बुधवार, २५ जानेवारी, २०२३

२५ जानेवारी रसायनशास्त्रज्ञ रॉबर्ट बॉयल वाढदिवस


  २५ जानेवारी 

 रसायनशास्त्रज्ञ रॉबर्ट बॉयल वाढदिवस

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 जन्म - 25 जानेवारी 1627 (आयर्लंड)

 मेमरी - ३१ डिसेंबर १६९१ (इंग्लंड)


 रॉबर्ट बॉयल हे आधुनिक रसायनशास्त्राचे संस्थापक, त्यांच्या काळातील महान शास्त्रज्ञांपैकी एक, लंडनच्या प्रसिद्ध रॉयल सोसायटीचे संस्थापक आणि अर्ल ऑफ कॉर्कचे 14 वे मूल होते.  बॉयलचा जन्म लिस्मोर कॉन्सेल, मुन्स्टर काउंटी, आयर्लंड येथे झाला.  घरी, तो लॅटिन आणि फ्रेंच शिकला आणि तीन वर्षे इटनमध्ये शिकला.


 1638 मध्ये त्यांनी फ्रान्सला प्रवास केला आणि जिनिव्हा येथे सुमारे एक वर्ष अभ्यास केला.  फ्लॉरेन्समध्ये त्यांनी गॅलिलिओच्या कामांचा अभ्यास केला.  1644 मध्ये जेव्हा ते इंग्लंडला पोहोचले तेव्हा त्यांची अनेक शास्त्रज्ञांशी मैत्री झाली.  हे लोक एका छोट्या गटाच्या स्वरूपात आणि नंतर ऑक्सफर्डमध्ये विचारांची देवाणघेवाण करायचे.  ही परिषद म्हणजे आजची जगप्रसिद्ध रॉयल सोसायटी.


 1646 पासून, बॉयलचा सर्व वेळ वैज्ञानिक प्रयोगांमध्ये घालवला जाऊ लागला.  1654 नंतर, ते ऑक्सफर्डमध्ये राहिले आणि येथे त्यांची अनेक विचारवंत आणि विद्वानांशी ओळख झाली.  ऑक्सफर्डमध्ये 14 वर्षे राहून त्यांनी हवेच्या पंपांवर विविध प्रयोग केले आणि हवेच्या गुणधर्मांचा चांगला अभ्यास केला.  हवेतील आवाजाच्या वेगावरही काम केले.  बॉयलच्या लेखनात या प्रयोगांचे तपशीलवार वर्णन केले आहे.  त्यांना धार्मिक साहित्यातही रस होता आणि त्यांनी या संदर्भात लेखही लिहिले.  त्यांनी स्वखर्चाने बायबलचे अनेक भाषांमध्ये भाषांतर करून घेतले आणि ख्रिश्चन धर्माच्या प्रसारासाठी भरपूर पैसाही दिला.


 रॉबर्ट बॉयलचे पहिले प्रकाशित वैज्ञानिक पुस्तक म्हणजे न्यू एक्सपेरिमेंट्स, फिजिको-मेकॅनिकल, टचिंग द स्प्रिंग ऑफ एअर अँड इट्स इफेक्ट्स, ऑन द कॉन्ट्रॅक्शन अँड एक्सपेन्शन ऑफ एअर.  1663 मध्ये रॉयल सोसायटीची औपचारिक स्थापना झाली.  यावेळी बॉयल केवळ या संस्थेचे सदस्य होते.  या संस्थेतून प्रकाशित होणाऱ्या ‘फिलॉसॉफिकल ट्रान्झॅक्शन्स’ या जर्नलमध्ये बॉयलने अनेक लेख लिहिले आणि 1680 मध्ये ते या संस्थेचे अध्यक्ष म्हणून निवडून आले.  मात्र शपथेशी संबंधित काही मतभेदांमुळे त्यांनी हे पद घेण्यास नकार दिला.


 काही दिवसांपासून बॉयलला रसायनशास्त्रातही रस होता आणि त्याने मूळ धातूंचे उदात्त धातूंमध्ये रूपांतर करण्याच्या संदर्भात काही प्रयोगही केले.  चौथ्या हेन्रीने किमयाविरुध्द काही कायदे केले होते.  बॉयलच्या प्रयत्नांमुळे हे कायदे १६८९ मध्ये उठवण्यात आले.


 बॉयलने मूलद्रव्यांची पहिली वैज्ञानिक व्याख्या दिली आणि निदर्शनास आणून दिले की अॅरिस्टॉटलने वर्णन केलेले कोणतेही मूलद्रव्य किंवा अल्केमिस्टचे मूलद्रव्य (पारा, गंधक आणि क्षार) मूलद्रव्ये नाहीत, कारण ज्या शरीरात ते अस्तित्वात असल्याचे सांगितले जाते (जसे. धातू म्हणून) हे त्यांच्यापासून काढले जाऊ शकत नाहीत.  1661 मध्ये, बॉयलने घटकांबद्दल "द स्केप्टिकल केमिस्ट" एक महत्त्वपूर्ण पुस्तिका लिहिली.


 बॉयलने रसायनशास्त्राच्या प्रयोगशाळेत वापरल्या जाणार्‍या अनेक पद्धतींचा शोध लावला, जसे की कमी दाबाखाली ऊर्धपातन.  बॉयलचे वायूचे नियम, त्याचे ज्वलनाचे प्रयोग, हवेतील धातू जाळण्याचे प्रयोग, पदार्थांवर उष्णतेचा परिणाम, आम्ल आणि क्षारांची वैशिष्ट्ये आणि त्यांच्या संबंधात केलेले प्रयोग, हे सर्व युगप्रवर्तक प्रयोग होते ज्यांनी आधुनिक रसायनशास्त्राला जन्म दिला.


 बॉयलने पदार्थाचा कणवाद मांडला, जो डाल्टनच्या अणुवादात व्यक्त झाला होता.  त्यांची इतर कामे मिश्र धातु, फॉस्फरस, मिथाइल अल्कोहोल (वुड स्पिरिट), फॉस्फोरिक ऍसिड, चांदीच्या क्षारांवर प्रकाशाचा प्रभाव इत्यादींशी संबंधित आहेत.


 बॉयल आयुष्यभर ब्रह्मचारी राहिला.  त्यांचा बेकनच्या तत्त्वज्ञानावर प्रचंड विश्वास होता.  आजपर्यंतच्या अमर शास्त्रज्ञांमध्ये त्यांची गणना होते.  1660 नंतर त्यांची तब्येत ढासळू लागली, परंतु रासायनिक कार्य यावेळीही थांबले नाही.  

    ✍️  संकलन .....गजानन गोपेवाड




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बुधवार, ४ जानेवारी, २०२३

गुरु गोविन्द सिंह*

 


*🇮🇳 आझादी का अमृत महोत्सव 🇮🇳*

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       🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳

                 ▬ ❚❂❚❂❚ ▬                  संकलन : गजानन गोपेवाड                                                   

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            *गुरु गोविन्द सिंह*

            *दशम सिख गुरु,*

        *खालसा के संस्थापक*


       *जन्म : गोविन्द राय*

        *5 जनवरी 1666*

         (पटना बिहार, भारत)


     *मृत्यु : 7 अक्टूबर 1708*

       (नांदेड़, महाराष्ट्र, भारत)


पदवी : सिखों के दसवें गुरु

प्रसिद्धि कारण : दसवें सिख गुरु,     

                     सिख खालसा सेना  

                     के संस्थापक 

                      एवं प्रथम सेनापति

पूर्वाधिकारी : गुरु तेग बहादुर

उत्तराधिकारी : गुरु ग्रंथ साहिब

जीवनसाथी : माता जीतो, 

                   माता सुंदरी,

                   माता साहिब दीवान

बच्चे : अजीत सिंह, जुझार सिंह,      

          जोरावर सिंह, फतेह सिंह

माता-पिता : गुरु तेग बहादुर, 

                   माता गूजरी


गुरु गोबिन्द सिंह सिखों के दसवें गुरु थे। उनके पिता गुरू तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त ११ नवम्बर सन १६७५ को वे गुरू बने। वह एक महान योद्धा, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। सन १६९९ में बैसाखी के दिन उन्होने खालसा पन्थ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।


      *सिख सतगुरु एवं भक्त*


सतगुरु नानक देव · सतगुरु अंगद देव

सतगुरु अमर दास  · सतगुरु राम दास 

सतगुरु अर्जन देव  ·सतगुरु हरि गोबिंद  

सतगुरु हरि राय  · सतगुरु हरि कृष्ण

सतगुरु तेग बहादुर  · सतगुरु गोबिंद सिंह

भक्त कबीर जी  · शेख फरीद

भक्त नामदेव


             *धर्म ग्रंथ*


आदि ग्रंथ साहिब · दसम ग्रंथ

सम्बन्धित विषय

गुरमत ·विकार ·गुरू

गुरद्वारा · चंडी ·अमृत

नितनेम · शब्दकोष

लंगर · खंडे बाटे की पाहुल

गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में सुशोभित किया। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरू गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है।


उन्होने मुगलों या उनके सहयोगियों (जैसे, शिवालिक पहाडियों के राजा) के साथ १४ युद्ध लड़े। धर्म के लिए समस्त परिवार का बलिदान उन्होंने किया, जिसके लिए उन्हें 'सरबंसदानी' (सर्ववंशदानी) भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जनसाधारण में वे कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले आदि कई नाम, उपनाम व उपाधियों से भी जाने जाते हैं।


गुरु गोविंद सिंह जहां विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे, वहीं वे स्वयं एक महान लेखक, मौलिक चिंतक तथा संस्कृत सहित कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रंथों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उनके दरबार में ५२ कवियों तथा लेखकों की उपस्थिति रहती थी, इसीलिए उन्हें 'संत सिपाही' भी कहा जाता था। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे।


उन्होंने सदा प्रेम, एकता, भाईचारे का संदेश दिया। किसी ने गुरुजी का अहित करने की कोशिश भी की तो उन्होंने अपनी सहनशीलता, मधुरता, सौम्यता से उसे परास्त कर दिया। गुरुजी की मान्यता थी कि मनुष्य को किसी को डराना भी नहीं चाहिए और न किसी से डरना चाहिए। वे अपनी वाणी में उपदेश देते हैं भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन। वे बाल्यकाल से ही सरल, सहज, भक्ति-भाव वाले कर्मयोगी थे। उनकी वाणी में मधुरता, सादगी, सौजन्यता एवं वैराग्य की भावना कूट-कूटकर भरी थी। उनके जीवन का प्रथम दर्शन ही था कि धर्म का मार्ग सत्य का मार्ग है और सत्य की सदैव विजय होती है।


🤱🏻 *गुरु गोबिन्द सिंह का जन्म* ( *पटना साहिब*)


गुरु गोविंद सिंह का जन्म नौवें सिख गुरु गुरु तेगबहादुर और माता गुजरी के घर पटना में 05 जनवरी १६६६ को हुआ था। जब वह पैदा हुए थे उस समय उनके पिता असम में धर्म उपदेश को गये थे। उनके बचपन का नाम गोविन्द राय था। पटना में जिस घर में उनका जन्म हुआ था और जिसमें उन्होने अपने प्रथम चार वर्ष बिताये थे, वहीं पर अब तखत श्री पटना साहिब स्थित है।

            १६७० में उनका परिवार फिर पंजाब आ गया। मर्च १६७२ में उनका परिवार हिमालय के शिवालिक पहाड़ियों में स्थित चक्क नानकी नामक स्थान पर आ गया। यहीं पर इनकी शिक्षा आरम्भ हुई। उन्होंने फारसी, संस्कृत की शिक्षा ली और एक योद्धा बनने के लिए सैन्य कौशल सीखा। चक नानकी ही आजकल आनन्दपुर साहिब कहलता है।

               गोविन्द राय जी नित्य प्रति आनंदपुर साहब में आध्यात्मिक आनंद बाँटते, मानव मात्र में नैतिकता, निडरता तथा आध्यात्मिक जागृति का संदेश देते थे। आनंदपुर वस्तुतः आनंदधाम ही था। यहाँ पर सभी लोग वर्ण, रंग, जाति, संप्रदाय के भेदभाव के बिना समता, समानता एवं समरसता का अलौकिक ज्ञान प्राप्त करते थे। गोविन्द जी शांति, क्षमा, सहनशीलता की मूर्ति थे।


काश्मीरी पण्डितों का जबरन धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बनाये जाने के विरुद्ध शिकायत को लेकर तथा स्वयं इस्लाम न स्वीकारने के कारण ११ नवम्बर १६७५ को औरंगजेब ने दिल्ली के चांदनी चौक में सार्वजनिक रूप से उनके पिता गुरु तेग बहादुर का सिर कटवा दिया। इसके पश्चात वैशाखी के दिन २९ मार्च १६७६ को गोविन्द सिंह सिखों के दसवें गुरु घोषित हुए।


१०वें गुरु बनने के बाद भी उनकी शिक्षा जारी रही। शिक्षा के अन्तर्गत लिखना-पढ़ना, घुड़सवारी तथा धनुष चलाना आदि सम्मिलित था। १६८४ में उन्होने चंडी दी वार कि रचना की। १६८५ तक वह यमुना नदी के किनारे पाओंटा नामक स्थान पर रहे।


गुरु गोबिन्द सिंह की तीन पत्नियाँ थीं। 21जून, 1677 को 10 साल की उम्र में उनका विवाह माता जीतो के साथ आनंदपुर से 10 किलोमीटर दूर बसंतगढ़ में किया गया। उन दोनों के 3 पुत्र हुए जिनके नाम थे – जुझार सिंह, जोरावर सिंह, फ़तेह सिंह। 4 अप्रैल, 1684 को 17 वर्ष की आयु में उनका दूसरा विवाह माता सुंदरी के साथ आनंदपुर में हुआ। उनका एक बेटा हुआ जिसका नाम था अजित सिंह। 15 अप्रैल, 1700 को 33 वर्ष की आयु में उन्होंने माता साहिब देवन से विवाह किया। वैसे तो उनका कोई संतान नहीं था पर सिख धर्म के पन्नों पर उनका दौर भी बहुत प्रभावशाली रहा।


🎠 *आनन्दपुर साहिब को छोड़कर जाना और वापस आना*


अप्रैल 1685 में, सिरमौर के राजा मत प्रकाश के निमंत्रण पर गुरू गोबिंद सिंह ने अपने निवास को सिरमौर राज्य के पांवटा शहर में स्थानांतरित कर दिया। सिरमौर राज्य के गजट के अनुसार, राजा भीम चंद के साथ मतभेद के कारण गुरु जी को आनंदपुर साहिब छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था और वे वहाँ से टोका शहर चले गये। मत प्रकाश ने गुरु जी को टोका से सिरमौर की राजधानी नाहन के लिए आमंत्रित किया। नाहन से वह पांवटा के लिए रवाना हुऐ| मत प्रकाश ने गढ़वाल के राजा फतेह शाह के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से गुरु जी को अपने राज्य में आमंत्रित किया था। राजा मत प्रकाश के अनुरोध पर गुरु जी ने पांवटा में बहुत कम समय में उनके अनुयायियों की मदद से एक किले का निर्माण करवाया। गुरु जी पांवटा में लगभग तीन साल के लिए रहे और कई ग्रंथों की रचना की। 


सन 1687 में नादौन की लड़ाई में, गुरु गोबिंद सिंह, भीम चंद, और अन्य मित्र देशों की पहाड़ी राजाओं की सेनाओं ने अलिफ़ खान और उनके सहयोगियों की सेनाओ को हरा दिया था। विचित्र नाटक (गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित आत्मकथा) और भट्ट वाहिस के अनुसार, नादौन पर बने व्यास नदी के तट पर गुरु गोबिंद सिंह आठ दिनों तक रहे और विभिन्न महत्वपूर्ण सैन्य प्रमुखों का दौरा किया।


