रविवार, ६ मार्च, २०२२

🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ═════════════ 📙 *क्लोरीन म्हणजे काय


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   @ संकलन @

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *क्लोरीन म्हणजे काय ?* 📙

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खाण्याचे मीठ व पिण्याच्या पाण्याची शुद्धता या दोन महत्वाच्या गोष्टी क्लोरीनमुळेच शक्य झाल्या आहेत. क्लोरीन हा वायू स्वरूपात मिळवला व साठवला जातो. मात्र नैसर्गिकरित्या क्लोरीन आढळत नाही. सोडियम बरोबर त्याचे संयुग पटकन बनते. त्यालाच आपण मीठ म्हणतो. ‍१७७४ साली शील यांनी त्याचा शोध लावला. फिकट हिरव्या रंगावरून ग्रीक भाषेतील क्लोराॅस या शब्दावरून त्याचे नाव पडले आहे. क्लोरीन हा वायू मुख्यतः पाणी शुद्ध करण्याच्या ब्लिचिंग पावडरमध्ये वापरला जातो. त्याच्यामुळे पाण्यातील जंतू मरतात व मुक्त झालेला क्लोरिन हवेत मिसळतो. अगदी सहज पूर्ण झालेल्या या प्रक्रियेमुळेच आपण मोठ्या प्रमाणावर पाण्याचे शुद्धीकरण करून गावे, शहरे, महानगरे यांना शुद्ध पाण्याचा पुरवठा करू शकतो.


क्लोरिनचे अनेक औद्योगिक उपयोगही आहेत. क्लोरीनचा गैरवापर करून पहिल्या महायुद्धात शत्रूच्या सैनिकांवर त्या वायूचा मारा केला गेला होता. फुप्फुसदाहाने त्यांचा त्यात मृत्यू ओढवला. कोणत्याही जिवंत प्राण्यांसाठी क्लोरीन हा अतिशय घातक वायू आहे. मात्र संयुग स्वरूपातील त्याची उपयुक्तता वादातीत ठरावी. माणसाच्या खाण्यातील एक अत्यावश्यक घटक म्हणजे मीठ. शरीरातील सोडीयमचा साठा अनेक शरीरातील क्रियांना मदत करतो. असा हा घटक म्हणजे सोडियम व क्लोरीनचे संयुग होय. भूल देण्यासाठी कित्येक दशके वापरले गेलेले क्लोरोफार्म हे द्रव्यही क्लोरीनचेच संयुग. क्लोरिनमुळे अनेक पदार्थांचे ऑक्सिडेशन होते. त्यामुळे अनेक रंग, डाग यांचा रंगीतपणा जातो. कपड्यांना नवीन रंग देण्यापूर्वी, कपडे स्वच्छ करण्यासाठी ब्लिचिंग पद्धतीच्या प्रक्रियेत याचा वापर केला जातो. हायड्रोक्लोरिक अॅसिड मध्ये क्लोरिन असतो व विद्राव्य म्हणून त्याचा वापर अनेक उद्योगांत केला जातो. कार्बनबरोबरचे त्याचे संयुग कार्बनटेट्राक्लोराईड एक उत्तम विद्राव्य आहे. त्याचा वापर आग विझवण्यासाठी केला जातो.


क्लोरीनची निर्मिती इलेक्ट्रोलायसिस पद्धतीने केली जाते. समुद्राचे पाणी किंवा पोटॅशियमबरोबरची त्याची निसर्गात सापडणारी संयुगे यांचा वापर त्यासाठी केला जातो. एका परीने या वायूचा शोध हा मानवी प्रगतीला लागलेला मोठा हातभारच आहे, यात शंका नाही. 

 

*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*

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गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳 ➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿ *भारतरत्न* *👳🏻‍♂️👳🏻‍♂️गोविंद बल्लभ पंत

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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                   *भारतरत्न*

*👳🏻‍♂️👳🏻‍♂️गोविंद बल्लभ पंत👳🏻‍♂️👳🏻‍♂️*


(भारतीय राजनेता,स्वतंत्रता सेनानी)


     *जन्म : १० सितम्बर १८८७*

        (अल्मोड़ा, उत्तराखंड)


       *मृत्यु : ७ मार्च,१९६१*


अभिभावक : श्री मनोरथ पंत

पति/पत्नी : श्रीमती गंगा देवी

नागरिकता : भारतीय

पार्टी : कांग्रेस

पद : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और भारत के गृहमंत्री

*कार्य काल मुख्यमंत्री*

 १५ अगस्त १९४७ से २७ मई १९५४

*गृहमंत्री-* १९५५ - १९६१


शिक्षा : वकालत

विद्यालय : 'म्योर सेण्ट्रल कॉलेज', इलाहाबाद

भाषा : अंग्रेज़ी, संस्कृत

जेल यात्रा : सन १९२१,१९३०, १९३२ और १९३४ के स्वतंत्रता संग्रामों में लगभग ७ वर्ष जेलों में रहे।

पुरस्कार-उपाधि : भारत रत्न

रचनाएँ : वरमाला, 'राजमुकुट' और 'अंगूर की बेटी'

