व्यवस्थित आहे वा नाही, हे कसे ओळखायचे? हा पालकांपुढील महत्त्वाचा प्रश्न असतो. ५ वर्षापर्यंतच्या वयाच्या मुलाच्या वाढीचा त्याचे वजन हा उत्तम निदर्शक असतो. "Road to health" नावाचे तक्ते उपलब्ध असतात. यात दर महिन्याला मुलाचे वजन नोंदवण्याची सोय असते. मुलांच्या अपेक्षित वजनाच्या हिशोबाने तक्त्यावर एक 'आरोग्य पथ' दाखवलेला असतो. आपल्या बाळाचे वजन त्या आरोग्य पथावर असेल तर मुलाची वाढ चांगली आहे, असे समजावे. हा तक्ता असा असतो.


मुलाचा विकास योग्य आहे वा नाही, हे खालील निकषांवरून तपासून पाहता येईल. 


तीन महिने - आईकडे बघून ओळखीचे हसते.


चार महिने - मान पूर्णपणे सावरू शकते.


सहा-सात महिने - बसायला लागते.


नऊ ते दहा महिने - रांगायला लागते.


पंधरा महिने - बाबा, दादा असे बोलू लागते.


अडीच वर्षे - स्वतंत्रपणे चालू लागते. संडासवर नियंत्रण येते.


दोन ते अडीच वर्षे - छोटी वाक्य बोलते.


तीन ते साडेतीन वर्षे - लघवीवर नियंत्रण येते.


या विकासाच्या टप्यांवरून मूल योग्य प्रकारे वाढते आहे वा नाही, हे तपासता येईल. अर्थात वाढ व विकास यात मुलामुलांमध्ये थोडाफार फरक पडू शकतो, हे लक्षात ठेवणे आवश्यक आहे. एखाद्या मुलामध्ये विकासाचे सर्वच


टप्पे उशीरा गाठले जात असतील, तर मात्र संपूर्ण तपासण्या करून घेणे गरजेचे आहे.


*डाॅ.अंजली दिक्षित व डाॅ.जगन्नाथ दिक्षित*

*यांच्या 'मेडिकल जनरल नॉलेज' पुस्तकातून*

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कान का? खाजतात


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   *📒📒📒 @ संकलन @📒📒📒*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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               🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📕 *कान का खाजतात ?* 📕


सार्वजनिक ठिकाणी कानात बोट घालून कान गदागदा हलवणारे किंवा कानात काड्या घालून तल्लीन कान कोरणारे महाभाग तुम्ही पाहिले असतील. कान कोरडा पडला २ थोडीफार खाज येऊ शकते. ही खाज आपोआपच कमी होते; परंतु कानाच्या रोगांमध्ये मात्र खाज सारखीच येत राहते व उपचार केल्याशिवाय कमी होत नाही. पावसाळ्यात, दमट वातावरणात किंवा पोहणाऱ्या व्यक्तींमध्ये कर्णपथात (Auditory canal) बुरशीचा संसर्ग होऊ शकतो. अॅस्परजीलस, नायगर व कँडीडा अल्बीकन्स या बुरशींमुळे होणाऱ्या संसर्गात कान खाजतात व बहिरेपणाही येतो. कानाची तपासणी केल्यास कर्णपथात काळपट वा विटकरी काळपट रंगाची घाण जमा झालेली दिसते. ओल्या वर्तमानपत्राच्या बोळ्यासारखा रंग त्या घाणीला येतो.


कानातील घाण वारंवार काढून टाकणे, पुसून घेणे, सॅलीसिलिक अॅसिड कर्णपथात लावणे, निस्टॅटीनसारखे बुरशीनाशक वापरणे अशा विविध उपायांनी हा रोग पूर्णपणे आटोक्यात येतो. कानावर अॅलर्जीमुळे किंवा जंतूसंसर्गामुळे फोड आले, तरीही कान सुरुवातीच्या काळात अथवा फोड फुटून खपली येण्याच्या काळात खाजतात. यावर अॅलर्जी व जंतुसंसर्गावरील उपचार करावे लागतात.


*डाॅ.अंजली दिक्षित व डाॅ.जगन्नाथ दिक्षित*

*यांच्या 'मेडिकल जनरल नॉलेज' पुस्तकातून*

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ताराबाई मोडक यांची पुण्यतिथी

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*३१ ऑगस्ट - बालशिक्षणाची माता ताराबाई मोडक यांची पुण्यतिथी*

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जन्म - १९ एप्रिल १८९२ (मुंबई)

*स्मृती - ३१ ऑगस्ट १९७३*


बालशिक्षणाची माता ताराबाई मोडक यांची आज पुण्यतिथी.


ताराबाई मोडक या माहेरच्या ताराबाई केळकर.

आपल्या भारतभूमीत बालशिक्षणाची माता म्हणवून घेण्याचा गौरव पद्मभूषण स्व.ताराबाई मोडक यांनी प्राप्त केला. १९२३ मध्ये गिजुभाई बधेका यांच्या साहाय्याने भावनगर येथे montysarichya तत्वावर आधारलेली शिक्षणपद्धती त्यांनी निश्चित केली. 