भंगानी के युद्ध के कुछ दिन बाद, रानी चंपा (बिलासपुर की विधवा रानी) ने गुरु जी से आनंदपुर साहिब (या चक नानकी जो उस समय कहा जाता था) वापस लौटने का अनुरोध किया जिसे गुरु जी ने स्वीकार किया। वह नवंबर 1688 में वापस आनंदपुर साहिब पहुंच गये।


1695 में, दिलावर खान (लाहौर का मुगल मुख्य) ने अपने बेटे हुसैन खान को आनंदपुर साहिब पर हमला करने के लिए भेजा। मुगल सेना हार गई और हुसैन खान मारा गया। हुसैन की मृत्यु के बाद, दिलावर खान ने अपने आदमियों जुझार हाडा और चंदेल राय को शिवालिक भेज दिया। हालांकि, वे जसवाल के गज सिंह से हार गए थे। पहाड़ी क्षेत्र में इस तरह के घटनाक्रम मुगल सम्राट औरंगज़ेब लिए चिंता का कारण बन गए और उसने क्षेत्र में मुगल अधिकार बहाल करने के लिए सेना को अपने बेटे के साथ भेजा।


🔱 *खालसा पंथ की स्थापना*


गुरु गोबिंद सिंह जी का नेतृत्व सिख समुदाय के इतिहास में बहुत कुछ नया ले कर आया। उन्होंने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा जो की सिख धर्म के विधिवत् दीक्षा प्राप्त अनुयायियों का एक सामूहिक रूप है उसका निर्माण किया।


सिख समुदाय के एक सभा में उन्होंने सबके सामने पुछा – "कौन अपने सर का बलिदान देना चाहता है"? उसी समय एक स्वयंसेवक इस बात के लिए राज़ी हो गया और गुरु गोबिंद सिंह उसे तम्बू में ले गए और कुछ देर बाद वापस लौटे एक खून लगे हुए तलवार के साथ। गुरु ने दोबारा उस भीड़ के लोगों से वही सवाल दोबारा पुछा और उसी प्रकार एक और व्यक्ति राज़ी हुआ और उनके साथ गया पर वे तम्बू से जब बहार निकले तो खून से सना तलवार उनके हाथ में था। उसी प्रकार पांचवा स्वयंसेवक जब उनके साथ तम्बू के भीतर गया, कुछ देर बाद गुरु गोबिंद सिंह सभी जीवित सेवकों के साथ वापस लौटे और उन्होंने उन्हें पंज प्यारे या पहले खालसा का नाम दिया।


उसके बाद गुरु गोबिंद जी ने एक लोहे का कटोरा लिया और उसमें पानी और चीनी मिला कर दुधारी तलवार से घोल कर अमृत का नाम दिया। पहले 5 खालसा के बनाने के बाद उन्हें छठवां खालसा का नाम दिया गया जिसके बाद उनका नाम गुरु गोबिंद राय से गुरु गोबिंद सिंह रख दिया गया। उन्होंने पांच ककारों का महत्व खालसा के लिए समझाया और कहा – केश, कंघा, कड़ा, किरपान, कच्चेरा।


इधर 27 दिसम्बर सन्‌ 1704 को दोनों छोटे साहिबजादे और जोरावर सिंह व फतेह सिंहजी को दीवारों में चुनवा दिया गया। जब यह हाल गुरुजी को पता चला तो उन्होंने औरंगजेब को एक जफरनामा (विजय की चिट्ठी) लिखा, जिसमें उन्होंने औरगंजेब को चेतावनी दी कि तेरा साम्राज्य नष्ट करने के लिए खालसा पंथ तैयार हो गया है।


8 मई सन्‌ 1705 में 'मुक्तसर' नामक स्थान पर मुगलों से भयानक युद्ध हुआ, जिसमें गुरुजी की जीत हुई। अक्टूबर सन्‌ 1706 में गुरुजी दक्षिण में गए जहाँ पर आपको औरंगजेब की मृत्यु का पता लगा। औरंगजेब ने मरते समय एक शिकायत पत्र लिखा था। हैरानी की बात है कि जो सब कुछ लुटा चुका था, (गुरुजी) वो फतहनामा लिख रहे थे व जिसके पास सब कुछ था वह शिकस्त नामा लिख रहा है। इसका कारण था सच्चाई। गुरुजी ने युद्ध सदैव अत्याचार के विरुद्ध किए थे न कि अपने निजी लाभ के लिए।


औरंगजेब की मृत्यु के बाद आपने बहादुरशाह को बादशाह बनाने में मदद की। गुरुजी व बहादुरशाह के संबंध अत्यंत मधुर थे। इन संबंधों को देखकर सरहद का नवाब वजीत खाँ घबरा गया। अतः उसने दो पठान गुरुजी के पीछे लगा दिए। इन पठानों ने गुरुजी पर धोखे से घातक वार किया, जिससे 7 अक्टूबर 1708 में गुरुजी (गुरु गोबिन्द सिंह जी) नांदेड साहिब में दिव्य ज्योति में लीन हो गए। अंत समय आपने सिक्खों को गुरु ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानने को कहा व खुद भी माथा टेका। गुरुजी के बाद माधोदास ने, जिसे गुरुजी ने सिक्ख बनाया बंदासिंह बहादुर नाम दिया था, सरहद पर आक्रमण किया और अत्याचारियों की ईंट से ईंट बजा दी।


गुरु गोविंदजी के बारे में लाला दौलतराय, जो कि कट्टर आर्य समाजी थे, लिखते हैं 'मैं चाहता तो स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, परमहंस आदि के बारे में काफी कुछ लिख सकता था, परंतु मैं उनके बारे में नहीं लिख सकता जो कि पूर्ण पुरुष नहीं हैं। मुझे पूर्ण पुरुष के सभी गुण गुरु गोविंदसिंह में मिलते हैं।' अतः लाला दौलतराय ने गुरु गोविंदसिंहजी के बारे में पूर्ण पुरुष नामक एक अच्छी पुस्तक लिखी है।


इसी प्रकार मुहम्मद अब्दुल लतीफ भी लिखता है कि जब मैं गुरु गोविंदसिंहजी के व्यक्तित्व के बारे में सोचता हूँ तो मुझे समझ में नहीं आता कि उनके किस पहलू का वर्णन करूँ। वे कभी मुझे महाधिराज नजर आते हैं, कभी महादानी, कभी फकीर नजर आते हैं, कभी वे गुरु नजर आते हैं। सिखों के दस गुरू हैं।


एक हत्यारे से युद्ध करते समय गुरु गोबिंद सिंह जी के छाती में दिल के ऊपर एक गहरी चोट लग गयी थी। जिसके कारण 7अक्टूबर, 1708 को 42 वर्ष की आयु में नान्देड में उनकी मृत्यु हो गयी।


📝 *रचनायें*


दशम ग्रन्थ की पाण्डुलिपि का प्रथम पत्र। दशम ग्रन्थ में प्राचीन भारत की सन्त-सैनिक परम्परा की कथाएँ हैं।

जाप साहिब : एक निरंकार के गुणवाचक नामों का संकलन

अकाल उस्तत: अकाल पुरख की अस्तुति एवं कर्म काण्ड पर भारी चोट

बचित्र नाटक : गोबिन्द सिंह की सवाई जीवनी और आत्मिक वंशावली से वर्णित रचना

चण्डी चरित्र - ४ रचनाएँ - अरूप-आदि शक्ति चंडी की स्तुति। इसमें चंडी को शरीर औरत एवंम मूर्ती में मानी जाने वाली मान्यताओं को तोड़ा है। चंडी को परमेशर की शक्ति = हुक्म के रूप में दर्शाया है। एक रचना मार्कण्डेय पुराण पर आधारित है।

शास्त्र नाम माला : अस्त्र-शस्त्रों के रूप में गुरमत का वर्णन।

अथ पख्याँ चरित्र लिख्यते : बुद्धिओं के चाल चलन के ऊपर विभिन्न कहानियों का संग्रह।

ज़फ़रनामा : मुगल शासक औरंगजेब के नाम पत्र।

खालसा महिमा : खालसा की परिभाषा और खालसा के कृतित्व।

        

          🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳


🙏🌹 *विनम्र अभिवादन* 🌹🙏

शुक्रवार, २२ जुलै, २०२२

*२२ जुलै - भारतीय राष्ट्रध्वज स्वीकृत करण्यात आला*

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*२२ जुलै - भारतीय राष्ट्रध्वज स्वीकृत करण्यात आला*

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भारतीय राष्ट्रध्वज (तिरंगा) २२ जुलै १९४७ रोजी, भारत देशाला स्वातंत्र्य मिळण्याच्या २४ दिवस आधी अंगीकारला गेला. 


२४ मार्च रोजी इंंग्रजांनी लवकरच भारत सोडून जाण्याचा आपला निर्णय जाहीर केला. स्वतंंत्र भारताचा ध्वज कसा असावा हे ठरविण्यासाठी तातडीने एक समिती नेमली गेली. त्यात डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर हे प्रमुख होते. त्यांनी ठरवले की कॉंग्रेसचा ध्वज हाच स्वतंंत्र भारताचा ध्वज म्हणून घोषित करावा, फक्त चरख्याऐवजी अशोकचक्र हे चिह्न ध्वजाच्या मध्यभागी विराजमान व्हावे. घटना समितीने २२ जुलैला या ठरावाला मंंजुरी दिली.


भारताच्या राष्ट्रीय ध्वजात चार रंगाचा वापर केला गेला आहे. केशरी, पांढरा, हिरवा आणि निळा. त्यामुळे भारताचा राष्ट्रीय ध्वज, रंगाचाच विचार केला तर तिरंगा नसून चौरंगा आहे. २२ जुलै १९४७ रोजी घटना समितीच्या बैठकीत 'तिरंगी ध्वज' भारताचा अधिकृत राष्ट्रीय ध्वज म्हणून स्वीकृत करण्यात आला. त्या संबंधीचा ठराव पंडित जवाहरलाल नेहरू यांनी मांडला. 


एकाला एक लागून असलेल्या आडव्या समान प्रमाणाच्या तीन पट्ट्यांचा तो आहे. वरती गर्द केशरी, मध्यभागी पांढरा आणि खालच्या बाजूला गर्द हिरवा, अशा क्रमाने हे तीन रंग आहेत. मधल्या पांढऱ्या पट्ट्यावर निळ्या रंगाचे अशोकचक्र (धम्मचक्र) असून ते सारनाथ येथील सिंहमुद्रेवर असलेले अशोकचक्र आहे. चक्राला २४  आरे आहेत. 


मच्‍छलीपट्टणम जवळ जन्मलेल्या पिंगली वेंकय्या ह्यांनी तिरंग्याची रचना केली आहे. भारतीय राष्ट्रध्वजाच्या उंचीचे व लांबीचे प्रमाण २:३ असे आहे, तसेच राष्ट्रध्वज खादीच्या अथवा रेशमाच्या कापडाचाच बनवला जावा असा सरकारी नियम आहे.


ध्वजात तीन समान आडव्या पट्ट्यांची रचना करण्यात आली आहे. वरच्या भागात गडद केशरी रंग आहे. या रंगातून त्याग, धैर्य याचा बोध होतो.


मधल्या भागात पांढरा रंग आहे. या रंगातून प्रकाशाचा आणि सत्यमार्गाचा शांती, सत्य व पावित्र्याचा बोध होतो.


खालील भागात गडद हिरवा रंग आहे. हा रंगातून निसर्गाशी वा भूमीशी असलेले नाते दर्शवितो, निष्ठा व समृद्धीचा बोध होतो.


निळ्या रंगाचे अशोक चक्र हे सागराप्रमाणे अथांगता व कालचक्राचे व त्यासोबत बदलत जाणारे जग सूचित करतो. जीवन गतिमान असावे व भारतीयांनी शांततापूर्ण आगेकूच करावी असे धम्मचक्र दर्शविते. मूलतः हे चक्र विश्वशांतीचा संदेश देणार्‍या बौद्ध धर्माचे धम्मचक्र आहे. त्याला ‘अशोकचक्र' या नावाने ओळखले जाते. त्यात भारतीय कला, तत्त्वज्ञान, इतिहास व संस्कृती यांचा सुरेख संगम झालेला दिसतो. ‘धम्मचक्र प्रवर्तनाय' हे घोषवाक्य भारतीय संसद सभापतीच्या स्थानाच्या शिरोभागी लिहिलेले आहे.


*फडकवण्याची नियमावली :*


भारत देशाच्या अस्मितेचे प्रतीक असलेला राष्ट्रध्वज तिरंगा राष्ट्रीय सण व अन्य महत्त्वपूर्ण दिवशी सन्मान पूर्वक फडकवला जातो. राष्ट्राचे प्रतीक असलेल्या राष्ट्रध्वजाला फडकावित असताना त्याचा कुठल्याही प्रकारे अवमान होणार नाही,यासाठी काही नियम करण्यात आले आहेत. केंद्रीय गृह मंत्रालयाच्या वतीने भारतीय राष्ट्रध्वज संहिता तयार करण्यात आली आहे.ध्वज संहितेबाबत नागरिकांमध्ये जागृती निर्माण व्हावी,अशी अपेक्षा व्यक्त करण्यात आली आहे.


राष्ट्रीय ध्वजाबाबत संहिता तयार करण्यात आल्याचे खूप कमी भारतीयांना माहिती असते. संहितेनुसार महत्त्वाचे राष्ट्रीय कार्यक्रम, सांस्कृतिक व मैदानी खेळाच्या वेळी ध्वज संहितांनुसार जेव्हा राष्ट्रीय ध्वज फडकविला जातो तेव्हा त्याला सन्मानपूर्वक उच्च स्थान दिले जाते. 


राष्ट्रीय ध्वज अशा जागेवर फडकवला जातो की,तेथून तो ध्वज सगळ्यांना दिसतो. शासकीय इमारतीवर राष्ट्रध्वज फडकवण्याची प्रथा आहे. रविवार व अन्य सुटीच्या दिवशीही सूर्योदयापासून ते सूर्यास्तापर्यंत ध्वज फडकवला जातोच. प्रतिकूल हवामानातही ध्वज फडकवणे आवश्यक असते.


संहितेनुसार राष्ट्रध्वज नेहमी स्फूर्तीने फडकवला पाहिजे व आदरपूर्वक ध्वज हळूहळू उतरवला जातो. ध्वज फडकवताना व उतरवताना बिगूल वाजविण्याची प्रथा आहे. ध्वज कुठल्याही इमारतीच्या खिडकी अथवा दर्शनी भागात आडवा व तिरपा फडकवताना ध्वजातील केशरी रंगांचा पट्टा हा वरच्या बाजूला असतो.प्लॅस्टिकचा ध्वज वापरण्यास मनाई असते.


राष्ट्रध्वज सभेच्या वेळी फडकविताना अशा पद्धतीने फडकाविला गेला पाहिजे की,मान्यवराचे तोंड हे उपस्थिताकडे पाहिजे व ध्वज हा त्यांच्या डाव्या बाजूला पाहिजे.अथवा ध्वज भिंतीवर असेल तर मान्यवरांच्या मागे व भिंतीवर आडवा फडकाविला पाहिजे.कुठल्या पुतळ्याचे अनावरण असेल तर ध्वज सन्मानपूर्वक व वेगळ्या पद्धतीने फडकविला गेला पाहिजे.ध्वज गाडीवर लावताना गाडीच्या बॉनेटवर एक दंड उभा करावा व त्यावर फडकवावा.


संहितेनुसार राष्ट्रीय ध्वज कुठल्या मिरवणूक किंवा परेडच्या व्यक्तीच्या उजव्या हातात असावा.जर इतरही ध्वज असतील तर त्यांच्या मध्यभागी राष्ट्रध्वज असला पाहिजे. फाटलेला,मळलेला ध्वज फडकविला जाता कामा नये. कोणत्या व्यक्तीला अथवा वस्तूला वंदन करताना ध्वज जमिनीच्या दिशेने झुकवू नये.इतर ध्वजांची पताका अथवा ध्वज राष्ट्रध्वजापेक्षा उंच लावू नये.