अन्य जानकारी : गोविन्द बल्लभ पंत का मुक़दमा लड़ने का ढंग निराला था, जो मुवक़्क़िल अपने मुक़दमों के बारे में सही जानकारी नहीं देते थे, पंत जी उनका मुक़दमा नहीं लेते थे। काशीपुर में एक बार वे धोती, कुर्ता तथा गाँधी टोपी पहनकर कोर्ट चले गये। वहां अंग्रेज़ मजिस्ट्रेट ने आपत्ति की


पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त या जी. बी. पन्त  प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी और वरिष्ठ भारतीय राजनेता थे। वे उत्तर प्रदेश राज्य के प्रथम मुख्य मन्त्री और भारत के चौथे गृहमंत्री थे। सन १९५७ में उन्हें भारतरत्न से सम्मानित किया गया। गृहमंत्री के रूप में उनका मुख्य योगदान भारत को भाषा के अनुसार राज्यों में विभक्त करना तथा हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना था।


💁‍♂️ *प्रारम्भिक जीवन*


इनका जन्म १० सितम्बर १८८७ को अल्मोड़ा जिले के श्यामली पर्वतीय क्षेत्र स्थित गाँव खूंट में महाराष्ट्रीय मूल के एक कऱ्हाड़े ब्राह्मण कुटुंब में हुआ। इनकी माँ का नाम गोविन्दी बाई और पिता का नाम मनोरथ पन्त था। बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उनकी परवरिश उनके नाना श्री बद्री दत्त जोशी ने की। १९०५ में उन्होंने अल्मोड़ा छोड़ दिया और इलाहाबाद चले गये। म्योर सेन्ट्रल कॉलेज में वे गणित, साहित्य और राजनीति विषयों के अच्छे विद्यार्थियों में सबसे तेज थे। अध्ययन के साथ-साथ वे कांग्रेस के स्वयंसेवक का कार्य भी करते थे। १९०७ में बी.ए.और १९०९ में कानून की डिग्री सर्वोच्च अंकों के साथ हासिल की। इसके उपलक्ष्य में उन्हें कॉलेज की ओर से "लैम्सडेन अवार्ड" दिया गया।


१९१० में उन्होंने अल्मोड़ा आकर वकालत शूरू कर दी। वकालत के सिलसिले में वे पहले रानीखेत गये फिर काशीपुर में जाकर प्रेम सभा नाम से एक संस्था का गठन किया जिसका उद्देश्य शिक्षा और साहित्य के प्रति जनता में जागरुकता उत्पन्न करना था। इस संस्था का कार्य इतना व्यापक था कि ब्रिटिश स्कूलों ने काशीपुर से अपना बोरिया बिस्तर बाँधने में ही खैरियत समझी।


🇮🇳 *स्वतन्त्रता संघर्ष में*


दिसम्बर १९२१ में वे गान्धी जी के आह्वान पर असहयोग आन्दोलन के रास्ते खुली राजनीति में उतर आये।


९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड करके उत्तर प्रदेश के कुछ नवयुवकों ने सरकारी खजाना लूट लिया तो उनके मुकदमें की पैरवी के लिये अन्य वकीलों के साथ पन्त जी ने जी-जान से सहयोग किया। उस समय वे नैनीताल से स्वराज पार्टी के टिकट पर लेजिस्लेटिव कौन्सिल के सदस्य भी थे। १९२७ में राम प्रसाद 'बिस्मिल' व उनके तीन अन्य साथियों को फाँसी के फन्दे से बचाने के लिये उन्होंने पण्डित मदन मोहन मालवीय के साथ वायसराय को पत्र भी लिखा किन्तु गान्धी जी का समर्थन न मिल पाने से वे उस मिशन में कामयाब न हो सके। १९२८ के साइमन कमीशन के बहिष्कार और १९३० के नमक सत्याग्रह में भी उन्होंने भाग लिया और मई १९३० में देहरादून जेल की हवा भी खायी।


🇮🇳 *मुख्यमन्त्री कार्यकाल*


१७ जुलाई १९३७ से लेकर २ नवम्बर १९३९ तक वे ब्रिटिश भारत में संयुक्त प्रान्त अथवा यू.पी. के पहले मुख्य मन्त्री बने। इसके बाद दोबारा उन्हें यही दायित्व फिर सौंपा गया और वे १ अप्रैल १९४६ से १५ अगस्त १९४७ तक संयुक्त प्रान्त (यू.पी.) के मुख्य मन्त्री रहे। जब भारतवर्ष का अपना संविधान बन गया और संयुक्त प्रान्त का नाम बदल कर उत्तर प्रदेश रखा गया तो फिर से तीसरी बार उन्हें ही इस पद के लिये सर्व सम्मति से उपयुक्त पाया गया। इस प्रकार स्वतन्त्र भारत के नवनामित राज्य के भी वे २६ जनवरी १९५० से लेकर २७ दिसम्बर १९५४ तक मुख्य मन्त्री रहे।


🇮🇳 *गृह मंत्री कार्यकाल*


सरदार पटेल की मृत्यु के बाद उन्हें गृह मंत्रालय, भारत सरकार के प्रमुख का दायित्व दिया गया। भारत के गृह मंत्री रूप में उनका कार्यकाल सन १९५५ से लेकर १९६१ में उनकी मृत्यु होने तक रहा।


🕯️ *मृत्यु*


७ मार्च १९६१ को हृदयाघात से जूझते हुए उनकी मृत्यु हो गयी। उस समय वे भारत सरकार में केन्द्रीय गृह मन्त्री थे।