मुलांच्या बालवयातच शिक्षणाचा खरा पाया घातला जाण्याची शक्यता व आवश्यकता  असते. यादृष्टीने त्यांनी पूर्वप्राथमिक विभागात शिक्षणात नवीन पाऊल टाकले. १९२६ साली नूतन बालशिक्षण संघाची स्थापना केली. मुंबई-दादरच्या हिंदू कॉलनीत त्यांनी शिशुविहार नावाची संस्था स्थापन करून बालशिक्षणाचे प्रसारकार्य केले. या संस्थेने पुढे पूर्व प्राथमिक अध्यापन मंदिर सुरु केले. यातून मराठी आणि गुजराती दोन्ही भाषांच्या हजाराहून अधिक शिक्षक शिक्षकांचे प्रशिक्षण केले. मराठी शिक्षणपत्रिका त्यांनीच सुरु केली. 


ताराबाईनी १९३३ जूनचा शिक्षणपत्रिकेचा पहिला अंक प्रकाशित केला. तत्पूर्वी त्या गुजराती शिक्षण पत्रिकेत १० वर्षे लिहित होत्या. बालकांसाठी त्यांनी विपुल लेखन लिहिले. परंतु पालक शिक्षक यांच्या साठीही विपुल लिहिले.१९४५ मध्ये ताराबाईनी बोर्डी (जि.ठाणे) येथे ग्राम बाल शिक्षा केंद्र स्थापिले. आदिवासी मुलांच्या अडचणी लक्षात घेवून त्यांनी १९५३ मध्ये नवीन उपक्रम सुरु केला. 


१९५७ मध्ये बोर्डी येथील ग्राम बालशिक्षा केंद्र कोसबाड येथे  हलविण्यात आले. येथे आदिवासी मुलांसाठी कुरणशाळा, रात्रीची शाळा ,व्यवसाय शिक्षण हे पूरक प्रकार प्राथमिक स्वरुपात सुरु करण्यात आले. १९६२ मध्ये त्यांना भारत सरकारने त्यांच्या शिक्षणक्षेत्रातील कार्याबद्दल पद्मभूषण हा किताब देवून गौरविले. आजही महाराष्ट्रात त्यांचे कार्य ग्राम शिक्षा केंद्र विकासवाडी, कोसबाडहिल जि.ठाणे येथे चालू आहे. ताराबाईच्या पश्चात स्व. अनुताई वाघ यांनी कार्य प्रज्वलित ठेवले. 


मा.ताराबाई मोडक यांचे निधन ३१ ऑगस्ट १९७३ रोजी झाले.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -) गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

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प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

श्रावण मास,कृष्ण पक्ष, *नवमी*,रोहिणी नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,वर्षा ऋतु,युगाब्ध ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

मंगलवार, ३१ आॕगष्ट २०२१.

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                        *प्रभात दर्शन*

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अष्टौ गुणा: पुरुषं दीपयन्ति

           प्रज्ञासुशीलत्वदमौ श्रुतं च,

 पराक्रमश्चा बहुभाषिता च

          दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥


*भावार्थः - आठ गुण पुरुष को सुशोभित करते हैं - तीक्ष्ण बुद्धि, उत्कृष्ट चरित्र, आत्म-नियंत्रण, शास्त्र-अध्ययन, साहस, कई भाषाओं का ज्ञान, यथाशक्ति दान और कृतज्ञता।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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गुरुवार, २६ ऑगस्ट, २०२१

बाळाची वाढ


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   *📒📒📒 @ संकलन @📒📒📒*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 



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               🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📕 *बाळाची वाढ व विकास व्यवस्थित आहे वा नाही, हे कसे ओळखावे ?* 


बन्याचदा आईवडिलांना आपल्या मुलाच्या वाढीविषयी चिंता वाटत असते तो नीट खात नाही वा अमुकच करतो, अशा तक्रारी ते करत असतात. मुलाची वाढ व विकास व्यवस्थित आहे वा नाही, हे कसे ओळखायचे? हा पालकांपुढील महत्त्वाचा प्रश्न असतो. ५ वर्षापर्यंतच्या वयाच्या मुलाच्या वाढीचा त्याचे वजन हा उत्तम निदर्शक असतो. "Road to health" नावाचे तक्ते उपलब्ध असतात. यात दर महिन्याला मुलाचे वजन नोंदवण्याची सोय असते. मुलांच्या अपेक्षित वजनाच्या हिशोबाने तक्त्यावर एक 'आरोग्य पथ' दाखवलेला असतो. आपल्या बाळाचे वजन त्या आरोग्य पथावर असेल तर मुलाची वाढ चांगली आहे, असे समजावे. हा तक्ता असा असतो.


मुलाचा विकास योग्य आहे वा नाही, हे खालील निकषांवरून तपासून पाहता येईल. 


तीन महिने - आईकडे बघून ओळखीचे हसते.


चार महिने - मान पूर्णपणे सावरू शकते.


सहा-सात महिने - बसायला लागते.


नऊ ते दहा महिने - रांगायला लागते.


पंधरा महिने - बाबा, दादा असे बोलू लागते.


अडीच वर्षे - स्वतंत्रपणे चालू लागते. संडासवर नियंत्रण येते.


दोन ते अडीच वर्षे - छोटी वाक्य बोलते.


तीन ते साडेतीन वर्षे - लघवीवर नियंत्रण येते.


या विकासाच्या टप्यांवरून मूल योग्य प्रकारे वाढते आहे वा नाही, हे तपासता येईल. अर्थात वाढ व विकास यात मुलामुलांमध्ये थोडाफार फरक पडू शकतो, हे लक्षात ठेवणे आवश्यक आहे. एखाद्या मुलामध्ये विकासाचे सर्वच


टप्पे उशीरा गाठले जात असतील, तर मात्र संपूर्ण तपासण्या करून घेणे गरजेचे आहे.