राष्ट्रध्वजाचा उपयोग वक्त्याचे व्यासपीठ झाकण्यासाठी अथवा ते सजविण्यासाठी करू नये. केशरी पट्टा जमिनीच्या बाजूने ठेवून ध्वज फडकविला जाऊ नये. तसेच राष्ट्रध्वजाला माती व पाण्याचा स्पर्श होऊ देऊ नये. ध्वज फडकविताना तो फाटणार नाही,अशा पद्धतीने बांधला पाहिजे.ध्वजाचा दुरुपयोग थांबविण्यासंदर्भात स्पष्ट दिशा ठरविण्यात आली आहे.त्यानुसार राजकीय व्यक्ती,केंद्रीय सैनिक दलाच्या संबंधित व्यक्तीच्या अंत्ययात्रेव्यतिरिक्त इतरत्र कोठेही त्याचा उपयोग करू नये.ध्वज कुठलेही वाहन,रेल्वे,जहाजावर लावला जाऊ शकत नाही.


ध्वजाचा उपयोग घराच्या पडद्यासाठी करू नये.कुठलाही पेहराव करताना ध्वजाचे कापड घेता येणार नाही.तसेच राष्ट्रध्वज गादी,रुमालावर काढू नये. राष्ट्रध्वजावर कुठेलीही लिखाण केले जात नाही किंवा त्यावर कुठलीही जाहिरात केली जात नाही.ध्वज ज्या खांबावर फडकविला जातो त्यावरही जाहिरात लावता येणार नाही.


केवळ प्रजासत्ताक दिन व स्वातंत्र्य दिन याच दिवशी ध्वज फुलांच्या पाकळ्यात ठेवून फडकविला जातो.राष्ट्रीय ध्वज फडकवताना अथवा उतरवताना उपस्थित नागरिक कवायतीच्या सावधान स्थितीत पाहिजेत. शासकीय पोषाखात असलेले सरकारी अधिकारी ध्वजाला मानवंदना देतील.जेव्हा ध्वज सैन्याच्या तुकडीतील जवानाच्या हातात असेल व तो सावधान स्थितीत उभा राहिल.सरकारी अधिकार्‍यांच्या जवळून ध्वज जात असताना त्यांनी ध्वजाला सन्मानपूर्वक मानवंदना दिली पाहिजे. आदरणीय व्यक्ती डोक्यावर टोपी न घालताही राष्ट्रध्वजाला मानवंदना देऊ शकतात.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

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संकलन -)

गजानन गोपेवाड  

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

बुधवार, २० जुलै, २०२२

स्मृतिदिन - २० जुलै १९३७* गुलियेल्मो मार्कोनीचा जन्म

*📬📬गुलियेल्मो मार्कोनी📬📬* 📧📧📧📧📧📧📧📧📧📧 *भौतिकशास्त्रातील नोबेल पारितोषिक विजेता* ⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡ *स्मृतिदिन - २० जुलै १९३७* गुलियेल्मो मार्कोनीचा जन्म इटलीतील 'बोलोन्या' शहरात २५ एप्रिल १८७४ रोजी झाला. मार्कोनीच्या जन्माच्या आधी १८६८ मध्ये मॅक्‍सेल या शास्त्रज्ञाने विजेचा प्रवाह वातावरणात आहे,अशी कल्पना मांडली होती. या वीजप्रवाहाचे गुणधर्मही त्याने वर्णिले होते. पण बाकीच्या शास्त्रज्ञांनी त्याकडे दुर्लक्ष केले. मार्कोनीला लहानपणापासूनच विजेच्या प्रवाहाबाबत कुतूहल होते. हाइनरिक हर्ट्‌‌‌झचे लेखही त्याने वाचले होते.१८९५ मध्ये मार्कोनी हर्ट्‌‌झच्या संशोधनावर आपल्या वडिलांच्या बोलोन्यातील मोठ्या वाड्यात काम करू लागला.तो आपला पहिला बिनतारी संदेश एक मैल लांब पाठवू शकण्यात यशस्वी झाला.२ जून १८९४ मध्ये इंग्लंडमधील मुख्य पोस्ट ऑफिसच्या छपरावरून मार्कोनीचे पहिले प्रात्यक्षिक करण्यात आले.सरकारी अधिकारी, पोस्टातील मान्यवर त्या वेळी उपस्थित होते. सॅल्सबरीमध्ये दुसर्‍या प्रात्यक्षिकाला वायुदल व सेनादलातील बरेच अधिकारी आले.आता दोन मैलांवरून बिनतारी संदेश दहा मैलांपर्यंत पोचू शकत होता. हळूहळू मार्कोनीच्या बिनतारी यंत्रणेचे जाळे सर्वत्र पसरत गेले. १९१४ मध्ये पहिले जागतिक युद्ध पुकारले गेले. मार्कोनीच्या बिनतारी यंत्रणेचा इटालियन नौदल, वायुदलास फार उपयोग झाला.जगातील सर्वांत मोठे वायरलेस स्टेशन मार्कोनीने उभारले.मार्कोनीला भौतिकशास्त्राचे नोबेल पारितोषिक व इतर अनेक पारितोषिके मिळाली. 🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏 संकलन -) गजानन गोपेवाड  उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

सोमवार, १८ जुलै, २०२२

गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳 ➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿ गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳 ➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿

विनम्र अभिवादन,अग्निपंख शैक्षणिक समुह महाराष्ट्र राज्य तर्फे व  गजानन गोपेवाड 

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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    *साहित्यरत्न लोकशाहीर*   

          *अण्णाभाऊ साठे*


     *जन्म :  १ ऑगस्ट, १९२०*

(वाटेगाव,ता.वाळवा,जि. सांगली) 

        *मृत्यू :  १८ जुलै, १९६९*

                ( गोरेगाव, मुंबई )


जन्म नाव -) तुकाराम भाऊराव साठे

टोपणनाव -) अण्णाभाऊ साठे

शिक्षण -) अशिक्षित

राष्ट्रीयत्व -) भारतीय 

कार्यक्षेत्र -) लेखक, साहित्यिक

भाषा -) मराठी

साहित्य प्रकार -) शाहिर,कथा,कादंबरीकार

चळवळ -) संयुक्त महाराष्ट्र चळवळ

प्रसिद्ध साहित्यकृती -) फकिरा

प्रभाव -) बाबासाहेब आंबेडकर, 

            कार्ल मार्क्स

वडील -) भाऊराव साठे

आई -)  वालुबाई साठे

पत्नी -) कोंडाबाई साठे,

           जयवंता साठे

अपत्ये -) मधुकर,शांता आणि शकुंतला


            तुकाराम भाऊराव साठे हे अण्णाभाऊ साठे म्हणून ओळखले जाणारे एक मराठी समाजसुधारक,लोककवी आणि लेखक होते.साठे एका अस्पृश्य मांग समाजामध्ये जन्मलेले एक दलित व्यक्ती होते, त्यांची उपज आणि ओळख त्यांचे लेखन आणि राजकीय कृतीशीलतेचे केंद्रबिंदू होते.

       कथा,कादंबरी,लोकनाट्य,नाटक,पटकथा,लावणी,पोवाडे,प्रवासवर्णन अशा वेगवेगळ्या साहित्यप्रकारांतील लेखन केलेले ख्यातनाम मराठी साहित्यिक. ब्रिटिशराज्यकर्त्यांनी ‘गुन्हेगार’ म्हणून शिक्का मारलेल्या एका जमातीत त्यांचा जन्म झाला. त्यांच्या वडिलांचे नाव भाऊ सिधोजी साठे,तर आईचे नाव वालबाई होते.त्यांचे मूळ नाव तुकाराम.जन्मस्थळ वाटेगाव (ता.वाळवा,जि.सांगली).त्यांचे शालेय शिक्षण झालेले नव्हते; तथापि त्यांनी प्रयत्नपूर्वक अक्षरज्ञान मिळविले.१९३२ साली वडिलांसोबत ते मुंबईला आले. चरितार्थासाठी कोळसे वेचणे, फेरीवाल्यांच्या पाठीशी गाठोडे घेऊन हिंडणे,मुंबईच्या मोरबाग गिरणीत झाडूवाला म्हणून नोकरी,अशी मिळतील ती कामे त्यांनी केली.मुंबईत कामगारांचे कष्टमय,दुःखाचे जीवन त्यांनी पाहिले.त्यांचे संप,मोर्चे पाहून त्यांचा लढाऊपणाही त्यांनी अनुभवला.१९३६ मध्ये भारतीय कम्युनिस्ट पक्षाचे नेते कॉ.श्रीपाद अमृत डांगे यांच्या प्रभावाखाली आल्यावर ते कम्युनिस्ट पक्षाचे क्रियाशील कार्यकर्ते झाले.

        मुंबईत डॉ.बाबासाहेब आंबेडकरांपासून स्वातंत्र्यवीर सावरकरांपर्यंत अनेक नेत्यांची भाषणे त्यांनी ऐकली.पक्षाचे कामही ते करीत होतेच;तथापि वडिलांच्या निधनानंतर कुटुंबाची सगळी जबाबदारी अंगावर,पडल्याने ते पुन्हा आपल्या गावी आले.तेथे बापू साठे या चुलतभावाच्या तमाशाच्या फडात ते काम करू लागले.पुढे १९४२ च्या चळवळीत सहभागी झाल्यामुळे ब्रिटिश सरकारने त्यांच्यावर पकडवॉरंट काढले.पोलिसांना चुकवीत ते मुंबईला आले.मुंबईत लोकशाहीर म्हणून त्यांचा लौकिक झाला. त्यावेळी अमर शेख या ख्यातनाम मराठी लोकशाहीरांबरोबर अण्णाभाऊंचेही नाव लोकशाहीर म्हणून गाजू लागले.त्यांनी लिहिलेला ‘स्तालिनग्राडचा पवाडा’ १९४३ साली पार्टी या मासिकात प्रसिद्घ झाला.त्यांनी १९४४ साली शाहीर अमर शेख व गव्हाणकर यांच्या मदतीने ‘लाल बावटा’ कलापथक स्थापन केले. या कलापथकावर सरकारने बंदी घातली. ‘अमळनेरचे अमर हुतात्मे’ आणि ‘पंजाब-दिल्लीचा दंगा’ या त्यांच्या काव्यरचना १९४७ साली प्रसिद्घ झाल्या. ‘पंजाब-दिल्लीचा दंगा’ या रचनेत सर्व प्रागतिक शक्तींना एकत्र येऊन शांतता प्रस्थापित करण्याचे आवाहन त्यांनी केले होते.

         संयुक्त महाराष्ट्राच्या चळवळीत त्यांनी स्वतःला झोकून दिले होते. त्यांच्या शाहिरीत लावणी, पोवाडे, गीते, लोकनाटये आदींचा समावेश होता. ‘महाराष्ट्राची परंपरा’ (१९५०) ह्या नावाने त्यांनी या चळवळीसाठी पोवाडा लिहिला;  त्याचप्रमाणे मुंबई कुणाची ?  ह्या लोकनाट्याचे महाराष्ट्रभर प्रयोग केले. अकलेची गोष्ट (१९४५), देशभक्त घोटाळे (१९४६), शेटजींचे इलेक्शन (१९४६), बेकायदेशीर (१९४७), पुढारी मिळाला (१९५२), लोकमंत्र्यांचा दौरा (१९५२) ही त्यांची अन्य काही लोकनाटये. अण्णाभाऊंनी पारंपरिक तमाशाला आधुनिक लोकनाट्याचे रूप दिले.

           अण्णाभाऊंच्या साहित्यात त्यांची कथा-कादंबरीची निर्मितीही ठळकपणे नजरेत भरते. जिवंत काडतूस, आबी, खुळंवाडी, बरबाद्याकंजारी (१९६०), चिरानगरची भुतं (१९७८), कृष्णाकाठच्या कथा हे त्यांचे काही कथासंग्रह; त्यांनी पस्तीस कादंबऱ्या लिहिल्या. चित्रा (१९४५) हीत्यांची पहिली कादंबरी. त्यानंतर ३४ कादंबऱ्या त्यांनी लिहिल्या. त्यांत फकिरा (१९५९, आवृ.१६– १९९५), वारणेचा वाघ (१९६८), चिखलातीलकमळ, रानगंगा, माकडीचा माळ (१९६३), वैजयंता ह्यांसारख्या कादंबऱ्यांचा समावेश होतो. त्यांच्या फकिरा ह्या कादंबरीला महाराष्ट्र शासनाचा पुरस्कार मिळाला. वास्तव, आदर्श आणि स्वप्नरंजन यांचे मिश्रण त्या कादंबरीत आहे. सत्प्रवृत्तीचा, माणुसकीचा विजय हे अण्णाभाऊंच्या कादंबऱ्यांचे मुख्यसूत्र होय. त्यांच्या काही कादंबऱ्यांवर चित्रपटही निघाले : वैजयंता (१९६१, कादंबरी वैजयंता ), टिळा लावते मी रक्ताचा (१९६९, कादंबरी आवडी ),डोंगरची मैना (१९६९, कादंबरी माकडीचा माळ ), मुरली मल्हारीरायाची (१९६९, कादंबरी चिखलातील कमळ ), वारणेचा वाघ (१९७०, कादंबरीवारणेचा वाघ ), अशी ही साताऱ्याची तऱ्हा (१९७४, कादंबरी अलगूज ), फकिरा (कादंबरी फकिरा ). या शिवायव इनामदार (१९५८), पेंग्याचं लगीन,सुलतान ही नाटकेही त्यांनी लिहिली.

         उपेक्षित गुन्हेगार म्हणून कलंकित ठरवले गेलेले, दलित आणि श्रमिक यांच्या समृद्घीचे स्वप्न अण्णाभाऊ पाहात आले. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरयांच्या लढाऊ आणि विमोचक विचारांचे संस्कार त्यांच्या मनावर खोलवर झालेले होते. ‘जग बदल घालुनी घाव। सांगूनि गेले मज भीमराव॥’ हे त्यांचे गीतखूप गाजले. त्यांनी लिहिलेल्या लावण्यांत ‘माझी मैना गावावर राहिली’ आणि ‘मुंबईची लावणी’ या अजोड आणि अविस्मरणीय आहेत.

          अतिशय तळमळीने लिहिण्याची त्यांची वृत्ती होती. ‘पृथ्वी शेषाच्या मस्तकावर तरली नसून ती दलितांच्या तळहातावर तरलेली आहे’,असे ते म्हणत; आणि हाच त्यांच्या लेखनाचा प्रेरणा स्रोत होता.मानवी जीवनातील संघर्ष,नाटय,दुःख,दारिद्र्य त्यांच्या साहित्यातून प्रकट होते.त्यांच्या कथा-कादंबऱ्यांतून त्यांनी उभ्या केलेल्या माणसांत जबरदस्त जीवनेच्छा दिसते.त्यांच्यापासून प्रेरणा घेऊन दलित लेखकांची एक प्रतिभावान पिढी निर्माणझाली.त्यात बाबूराव बागूल,नामदेव ढसाळ,लक्ष्मण माने,यशवंत मनोहर,दया पवार,केशव मेश्राम,शरणकुमार लिंबाळे आदींचा अंतर्भाव होतो.

        अण्णाभाऊंची निरीक्षणशक्ती अत्यंत सूक्ष्म आहे. त्यांच्या लेखन शैलीला मराठमोळा,रांगडा पण लोभस घाट आहे.नाट्यमयता हाही त्यांच्यालेखनशैलीचा एक खास गुण.ज्या विपर्यस्त जीवनातून अण्णाभाऊंनी अनुभव आत्मसात केले, त्यांतील क्षणांचा वेग आणि आवेग त्यांच्या लेखनात जाणवतो.लवचिक भावचित्रे अंगासरशा मोडीने साकार करण्याची त्यांची लकबही स्वतंत्र आहे. लेखनावर त्यांनी जीव जडवला होता; त्यांनी ते विपुल केले.