🗽 *स्मारक और संस्थान*


गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर, उत्तराखण्ड

गोविन्द बल्लभ पन्त अभियान्त्रिकी महाविद्यालय, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड

गोविन्द बल्लभ पंत सागर, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश

पं. गोविन्द गोविन्द बल्लभ पंत इण्टर कॉलेज काशीपुर ऊधमसिंह नगर (उत्तराखंड)

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳 ➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿ *👳🏻‍♂️👳🏻‍♂️बाबा पृथ्वीसिंह आझाद👳🏻‍♂️👳🏻‍♂️*

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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*👳🏻‍♂️👳🏻‍♂️बाबा पृथ्वीसिंह आझाद👳🏻‍♂️👳🏻‍♂️*


( भारतीय क्रांतिकारी - गदर पार्टी के संस्थापकों मे से एक )


   *जन्म : १५ सप्टेंबर १८९२*

(रायपुरानी,पटियाला,पंजाब,भारत)


       *मृत्यू :  ६ मार्च १९८९*

                  (वय ९६)

                   (भारत)


व्यवसाय : भारतीय स्वातंत्र्य कार्यकर्ता

वर्ष सक्रिय : १९०७–१९८९

प्रसिद्ध : भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम

लाहोर षड्यंत्र चाचणी

भागीदार : कै.आझाद देवी

संतान : अजितसिंग भट्टी, प्रज्ञा कुमार


बाबा पृथ्वी सिंह आजाद (१८९२ - १९८९) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी, क्रान्तिकारी  तथा गदर पार्टी के संस्थापकों में से एक थे। स्वतंत्रता के पश्चात वे पंजाब के भीम सेन सचर सरकार में मन्त्री रहे। वे भारत की पहली संविधान सभा के भी सदस्य रहे। सन १९७७ में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया।


पृथ्वी सिंह को 'जिन्दा शहीद' भी कहा जाता है। उन्हें लाहौर षड्यंत्र केस में फांसी की सजा सुनायी गयी थी जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया था। स्वतन्त्रता संग्राम में उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। उन्हें सेल्युलर जेल में रखा गया था । उनकी 'लेनिन के देश में' नामक पुस्तक बहु चर्चित पुस्तकों में से एक है। आजादी के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय अजय भवन में जीवन पर्यन्त रहे।


*किस्सा कुछ यूं था: रोज सामने मौत की बाल्टी देख कर भी डरे नहीं पृथ्वीसिंह आजाद*


भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले कुछ ऐसे क्रांतिकारी भी रहे, जिन्हें आजादी मिलने के बाद भुला दिया गया। या तो उन्हें जानबूझकर भुलाया गया या फिर उनके बारे में कहीं कोई जानकारी दर्ज थी ही नहीं, इसलिए देश उन्हें भूल गया। ऐसे ही क्रांतिवीर थे पृथ्वीसिंह आजाद, जिनके बारे में छुटपुट जानकारी ही देश के सामने आ सकी। बाबा पृथ्वीसिंह आजाद ऐसे क्रांतिवीर थे, जिनके जीवन का प्रत्येक क्षण देश की स्वतंत्रता के लिए अर्पित था। १५ सितंबर १८९२ को पंजाब के सर्कपुर टावर, जिला अम्बाला में जन्मे पृथ्वीसिंह आजाद कुछ कमाने के लिए कई देशों की यात्रा करते हुए अमेरिका पहुंचे थे। वहां वे भारत की आजादी के लिए लड़ रही 'गदर पार्टी' में शामिल हो गए।


गदर पार्टी के आह्वान पर वे अपने साथियों के साथ वापस भारत लौटे और अम्बाला की सैनिक छावनियों में भारतीय सैनिकों को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने की प्रेरणा देने लगे। दुर्भाग्य से ८ दिसम्बर १९१४ को उन्हें बंदी बनाकर लाहौर की सेंट्रल जेल भेज दिया गया। उन्हें लाहौर षड्‌यंत्र केस में अन्य कई क्रांतिकारियों के साथ अभियुक्त बनाया गया।


न्यायालय ने उक्त केस में २४ क्रांतिकारियों को फांसी का दंड घोषित किया। उन क्रांतिकारियों में बाबा पृथ्वीसिंह आजाद भी थे। उस समय जेल में फांसी देने के बाद शवों को नहलाया नहीं जाता था। जेल परिसर में जेल के ही कर्मचारियों द्वारा शव को जला दिया जाता था। अतः राजबंदियों की मांग थी कि जिस दिन हमें फांसी दें, उसके पहले स्नान करने की व्यवस्था करें। मगर क्रूर अंग्रेजी शासक क्रांतिकारियों को मानसिक प्रताड़ना देने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते थे।


जेल में बाबा पृथ्वीसिंह आजाद की कोठरी के सामने रोज एक बाल्टी पानी रख दिया जाता था। क्रांतिकारियों को लगता था कि आज उन्हें फांसी दी जाएगी। ऐसी मानसिक क्रूरता लगातार १४ दिनों तक की गई। किंतु इससे न तो बाबा पृथ्वीसिंह आजाद डिगे, न ही कोई अन्य क्रांतिकारी।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