*डाॅ.अंजली दिक्षित व डाॅ.जगन्नाथ दिक्षित*

*यांच्या 'मेडिकल जनरल नॉलेज' पुस्तकातून*

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सिझेरीयन म्हणजे काय?


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   *📒📒📒 @ संकलन @📒📒📒*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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               🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📕 *सिझेरियन म्हणजे काय* 📕


"सिझेरीयन झाले शेवटी", "सिझेरीयनशिवाय गत्यंतर नाही, असे डॉक्टर म्हणाले" अशी वाक्ये मॅटर्निटी हॉस्पिटलमध्ये वारंवार ऐकू येतात. बाळंतपणासाठी गेलेली स्त्री सात-आठ दिवस बिछान्यावर पडून असते. नंतर टाके काढल्यानंतर तिला घरी जाऊ देतात. एकूण सिझेरीयन व बाळंतपण यांचा संबंध आहे, हे आपल्या लक्षात आले असेल.


९५% प्रसूती नैसर्गिकरित्या होतात. म्हणजेच मातेच्या योनीमार्गातून बाळ बाहेर येते. काही वेळा मात्र योनीमार्गातून बाळ बाहेर येणे शक्य नसते. बाळाचे डोके मोठे असते वा मातेच्या कमरेच्या हाडांच्या ज्या पोकळीतून बाळ बाहेर येते ती पोकळी खूप लहान असते. कधी माता बाळंतपणाच्या कळा घेऊ शकत नाही. कधी तिचे पूर्वी सिझेरीयन झालेले असते. या सर्व कारणांमुळे योनीमार्गातून मुलाचा नैसर्गिकरित्या जन्म न होता ते पोटातून काढावे लागते. प्रथम ओटीपोटीवर छेद घेऊन नंतर गर्भाशयाचा छेद घेतल्यानंतर काही क्षणांतच बाळ बाहेर काढले जाते. एकदा मूल बाहेर आले की, मग त्याची काळजी नैसर्गिकरित्या जन्माला आलेल्या मुलाप्रमाणेच घेतली जाते.


आजकाल सिझेरीयनचे प्रमाण वाढत चाललेले दिसते. डॉक्टरी व्यवसायातील धंदेवाईकपणा, हे याचे एक कारण असले तरी, वेदना सहन न करण्याकडे असलेला आधुनिक स्त्रियांचा कल, पूर्वीसारखी घरगुती कामे (बसून कपडे धुणे, सारवणे आणि बरीच इतर शारीरिक कष्टाची कामे) करावी न लागल्याने कमी होऊ लागलेली गर्भाशयाच्या स्नायूंची शक्ती ही कारणे देखील दुर्लक्षण्याजोगी नाहीत. त्यामुळे बऱ्याचदा स्त्रिया स्वतः होऊनच सिझेरीयन करायची विनंती डॉक्टरांना करतात. वेदनेशिवाय, कळांशिवाय मातृत्व ही कल्पनाच करणे योग्य नाही. सिझेरीयनचे दुष्परिणामही होऊ शकतात. ही शस्त्रक्रिया असल्याने भूल देण्यातील धोके, शस्त्रक्रियेत होणारे उपद्रव, जंतु संसर्गाची भीती असतेच. शिवाय साध्या बाळंतपणापेक्षा खर्चही ५-६ पट अधिक येतो.


बाळाला दूध पाजणेही ४-६ तास (स्त्री शुद्धीवर येईपर्यंत) उशीरा सुरू होते. तसेच एकदा सिझेरीयन झाले की, बरेचदा पुढच्या बाळाच्या वेळीही सिझेरीयनच करावे लागते. या सर्व बाबी लक्षात घेता मातांनी सहनशीलता दाखवून, सिझेरीयन टाळता येईल तेवढे टाळण्याचा प्रयत्न करावा.


*डाॅ.अंजली दिक्षित व डाॅ.जगन्नाथ दिक्षित*

*यांच्या 'मेडिकल जनरल नॉलेज' पुस्तकातून*

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लाँर्ड माउंटबँटन यांची आज स्मृतिदिन

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*२७ ऑगस्ट - लॉर्ड माउंटबॅटन स्मृतिदिन*

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जन्म - २५ जून १९०० (UK)

*स्मृती - २७ ऑगस्ट १९७९* (आयर्लंड)


लॉर्ड माउंटबॅटनच्या कार्यकाळादरम्यान १५ ऑगस्ट १९४७ रोजी भारत देशाला ब्रिटिश सत्तेपासून स्वातंत्र्य मिळाले. त्यानंतर पुढील एक वर्ष तो भारतीय अधिराज्याचा पहिला गव्हर्नर-जनरल होता.


लॉर्ड  माउंटबॅटन हा भारतातील शेवटचा ब्रिटिश व्हॉइसरॉय आणि स्वतंत्र भारताचा पहिला गव्हर्नर जनरल. त्यांचे पूर्ण नाव लूई फ्रान्सिस ॲल्बर्ट व्हिक्टर निकोलस ऑफ बॅटनबर्ग.