         रशियाच्या ‘इंडो-सोव्हिएत कल्चरल सोसायटी’ च्या निमंत्रणावरून ते १९६१ साली रशियाला गेले. तेथील अनुभवांवर आधारित माझा रशियाचाप्रवास हे प्रवास वर्णन त्यांनी लिहिले.

          पुढे पुढे मात्र दारिद्र्य आणि एकाकी आयुष्य त्यांच्या वाट्याला प्रकर्षाने आले मराठी साहित्यातील प्रतिष्ठितांकडून त्यांची उपेक्षा झाली. विपन्नावस्थेत गोरेगाव (मुंबई) येथे त्यांचे निधन झाले.


महाराष्ट्रातील विद्यापीठांत अण्णाभाऊंवर अकरा प्रबंध प्रसिद्घ केले गेले आहेत. पुणे विद्यापीठात त्यांच्या सन्मानार्थ ‘अण्णाभाऊ साठे’ अध्यासन सुरु करण्यात आले आहे. त्यांच्या कथा-कादंबऱ्यांची केवळ भारतीयच नव्हे, तर २२ परकीय भाषांत भाषांतरे झाली आहेत.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

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१८ जुलै - दक्षिण आफ्रिकेचे पहिले कृष्णवर्णीय अध्यक्ष नेल्सन मंडेला यांचा जन्मदिन

*१८ जुलै - दक्षिण आफ्रिकेचे पहिले कृष्णवर्णीय अध्यक्ष नेल्सन मंडेला यांचा जन्मदिन* *जन्म - १८ जुलै १९१८* *मृत्यू - ५ डिसेंबर २०१३*;गांधीजींचा दक्षिण आफ्रिकेतील नागरी हक्कांचा लढा २० वर्षे चालू होता.तो १९१४ मध्ये संपला.त्यानंतर चार वर्षांनी मंडेला यांचा जन्म झाला.पीटरमारित्झबर्ग येथे महात्मा गांधींना ते कृष्णवर्णीय असल्याने रेल्वेतून फेकण्यात आले,त्या घटनेचा मंडेला यांच्यावर खोलवर परिणाम झाला होता.मंडेला यांनी वर्णद्वेष विरोधी चळवळीत प्रेरणास्थान म्हणून नेहमी गांधीजींना समोर ठेवले होते. २७ वर्षे ते वर्णविरोधी लढय़ासाठी रॉबेन बेटांवर तुरुंगात होते. रिव्होनिया येथील खटल्यात त्यांना पन्नास वर्षांपूर्वी इतरांसमवेत दोषी ठरवण्यात आले होते. १९९९ मध्ये अध्यक्षपदाची एक कारकीर्द पूर्ण करून ते पायउतार झाले.महात्मा गांधी यांच्यापासून प्रेरणा घेऊन दक्षिण आफ्रिकेतील वर्णद्वेषी राजवट उलथवून लावणारे शांततेचा नोबेल पुरस्कार मिळालेले नेते व दक्षिण आफ्रिकेचे पहिले कृष्णवर्णीय अध्यक्ष नेल्सन मंडेला यांनी नागरी हक्कांसाठी दिलेला लढा हा मार्टिन ल्यूथर किंग व अब्राहम लिंकन यांच्या तोडीचा होता. या लढ्यात मंडेला यांनी एवढा त्याग केला होता की संयुक्त राष्ट्र्संघानेही रोबेन बेटाला जागतिक वारशाचा दर्जा दिला आहे.जेथे मंडेलांना डांबले होते तेथे आजही टेबलवर लोखंडाचे एक ताट व कप ठेवलेला आढळतो.जगभरातील पर्यटक येथे गर्दी करतात. 


‘लाँग वॉक टू फ्रीडम’ या आत्मचरित्रात मंडेला म्हणतात, ‘कोठडी तीन पावलांचीच होती. झोपायचे म्हटले तर डोके आणि पाय भिंतीला लागत.१९९० मध्ये मंडेला यांना भारतरत्न देण्यात आले होते.मंडेला यांना शांततेचा नोबेल पुरस्कार ही मिळाला होता. 


२००० मध्ये त्यांनी टाइम नियतकालिकासाठी लेख लिहिला होता, त्यात त्यांनी गांधीजींना भारताच्या अहिंसक लढय़ाचे पिता म्हटले होते व गांधीजींच्या लढय़ाची मुळे आफ्रिकेत होती,असेही म्हटले होते.ते एके ठिकाणी लिहितात की,गांधीजींचा जन्म भारतात झाला पण आम्ही त्यांना दत्तक घेतले.ते भारतीय व दक्षिण आफ्रिकी नागरिक होते. 


दोन्ही देशांनी त्यांच्या बौद्धिक व नैतिक घडणीत मोठा वाटा उचलला होता.त्यांनी अनेक देशांतील वसाहतवादी राजवटीविरोधातील लढय़ांना आकार दिला.नेल्सन मंडेला वकील होते व बॉक्सरही होते. 


नेल्सन मंडेला यांचे ५ डिसेंबर २०१३ रोजी निधन झाले. त्यांना आदरांजली !

*🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏*

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संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

बुधवार, १३ जुलै, २०२२

गोपाळ गणेश आगरकर* 🗞️📰🗞️📰🗞️📰🗞️📰🗞️📰🗞️ *जन्म : १४ जुलै १८५६ (टेंभू-सातारा)*

 *✒️🗒️🗞️गोपाळ गणेश आगरकर*

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*जन्म :  १४ जुलै १८५६ (टेंभू-सातारा)*

 *मृत्यू :   १७ जून १८९५*

         हे महाराष्ट्रातील थोर समाज सुधारक होते.आधुनिक महाराष्ट्राच्या इतिहासात सामाजिक जागृतीत गो.ग.आगरकर यांचे योगदान मोलाचे आहे.त्यांनी समाज प्रबोधन करण्यासाठी सुधारक, केसरी,मराठा या वृत्तपत्रांचा आधार घेतला.सामाजिक समता,स्त्री-पुरुष समानता आणि विज्ञान‌- निष्ठा‌ ही त्यांची जीवनमूल्ये होती.मुलींनासुद्धा शिक्षण मिळायला पाहिजे असा लेख त्यांनी सुधारक या वृत्तपत्रात लिहिला.असा लेख लिहिण्याचे धारिष्ट्य त्यापूर्वी कोणाचे नव्हते. बुद्धिप्रामाण्य वादाचे पुरस्कार करून महाराष्ट्रामध्ये समाज सुधारणा घडून आणणे या उद्देशाने समाजसुधारणा करणाऱ्या समाजसुधारकांमध्ये गोपाळ गणेश आगरकर यांचे नाव प्राधान्याने घ्यावी लागते महाराष्ट्रातील समाज सुधारकांच्या मांदियाळीतील क्रांतीकारी समाजसुधारक म्हणून गोपाळ गणेश आगरकर हे महत्त्वपूर्ण ठरतात.


गोपाळ गणेश आगरकर यांच्या स्मृतिप्रीत्यर्थ आचार्य अत्रे यांनी पुण्यात इ.स. १९३४साली आगरकर हायस्कूल ही मुलींची शाळा स्थापन केली.


*आरंभीचा काळ*

आगरकरांचा जन्म सातारा जिल्ह्यातील टेंभू या खेड्यात,एका गरीब देशस्थ ऋग्वेदी ब्राह्मण कुटुंबात झाला.घरच्या गरिबीमुळे शिक्षणाचा खर्च भागविण्यासाठी त्यांना अनेक मार्ग चोखाळावे लागले.कधी मामलेदार कचेरीत उमेदवारी करून, कधी माधुकरी मागून तर कधी कंपाउंडरचे काम करून त्यांनी आपले मॅट्रिकपर्यंतचे शिक्षण पूर्ण केले. शिक्षणासाठी ते कर्‍हाड, अकोला, रत्नागिरी येथे गेले. १८७५ साली ते मॅट्रिक झाले व महाविद्यालयीन शिक्षण घेण्यासाठी पुण्याला आले. पुण्यात त्यांनी डेक्कन कॉलेजला प्रवेश घेतला.वर्तमानपत्रात लिखाण करणे,वक्तृत्व स्पर्धा,निबंध स्पर्धा यांत भाग घेऊन बक्षिसे जिंकणे,शिष्यवृत्ती मिळवणे अशा प्रकारे त्यांची गुजराण चालत असे. गोपाळ गणेश आगरकर व लोकमान्य टिळक यांची ओळख १८७९मध्ये एम. ए. करतांना झाली. त्यांनी एकत्रच शिक्षण घेतले होते. त्यांनीच त्यावेळेस केसरी वृत्तपत्र सुरु करायचे ठरवले होते.त्यात लोकमान्य टिळक,गोपाळ गणेश आगरकर,व विष्णुशास्त्री चिपळूणकर या तिघांचा पुढाकार होता.



*कारकीर्द*

आगरकर हे बाळ गंगाधर टिळकांनी सुरू केलेल्या केसरी वृत्तपत्राचे पहिले संपादक (१८८०-१८८१) होते.


पुण्यात महाविद्यालयीन शिक्षण घेत असतांना ते व लोकमान्य टिळक एकत्र आले. तोपर्यंत स्वदेशसेवेची प्रेरणा दोघांच्याही मनात जागी झाली होती. दिनांक १ जानेवारी, १८८० रोजी विष्णुशास्त्री चिपळूणकरांनी ‘न्यू इंग्लिश स्कूल’ ची स्थापना केली. आगरकर १८८१ मध्ये एम. ए. झाल्यावर चिपळूणकरांना जाऊन मिळाले. आगरकर व टिळक यांनी १८८१ मध्ये इंग्रजीतून ‘मराठा’, तर मराठीतून ‘केसरी’ अशी दोन वृत्तपत्रे चालू केली. केसरीचे संपादकत्व आगरकरांनी स्वीकारले.


पुढे लोकमान्य टिळक व आगरकर यांनी २४ ऑक्टोबर १८८४ ला डेक्कन एज्युकेशन सोसायटीची स्थापना केली व त्या अंतर्गत १८८५ साली फर्ग्युसन कॉलेजची स्थापना झाली. आगरकर याच कॉलेजात शिकवू लागले, पुढे ते फर्ग्युसनचे प्राचार्यही झाले


*उल्लेखनीय कार्य*

१८८४ साली बाळ गंगाधर टिळक, विष्णुशास्त्री चिपळूणकर आणि आगरकरांनी पुण्यात ‘डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी’ स्थापली.१८८८ साली त्यांनी ‘सुधारक’ हे वृत्तपत्र सुरू केले.


गोपाळ गणेश आगरकर हे, भौतिकता – ऐहिकता, बुद्धिप्रामाण्य, व्यक्तिस्वातंत्र्य या आधुनिक तत्त्वांना प्रमाण मानून जिवाच्या कराराने समाज सुधारणांचा पाठपुरावा करणारे समाजप्रबोधक होते. महाराष्ट्रातील समाज परिवर्तनाच्या प्रक्रियेला विवेकाचे, बुद्धिप्रामाण्याचे व व्यक्तिस्वातंत्र्याचे अधिष्ठान देऊन,परिवर्तनाचे विज्ञाननिष्ठ तत्त्वज्ञान निर्माण करण्याचे श्रेय गोपाळ आगरकरांकडे जाते.



राजकीय स्वातंत्र्याआधी समाजसुधारणा महत्त्वाची आहे. बालविवाह, अस्पृश्यता यांसारख्या समाजातील अनिष्ट रूढी आधी नष्ट केल्या पाहिजेत अशा विचारांचे ते होते. समाजसुधारणा विरुद्ध राजकीय स्वातंत्र्य याच वादातून १८८७ च्या ऑक्टोबरमध्ये त्यांनी केसरीचे संपादकत्व सोडले. १८८८ साली त्यांनी ‘सुधारक (वृत्तपत्र)’ हे वृत्तपत्र सुरू केले. व्यक्तिस्वातंत्र्य, बुद्धिवाद, भौतिकता या मूल्यांचा प्रचार त्यांनी सुधारकमधून केला, तसेच जातिव्यवस्था, चातुर्वर्ण्य, बालविवाह, ग्रंथप्रामाण्य- धर्मप्रामाण्य, केशवपन इत्यादी अन्यायकारक परंपरांना त्यांनी विरोध केला. अंधश्रद्धा, पाखंडीपणा यांच्यावर प्रहार केले. सुधारक हे इंग्रजी व मराठी या दोन्ही भाषांतून प्रकाशित केले जात होते. इंग्रजी सुधारकची जबाबदारी काही काळ नामदार गोखले यांनी सांभाळली होती.



आगरकर व्यक्तिवादाचे पुरस्कर्ते होते. बुद्धीला जी गोष्ट पटेल ती बोलणे व शक्य तितकी आचरणात आणणे, मग त्याला इतरत्र पूज्य ग्रंथात वा लोकरूढीत आधार असो वा नसो, हे आगरकरांचे महत्त्वाचे तत्त्व होते. स्त्रियांच्या अगदी पेहेरावाविषयीही त्यांनी आधुनिक विचार समाजासमोर मांडले होते. राजकीय व सामाजिक बाबतीत समता, संमती व स्वातंत्र्य हे घटक महत्त्वाचे आहेत; मनुष्यकृत विषमता शक्य तितकी कमी असावी; सर्वांस सारखे, निदान होईल तितके सारखे सुख मिळण्याची व्यवस्था होत जाणे म्हणजे सुधारक होत जाणे – अशी त्यांची सुटसुटीत विचारसरणी होती. ‘विचारकलह हा समाजस्वास्थ्याला आवश्यक आहे,’ असे त्यांचे मत होते. त्यांच्या या विचारसरणीमुळे त्यांना टोकाचा विरोध झाला. सनातनी लोकांनी त्यांच्या जिवंतपणीच त्यांची प्रतीकात्मक प्रेतयात्रा काढली होती. पण तरीही निग्रहाने आणि निश्चयाने त्यांनी आपल्या विचारांचा पाठपुरावा केला.


वयाच्या अवघ्या एकोणचाळीसाव्या वर्षी त्यांचे निधन झाले


*पत्रकारिता*

१८८१ मध्ये ‘केसरी’ हे वृत्तपत्र सुरू केले. याचे प्रथम संपादक म्हणून आगरकरांनी १८८८ पर्यंत काम केले. आगरकर हे बुद्धिवादी होते. त्यांनी प्रारंभीच्या काळात जनतेच्या विचार परिवर्तनाविषयक लिखाणांवर भर दिला. समाज सुधारणांच्या मूलगामी विचारांतून सामाजिक सुधारणा वेग धरू शकतील याबाबत त्यांनी जागरूकतेने सामाजिक सुधारणांवर आग्रही राहून ‘केसरी’त लिखाण केले. त्याचबरोबर राजकीय स्वातंत्र्याचाही पुरस्कार केला. आगरकरांचा सडेतोडपणा, वैविध्य यामुळे ‘केसरी’ची लोकप्रियता वाढली खरी; परंतु पुढे टिळक व आगरकरांत वैचारिक मतभेद वाढत गेल्यामुळे १८९० पासुन ‘केसरी’चे काम लोकमान्य टिळक पाहू लागले.


आगरकरांनी पुण्यातच सुधारक वृत्तपत्र सुरू केले.सुधारक मधून आगरकरांनी व्यक्तिस्वातंत्र्य, अनिष्ट धार्मिक रूढींचा निषेध, शिक्षणाचे महत्त्व इ. मुद्यांचा प्रसार केला.तत्कालीन समाजाच्या विरोधात जाताना आगरकरांना प्रचंड मानसिक व शारीरिक त्रास सहन करावा लागला.