शुक्रवार, ४ मार्च, २०२२

गाथा बलिदानाची* ➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿ 🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *गिता मुखर्जी

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               *गाथा बलिदानाची*

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🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *गिता मुखर्जी*🇮🇳🇮🇳🇮🇳


*(नारी शक्ति : पश्चिम बंगाल से लगातार सात बार सांसद चुनी गईं गीता मुखर्जी)*


       *जन्म : ८ जनवरी १९२४*

        (दक्षिण कलकत्ता, बंगाल     

       प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत)


       *मृत्यु : ४ मार्च २०००*

                 (उम्र ७६)

          (नई दिल्ली, भारत)


जन्म का नाम : गीता रॉय चौधरी

राष्ट्रीयता : भारतीय

राजनीतिक दल : भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

जीवन संगी : विश्वनाथ मुखर्जी

शैक्षिक सम्बद्धता : कलकत्ता युनिवर्सिटी असुतोश कॉलेज

पेशा : राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक

धर्म : हिन्दू


           गीता मुखर्जी वामपंथी आंदोलन और नारी सशक्तिकरण का सशक्त चेहरा थीं। पश्चिम बंगाल से लगातार सात बार लोकसभा में पहुंचने वाली गीता मुखर्जी लोकसभा की दमदार आवाज थीं। वे १९८० में पहली बार बंगाल के पनसुकरा से भाकपा के टिकट पर लोकसभा की सदस्य चुनीं गईं। आंदोलनकारी सांसद होने के साथ ही गीता मुखर्जी गहरी साहित्यिक अभिरुचि वाली महिला थीं।


👸🏻 *पनसुकरा में अपराजेय रहीं*


 गीता मुखर्जी ने १९८४, १९८९, १९९१, १९९६, १९९८ और १९९९ का लोकसभा चुनाव मिदनापुर जिले की पनसुकरा लोकसभा क्षेत्र से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर जीता। इससे पहले वे विधानसभा की सदस्य रह चुकी थीं। वे पहली बार १९६७ में पनसुकरा पूर्व से विधायक चुनीं गई। फिर १९७२ में भी पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए चुनीं गईं।



⛓ *स्वतंत्रता आंदोलन में जेल गईं*


 गीता मुखर्जी का जन्म ८ जनवरी १९२४ को कोलकाता में हुआ था। उन्होंने बांग्ला साहित्य में स्नातक की पढ़ाई आशुतोष कॉलेज कोलकाता से की। १९४२ में उनका विवाह वामपंथी नेता विश्वनाथ मुखर्जी के संग हुआ। वे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और उसके बाद भी कई बार जेल गईं।


⚛ *१५ साल की उम्र में छात्र राजनीति में*


 गीता महज १५ साल की उम्र में आशुतोष कॉलेज कोलकाता में अध्ययन के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के छात्र संगठन आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन में सक्रिय हो गईं थी। वे बंगाल प्रांत छात्र संगठन की १९४७ से १९५१ तक सचिव रहीं। वे १९४६ में सीपीआई की राज्य समिति की सदस्य बन गई थीं। १९८१ के बाद वे लगातार सीपीआई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य रहीं।


✍ *कई पुस्तकें लिखी*


गीता मुखर्जी की साहित्य में काफी रूचि थी। उन्होंने बांग्ला में भारत उपकथा, छोटोदेर रविंद्रनाथ और हे अतिथि कथा कहो जैसी पुस्तकों की रचना की। उन्होंने कुछ पुस्तकों का अंग्रेजी से बांग्ला में अनुवाद भी किया। गीता मुखर्जी अपने जीवन के आखिरी क्षण तक संसद के अंदर और बाहर सक्रिय रहीं। सन २००० में ४ मार्च को ७६ साल की उम्र में जब वे एक कार्यक्रम में अलीगढ़ जाने की तैयारी कर रही थीं, उनका नई दिल्ली में निधन हो गया।


🙋‍♀ *संसद में महिला आरक्षण की हिमायत*


महिलाओं को संसद और राज्य के विधानसभाओं में ३३ फीसदी आरक्षण दिए जाने वाले विधेयक के लिए वे सक्रियता से हिमायत करती रहीं। इस बिल के लिए बनी संयुक्त संसदीय समिति की वे चेयरपर्सन थीं। इस बिल को लेकर उनका समर्पण इतना ज्यादा था कि ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने गुजराल सरकार में मंत्री पद सिर्फ इसीलिए ठुकरा दिया कि वह बिल पर पूरा फोकस करना चाहती थीं।


🌀 *सफरनामा*


१९२४ में ८ जनवरी को उनका जन्म हुआ।

१९६७ में पहली बार विधानसभा का चुनाव जीता।

१९८० में बंगाल के पनसुकरा से लोकसभा का चुनाव जीता।

१९९९ में सातवीं बार पनसुकरा से लोकसभा का चुनाव जीता। २००० में ४ मार्च को नई दिल्ली में निधन हो गया।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