लॉर्ड माउंटबॅटन हा प्रिन्स लूई ऑफ बॅटनबर्ग (१८५१–१९२४) यांचा धाकटा मुलगा. प्रिन्स लूई १८६२ पासून ब्रिटिश नौदलामध्ये होते. स्वकर्तृत्वावर त्यांनी डिसेंबर १९१२ मध्ये ब्रिटिश नौदलामध्ये प्रमुखपद मिळविले पहिल्या महायुद्धाला तोंड फुटल्यानंतर ब्रिटिश नौदलाला पुरेसे यश मिळविता आले नाही. त्यामुळे प्रिन्स लूई यांच्यावर टीका होऊ लागली. बॅटनबर्ग ह्या जर्मन नावामुळे आणि लहानपण ऑस्ट्रियामध्ये गेलेले असल्यामुळे त्यांच्या राष्ट्रप्रेमा विषयी शंका घेतली जाऊ लागली. म्हणून ऑक्टोबर १९१४ मध्ये त्यांना नौदलप्रमुखपद सोडावे लागले. जर्मन द्वेषाची ही लाट पुढेही टिकून राहिल्याने राजाने आणि राजघराण्याशी संबंधितांनी आपली जर्मन नावे बदलावीत, असे शासनाने १९१७ मध्ये सुचविले. प्रिन्स लूई यांनी व्हिक्टोरिया राणीच्या नातीशी विवाह केल्यामुळे १९१७ मध्ये ते माउंटबॅटन बनले.


लूई (डिकी) माउंटबॅटन वयाच्या तेराव्या वर्षीच ऑझ्‌बर्न येथील रॉयल नेव्हल कॉलेजात दाखल झाले. जुलै १९१६ मध्ये त्यांनी प्रत्यक्ष नौदलात कॅडेट म्हणून प्रवेश केला. पुढे नौदलात त्यांना जे जे पद मिळाले, त्यावर आपल्या स्वकर्तृत्वाचा ठसा उमटविला. मुख्यतः नौदलातील संदेशवहन आणि दूरसंदेश ह्यांचा त्यांनी विशेष अभ्यास केला. दुसरे महायुद्ध सुरू झाले, तेव्हा ‘केली’ (Kelly) ह्या जहाजाचा कॅप्टन म्हणून माउंटबॅटन काम पहात असत. युद्धात ते जहाज निकामी झाल्यानंतर काही काळ त्यांनी इलस्ट्रियस ही विमानवाहू नौका सांभाळली. येथून पुढे त्यांच्या उत्कर्षाला खऱ्या अर्थाने प्रारंभ झाला.


पंतप्रधान विन्स्टन चर्चिल ह्यांनी १९४१ मध्ये तिन्ही सेनादलांच्या संयुक्त हालचालींचे सूत्रधार म्हणून माउंटबॅटनना नेमले. ह्या काळात यूरोपातील त्यांच्या कर्तृत्वाचा आणि संघटना-कौशल्याचा प्रभाव अमेरिकेचे अध्यक्ष फ्रॅन्क्लिन रुझव्हेल्ट यांच्यावर पडला. त्यामुळेच पुढे १९४३ मध्ये दक्षिणपूर्व (आग्नेय) आशियामधील दोस्त राष्ट्रांच्या सैन्याने सुप्रीम कमांडर म्हणून माउंटबॅटन यांची नेमणूक केली. 


आग्नेय आशियामध्ये दोस्त राष्ट्रांचे सैन्य सगळीकडे पराभूत होत होते. त्यावेळी माउंटबॅटननी सैन्यामध्ये विश्वास निर्माण करून त्याचे धैर्य वाढविले. त्याच प्रमाणे भर पावसाळ्यात ब्रह्मदेशात जपानच्या सैन्याशी मुकाबला करण्याची महत्त्वाकांक्षी योजना राबविली. त्यामुळे आग्नेय आशियातील दोस्त राष्ट्रांच्या सैन्याची प्रतिमा खूपच उंचावली. मात्र ह्या युद्धात निर्णायक विजय मिळविण्याची त्यांची योजना पूर्ण झाली नाही कारण दोस्त राष्ट्रांनी अणुबॉम्बचा वापर करून युद्ध संपविण्याचा निर्णय घेतला. तरीही सिंगापूरमध्ये जपानी सैन्याची शरणागती माउंटबॅटननीच स्वीकारली. 


यशस्वी सेनानी म्हणून त्यांनी स्वतःचा ठसा उमटविला. त्याचबरोबर बह्मदेश, सिंगापूर आणि इतर प्रदेशांच्या रहिवाशांशीही त्यांनी चांगले संबंध निर्माण केले. पश्चिमी साम्राज्यशाहीखाली असलेल्या देशांमध्ये युद्धानंतर राष्ट्रवादाला निर्णायक रूप आले आणि तेथील राष्ट्रवादी चळवळी प्रखर बनल्या. या चळवळींकडे पाहण्याचा माउंटबॅटन यांचा दृष्टिकोन उदार आणि समंजस होता. १९२० ते १९४५ या कालखंडात भारतात राष्ट्रवादी आंदोलन देशव्यापी झाले.


माउंटबॅटन यांच्या या उदार दृष्टिकोणामुळे महायुद्धानंतर निवडून आलेल्या क्लेमंट ॲटलींच्या मजूर पक्षाच्या शासनाने माउंटबॅटनना भारताचे व्हाइसरॉय म्हणून पाठविण्याचा निर्णय १९४७ मध्ये घेतला. सेनानी म्हणून यशस्वी ठरलेल्या माउंटबॅटनवर शासनप्रमुख होण्याची आणि भारतातील ब्रिटिश राजवट संपुष्टात आणण्याची जबाबदारी पडली. 