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*🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏*

संकलन -) 

गजानन गोपेवाड 

गुरुवार, ३० जून, २०२२

३० जुन १९०५* *अल्बर्ट आइनस्टाइन यांनी त्यांचा क्रांतिकारक सापेक्षतावादाचा सिद्धांत मांडला.*

 *३० जुन १९०५*


*अल्बर्ट आइनस्टाइन यांनी त्यांचा क्रांतिकारक सापेक्षतावादाचा सिद्धांत मांडला.*


सापेक्षतावादाचा विशेष सिद्धान्त ३० जून  इ.स. १९०५ रोजी प्रसिद्ध भौतिकशास्त्रज्ञ अ‍ॅल्बर्ट आइन्स्टाइन यांनी मांडला. त्या सिद्धान्तामध्ये त्यांनी दाखवून दिले की सर आयझॅक न्यूटन यांनी सांगितलेल्या गतीच्या नियमांनुसार विद्युत-चुंबकीय लहरींची (यामध्ये प्रकाशकिरणांचादेखील समावेश होतो) वागणूक स्पष्ट करता येत नाही आणि विशिष्ट परिस्थितीमध्ये सिद्धान्त कोलमडून पडतो. त्या परिस्थितीचे विश्लेषण, स्पष्टीकरण आणि अनुमान आइन्स्टाइन यांनी सापेक्षतावादाच्या विशेष सिद्धान्तात केले. त्यानंतर काही वर्षांनंतर त्यांनी याच सिद्धान्तामध्ये गुरुत्वाकर्षण बलाचासमावेश करून सापेक्षतावादाचा सामान्य सिद्धान्तसांगितला. त्यामुळे केवळ सापेक्षतावादाचा सिद्धान्त असे म्हणणे बरोबर नाही तर सापेक्षतावादाचा सामान्य सिद्धान्त किंवा सापेक्षतावादाचा विशेष सिद्धान्त अधिक योग्य आहे. या दोन्ही सिद्धान्तांनुसार विद्युत-चुंबकीय लहरींचा वेग सापेक्ष परिस्थितीमध्ये नेहमी स्थिर असतो आणि निरीक्षकाच्या वेगावर आणि स्थळावर अवलंबून नसतो. थोडक्यात (न्यूटनच्या गतीच्या नियमांनुसार) संदर्भाची निरपेक्ष चौकट (Frame of Reference (इंग्रजी आवृत्ती)) ही निरीक्षकाकडे न राहता सापेक्षतेच्या सिद्धान्तानुसार प्रकाशाचा निर्वात क्षेत्रातील वेग हाच ती निरपेक्ष चौकट बनला. *E=mc^2*

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संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

गुरुवार, १४ एप्रिल, २०२२

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

चैत्र मास,शुक्ल पक्ष,*चतुर्दशी*,उ.फा.नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,बसन्त ऋतु,युगाब्द ५१२४,विक्रम संवत-२०७९, 

शुक्रवार, १५ एप्रिल २०२२.

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                        *प्रभात दर्शन*

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लभन्ते ब्रह्मनिर्वाण

                  मृषयः क्षीणकल्मषाः,

छिन्नद्वैधा यतात्मानः 

                  सर्वभूतहिते रताः।


 *भावार्थ :- जिनके सब कष्ट एवं पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में लीन हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता मनुष्य शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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गाथा बलिदानाची* *गुरु नानक देव* *जन्म : १५ अप्रैल,


🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची*                                     

                *गुरु नानक देव*


       *जन्म : १५ अप्रैल, १४६९*

        (तलवंडी, पंजाब, भारत)

       *मृत्यु : २२ सितंबर, १५३९*

                 (भारत)                                                 पिता :  कालू

माता : तृप्ता

पत्नी : सुलक्खनी

संतान : श्रीचन्द,लक्ष्मीदास

कर्म भूमि : भारत

कर्म-क्षेत्र : समाज सुधारक

मुख्य रचनाएँ : जपुजी, तखारी' राग के बारहमाहाँ

भाषा : फ़ारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी , ब्रजभाषा, खड़ीबोली

प्रसिद्धि : सिक्खों के प्रथम गुरु

नागरिकता : भारतीय

उत्तराधिकारी : गुरु अंगद देव

अन्य जानकारी: गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में पैगम्बर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्म-सुधारक, समाज-सुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबन्धु आदि सभी के गुण उत्कृष्ट मात्रा में समेटे हुए थे।

गुरु नानक  सिक्खों के प्रथम गुरु (आदि गुरु) थे। इनके अनुयायी इन्हें 'गुरु नानक', 'बाबा नानक' और 'नानकशाह' नामों से संबोधित करते हैं। गुरु नानक २० अगस्त,१५०७ को सिक्खों के प्रथम गुरु बने थे। वे इस पद पर २२ सितम्बर,१५३९ तक रहे।


❇️ *परिचय*

पंजाब के तलवंडी नामक स्थान में १५ अप्रैल, १४६९ को एक किसान के घर गुरु नानक उत्पन्न हुए। यह स्थान लाहौर से ३० मील पश्चिम में स्थित है। अब यह 'नानकाना साहब' कहलाता है। तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। नानक के पिता का नाम कालू एवं माता का नाम तृप्ता था। उनके पिता खत्री जाति एवं बेदी वंश के थे। वे कृषि और साधारण व्यापार करते थे और गाँव के पटवारी भी थे। गुरु नानक देव की बाल्यावस्था गाँव में व्यतीत हुई। बाल्यावस्था से ही उनमें असाधारणता और विचित्रता थी। उनके साथी जब खेल-कूद में अपना समय व्यतीत करते तो वे नेत्र बन्द कर आत्म-चिन्तन में निमग्न हो जाते थे। इनकी इस प्रवृत्ति से उनके पिता कालू चिन्तित रहते थे।


💁‍♂️ *आरंभिक जीवन*

सात वर्ष की आयु में वे पढ़ने के लिए गोपाल अध्यापक के पास भेजे गये। एक दिन जब वे पढ़ाई से विरक्त हो, अन्तर्मुख होकर आत्म-चिन्तन में निमग्न थे, अध्यापक ने पूछा- पढ़ क्यों नहीं रहे हो? गुरु नानक का उत्तर था- मैं सारी विद्याएँ और वेद-शास्त्र जानता हूँ। गुरु नानक देव ने कहा- मुझे तो सांसारिक पढ़ाई की अपेक्षा परमात्मा की पढ़ाई अधिक आनन्दायिनी प्रतीत होती है, यह कहकर निम्नलिखित वाणी का उच्चारण किया- मोह को जलाकर (उसे) घिसकर स्याही बनाओ, बुद्धि को ही श्रेष्ठ काग़ज़ बनाओ, प्रेम की क़लम बनाओ और चित्त को लेखक। गुरु से पूछ कर विचारपूर्वक लिखो (कि उस परमात्मा का) न तो अन्त है और न सीमा है। इस पर अध्यापक जी आश्चर्यान्वित हो गये और उन्होंने गुरु नानक को पहुँचा हुआ फ़क़ीर समझकर कहा- तुम्हारी जो इच्छा हो सो करो। इसके पश्चात् गुरु नानक ने स्कूल छोड़ दिया। वे अपना अधिकांश समय मनन, ध्यानासन, ध्यान एवं सत्संग में व्यतीत करने लगे। गुरु नानक से सम्बन्धित सभी जन्म साखियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं कि उन्होंने विभिन्न सम्प्रदायों के साधु-महत्माओं का सत्संग किया था। उनमें से बहुत से ऐसे थे, जो धर्मशास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित थे। अन्त: साक्ष्य के आधार पर यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि गुरु नानक ने फ़ारसी का भी अध्ययन किया था। 'गुरु ग्रन्थ साहब' में गुरु नानक द्वारा कुछ पद ऐसे रचे गये हैं, जिनमें फ़ारसी शब्दों का आधिक्य है।


👦🏻 *बचपन*

गुरु नानक की अन्तमुंखी-प्रवृत्ति तथा विरक्ति-भावना से उनके पिता कालू चिन्तित रहा करते थे। नानक को विक्षिप्त समझकर कालू ने उन्हें भैंसे चराने का काम दिया। भैंसे चराते-चराते नानक जी सो गये। भैंसें एक किसान के खेत में चली गयीं और उन्होंने उसकी फ़सल चर डाली। किसान ने इसका उलाहना दिया किन्तु जब उसका खेत देखा गया, तो सभी आश्चर्य में पड़े गये। फ़सल का एक पौधा भी नहीं चरा गया था। ९ वर्ष की अवस्था में उनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। यज्ञोपवीत के अवसर पर उन्होंने पण्डित से कहा - दया कपास हो, सन्तोष सूत हो, संयम गाँठ हो, (और) सत्य उस जनेउ की पूरन हो। यही जीव के लिए (आध्यात्मिक) जनेऊ है। ऐ पाण्डे यदि इस प्रकार का जनेऊ तुम्हारे पास हो, तो मेरे गले में पहना दो, यह जनेऊ न तो टूटता है, न इसमें मैल लगता है, न यह जलता है और न यह खोता ही है।                           👫🏻 *विवाह*


सन १४८५ ई. में नानक का विवाह बटाला निवासी, मूला की कन्या सुलक्खनी से हुआ। उनके वैवाहिक जीवन के सम्बन्ध में बहुत कम जानकारी है। २८ वर्ष की अवस्था में उनके बड़े पुत्र श्रीचन्द का जन्म हुआ। ३१ वर्ष की अवस्था में उनके द्वितीय पुत्र लक्ष्मीदास अथवा लक्ष्मीचन्द उत्पन्न हुए। गुरु नानक के पिता ने उन्हें कृषि, व्यापार आदि में लगाना चाहा किन्तु उनके सारे प्रयास निष्फल सिद्ध हुए। घोड़े के व्यापार के निमित्त दिये हुए रुपयों को गुरु नानक ने साधुसेवा में लगा दिया और अपने पिताजी से कहा कि यही सच्चा व्यापार है। नवम्बर, सन् १५०४ ई. में उनके बहनोई जयराम (उनकी बड़ी बहिन नानकी के पति) ने गुरु नानक को अपने पास सुल्तानपुर बुला लिया। नवम्बर,१५०४ ई. से अक्टूबर १५०७ ई. तक वे सुल्तानपुर में ही रहें अपने बहनोई जयराम के प्रयास से वे सुल्तानपुर के गवर्नर दौलत ख़ाँ के यहाँ मादी रख लिये गये। उन्होंने अपना कार्य अत्यन्त ईमानदारी से पूरा किया। वहाँ की जनता तथा वहाँ के शासक दौलत ख़ाँ नानक के कार्य से बहुत सन्तुष्ट हुए। वे अपनी आय का अधिकांश भाग ग़रीबों और साधुओं को दे देते थे। कभी-कभी वे पूरी रात परमात्मा के भजन में व्यतीत कर देते थे। मरदाना तलवण्डी से आकर यहीं गुरु नानक का सेवक बन गया था और अन्त तक उनके साथ रहा। गुरु नानक देव अपने पद गाते थे और मरदाना रवाब बजाता था। गुरु नानक नित्य प्रात: बेई नदी में स्नान करने जाया करते थे। कहते हैं कि एक दिन वे स्नान करने के पश्चात् वन में अन्तर्धान हो गये। उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। परमात्मा ने उन्हें अमृत पिलाया और कहा- मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ, मैंने तुम्हें आनन्दित किया है। जो तुम्हारे सम्पर्क में आयेगें, वे भी आनन्दित होगें। जाओ नाम में रहो, दान दो, उपासना करो, स्वयं नाम लो और दूसरों से भी नाम स्मरण कराओं। इस घटना के पश्चात् वे अपने परिवार का भार अपने श्वसुर मूला को सौंपकर विचरण करने निकल पड़े और धर्म का प्रचार करने लगे। मरदाना उनकी यात्रा में बराबर उनके साथ रहा।


👨‍🦯 *यात्राएँ*

गुरु नानक की पहली 'उदासी' (विचरण यात्रा) अक्तूबर , १५०७ ई. में १५१५ ई. तक रही। इस यात्रा में उन्होंने हरिद्वार, अयोध्या, प्रयाग, काशी, गया, पटना, असम, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वर, सोमनाथ, द्वारिका, नर्मदातट, बीकानेर, पुष्कर तीर्थ, दिल्ली, पानीपत, कुरुक्षेत्र, मुल्तान, लाहौर आदि स्थानों में भ्रमण किया। उन्होंने बहुतों का हृदय परिवर्तन किया। ठगों को साधु बनाया, वेश्याओं का अन्त:करण शुद्ध कर नाम का दान दिया, कर्मकाण्डियों को बाह्याडम्बरों से निकालकर रागात्मिकता भक्ति में लगाया, अहंकारियों का अहंकार दूर कर उन्हें मानवता का पाठ पढ़ाया। यात्रा से लौटकर वे दो वर्ष तक अपने माता-पिता के साथ रहे।

उनकी दूसरी 'उदासी' १५१७ ई. से १५१८ ई. तक यानी एक वर्ष की रही। इसमें उन्होंने ऐमनाबाद, सियालकोट, सुमेर पर्वत आदि की यात्रा की और अन्त में वे करतारपुर पहुँचे।

तीसरी 'उदासी' १५१८ ई. से १५२१ ई. तक लगभग तीन वर्ष की रही। इसमें उन्होंने रियासत बहावलपुर, साधुबेला (सिन्धु), मक्का, मदीना, बग़दाद, बल्ख बुखारा, क़ाबुल, कन्धार, ऐमानाबाद आदि स्थानों की यात्रा की। १५२१ ई. में ऐमराबाद पर बाबर का आक्रमण गुरु नानक ने स्वयं अपनी आँखों से देखा था। अपनी यात्राओं को समाप्त कर वे करतारपुर में बस गये और १५२१ ई. से १५३९ ई. तक वहीं रहे।             🌀 *व्यक्तित्व*

गुरुनानक का व्यक्तित्व असाधारण था। उनमें पैगम्बर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्म-सुधारक, समाज-सुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबन्धु सभी के गुण उत्कृष्ट मात्रा में विद्यमान थे। उनमें विचार-शक्ति और क्रिया-शक्ति का अपूर्व सामंजस्य था। उन्होंने पूरे देश की यात्रा की। लोगों पर उनके विचारों का असाधारण प्रभाव पड़ा। उनमें सभी गुण मौजूद थे। पैगंबर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्मसुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबंधु आदि सभी गुण जैसे एक व्यक्ति में सिमटकर आ गए थे। उनकी रचना 'जपुजी' का सिक्खों के लिए वही महत्त्व है जो हिंदुओं के लिए गीता का है।


✍️ *रचनाएँ और शिक्षाएँ*

'श्री गुरु-ग्रन्थ साहब' में उनकी रचनाएँ 'महला १' के नाम से संकलित हैं। गुरु नानक की शिक्षा का मूल निचोड़ यही है कि परमात्मा एक, अनन्त, सर्वशक्तिमान, सत्य, कर्त्ता, निर्भय, निर्वर, अयोनि, स्वयंभू है। वह सर्वत्र व्याप्त है। मूर्ति-पूजा आदि निरर्थक है। बाह्य साधनों से उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। आन्तरिक साधना ही उसकी प्राप्ति का एक मात्र उपाय है। गुरु-कृपा, परमात्मा कृपा एवं शुभ कर्मों का आचरण इस साधना के अंग हैं। नाम-स्मरण उसका सर्वोपरि तत्त्व है, और 'नाम' गुरु के द्वारा ही प्राप्त होता है। गुरु नानक की वाणी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से ओत-प्रोत है। उनकी वाणी में यत्र-तत्र तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक स्थिति की मनोहर झाँकी मिलती है, जिसमें उनकी असाधारण देश-भक्ति और राष्ट्र-प्रेम परिलक्षित होता है। उन्होंने हिंन्दूओं-मुसलमानों दोनों की प्रचलित रूढ़ियों एवं कुसंस्कारों की तीव्र भर्त्सना की है और उन्हें सच्चे हिन्दू अथवा सच्चे मुसलमान बनने की विधि बतायी है। सन्त-साहित्य में गुरु नानक ही एक ऐसे व्यक्ति हैं; जिन्होंने स्त्रियों की निन्दा नहीं की, अपितु उनकी महत्ता स्वीकार की है। गुरुनानक देव जी ने अपने अनु‍यायियों को जीवन की दस शिक्षाएँ दी-