गरम पाण्याचे झरे


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   * संकलन *

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *गरम पाण्याचे झरे* 

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हिमालयात प्रवासाला जाणारे परतल्यावर नेहमीच एक आश्चर्याचा किस्सा सांगतात. गंगोत्रीच्या वाटेवर वाटेत काही कुंडे लागतात. कुडकुडणारी थंडी, दूरवर डोंगरमाथ्यावर सफेद बर्फाचे थर आणि या कुंडातून मात्र पाण्यातून चक्क वाफा निघत असतात. हात बुडवला तर चटका बसतो. एवढेच नवे अनेक जण जवळचे तांदूळ त्या पाण्यात काहीवेळा कापडी पुरचुंडी बांधून धरतात व आयता शिजलेला भात खातात. हे पाणी काढून मनसोक्त आंघोळ करण्याचा मोहही कोणी आवरून धरत नाही. असाच पण जरा वेगळा अनुभव वज्रेश्वरीला महाराष्ट्रात येतो. पण येथील झऱ्यांचे पाणी गंधक मिश्रित उग्र वासाचे आहे. येथील उष्ण पाण्यात अंघोळ करून निसर्गोपचार करून घेणाऱ्यांचीही कायम गर्दी उसळलेली असते. जगात असे गरम पाण्याचे कित्येक झरे आहेत. तसेच फक्त वाफेचेही झरे आहेत. वाफेच्या झर्‍यातून फक्त जोरात वाफ उसळून एखाद्या प्रेशरकुकरप्रमाणे तेथे शिट्टीचा आवाजही येत राहतो. 


या सगळ्या प्रकाराचे मूळ भूगर्भात खोलवर घडणाऱ्या घडामोडीत आहे. सुमारे तीस एक किलोमीटर खोलीवर तप्त मध्यावरणाचा पाण्याच्या वाहत्या साठ्याशी संबंध येतो. तिथे वाफ कोंडू लागते. या वाफेच्या दाबाने जमिनीतील खडकातील काही भेगांतून मार्ग काढला जाऊ शकतो. त्यातूनच हे झरे निर्माण होतात. काही ठिकाणी ज्वालामुखीच्या मुखापासून काही ठराविक अंतरावर प्रथम वाफेचे व नंतर गरम पाण्याचे झरे सलगपणे आढळतात. पण अनेक ठिकाणी ज्वालामुखीचा अलीकडच्या ज्ञात काळात कधीच संबंध आलेला नसतो. हेही लक्षात घ्यायला लागेल. यातही एक मोठा फरक आहे. वाफेचे झरे मधूनमधून नाहीसे होतात, पण गरम पाण्याचे झरे मात्र सलगपणे वर्षानुवर्षे उकळताना दिसतात. काही झर्‍यांत गंधकाचा अंश सापडतो. ते नक्कीच ज्वालामुखीच्या उगमाशी संबंधित असावेत असा संशय घ्यायला जागा आहे.


पृथ्वीचा गाभा अत्यंत गरम आहे मध्यावरणही अतितप्त आहे. पण बाह्यावरणाचा काही भाग बऱ्याच ठिकाणी भरपूर गरम आहे असेही लक्षात आले आहे. आईसलँड, न्यूझीलंड येथील काही भागात जेमतेम एक ते तीन किलोमीटर अंतर खोलवर बोअरिंगचे छिद्र पाडले असता भूगर्भातील गरम पाणी व वाफ मिळवता येते असा अनुभव आहे. जरी एवढे खोल छिद्र पाडणे अत्यंत महागडे असले तरी यातून मिळणारी ऊर्जा ही अनेक वर्षे पुरणार असल्याने हा खर्च परवडतो. हे गरम पाणी वा वाफ वापरून घरे उष्ण ठेवण्याचा वा विद्युतनिर्मिती उद्योग यातूनच केला जातो. येथेही गमतीचा भाग कसा आहे बघा. आइसलँड व न्यूझीलंडसारख्या थंड प्रदेशातही निसर्गाने ही सोय करून ठेवली आहे.

 

*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*

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🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ═════════════ 📙 *गुरुत्वाकर्षण म्हणजे काय ?* 📙


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   *@ संकलन @*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *गुरुत्वाकर्षण म्हणजे काय ?* 📙 

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गुरुत्वाकर्षण सर्वत्र असते. गुरुत्वाकर्षणाची ताकद वस्तूमानाप्रमाणे बदलत जाते, पण प्रत्येक गोष्ट स्वतःचे गुरुत्वाकर्षण राखून असते. त्याचा प्रभाव कदाचित लक्षात येईल, जाणवेल किंवा नाही, ही गोष्ट वेगळी. व्यवहारत: प्रत्येक वस्तू दुसऱ्या वस्तूवर गुरुत्वाकर्षणाचा प्रभाव राखून असते, हे विधान समजावुन देणे अशक्य आहे. पण जरा वेगळ्या पद्धतीने हे पटू शकते.