मार्च १९४७ मध्ये माउंटबॅटन भारतात आले. ह्यावेळेस भारतातील परिस्थिती अत्यंत स्फोटक होती. हिंदु-मुस्लिम तणावांनी अत्यंत गंभीर स्वरूप धारण केले होते. नौदलाचे बंड (१९४६), भारत छोडो आंदोलन आणि दुसऱ्या महायुद्धाचा ब्रिटनला बसलेला फटका यांमुळे भारतावर फार काळ नियंत्रण ठेवणे शक्य नाही, ह्याची जाणीव मजूर पक्षाच्या शासनाला झाली होती. म्हणूनच स्टॅफर्ड क्रिप्स-योजना व त्रिमंत्रि-योजना अयशस्वी झाल्यानंतरही ब्रिटिशांनी भारताला लवकरात लवकर स्वातंत्र्य देण्याचा निर्णय घेतला. माउंटबॅटन यांनी भारतातील जबाबदारी स्वीकारण्यापूर्वी ॲटलींच्या मागे लागून जून १९४८ पूर्वी स्वातंत्र्य देण्यात येईल, अशी घोषणा करवून घेतली.


प्रत्यक्षात स्टॅफर्ड क्रिप्स यांची आणि नंतरची त्रिमंत्रि-योजना ह्यांच्यावरील चर्चेतून काँग्रेस आणि मुस्लिम लीग एकत्र येणे अशक्य आहे, हे स्पष्ट झाले होते आणि फाळणीची अपरिहार्यता बहुतेक काँग्रेसने स्वीकारली होती. माउंटबॅटन यांनी प्रत्येक नेत्याशी स्वतंत्रपणे प्रदीर्घ चर्चा करून जवळजवळ सर्वच नेत्यांचा विश्वास संपादन केला. 


आकर्षक व्यक्तिमत्त्व, थंड डोक्याने युक्तिवाद करण्याची शैली, भारताच्या प्रश्नाबद्दलची कळकळ आणि इतर कोणत्याही व्हॉइसरॉयच्या तुलनेने माउंटबॅटन यांना मिळालेले विशेष अधिकार, यांमुळे त्यांना झटपट निर्णय घेणे शक्य झाले. 


भारतातील चिघळणारी परिस्थिती लक्षात घेऊन ३ जून १९४७ रोजी त्यांनी १५ ऑगस्ट १९४७ रोजी भारतास स्वातंत्र्य देण्याची घोषणा केली. इतक्या अल्प-मुदतीचे दडपण आल्याने काँग्रेस आणि लीगच्या नेत्यांना फाळणीच्या योजनेबद्दल शब्द फिरविता येणार नाही, अशी त्यांची अटकळ होती. फाळणी अटळ आहे, असे मत बनल्यानंतर अत्यंत धूर्तपणे, मुत्सद्देगिरीने आणि कार्यक्षम रीतीने त्यांनी संपूर्ण योजना राबवून १४ ऑगस्ट १९४७ रोजी स्वतंत्र पाकिस्तान आणि १५ ऑगस्ट १९४७ रोजी स्वतंत्र भारत जाहीर करून सत्तांतर घडवून आणले. हे करीत असतानाच दोन्ही स्वतंत्र राष्ट्रे ब्रिटिश राष्ट्रकुलातच रहावीत, ह्यासाठी त्यांनी यशस्वीपणे प्रयत्न केले.


काँग्रेस नेत्यांचा त्यांनी एवढा विश्वास संपादन केला, की स्वतंत्र भारताचे गव्हर्नर जनरल म्हणून काम पाहण्याची जबाबदारी त्यांच्यावरच टाकली गेली (ऑगस्ट १९४७ - जून १९४८). भारताच्या फाळणीबद्दल माउंटबॅटन ह्यांची भूमिका नंतर वादाचा विषय झाली असली, तरी त्यांचे भारताविषयीचे प्रेम वादातीत होते. प्रत्यक्ष फाळणीचा अप्रिय निर्णय त्यांनी अत्यंत कौशल्याने राबविला. तो राबवीत असताना ब्रिटिशांच्या हितसंबंधांना संरक्षण देण्याचे धोरणही त्यांनी कटाक्षाने पाळले.


भारतातून परत गेल्यानंतर १९४८ च्या जूनमध्ये ते पुन्हा नौदलाच्या सेवेत रुजू झाले. १९५२ ते १९५५ ह्या काळात ते भूमध्य समुद्राच्या क्षेत्रातील नाटोच्या नौदलाचे कमांडर इन्-चीफ होते. १९५५ मध्ये ते ब्रिटिश नौदलाचे प्रमुख (फर्स्ट सी लॉर्ड) बनले. १९५९ ते १९६५ पर्यंत संरक्षण विभागाचे प्रमुख (चीन ऑफ डिफेन्स स्टाफ) ह्या नात्याने तिन्ही सैन्य दलांच्या सुसूत्रीकरणाची फार महत्त्वाची कामगिरी त्यांनी पार पाडली आणि मग ते सेवानिवृत्त झाले.


माउंटबॅटन यांना राजघराण्याशी असलेल्या आपल्या नात्याचा फार अभिमान होता. देखण्या व्यक्तिमत्त्वाच्या माउंटबॅटन ह्यांचा विवाह १९२२ मध्ये एड्‌विना ॲश्ली (१९०१-६०) ह्या श्रीमंत आणि सौंदर्यसंपन्न युवतीबरोबर झाला होता. माउंटबॅटन आणि एड्‌विना दोघेही त्याकाळी त्यांच्या उदार, काहीशा डावीकडे झुकलेल्या विचारांबद्दल प्रसिद्ध होते. प्रत्यक्षात त्यांचा विचार आणि कार्य दोन्ही जहाल किंवा समाजवादी नव्हे तर मानवतावादी स्वरूपाचे होते. 