ईश्वर एक है।

सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो।

ईश्वर सब जगह और प्राणी मात्र में मौजूद है।

ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता।

ईमानदारी से और मेहनत कर के उदरपूर्ति करनी चाहिए।

बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएँ।

सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा माँगनी चाहिए।

मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए।

सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं।

भोजन शरीर को ज़िंदा रखने के लिए ज़रूरी है पर लोभ-लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।                             🔷 *भक्त कवि गुरु नानक*

पंजाब में मुसलमान बहुत दिनों से बसे थे जिससे वहाँ उनके कट्टर 'एकेश्वरवाद' का संस्कार धीरे - धीरे प्रबल हो रहा था। लोग बहुत से देवी देवताओं की उपासना की अपेक्षा एक ईश्वर की उपासना को महत्व और सभ्यता का चिह्न समझने लगे थे। शास्त्रों के पठन पाठन का क्रम मुसलमानों के प्रभाव से प्राय: उठ गया था जिससे धर्म और उपासना के गूढ़ तत्व को समझने की शक्ति नहीं रह गई थी। अत: जहाँ बहुत से लोग जबरदस्ती मुसलमान बनाए जाते थे वहाँ कुछ लोग शौक़ से भी मुसलमान बनते थे। ऐसी दशा में कबीर द्वारा प्रवर्तित 'निर्गुण संत मत' एक बड़ा भारी सहारा समझ पड़ा।


☮️ *निर्गुण उपासना*

गुरुनानक आरंभ से ही भक्त थे अत: उनका ऐसे मत की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक था, जिसकी उपासना का स्वरूप हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को समान रूप से ग्राह्य हो। उन्होंने घर बार छोड़ बहुत दूर दूर के देशों में भ्रमण किया जिससे उपासना का सामान्य स्वरूप स्थिर करने में उन्हें बड़ी सहायता मिली। अंत में कबीरदास की 'निर्गुण उपासना' का प्रचार उन्होंने पंजाब में आरंभ किया और वे सिख संप्रदाय के आदिगुरु हुए। कबीरदास के समान वे भी कुछ विशेष पढ़े लिखे न थे। भक्तिभाव से पूर्ण होकर वे जो भजन गाया करते थे उनका संग्रह (संवत् १६६१) ग्रंथसाहब में किया गया है। ये भजन कुछ तो पंजाबी भाषा में हैं और कुछ देश की सामान्य काव्य भाषा हिन्दी में हैं। यह हिन्दी कहीं तो देश की काव्यभाषा या ब्रजभाषा है, कहीं खड़ी बोली जिसमें इधर उधर पंजाबी के रूप भी आ गए हैं, जैसे चल्या, रह्या। भक्त या विनय के सीधे सादे भाव सीधी सादी भाषा में कहे गए हैं, कबीर के समान अशिक्षितों पर प्रभाव डालने के लिए टेढ़े मेढ़े रूपकों में नहीं। इससे इनकी प्रकृति की सरलता और अहंभावशून्यता का परिचय मिलता है। संसार की अनित्यता, भगवद्भक्ति और संत स्वभाव के संबंध में उन्होंने कहा हैं -


इस दम दा मैनूँ कीबे भरोसा, आया आया, न आया न आया।

यह संसार रैन दा सुपना, कहीं देखा, कहीं नाहि दिखाया।

सोच विचार करे मत मन मैं, जिसने ढूँढा उसने पाया।

नानक भक्तन दे पद परसे निसदिन राम चरन चित लाया


जो नर दु:ख में दु:ख नहिं मानै।

सुख सनेह अरु भय नहिं जाके, कंचन माटी जानै

नहिं निंदा नहिं अस्तुति जाके, लोभ मोह अभिमाना।

हरष सोक तें रहै नियारो, नाहि मान अपमाना

आसा मनसा सकल त्यागि कै जग तें रहै निरास।

काम, क्रोध जेहि परसे नाहि न तेहिं घट ब्रह्म निवासा

गुरु किरपा जेहि नर पै कीन्हीं तिन्ह यह जुगुति पिछानी।

नानक लीन भयो गोबिंद सो ज्यों पानी सँग पानी।


📝 *प्रकृति चित्रण*


गुरु नानक देव, तलवंडी, पंजाब

गुरु नानक की कविता में कहीं-कहीं प्रकृति का बड़ा सुन्दर चित्रण मिलता है। 'तखारी' राग के बारहमाहाँ (बारहमासा) में प्रत्येक मास का हृदयग्राही वर्णन है। चैत्र में सारा वन प्रफुल्लित हो जाता है, पुष्पों पर भ्रमरों का गुंजन बड़ा ही सुहावना लगता है। वैशाख में शाखाएँ अनेक वेश धारण करती हैं। इसी प्रकार ज्येष्ठ-आषाढ़ की तपती धरती, सावन-भादों की रिमझिम, दादर, मोर, कोयलों की पुकारें, दामिनी की चमक, सर्पों एवं मच्छरों के दर्शन आदि का रोचक वर्णन है। प्रत्येक ऋतु की विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है।                                        🟡 *पंजासाहब*

मुख्य लेख : पंजासाहब

सिक्ख तीर्थ पेशावर जाने वाले मार्ग पर तक्षशिला से एक स्टेशन आगे तथा हसन अब्दाल से दो मील दक्षिण में पंजासाहब स्थान स्थित है।


🔮 *राग और रस*

गुरु नानक की वाणी में शान्त एवं श्रृंगार रस की प्रधानता है। इन दोनों रसों के अतिरिक्त, करुण, भयानक, वीर, रौद्र, अद्भुत, हास्य और वीभत्स रस भी मिलते हैं। उनकी कविता में वैसे तो सभी प्रसिद्ध अलंकार मिल जाते हैं, किन्तु उपमा और रूपक अलंकारों की प्रधानता है। कहीं-कहीं अन्योक्तियाँ बड़ी सुन्दर बन पड़ी हैं। गुरु नानक ने अपनी रचना में निम्नलिखित उन्नीस रागों के प्रयोग किये हैं- सिरी, माझ, गऊड़ी, आसा, गूजरी, बडहंस, सोरठि, धनासरी, तिलंग, सही, बिलावल, रामकली, मारू, तुखारी, भरेउ, वसन्त, सारंग, मला, प्रभाती।


🌀 *भाषा*

भाषा की दृष्टि से गुरु नानक की वाणी में फ़ारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी , ब्रजभाषा, खड़ीबोली आदि के प्रयोग हुए हैं। संस्कृत, अरबी और फ़ारसी के अनेक शब्द ग्रहण किये गये हैं। १५२१ तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, फ़ारस और अरब के मुख्य-मुख्य स्थानों का भ्रमण किया।            🪔 *मृत्यु*

गुरु नानक की मृत्यु सन् १५३९ ई. में हुई। इन्होंने गुरुगद्दी का भार गुरु अंगददेव (बाबा लहना) को सौंप दिया और स्वयं करतारपुर में 'ज्योति' में लीन हो गए। गुरु नानक आंतरिक साधना को सर्वव्यापी परमात्मा की प्राप्ति का एकमात्र साधन मानते थे। वे रूढ़ियों के कट्टर विरोधी थे। गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक,योगी,गृहस्थ,धर्मसुधारक,समाजसुधारक,कवि,देशभक्त और विश्वबंधु-सभी के गुण समेटे हुए थे।                                                                                                                                                                                                                                 

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳   

🙏🙏🙏 *शुभ प्रभात*🙏🙏🙏

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

गाथा बलिदानाची वर्धमान महाविर

 


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🚩🚩 *गाथा बलिदानाची* 🚩🚩

       

              *वर्धमान महावीर*

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      *जन्म : ई.पू. ५९९*

  [ क्षत्रिय कुण्डग्राम (कुंडलपुर, वैशाली) बिहार]

मृत्यु स्थान : पावापुरी

 अन्य नाम : वर्धमान, आदिनाथ, 'अर्हत', 'जिन', 'निर्ग्रथ', 'अतिवीर' आदि।                                                                                         पिता : सिद्धार्थ                                                                           माता : त्रिशला देवी

पत्नी : यशोदा

वंश : ज्ञातृ वंशीय क्षत्रिय (गोत्र 'काश्यप')

चिह्न : सिंह

वर्ण : सुवर्ण

अन्य जानकारी : अपनी श्रद्धा से जैन धर्म को पुनः प्रतिष्ठापित करने के बाद कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली के दिन पावापुरी में भगवान महावीर ने निर्वाण को प्राप्त किया।

                                                                                  महावीर या वर्धमान महावीर जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान ऋषभनाथ की परम्परा में २४ वें जैन तीर्थंकर थे। वे अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। उनका जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत था। उन्हें एक लँगोटी तक का परिग्रह नहीं था। हिंसा, पशुबलि, जाति-पाँति के भेदभाव जिस युग में बढ़ गए थे, उसी युग में महावीर और बुद्ध पैदा हुए। भगवान महावीर तथा बुद्ध, दोनों ने ही इन कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई। दोनों ने अहिंसा का भरपूर विकास किया।

                                                                                                        💁‍♂️ *जीवन परिचय*

महावीर स्वामी का जीवन काल ५९९ ई. ईसा पूर्व से ५२७ ई. ईसा पूर्व तक माना जाता है। उनका जन्म वैशाली गणतंत्र के कुण्डलपुर में इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहाँ चैत्र शुक्ल तेरस को हुआ था। बचपन में महावीर का नाम 'वर्धमान' था, लेकिन बाल्यकाल से ही यह साहसी, तेजस्वी, ज्ञान पिपासु और अत्यंत बलशाली होने के कारण 'महावीर' कहलाए। भगवान महावीर ने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया था, जिस कारण इन्हें 'जीतेंद्र' भी कहा जाता है।


👫🏻 *विवाह*

कलिंग नरेश की कन्या 'यशोदा' से महावीर का विवाह हुआ। किंतु ३० वर्ष की उम्र में अपने ज्येष्ठबंधु की आज्ञा लेकर इन्होंने घर-बार छोड़ दिया और तपस्या करके 'कैवल्य ज्ञान' प्राप्त किया। महावीर ने पार्श्वनाथ के आरंभ किए तत्वज्ञान को परिमार्जित करके उसे जैन दर्शन का स्थायी आधार प्रदान किया। महावीर ऐसे धार्मिक नेता थे, जिन्होंने राज्य का या किसी बाहरी शक्ति का सहारा लिए बिना, केवल अपनी श्रद्धा के बल पर जैन धर्म की पुन: प्रतिष्ठा की। आधुनिक काल में जैन धर्म की व्यापकता और उसके दर्शन का पूरा श्रेय महावीर को दिया जाता है।


🔮 *दीक्षा प्राप्ति*

महावीर स्वामी के शरीर का वर्ण सुवर्ण और चिह्न सिंह था। इनके यक्ष का नाम 'ब्रह्मशांति' और यक्षिणी का नाम 'सिद्धायिका देवी' था। जैन धर्मावलम्बियों के अनुसार भगवान महावीर के गणधरों की कुल संख्या ११ थी, जिनमें गौतम स्वामी इनके प्रथम गणधर थे। महावीर ने मार्गशीर्ष दशमी को कुंडलपुर में दीक्षा की प्राप्ति की और दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् २ दिन बाद खीर से इन्होंने प्रथम पारणा किया। दीक्षा प्राप्ति के बाद १२ वर्ष और ६ .५ महीने तक कठोर तप करने के बाद वैशाख शुक्ल दशमी को ऋजुबालुका नदी के किनारे 'साल वृक्ष' के नीचे भगवान महावीर को 'कैवल्य ज्ञान' की प्राप्ति हुई थी।


♨️ *कुण्डलपुर महोत्सव*

दिगम्बर जैन आगम ग्रंथों के अनुसार भगवान महावीर बिहार प्रांत के कुंडलपुर नगर में आज (सन २०१३) से २६१२ वर्ष पूर्व महाराजा सिद्धार्थ की महारानी त्रिशला के गर्भ से चैत्र कृष्ण तेरस को जन्मे थे। वह कुंडलपुर वर्तमान में नालंदा ज़िले में अवस्थित है। वहाँ सन २००२ में जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी अपने संघ के साथ पदविहार करके गईं और उनकी पावन प्रेरणा से कुंडलपुर में २६०० वर्ष प्राचीन नंद्यावर्त महल की प्रतिकृति का (७ मंज़िल ऊँचा) निर्माण हुआ, जिसे बिहार सरकार का पर्यटन विभाग पर्यटकों के लिए ख़ूब प्रचारित कर रहा है। अतः वहाँ प्रतिदिन पर्यटकों एवं तीर्थयात्रियों का ताँता लगा रहता है। कुंडलपुर में प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन बिहार सरकार एवं कुंडलपुर दिगंबर जैन समिति के द्वारा कुण्डलपुर महोत्सव आयोजित किया जाता है। 


🌀 *अन्य नाम*

महावीर स्वामी के अनेक नाम हैं- 'अर्हत', 'जिन', 'निर्ग्रथ', 'महावीर', 'अतिवीर' आदि। इनके 'जिन' नाम से ही आगे चलकर इस धर्म का नाम 'जैन धर्म' पड़ा। जैन धर्म में अहिंसा तथा कर्मों की पवित्रता पर विशेष बल दिया जाता है। उनका तीसरा मुख्य सिद्धांत 'अनेकांतवाद' है, जिसके अनुसार दूसरों के दृष्टिकोण को भी ठीक-ठाक समझ कर ही पूर्ण सत्य के निकट पहुँचा जा सकता है। भगवान महावीर अहिंसा और अपरिग्रह की साक्षात मूर्ति थे। वे सभी के साथ सामान भाव रखते थे और किसी को कोई भी दुःख देना नहीं चाहते थे। अपनी श्रद्धा से जैन धर्म को पुनः प्रतिष्ठापित करने के बाद कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली के दिन पावापुरी में भगवान महावीर ने निर्वाण को प्राप्त किया।✴️ *वर्धमान*

वीरःसर्व सुरासुरेंद्र महितो , वीरं बुधाः संश्रिताः ।

वीरेणैव हतः स्वकर्मनिचयो , वीराय भक्त्या नम ।।

वीरात्तीर्थमिदं प्रवृत्तमतुलं , वीरस्य वीरं तपो ।

वीरे श्री द्युतिकांतिकीर्तिधृतयो , हे वीर ! भद्रं त्वयि ।।१।।


भारत के वृज्जि गणराज्य की वैशाली नगरी के निकट कुण्डग्राम में राजा सिद्धार्थ अपनी पत्नी प्रियकारिणी के साथ निवास करते थे। इन्द्र ने यह जानकर कि प्रियकारिणी के गर्भ से तीर्थंकर पुत्र का जन्म होने वाला है, उन्होंने प्रियकारिणी की सेवा के लिए षटकुमारिका देवियों को भेजा। प्रियकारिणी ने ऐरावत हाथी के स्वप्न देखे, जिससे राजा सिद्धार्थ ने भी यही अनुमान लगाया कि तीर्थंकर का जन्म होगा। आषाढ़, शुक्ल पक्ष की षष्ठी के अवसर पर पुरुषोत्तर विमान से आकर प्राणतेन्द्र ने प्रियकारिणी के गर्भ में प्रवेश किया। चैत्र, शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को सोमवार के दिन वर्धमान का जन्म हुआ। देवताओं को इसका पूर्वाभास था। अत: सबने विभिन्न प्रकार के उत्सव मनाये तथा बालक को विभिन्न नामों से विभूषित किया। इस बालक का नाम सौधर्मेन्द्र ने 'वर्धमान' रखा तो ऋद्धिधारी मुनियों ने 'सन्मति' रखा। संगमदेव ने उसके अपरिमित साहस की परीक्षा लेकर उसे 'महावीर' नाम से अभिहित किया।