चंद्रावर पृथ्वीच्या गुरुत्वाकर्षणाचा प्रभाव आहे म्हणून तो तिच्या कक्षेत फिरतो, तर पृथ्वीवर सूर्याचे गुरुत्वाकर्षण प्रभाव ठेवून आहे. सूर्य आपल्या सर्व ग्रहांसह आकाशगंगेत आहे; कारण आकाशगंगेतील सुमारे लाखभर तारे एकमेकांवर गुरुत्वाकर्षणाचा प्रभाव राखून आहेत. यात आपल्याला गुरुत्वाकर्षण जाणवते, ते फक्त पृथ्वीचे. याचा शोध न्यूटन यांनी लावला, हे ज्ञात आहेच. १६६५ साली वयाच्या केवळ २३ व्या वर्षी झाडाखाली बसलेले असताना सफरचंद खाली का पडते, या विचारातून गुरुत्वाकर्षणाबद्दलचा विचार त्यांनी पुढे मांडला. चालता चालता पाय घसरला, तर आपला तोल जातो. खुर्ची एका मर्यादेपलीकडे कलंडली, तर पडते. याचे कारण म्हणजे प्रत्येक वस्तूचा गुरुत्वाकर्षणामुळे निर्माण झालेला गुरुत्वमध्य एका मर्यादेपलीकडे ढळतो आहे, हेच आहे; कारण जणू काही त्या वस्तूचे वजन त्या बिंदूतच एकवटलेले असते. एखाद्या वस्तूच्या उंचीतील ओळंबा जेव्हा तिच्या पायाबाहेर जातो, तेव्हा हे घडते.


 आकाशगंगाच काय, पण विश्वातील अनेक वस्तू गुरुत्वाकर्षणामुळेच टिकून आहेत. ही प्रत्येक गोष्टीची मध्याकडे ओढ नसती, तर ज्या वस्तूमानाने, कणांनी प्रत्येक ग्रह, तारे बनले आहेत, ते वस्तुमान एकत्रच राहिले नसते. पृथ्वी विलक्षण वेगाने स्वतःभोवती फिरते, पण एवढे अवाढव्य समुद्राचे पाणी मात्र स्वतःच्या जागीच असते. इतकी उंच डोंगरशिखरे स्थिरच राहतात. पृथ्वीचे वातावरणही तिच्या वेगानेच फिरत राहते. याचेच कारण पृथ्वीचे गुरुत्वाकर्षण.


वस्तुमान व आकारमानाप्रमाणे गुरुत्वाकर्षणाची ताकद बदलते, हे तर प्रत्यक्षच सिद्ध झाले आहे. चंद्रावर गेलेल्यांचे वजन पृथ्वीवरच्यापेक्षा जेमतेम एकषष्ठांशच भरले होते. याउलट, पृथ्वीपेक्षा मोठ्या ग्रहावर जर यदाकदाचित माणूस पोहोचला, तर त्याचे वजन कितीतरी जास्त भरेल. ग्रहाच्या आकारमानाप्रमाणे तेथील वस्तूंचे वजन बदलेल.


अवकाशात केल्यावर गुरुत्वाकर्षणरहीत अवस्थेत आपण असतो, असे अनेक वेळा म्हटले जाते. पृथ्वीभोवती कक्षेत फिरणार्‍या कोणत्याही वस्तूच्या बाबतीत ते खरे आहे. ज्याप्रमाणे उंचावरून पृथ्वीकडे झेपावतानासुद्धा पृथ्वीचे गुरुत्वाकर्षण जाणवेनासे होते, वर वजनरहित अवस्था आहे, असे वाटत राहते, तशीच ही थोडीफार जाणीव असते. त्यालाच मायक्रोग्रॅव्हिटी म्हणता येईल.

 मायक्रोग्रॅव्हिटीत दैनंदिन व्यवहार किती कठीण असतात, ते अंतराळयानात वावरणाऱ्या अनेकांनी वर्णन केलेले आहेच. अन्न गिळणे, अंघोळ करणे, तोल राखणे, पाय जमिनीवर ठेवणे हेसुद्धा अंतराळात वावरताना अत्यंत कटकटीचे ठरते. अंघोळीसाठी विशिष्ट सूट घालून त्यातून पाणी शोषून घ्यावे लागते, तर अन्न पेस्टच्या स्वरुपात तोंडात कसेबसे गिळावे लागले. पाय तर जमिनीवर कधीच ठरत नाहीत. आणि हे सारे सांभाळत विविध कामे व प्रयोग पार पाडायचे असतातच.

 

*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*

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गुरुवार, ३ मार्च, २०२२

जलविद्युत निर्मिती

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   @ संकलन @

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *जलविद्युतनिर्मिती म्हणजे काय ?* 📙

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पाणी उंचावरून नेहमीच समुद्रपातळीकडे झेपावत असते. मग हा वेग पातळीनुसार वाढतो वा मंदावतो. जेव्हा ही पातळी खूप उंच असेल तेव्हा या वाहणाऱ्या पाण्याच्या जोराचा वापर करून जलविद्युतनिर्मिती केली जाते. उंच डोंगरमाथ्यावर असलेले धरणाचे पाणी प्रचंड आकाराच्या पाइपमधून बांधलेल्या जलविद्युतगृहातील जनित्रावर सोडले जाते. या पाण्याच्या ताकदीने ही अवाढव्य जनित्रे फिरतात व विद्युतनिर्मिती होते. संपूर्ण भारतात अशा स्वरूपाचे प्रकल्प एकूण विजेच्या ६ टक्के वीज निर्माण करून आपली गरज भागवतात. कोयना प्रकल्प हा त्यातीलच एक आहे. कोयनानगर येथे धरण बांधून तेथील पाणी पाईपमधून वीस किमी दूरवरील पोफळी येथे वाहून नेले जाते. या दरम्यान असलेल्या जवळजवळ सरळ उताराचा परिणाम म्हणून या पाण्याचा वेग व ताकद गुरुत्वाकर्षणाने वाढते व त्यापासून खूपच मोठय़ा प्रमाणात वीज निर्माण होते. मुळशी येथे धरण बांधून तेथील पाणी खोपोली येथेपर्यंत असेच खोलवर वाहून आणले जाते व तेथील विद्युतनिर्मिती केंद्र चालवले जाते.