माउंटबॅटन दांपत्य आणि पाट्रिशिया व पॅमेला ह्या त्यांच्या मुली. ह्यांनी भारतीय जनतेला आपलेसे करून टाकले होते. सर्वसामान्यांमध्ये मिसळण्याचा त्यांचा गुण हेच त्याचे मुख्य कारण. भारतात असताना लेडी एड्‌विना माउंटबॅटन व जवाहरलाल नेहरू यांच्यात अत्यंत उत्कट प्रेमसंबंध निर्माण झाला. माउंटबॅटन यांच्या चरित्रात या प्रणयाचा निर्देश सापडतो. 


पत्नीच्या मृत्यूनंतर आणि निवृत्तीनंतर काहीसे शांत आणि एकाकी जीवन कंठणाऱ्या माउंटबॅटनंना आयर्लंडमधील त्यांच्या डोनेगल उपसागरातील घराजवळ मासेमारी बोटीमध्ये आयरिश दहतशतवाद्यांनी ठेवलेल्या बॉम्बच्या स्फोटामध्ये मृत्यू आला.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

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प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

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श्रावण मास,कृष्ण पक्ष, *पँचमी*,अश्विनी नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,वर्षा ऋतु,युगाब्ध ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

शुक्रवार, २७ आॕगष्ट २०२१.

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                        *प्रभात दर्शन*

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         *"कोई आहार में विष घोल दे तो उसका उपचार सम्भव है, किन्तु कोई विचार में विष घोल दे तो उसका उपचार सम्भव नहीं।*

*वातावरण में प्रदूषण का उपचार सम्भव है किंतु वैचारिक प्रदूषण का कोई उपचार नही।*

*अतः जहाँ भी कुत्सित अथवा दूषित विचारधारा दिखाई दे, उस स्थान एवं व्यक्ति से दूरी ही श्रेष्ठ है।"*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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मंगळवार, २४ ऑगस्ट, २०२१

जेम्स वँटस संशोधक

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*२५ ऑगस्ट - संशोधक जेम्स वॅट स्मृतिदिन*

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जन्म - ३० जानेवारी १७३६

स्मृती - २५ ऑगस्ट १८१९


*वाफेवर चालणार्‍या आगगाडीचा जनक*

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जेम्स वॅट हे स्कॉटिश संशोधक व उपकरणनिर्माते होते. त्‍यांच्या वडिलांचा जहाजबांधणीचा व बांधकामाचा व्यवसाय होता आणि त्यांची एक कार्यशाळा होती. जेम्स अशक्त असल्याने त्याचे आधीचे शिक्षण घरीच झाले. नंतर शाळेत जाऊन त्यांनी लॅटिन, ग्रीक व गणित या विषयांचे अध्ययन केले.


त्यांना यंत्रोपकरणात विशेष रुची असल्याने त्यांचे खरे शिक्षण वडिलांच्या कार्यशाळेत झाले. तेथे त्यांनी स्वतः यारीसारख्या यंत्राच्या प्रतिकृती बनविल्या; तसेच जहाजावरच्या उपकरणांची माहिती करून घेतली. आधीच्या इजिनात मूलभूत स्वरूपाच्या सुधारणा करून त्यांनी बनविलेले वाफेचे इंजिन हे शक्तिनिर्माणाचे साधन म्हणून सर्वत्र वापरले जाऊ लागले. औद्योगिक क्रांतीच्या सुरुवातीच्या काळातील हे सर्वांत महत्त्वाचे साधन ठरले.


वॅट यांनी त्यानंतर ग्लासगो व लंडन येथे वैज्ञानिक (गणितीय) उपकरणांच्या निर्मितीविषयीचे प्रशिक्षण घेतले. त्या काळी मुख्यतः सर्वेक्षण व मार्गनिर्देशन यांकरिता लागणारी उपकरणे बनवीत असत. १७५७ साली ग्लासगोला परत आल्यावर वैज्ञानिक उपकरणनिर्माते म्हणून त्यांनी ग्लासगो विद्यापीठात काम करण्यास सुरुवात केली. तेथे असताना त्यांनी चतुर्थ यंत्र, होकायंत्र, दाबमापक इत्यादी उपकरणे तयार केली. या काळात त्यांचा अनेक वैज्ञानिकांशी परिचय झाला. पैकी जोसेफ ब्लॅक यांच्याबरोबर त्यांची मैत्री जमली व त्या मैत्रीचा त्यांना वाफेच्या इंजिनात सुधारणा करण्याच्या दृष्टीने खूप उपयोग झाला.


वाफेवर चालणार्‍या आगगाडीचा जनक म्हणून जेम्स वॅट यांना ओळखले जाते. जेम्स वॅट लहानपणी अतिशय आळशी होता, असे त्याच्या न बोलण्यामुळे तरी वाटत होते. तो स्वयंपाकघरात त्याच्या आत्या बरोबर बसलेला असताना, विस्तवावर एका किटलीमध्ये पाणी उकळत होते. त्या पाण्याची वाफ किटलीच्या तोंडातून बाहेर पडत होती. जेम्स त्या वाफेवर एकदा कप व एकदा चमचा धरत होता व तो कप व चमचा वाफेच्या जोराने कसा खालीवर होतो, याचे निरीक्षण करत होता. 