 ⚛️ *कैवल्य ज्ञान*

विवेक उत्पन्न होने पर औपाधिक दु:ख सुखादि-अहंकार, प्रारब्ध, कर्म और संस्कार के लोप हो जाने से आत्मा के चितस्वरूप होकर आवागमन से मुक्त हो जाने की स्थिति को 'कैवल्य' कहते हैं। पातंजलसूत्र के अनुसार चित्‌ द्वारा आत्मा के साक्षात्कार से जब उसके कर्त्तृत्त्व आदि अभिमान छूटकर कर्म की निवृत्ति हो जाती है, तब विवेकज्ञान के उदय होने पर मुक्ति की ओर अग्रसारित आत्मा के चित्स्वरूप में जो स्थिति उत्पन्न होती हैं, उसकी संज्ञा कैवल्य है। वेदांत के अनुसार परामात्मा में आत्मा की लीनता और न्याय के अनुसार अदृष्ट के नाश होने के फलस्वरूप आत्मा की जन्ममरण से मुक्तावस्था को कैवल्य कहा गया है। योगसूत्रों के भाष्यकार व्यास के अनुसार, जिन्होंने कर्मबंधन से मुक्त होकर कैवल्य प्राप्त किया है, उन्हें 'केवली' कहा जाता है। ऐसे केवली अनेक हुए है। बुद्धि आदि गुणों से रहित निर्मल ज्योतिवाले केवली आत्मरूप में स्थिर रहते हैं। हिन्दू धर्मग्रंथों में शुक, जनक आदि ऋषियों को जीवन्मुक्त बताया है, जो जल में कमल की भाँति, संसार में रहते हुए भी मुक्त जीवों के समान निर्लेप जीवनयापन करते है। जैन ग्रंथों में केवलियों के दो भेद- 'संयोगकेवली' और 'अयोगकेवली' बताए गए है।


🚺 *आचार-संहिता*

महावीर ने जो आचार-संहिता बनाई वह निम्न प्रकार है-


किसी भी जीवित प्राणी अथवा कीट की हिंसा न करना

किसी भी वस्तु को किसी के दिए बिना स्वीकार न करना

मिथ्या भाषण न करना

आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना

वस्त्रों के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु का संचय न करना।

जैन ग्रंथ एवं जैन दर्शन में प्रतिपादित है कि भगवान महावीर जैन धर्म के प्रवर्तक नहीं हैं। वे प्रवर्तमान काल के चौबीसवें तीर्थंकर हैं। आपने आत्मजय की साधना को अपने ही पुरुषार्थ एवं चारित्र्य से सिद्ध करने की विचारणा को लोकोन्मुख बनाकर भारतीय साधना परम्परा में कीर्तिमान स्थापित किया। आपने धर्म के क्षेत्र में मंगल क्रांति सम्पन्न की। उद्घोष किया कि आँख मूँदकर किसी का अनुकरण या अनुसरण मत करो। धर्म दिखावा नहीं है, रूढ़ि नहीं है, प्रदर्शन नहीं है, किसी के भी प्रति घृणा एवं द्वेषभाव नहीं है। आपने धर्मों के आपसी भेदों के विरुद्ध आवाज उठाई। धर्म को कर्म-कांडों, अंधविश्वासों, पुरोहितों के शोषण तथा भाग्यवाद की अकर्मण्यता की जंजीरों के जाल से बाहर निकाला। घोषणा की कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है। धर्म एक ऐसा पवित्र अनुष्ठान है, जिससे आत्मा का शुद्धिकरण होता है। धर्म न कहीं गाँव में होता है और न कहीं जंगल में, बल्कि वह तो अन्तरात्मा में होता है। साधना की सिद्धि परमशक्ति का अवतार बनकर जन्म लेने में अथवा साधना के बाद परमात्मा में विलीन हो जाने में नहीं है, बहिरात्मा के अन्तरात्मा की प्रक्रिया से गुजरकर स्वयं परमात्मा हो जाने में है।


प्रोफेसर जैन ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में जैन भजनों में भगवान महावीर को 'अवतारी' वर्णित किया जा रहा है। यह मिथ्या ज्ञान का प्रतिफल है। वास्तव में भगवान महावीर का जन्म किसी अवतार का पृथ्वी पर शरीर धारण करना नहीं है। उनका जन्म नारायण का नर शरीर धारण करना नहीं है, नर का ही नारायण हो जाना है। परमात्म शक्ति का आकाश से पृथ्वी पर अवतरण नहीं है। कारण-परमात्मास्वरूप का उत्तारण द्वारा कार्य-परमात्मस्वरूप होकर सिद्धालय में जाकर अवस्थित होना है। भगवान महावीर की क्रांतिकारी अवधारणा थी कि जीवात्मा ही ब्रह्म है।

                                             🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳   

*🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏*

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

मंगळवार, १२ एप्रिल, २०२२

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

चैत्र मास,शुक्ल पक्ष,*एकादशी*,मघा नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,बसन्त ऋतु,युगाब्द ५१२४,विक्रम संवत-२०७९, 

मंगलवार, १२ एप्रिल २०२२.

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                         *प्रभात दर्शन*

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       *"किसी जिज्ञासु ने एक महात्मा से पूछा कि सवेरा तो रोज ही होता है परन्तु शुभ प्रभात क्या होता है??*


*महात्मा ने बहुत ही सुन्दर उत्तर दिया-*


      *"जीवन में जिस दिन प्रातः हम अपने अंदर की बुराईयों को समाप्त कर उच्च विचार तथा अपनी आत्मा को शुद्ध करके दिन का आरम्भ करते हो, वही शुभ प्रभात होता है"*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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रविवार, १० एप्रिल, २०२२

Tulipa gesneriana, Didier's Tulip

 

 शोधा

 तुलिपा गेसनेरियाना

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 सुधारणे

 Tulipa gesneriana, Didier's Tulip[2] किंवा गार्डन ट्यूलिप, लिली कुटुंबातील वनस्पतींची एक प्रजाती आहे, ज्याची लागवड अनेक देशांमध्ये शोभेच्या वस्तू म्हणून केली जाते कारण तिच्या मोठ्या, आकर्षक फुलांमुळे.  या उंच, उशीरा-फुललेल्या प्रजातीमध्ये एकच फुलणारे फूल आणि रेखीय किंवा विस्तृतपणे लॅन्सोलेट पाने आहेत.  ही एक जटिल संकरित नव-प्रजाती आहे, आणि तिला तुलिपा × गेस्नेरियाना देखील म्हटले जाऊ शकते.[3]  ट्यूलिपच्या बहुतेक वाणांचे उत्पादन ट्यूलिपा गेस्नेरियाना पासून केले जाते.  मध्य आणि दक्षिण युरोपच्या काही भागांमध्ये त्याचे नैसर्गिकीकरण झाले आहे[4] आणि उत्तर अमेरिकेतील विखुरलेल्या ठिकाणी.


 तुलिपा गेसनेरियाना

 צבעונים.JPG

 वैज्ञानिक वर्गीकरण संपादित

 राज्य:

 वनस्पती

 क्लेड:

 ट्रॅकोफाइट्स

 क्लेड:

 एंजियोस्पर्म्स

 क्लेड:

 मोनोकोट्स

 ऑर्डर:

 लिलियाल्स

 कुटुंब:

 लिलिअसी

 उपकुटुंब:

 लिलिओइडी

 जमात:

 लिलीए

 वंश:

 ट्यूलिपा

 उपजात:

 Tulipa subg.  ट्यूलिपा

 प्रजाती:

 टी. गेसनेरियाना

 द्विपदी नाव

 तुलिपा गेसनेरियाना

 एल.

 समानार्थी शब्द[1]

 समानार्थी शब्द

 Tulipa Coronaria Salisb.

 Tulipa hortensis Gaertn.

 ट्यूलिपा स्ट्रिस्टा स्टोक्स

 Tulipa pubescens Willd.

 Tulipa cornuta Redouté

 Tulipa laciniata Fisch.  माजी बेलर्म.

 Tulipa campsopetala Delaun.  माजी Loisel.

 Tulipa stenopetala Delaun.  माजी Loisel.

 Tulipa bonarotiana Reboul

 ट्यूलिपा स्ट्रॅंगुलता रेबोल

 Tulipa media C.Agardh माजी Schult.  & Schult.f.

 Tulipa फिश repens.  माजी गोड

 Tulipa bicolor Raf.

 ट्यूलिपा स्कॅब्रिस्कापा फॉक्स-स्ट्रॅंगव.

 Tulipa unguiculata Raf.

 Tulipa neglecta (Reboul) Reboul

 ट्यूलिपा सेरोटीना रेबोल

 Tulipa variopicta Reboul

 ट्यूलिपा स्पॅथुलाटा बर्टोल.

 Tulipa Didieri Jord.

 Tulipa fransoniana Parl.

 Tulipa platystigma Jord.

 Tulipa Billietiana Jord.

 Tulipa मॉरिटियाना Jord.

 Tulipa planifolia Jord.

 तुलिपा मौरियाना जॉर्ड.  & Fourr.

 ट्यूलिपा ऍक्युटिफ्लोरा डीसी.  माजी बेकर

 तुलिपा एलिगेन्स बेकर

 Tulipa fulgens बेकर

 ट्यूलिपा रेट्रोफ्लेक्सा बेकर

 ट्यूलिपा मौरियानेन्सिस डिडियर

 Tulipa macrospeila बेकर

 ट्यूलिपा लेव्हियरला जोडते

 ट्यूलिपा एट्रस्का लेव्हियर

 Tulipa lurida Levier

 ट्यूलिपा पॅसेरिनियाना लेव्हियर

 Tulipa sommieri Levier.

 Tulipa baldaccii Mattei

 Tulipa marjolletii E.P.Perrier आणि Songeon

 Tulipa segusiana E.P.Perrier & Songeon

 Tulipa saracenica E.P.Perrier

 Tulipa perrieri Marj.  माजी पी. फोर्न.

 ट्यूलिपा ग्रेंजिओलेन्सिस थॉमेन

 तुलिपा मॉन्टिसंद्रेई जे. प्रधोम्मे

 ट्यूलिपा रुबिडुसा लिझर

 Tulipa sedunii Lieser

 Tulipa norvegica Lieser


 तुलिपा गेसनेरियानाचे चित्रण आणि उतारा.

 युरोपमध्ये आलेल्या ट्यूलिपच्या इतर प्रजातींप्रमाणेच, इस्तंबूलमधील ओट्टोमन साम्राज्याच्या सुलतानच्या संग्रहातून या संकराचा उगम तुर्कीमध्ये झाला आहे असे मानले जाते.[1]  1574 मध्ये, सुलतान सेलीम II ने सीरियातील अजाझच्या काडीला 50,000 ट्यूलिप बल्ब पाठवण्याचे आदेश दिले.  तथापि, हार्वे या स्त्रोताशी संबंधित अनेक समस्यांकडे लक्ष वेधतात आणि ट्यूलिप्स आणि हायसिंथ (sümbüll), मूळ भारतीय स्पाइकनार्ड (Nardostachys jatamansi) मध्ये गोंधळ होण्याची शक्यता आहे.[6]  सुलतान सेलीमने इस्तंबूलमधील टोपकापी सराय येथील त्याच्या बागांसाठी क्राइमियामधील केफे बंदरातून केफे लाले (कॅफे-लाले या मध्ययुगीन नावावरून कॅफे-लाले म्हणूनही ओळखले जाणारे) 300,000 बल्ब आयात केले.  ते संग्रहात उपस्थित असलेल्या इतर प्रजातींसह संकरित केले जातात.[7]  Tulipa schrenkii अनुवांशिकदृष्ट्या Tulipa gesneriana शी जवळून संबंधित आहे, आणि कधीकधी त्याच प्रजातींमध्ये वर्गीकृत आहे.


 ट्यूलिपा गेस्नेरियाना 1554 मध्ये कॉन्स्टँटिनोपल येथून पश्चिम युरोपमध्ये ओळखले गेले. त्याचे वर्णन 1559 मध्ये कॉनरॅड गेसनर यांनी केले.[8]


 जेव्हा ट्यूलिप मूळतः ऑट्टोमन साम्राज्यातून युरोपमध्ये आला तेव्हा त्याची लोकप्रियता वाढली आणि डच सुवर्णयुगातील नवीन श्रीमंत व्यापार्‍यांसाठी ते त्वरीत स्थितीचे प्रतीक बनले.  मोझॅक विषाणूने बल्बला संसर्ग करण्यास सुरुवात केल्यामुळे, ब्लूममध्ये दुर्मिळ आणि नेत्रदीपक परिणाम निर्माण होतात परंतु आधीच मर्यादित संख्येत बल्ब कमकुवत आणि नष्ट होत असताना, 1634 ते 1637 च्या दरम्यान ट्यूलिप मॅनिया म्हणून ओळखल्या जाणार्‍या सट्टेबाजीचा उन्माद सुरू झाला. बल्बची देवाणघेवाण जमीन, पशुधनासाठी केली गेली.  , आणि घरे आणि डच लोकांनी फ्युचर्स मार्केट तयार केले जेथे हंगामाच्या शेवटी बल्ब खरेदी करण्याचे करार केले आणि विकले गेले.[9]  सेम्पर ऑगस्टस या एकाच बल्बने हार्लेममध्ये 6,000 फ्लोरिन्स आणले - त्या वेळी, फ्लोरिन गव्हाचे बुशेल खरेदी करू शकत असे.


 फ्लॉवर आणि बल्ब ऍलर्जीन, ट्यूलिपोसाइड ए द्वारे त्वचारोग होऊ शकतात, जरी बल्ब थोडे वाईट परिणामाने खाल्ले तरी.  बल्ब वाळवले जाऊ शकतात आणि मळलेले असू शकतात आणि तृणधान्ये किंवा पिठात जोडले जाऊ शकतात.[उद्धरण आवश्यक]


 गोड सुगंधी उभयलिंगी फुले एप्रिल आणि मे महिन्यात दिसतात.  बल्ब दंवास अत्यंत प्रतिरोधक असतात आणि ते अतिशीत कमी तापमानाला चांगले सहन करू शकतात — योग्य वाढ आणि फुलांच्या वाढीसाठी कमी तापमानाचा कालावधी आवश्यक असतो, फायटोहॉर्मोन ऑक्सीनच्या संवेदनशीलतेत वाढ होते.[10]


 यूके नॅशनल कलेक्शन ऑफ टुलिपा एसपीपी.  टी फ्रीथ यांनी रॉयल बोटॅनिक गार्डन्स, केव येथे आयोजित केले आहे.[11]


 ट्यूलिपा गेस्नेरियाना, ट्यूलिपा फॉस्टेरियाना आणि ट्यूलिपा इचलेरी यासारख्या विविध ट्यूलिप फुलांमध्ये अँथोसायनिन्स आढळतात.[12]


 संदर्भ

 बाह्य दुवे

 Citation bot ने 9 महिन्यांपूर्वी शेवटचे संपादित केले

 विकिपीडिया

 अन्यथा नमूद केल्याशिवाय सामग्री CC BY-SA 3.0 अंतर्गत उपलब्ध आहे.



शुक्रवार, ८ एप्रिल, २०२२

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

चैत्र मास,शुक्ल पक्ष,*अष्टमी*,पुनर्वसु नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,बसन्त ऋतु,युगाब्द ५१२४,विक्रम संवत-२०७९, 

शनिवार, ०९ एप्रिल २०२२.