 पाण्याच्या साठ्याची पातळी व जनित्राची पातळी यात फरक जितका जास्त तितकी वीजनिर्मिती अधिक करता येऊ शकते. यात आणखीही एक बाब ध्यानात ठेवावी लागते. वीज ही बाराही महिने लागणारी गोष्ट आहे. तिचा वापरपण रोज दिवसा जास्त व रात्री कमी होत जातो. पाण्याचा साठा मात्र फक्त पावसाळ्यातच होणार असतो. पाण्याचा सर्वच साठा वापरण्यायुक्त नसतो तर धरणात साठत जाणारा गाळ लक्षात घेऊन पाणी घेण्याची जागा ठरवावी लागते. यामुळे जलविद्युतनिर्मितीचे गणित फार थोड्या ठिकाणी मोठ्या प्रमाणावर उपयुक्त ठरू शकते. अन्य ठिकाणी तिचा वापर पूरक म्हणून वा साखळीयंत्रणेचा (Grid) भाग म्हणूनच करावा लागतो. 

 

 पूरक वापर म्हणून, साखळीयंत्रणेचा भाग म्हणून जेव्हा जलविद्युत वापरली जाते, तेव्हा जगात काही ठिकाणी एक गमतीदार योजना वापरली जाते. पाण्याच्या साठय़ातून जनित्रावर कोसळणारे पाणी पुन्हा साठवले जाते. रात्रीच्या वेळी जेव्हा अन्यत्र विजेचा वापर अगदी कमी असतो, तेव्हा इतरत्र निर्माण झालेली, पण न वापरली जाणारी वीज वापरून हेच पाणी याच जनित्रांचा पंपासारखे उलटा वापर करून मूळ साठ्यात पाठवले जाते. वीज साठवून ठेवता येणे अवघड असल्याने रात्रीच्या वेळी नको असलेली, वाया जाणारी, स्वस्त उपलब्ध असणारी वीज वापरण्याची ही पद्धत आहे. यासाठी फार मोठे तांत्रिक बदल करण्याची गरज पडत नाही, तर फक्त योग्य वेळी व योग्य तितका वेळ यंत्रणेच्या वीजपुरवठा नियंत्रणाची दिशा बदलण्याची गरज असते.

 

 याखेरीज खूप उंचावरून पाण्याचा वा नदीचा प्रवाह लांबवर वाहत जाणार असेल, तर विविध पातळ्यांवर जलविद्युतनिर्मिती केंद्रे उभारता येतात. भाक्रानांगल येथे किंवा सरदार सरोवर या प्रकल्पात ही योजना राबवली जाईल. टेनेसी व्हॅली योजना या पद्धतीतच काम करते. लांबवरचा विचार करता  जलविद्युत ही स्वस्त पडते. देखभाल कमी लागते. पण सुरुवातीचा भांडवली खर्च खूपच मोठा असतो. जलविद्युत केंद्र उभारताना बांधाव्या लागणाऱ्या धरणांमुळे विस्थापितांची संख्या नेहमीच मोठी असते. त्यामुळे त्याला समाजाचा विरोध होतोच; पण औष्णिक विद्युतनिर्मितीमुळे होणारे वातावरणातील प्रदूषण आसपासच्या गावांवर विपरीत परिणाम करत असतेच. त्यातून निर्माण होणारी प्रचंड प्रमाणावरची राख, काजळी, धुर यांची विल्हेवाट लावणे हाही एक फार मोठा प्रश्न म्हणून काही वर्षांनी उभा राहतो. दूरगामी विचार करून कशाला सामोरे जायचे हे ठरवणे सोपे मात्र नक्कीच नाही.

 

*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*

🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ═════════════ 📙 *चक्रीवादळे का येतात


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   * @ संकलन @*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *चक्रीवादळे का येतात ?* 📙 

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उन्हाळ्याचे दिवस चालू असतात. भर दुपारी उन्हाचा कडाका अंगाची लाहीलाही करत असतो. जमीन अगदी चटके बसतील, अशी तापलेली व हवा अजिबात पडलेली. झाडाचे तर पानही हलत नाही आणि बघता बघता लांबवर कुठेतरी जमिनीवरची पडलेली पाने वाऱ्याने गोलगोल भिरभिरताना दिसू लागतात. बघता बघता तीच पाने उंचावर उचलली जातात. त्यांच्याबरोबरच धुळीचा लोटही उफाळताना, गरगरताना दिसतो. काही सेकंदातच वाऱ्याची वावटळ आपल्यालाही घेरून टाकते. हेलकावणारी झाडे, वाऱ्याचा सोसाट्याचा आवाज, नाकातोंडात जाणारी धूळमाती यांमुळे सारेच कसे भीषण वाटत असते. ही असते चक्रीवादळाची सुरुवात.