त्याच्या आळशीपणाबद्दल त्याची आत्या नेहमीच कानउघाडणी करत असे. एकदा योगायोगाने जेम्सच्या कॉलेजच्या प्रयोगशाळेतील न्यूमनचे मॉडेल इंजिन जेम्सकडे दुरुस्तीला आले. इंजिन दुरुस्त करताना जेम्सच्या लक्षात आले, की हे इंजिन फक्त थोडाच वेळ काम देण्याच्या योग्यतेचे आहे. विचार केल्यावर त्याच्या ध्यानात आले, की न्यूमनचा बॉयलर फार लहान आहे. ज्यात दट्ट्या असतो त्या सिलिंडराच्या घनफळाच्या ३-४ पट वाफ असली, तरच तिच्यामार्फत दट्ट्या सिलिंडराच्या टोकापर्यंत लोटला जाऊ शकेल, असे त्यांना दिसून आले. अशा रीतीने या इंजिनात वाफ मोठ्या प्रमाणात वाया जाते, हे त्यांच्या लक्षात आले. 


न्यूमनच्या इंजिनमधील खाली-वर होणारा दांडा (दट्ट्या) जेव्हा खाली ओढला जाई, तेव्हा त्या सिलिंडरमधील पंपरॉड (दांडा) वर उचलला जाई. जेम्सने एका सिलिंडरमधील वाफ पंपाने दुसर्‍या सिलिंडरमध्ये नेऊन त्या सिलिंडरवर गार पाण्याचा मारा केला व त्या वाफेचे बाष्पीभवन करून, पोकळी निर्माण करायची असे ठरवले. त्यामुळे खर्च व वेळ वाचला. दोन सिलिंडरमध्ये त्याने एअरपंप बसवला. पुढे जेम्सने या इंजिनमध्ये पुष्कळ सुधारणा केल्या.


न्यूमनच्या इंजिनातील दोषांवर उपाय शोधताना जेम्सला अचानकपणे इंजिनाला स्वतंत्र असा संघनक (वाफेचे द्रवात-पाण्यात-रूपांतर करणारे साधन) जोडण्याची कल्पना सुचली व हा त्यांचा पहिला व सर्वांत महत्त्वाचा शोध ठरला. सिलिंडरात वाफेचे पाण्यात रूपांतर होताना जी सुप्त उष्णता लागते ती वाया जाणे हा न्यूमन इंजिनाचा सर्वांत मोठा दोष असल्याचे त्यांच्या ध्यानी आले होते. म्हणून वाफेच्या संघननाचे काम सिलिंडराऐवजी त्याला जोडलेल्या पण त्यापासून अलग असलेल्या कक्षात करण्याचे त्यांनी ठरविले. 


सिलिंडरातून बाहेर पडणारी वाफ सिलिंडरात नेऊन तेथे तिचे संघनन होते. यामुळे सिलिंडरात पाण्याच्या फवार्‍याने संघनन करताना सिलिंडर व दट्ट्या थंड होत असे आणि ते परत तापविण्याकरिता वारंवार जादा उष्णता लागते असे. संघनकामुळे ही उष्णता वाचते. याशिवाय सिलिंडर व दट्ट्या गरम राहण्यासाठी त्यांनी सिलिंडराभोवती आवेष्टन घालून त्यात वाफ सोडण्याची व्यवस्था केली. यामुळे उष्णतेची व पर्यायाने इंधनाची बचत होऊन इंजिन अधिक कार्यक्षम झाले. अशा रीतीने त्यांनी वाफ एंजिनात मूलभूत सुधारणा केल्या. मात्र वाफ एंजिनाचा शोध त्यांनी लावला हा लोकप्रिय (प्रचलित) समज चुकीचा आहे. कारण त्यांच्या जन्माच्या वेळीही वाफ एंजिने खाणीतील पाणी उपसण्यासाठी वापरात होती. 


वॅट यांच्या सुधारणांमुळे वाफ इंजिन चालवायला सोपे झाले; ते अधिक खात्रीशीर रीतीने वापरता येऊ लागले व अधिक शक्तिशाली वाफ इंजिने बनविता येऊ लागली. यामुळे कागद गिरण्या, कापड गिरण्या, पिठाच्या गिरण्या, लोखंडाचे कारखाने, भट्‌ट्या, पाणीपुरवठा इ. असंख्य ठिकाणी त्याचा उपयोग होऊ लागला. व्यावसायिक दृष्टीने महत्त्वाच्या ठरलेल्या या इंजिनाचे औद्योगिक क्रांतीला चांगलीच चालना मिळाली.


वॅट यांनी जॉन रोबक यांच्याबरोबर वाफेची इंजिने बनविण्याचा व्यवसाय भागीदारीत सुरू केला (१७६८) आणि १७६९ साली त्यांनी या एंजिनाचे पेटंट घेतले. मात्र या धंद्यात त्यांना विशेष यश मिळाले नाही. दरम्यान अर्थार्जनासाठी त्यांनी चष्म्याच्या व्यापाऱ्या कडील नोकरी, कालव्यांचे सर्वेक्षण व खोदकाम, बंदरांतील सुधारणा वगैरे कामे केली. या कामांना कंटाळून ते १७७४ साली बर्मिगहॅमला गेले व तेथे त्यांनी मॅथ्यू बोल्टन यांच्या भागीदारीत नव्याने वाफ एंजिने बनविण्याचा उद्योग सुरू केला. त्यांची ही भागीदारी २५ वर्षे टिकली व उद्योग भरभराटीला आला. १७७६ साली त्यांनी दोन वाफ एंजिने उभारली. पैकी एक दगडी कोळशाच्या खाणीत व दुसरे लोखंडाच्या कारखान्यात उभारले. यामुळे वाफ एंजिनांना मागणी वाढली व धंद्याला ऊर्जितावस्था प्राप्त झाली.