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                         *प्रभात दर्शन*

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यस्य पुत्रो वशीभूतो 

                  भार्या छन्दानुगामिनी,

विभवे यश्च सन्तुष्ट

                  स्तस्य स्वर्ग इहैव हि ।।


*भावार्थः- उस व्यक्ति ने धरती पर ही स्वर्ग को पा लिया... जिसका पुत्र आज्ञांकारी है, जिसकी पत्नी उसकी इच्छा के अनुरूप व्यव्हार करती है और जिसे अपने धन पर संतोष  है।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ═════════════ *प्लॅस्टिक*


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   @ संकलन @

  गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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*प्लॅस्टिक* 

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प्लॅस्टिकने आपले सारे जग व्यापून टाकले आहे. अजून काही वर्षांत ही स्थिती अधिकच वाढणार आहे. प्लास्टिक नसलेली वस्तू त्या वेळी शोधावी लागेल, अशी परिस्थिती यावी, असा शास्त्रज्ञांचा प्रयत्न चालू आहे. त्या वेळी प्लास्टिकचे घर, प्लास्टिकची मोटार, वाहन आपण वापरत असू, असा त्यांचा कयास आहे.


पेन, पाटी, रेडिओ - टीव्ही कॅबिनेट्स, खुर्च्या, पादत्राणे येथपासून रेनकोट, कपडे, कपबशा येथपर्यंत प्लास्टिकने मजल मारली आहे. १८६२ साली अलेक्झांडर पार्क याने प्लास्टिक पॉलिमरचा प्रथम शोध लावला. अनेक रेणूंची साखळी असलेले हे प्लास्टिक जन्माला आले, ते हस्तीदंती रंगात. पण लवकरच ते विविधरंगी तर बनलेच, पण रेणूंच्या साखळीत थोडेफार बदल करीत किंवा सुरुवातीचे पदार्थ बदलत त्यांचे स्वरूप खूप वाढून विविध प्रकारचे होत गेले.


 प्लास्टिक संशोधनाला खरी सुरुवात १९३० सालच्या सुमाराला झाली. मंदीचा काळ होता. लाकूड व पोलाद यांची निर्मिती कमी होती. त्यांना पर्याय म्हणून प्लास्टिकचा वापर त्याच काळात सुरू झाला. लाकडाप्रमाणे कुजत तर नाही व लोखंडाप्रमाणे गंजतही नाही म्हणून प्लास्टिक सगळ्यांचे लाडके बनू लागले. रबरी कोटिंग हळूहळू कडक बनत असते. रबरी पादत्राणे चिकटत असत. म्हणून प्लास्टिकने त्यांची जागा घेतली. हीच गोष्ट वायरिंगच्या इन्सुलेशनसाठी प्लास्टिक वापरायला कारणीभूत होत गेली.


१९६० सालच्या दशकात प्लॅस्टिकचे पुढील धागे म्हणजे नायलॉन, पॉलिएस्टर, अॅक्रिलिक यांची मोठ्या प्रमाणावर निर्मिती व वापर सुरू झाला. आज सर्वात स्वस्त व लोकप्रिय असे याच धाग्यांचे कपडे जगभर वापरले जातात. यानंतरचा लाडका वापर सुरू झाला, तो पाॅलिस्टिरिन व पीव्हीसीचा. सर्व पॅकिंगला पॉलिस्टिरिन फोम व पीव्हीसीची पादत्राणे आज प्रत्येकजण मागत असतो.


 प्लॅस्टिक हे क्रूडतेलातील काही घटक वापरून बनते. काही मोजक्या प्रकारात लाकूड, कोळसा, नैसर्गिक गॅस यांचाही वापर करतात. यामुळे खनिज तेल जसे मोठ्या प्रमाणावर उत्खनन करून काढले जात होते, तसे प्लॅस्टिकचे उत्पादनही वाढत गेले. सुरुवातीचे प्लॅस्टिक अतिकडक असे. आज मात्र असंख्य प्रकारात व पाहिजे त्या आकारात प्लास्टिक उपलब्ध आहे.


प्लॅस्टिकचे दोन मुख्य प्रकार पडतात. एका प्रकारात दर वेळी उष्णता देऊन प्लास्टिक वितळवून त्याला नवीन आकार देणे शक्य होते. याला 'थर्मोप्लास्टिक' म्हणतात. दुसऱ्या प्रकारात मात्र एकदाच दिलेला आकार कायम राहतो. याला 'थर्मोसेटप्लास्टिक' म्हणतात. सुरीचे वा दाराचे हँडल या प्रकारातले असते, तर छोटे मोठे ट्रे, बादल्या या पहिल्या प्रकारातल्या.


 प्लास्टिकचे कारखाने जगभर फार मोठ्या प्रमाणात उत्पादन करतात. यासाठी छोट्या कारखान्यापासून ते अवाढव्य कारखान्यांपर्यंत विविध प्रकारची मशिनरी वापरली जाते. काचेचे वस्तू तयार करताना वापरल्या जाणाऱ्या पद्धतीने किंवा प्लॅस्टिकच्या रसात हवेचे बुडबुडे सोडून त्यांच्या साह्याने केलेल्या वस्तूंत बाटल्या, बरण्या बनतात. नायलॉनचे दोर बनवण्यासाठी लोखंडी दोराप्रमाणेच गरम रस लहान तोंडातून खेचण्याची पद्धत वापरली जाते, तर प्लास्टिकचे पापुद्रे रोलरवरुन दाबून बनवतात. सगळ्यात आकर्षक पद्धत म्हणजे एखाद्या तयार साच्यात पूर्ण दाबाने प्लॅस्टिक रस सोडण्याची. पाहिजे त्या आकाराची आकर्षक वस्तू या प्रकाराने एकसंधपणे निर्माण होते, हे विशेष. आपल्या रोजच्या वापरातल्या टूथब्रश, कंगवा, गमबूट, पेनस्टॅँड हे सारे या पद्धतीने बनते.


प्लास्टिकने आपले जग किती व्यापावे ? खेळाचे साहित्य तर प्लॅस्टिकचे असतेच; पण आता सारी मैदानेही पॉलिग्रासची म्हणजे प्लास्टिकची बनत आहेत. घरातील फुलदाण्या व त्यांतील फुलेही प्लास्टिकचीच वापरली जातात. सर्वांवर कडी म्हणजे एकमेकांना ओळखीसाठी दिली जाणार व्हिजिटिंग कार्ड्सही आता प्लास्टिकमध्येच बनू लागली आहेत. प्लास्टिक नष्ट करणे अवघड म्हणून त्याचा कचरा फार कटकटीचा ! एकच बाब यात चांगली आहे. प्लास्टिक म्हणजे कचकड्याचे जग असे मात्र न राहता अभेद्य, चक्क बुलेटप्रुफ असे प्लास्टिक सध्या वापरात येत आहे.

 


🔸सम्राट अशोक :

 🔸सम्राट अशोक :

1) ज्या सम्राट अशोकाचे चक्र राष्ट्र ध्वजावर घेतले.


2) ज्या सम्राट अशोकाचे " सत्यमेव जयते " हे ब्रीद वाक्य म्हणून देशाने स्वीकारले.


3)ज्या सम्राट अशोकाची चार सिंहाची प्रतीमा देशाची मुद्रा म्हणून स्विकारली.


4) ज्या सम्राटला देशाचा सर्वोत्तम तथा सर्वश्रेष्ठ सम्राट म्हणून मानले जाते.


5) ज्या सम्राट अशोकामुळे भारताला जगात नावलौकिक  प्राप्त झाले.


6) ज्या अशोकामुळे सबंध विश्व भारताला अशोकाचा भारत म्हणून ओळखते.


7) ज्याच्या नावाने देशात सर्वोच्च शौर्य पुरस्कार अशोक चक्र दिल्या जाते. 


8) ज्या सम्राटाचे राज्य पाकीस्तान, अफगानिस्थान, ईरान , भूतान ,बांग्लादेशापर्यंत पसरलेले होते. 


9) ज्या सम्राटामुळे भारताला जम्बूदीप भारत म्हणून ओळख प्राप्त झाली. 


10) ज्याने सुवर्णमय भारत निर्माण निर्माण केला.


11)  ज्याच्या काळात भारतात साक्षरतेचे प्रमाण 80 % होते.


12) ज्या अशोकाच्या काळात भारताचा विकासाचा दर 32.5 % होता. ( आता भारताचा विकास दर 7% ते 9% दरम्यान आहे तर अमेरिकेचा 14% ते 20 % दरम्यान आहे.) 


13) ज्या सम्राट अशोकाच्या काळात भारत जागतिक महासत्ता होती.


14) ज्या सम्राटामुळे भारतीय बौद्ध धर्म विश्व धर्म बनला.


15)ज्याच्या शासन काळात  मानव - प्राणी - पर्यावरण यांच्या विकासाला व संरक्षणाला प्राधान्यक्रम दिला जात होता.


16) ज्या महान अशोकाला सबंध जग देवानांप्रिय प्रियदर्शी चक्रवर्ती सम्राट म्हणून ओळखतात.


सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य तथा सम्राट अशोकाची जयंती 

संकलन) :-

गजानन गोपेवाड 


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गुरुवार, ७ एप्रिल, २०२२

*👨‍⚕️👩‍⚕️👨‍⚕️७ एप्रिल १९४८👨‍⚕️👩‍⚕️👨‍⚕️* 🩺🩺🩺🩺🩺🩺🩺🩺🩺🩺🩺 *जागतिक आरोग्य संघटना स्थापना*

 *👨‍⚕️👩‍⚕️👨‍⚕️७ एप्रिल १९४८👨‍⚕️👩‍⚕️👨‍⚕️*

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*जागतिक आरोग्य संघटना स्थापना*

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जागतिक आरोग्य संघटना :

*(वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनायझेशन, WHO)* 

      ही एक आंतरराष्ट्रीय सहकार्याने कार्य करणारी संस्था असून ती राष्ट्रसंघाच्या आरोग्य यंत्रणेचा व पॅरिस येथील ‘आंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक आरोग्य कार्यालया’चा (Office Internationale d’hygiene Publique) वारसा पुढे चालवीत आहे. *‘आंतरराष्ट्रीय महत्त्वाचे रोगप्रतिबंधक व रोगनियंत्रक कार्य करणे’* हे या संस्थेचे ध्येय आहे. असे प्रयत्न करणाऱ्या संस्था पूर्वीही होत्या.


   इतिहास : भयंकर साथीचे रोग संसर्गामुळे पसरतात आणि अशा संसर्ग झालेल्या व्यक्तींचा विलग्नवास करण्याचे *(इतरांपासून अलग ठेवण्याचे, क्वारंटाइनाचे)* महत्त्व अगदी प्राचीन काळापासून लोकांना पटले होते. *चौदाव्या शतकात अशा विलग्नवासाची व्यवस्था भूमध्य समुद्रावरील बंदरात होती.*


विलग्नवासामुळे रोगांचा प्रसार नेहमी थांबेच असे नाही, कारण त्या काळी रोगप्रसाराच्या कारणांचे ज्ञानच अपुरे होते. निरनिराळ्या देशांतील बंदरांत विलग्नवास व्यवस्था निरनिराळी असे, तसेच त्याकरिता केलेले कायदेही एकाच प्रकारचे नसत त्यामुळे व्यापारउदीमाला बराच अडथळा येई. १८५२ पासून या कायद्यांच्या एकसूत्रीकरणाचे प्रयत्न झाले, परंतु विसाव्या शतकाच्या सुरुवातीस सूक्ष्मजंतुशास्त्राची भक्कम पायावर स्थापना होऊन रोगप्रतिबंधाच्या मूलतत्त्वांबद्दल बरेचसे एकमत होईपर्यंत या कामी विशेष प्रगती झाली नाही. विलग्नवासविषयक नियमांमुळे साधारण एकसूत्रीपणा आल्यानंतर या कार्यासाठी एखादी आंतरराष्ट्रीय यंत्रणा असावी, असा विचार प्रबळ झाला. अशा यंत्रणेची मुख्य उद्दिष्टे खालीलप्रमाणे असावीत हा विचारही पटू लागला.


*(१) स्‍वास्थ्यसंरक्षणविषयक आंतरराष्ट्रीय संकेतांचा अर्थ लावून त्यांत वेळोवेळी होणाऱ्या बदलांचा अभ्यास करणे त्या संकेतांचा भंग होत असल्याच्या तक्रारीबद्दल अधिकृत मत प्रदर्शित करणे.*

 

*(२) रोगविज्ञानात होत असलेल्या प्रगतीचा अभ्यास करण्यासाठी परिषदा भरवून त्यानुसार आंतरराष्ट्रीय संकेत व कायदे यांत बदल सुचविणे.*        


*(३) साथीच्या रोगांबद्दल जागतिक माहिती गोळा करून ती सर्व देशांना पुरविणे.*


   अशा माहितीच्या आधारावरच विलग्नवासविषयक नियम करण्यात येतात. १९०२ मध्ये या उद्दिष्टपूर्तीसाठी अखिल अमेरिकन आरोग्य संस्था स्थापण्यात आली. १९०९ मध्ये *पॅरिस* येथे *‘आंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक आरोग्य कार्यालय’* स्थापण्यात आले. ही संस्थाच पहिली जागतिक स्वरूपाची संस्था असून ती १९४७ ते १९५० च्या दरम्यान जागतिक आरोग्य संघटनेत विलीन झाली.


   यापूर्वी कित्येक वर्षे आंतरराष्ट्रीय सहकार्याने सोडवण्यासारख्या अनेक प्रश्नांकडे लोकांचे लक्ष वेधले गेले होते. उदा., औषधिद्रव्ये व रक्तरसापासून (रक्तातील घन पदार्थविरहित रक्तद्रवापासून) बनविलेल्या लसींचे प्रमाणीकरण, रोगांचे सर्वमान्य असे नामाभिधान ठरविणे, जन्ममृत्यूंची माहिती एकत्र करून पुरविणे व मादक पदार्थांविषयी (अफू, कोकेन वगैरेंविषयी) वैद्यकीय माहिती पुरविणे वगैरे. रोगासारख्या संकटाविरुद्ध आंतरराष्ट्रीय आघाडी उभारावयाची असेल, तर त्यासाठी प्रत्येक राष्ट्रातील जनतेची आरोग्यपातळी वाढविणे हाच एक कायमचा आणि खरा टिकाऊ उपाय आहे, याचीही जाणीव होऊ लागली. रोगसंसर्ग कमी होण्यासाठी राष्ट्राराष्ट्रांनी आपापसांत बांध उभे करणे हे प्रभावी साधन होऊ शकत नाही, हेही पटू लागले होते. पॅरिस येथील संस्थेच्या घटनेत अशा तऱ्हेच्या जागतिक प्रयत्नांना वाव नसल्यामुळे १९२१ मध्ये राष्ट्रसंघाने अशी जागतिक आरोग्य यंत्रणा उभी केली, ही एक सुदैवाचीच गोष्ट मानली पाहिजे.

*🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏*

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा - यवतमाळ ४४५२०६


प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

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चैत्र मास,शुक्ल पक्ष,*षष्ठी*,मृगशिरा नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,बसन्त ऋतु,युगाब्द ५१२४,विक्रम संवत-२०७९, 

गुरुवार, ०७ एप्रिल २०२२.

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                        *प्रभात दर्शन*

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नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य 

                 न चायुक्तस्य भावना,

न चाभावयत: शांतिर

                शांतस्य कुत: सुखम्।


*भावार्थ -  जिस मनुष्य का मन इंद्रियों अर्थात् धन, लोभ, आलस्य आदि में लिप्त है, उसके मन में भावना (आत्मज्ञान) नहीं होती, और जिस मनुष्य के मन में भावना नहीं होती, उसे किसी भी प्रकार से शान्ति नहीं मिलती और जिसके मन में शान्ति न हो, उसे सुख कहां से प्राप्त होगा, अत: सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियन्त्रण होना बहुत आवश्यक है।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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