पुढील पाच वर्षे म्हणजे १७८१ सालापर्यंत त्यांनी तांब्याच्या व कथिलाच्या खाणीतील पाणी उपसण्यासाठी असंख्य वाफ एंजिने उभारून त्यांच्या देखभालीचे काम केले. खाणव्यवस्थापकांना इंधनाच्या खर्चात बचत व्हावी असे वाटत होते. तसेच अन्य क्षेत्रांतूनही या एंजिनाला मोठी मागणी येण्याची चिन्हे दिसू लागली होती. म्हणून बोल्टन यांनी वॉट यांना एंजिनातील दट्ट्याच्या पश्चाग्र (पुढे-मागे होणार्‍या) गतीचे भुजादंडाच्या परिभ्रमी म्हणजे फिरत्या गतीत परिवर्तन करण्याची विनंती केली. वॉट यांनी हे काम १७८१ साली यशस्वीपणे साध्य केले. त्याकरिता त्यांनी तथाकथित ‘सूर्य व ग्रह दंतचक्र’ ही योजना केली. त्यामुळे एंजिनाच्या एका आवर्तनात भुजादंडाचे दोन फेरे होतात. १७८२ साली त्यांनी द्विक्रिय एंजिनाचे पेटंट घेतले. या एंजिनात दांडा रेटला व ओढलाही जातो. यासाठी दंड व दट्ट्या नव्या पद्धतीने दृढपणे जोडले जाणे आवश्यक होते. ही समस्या त्यांनी १७८४ साली समांतर गतीचा आपला शोध वापरून सोडविली. या दट्ट्याचा दांडा लंब दिशेत हालेल अशा रीतीने संयोगदांड्यांची मांडणी केली. बोल्टन यांच्या सूचनेवरून १७८८ साली वॉट यांनी एंजिनाची गती स्वयंचलितपणे नियंत्रित करणारा केंद्रोत्सारी गतिनियंता शोधून काढला व १७९० साली त्यांनी दाबमापक शोधला. यामुळे वॅट एंजिन जवळजवळ परिपूर्ण अवस्थेपर्यंत पोहोचले होते.


एंजिनाची शक्ती मोजण्यासाठी त्यांनी त्याची घोड्याच्या शक्तीशी तुलना केली. अशा प्रकारे हॉर्स पॉवर (अश्वशक्ती) ही संज्ञा प्रचारात आली. त्यानंतर एक अश्वशक्ती म्हणजे १ मिनिटात ३३,००० पौंड वजन १ फूट उंच उचलण्यास लागणारी शक्ती हे मूल्य निश्चित केले. दाबमापकाने एंजिनाची अश्वशक्ती मोजीत व अश्वशक्तीनुसार एंजिनाची किंमत ठरवीत.


वाफ एंजिनाशिवाय अभियांत्रिकी व रसायनशास्त्र या विषयांतही त्यांनी संशोधन केले होते आणि त्यांना भाषा व संगीत यांतही रस होता. त्यांचे काही महत्त्वाचे संशोधन पुढीलप्रमाणे आहे. 


आपले कार्यालय उबदार ठेवण्यासाठी त्यांनी वाफेच्या वेटोळ्यांचा वापर केला होता (१७८४). इंधनाची बचत करणारी भट्टी, दाब देऊन मजकुराच्या प्रती काढावयाचे यंत्र व प्रतिलिपी शाई, शिल्पाची (पुतळ्याची) पुनःनिर्मिती करणारे यंत्र, अम्लतेची चाचणी घेणारे दर्शक, नियामक झडप, क्लोरीनचा वापर करून विरंजन (रंग घालविण्याची क्रिया) करण्याचे तंत्र वगैरे त्यांचे शोध महत्त्वाचे आहेत. शिवाय पाणी हे मूलद्रव्य नसून संयुग आहे, असे सुचविणारे ते एक पहिले संशोधक होते. ग्लासगो वॉटर कंपनीचे सल्लागार म्हणून त्यांनी काम केले होते. विज्ञान व कला यांचा प्रसार करणार्‍या लूनर सोसायटीचे ते सदस्य होते.


वॅट यांना त्यांच्या संशोधनकार्याबद्दल पुढील अनेक मानसन्मान मिळाले होते. एडिंबरो व लंडन (१७८५) येथील रॉयल सोसायटीचे सदस्यत्व, ग्लासगो विद्यापीठाची डॉक्टर ऑफ लॉज ही पदवी (१८०६), फ्रेंच ॲकॅडेमी ऑफ सायन्सेसचे परदेशी सदस्यत्व वगैरे. त्यांना जहागिरी देऊ करण्यात आली होती; पण ती त्यांनी स्वीकारली नाही. त्यांच्या सन्मानार्थ शक्तीच्या एककाला वॉट (वॅट) हे नाव देण्यात आले असून वेस्ट मिन्स्टर ॲबे येथे त्यांचा पुतळा उभारला आहे. त्यांचा एक मुलगा (जेम्स) सागरी अभियंता होता व त्याने जहाजाकरिता वाफ एंजिनाचा वापर केला होता.


🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

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प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

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श्रावण मास,कृष्ण पक्ष, *तृतीय*,उ.भा.नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,वर्षा ऋतु,युगाब्ध ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

बुधवार, २५ आॕगष्ट २०२१.

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                       *प्रभात दर्शन*

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         *"धर्म में ही भारत की जीवन शक्ति निहित है और जब तक यह हिन्दू जाति अपने पूर्वजों की इस विरासत को नही भूलती, तब तक विश्व की कोई भी  शक्ति इसका विनाश नहीं कर सकती।”*


              *- स्वामी विवेकानन्द*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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