चक्रीवादळ म्हणजे वातावरणातील एखाद्या विवक्षित ठिकाणी हवेचा दाब आसपासच्या काही मैलांच्या परिसरापेक्षा कमी अथवा जास्त झाल्याने दिसून येणारे वातावरणातील बदल. हे बदल फार मोठ्या वेगाने घडतात, त्यात वाऱ्याची फार मोठी ताकद सामावलेली असते. त्या विवक्षित ठिकाणी हवेचा दाब कमी होतो वाह वाढतो. तो चक्रीवादळाचा केंद्रबिंदूच असतो. दाब कमी झाल्यास तेथील हवेची पोकळी भरून काढण्याचा प्रयत्न म्हणून वातावरणातील हवेत एक प्रकारचे भोवरे तयार होतात. याउलट दाब वाढला असल्यास त्या पट्टय़ातील हवा दाबामुळे केंद्राकडे खाली दाबली जात असते. याही क्रियेमध्ये वारे वाहणे वेगाने सुरू होते, पण त्यांची तीव्रता खूपच कमी असते. बहुतेक चक्रीवादळांचा केंद्रबिंदू समुद्रावरच सुरू होतो. कसलाही अडथळा वाटेत नसल्याने हे वादळ स्वतःभोवती फिरत वेगाने घोंगावत इकडे तिकडे हेलकावत राहते. पण समुद्री वार्‍यांमुळे हलके हलके जमिनीकडे येऊ लागते. सुरुवातीला जमिनीवरचा मोठा पट्टा त्यामुळे त्याच्या तडाख्यात सापडतो, पण त्याचबरोबर त्याचा वेग हळूहळू कमी होत पसरत जातो व काही काळाने ते संपूनही जाते. समुद्रपातळीपेक्षा जमिनीची वाढलेली उंची, वाटेत येणारे अडथळे व जमिनीवरील बरेचसे स्थिर तापमान यांमुळे या चक्रीवादळांचा वेग मंदावतो.


चक्रीवादळ बहुधा स्वतःबरोबर सोसाटयाचा पाऊसही आणते. खूप मोठ्या आकारमानात हे पसरलेले असल्याने (चारशे ते सहाशे किलोमीटर) या सर्व भागातील निरनिराळे ढग यात ओढले गेलेले असतात. या ढगांचे एकत्रीकरण होताच त्यातील बाष्पही एकत्र येऊन त्यापासून पाऊस पडेल, असे मोठे बाष्पकण तयार होतात. सुरुवातीला प्रचंड वेगाने वाहणारे वारे, धुळीचे वातावरण व नंतरच्या पावसाचे तडाखे ही चक्रीवादळाची खासियतच म्हणायला हवी. चक्रीवादळांचा वेग जमिनीवर पोहोचल्यावर अनेकदा ताशी साठ ते ऐंशी किलोमीटर इतका असतो. समुद्रावरील वेग मोजण्याची पद्धत नाही, पण तो कदाचित यापेक्षाही जास्त असू शकतो.


 समुद्रावरील बोटी या वादळात सापडल्यास अनेकदा त्यांचे गंभीर नुकसान होण्याइतका त्यांना तडाखा बसलेला असतो. वादळाचा पट्टा ओलांडण्यास त्यांना एक ते चार दिवस लागत असल्याने तोवर राक्षसी लाटांचे तांडव असहाय्यपणे बघणे एवढेच त्यांच्या हातात असते. अनेकदा या लाटांची उंची तीस ते पस्तीस फुटांपर्यंतही असू शकते. ही वादळे सागरी अपघात व दुर्घटना यांचे एक मुख्य कारण असल्याने या वादळी टापूंची सतत माहिती घेऊन त्याप्रमाणे मार्ग आखणे, बदलणे बोटीच्या कप्तानाने कामच राहते. किनाऱ्यावर जेव्हा ही वादळे येतात, तेव्हा उंच झाडे उन्मळून पडणे, सागरी लाटा खोलवर घुसून त्यामुळे नुकसान होणे, घरांचे पत्रे उडणे या गोष्टी होतात. 

 

 चक्रीवादळांची सूचना हल्ली उपग्रहांमुळे खूपच लवकर मिळू शकते. उपग्रहांमधून या सर्व वादळांचा नेमका प्रवास, हवेतील घडत जाणारे बदल यांचे फोटो मिळतात. या खेरीच एक मोठी विलक्षण पद्धत चक्रीवादळांच्या अभ्यासासाठी गेली २० वर्षे वापरली जात आहे. अत्यंत धोकादायक अशा पद्धतीत लष्करी जेट विमानातून संशोधक या चक्रीवादळाच्या केंद्रबिंदूकडेच प्रवास सुरू करतात. थेट केंद्रबिंदूचा वेध घेऊन विमान वर न्यावयाचे व त्या दरम्यान विविध शास्त्रीय निरीक्षणे करायची, अशी ही पद्धत आहे. निष्णात वैमानिक व जिवावर उदार झालेले संशोधक यांचा चमू हे काम करतो. या प्रकारात विमान पार वेडेवाकडे होऊन दोन तीन हजार फूट लांबवर एखाद्या खेळण्याप्रमाणे भिरकावलेही गेले आहे. तरीही सुखरूप उतरल्यावर नवीन चक्रीवादळाची सूचना कधी मिळते, इकडेच या चमूचे लक्ष असते.

 

 धाडस व जिज्ञासा यांचा संगम काय करू शकतो, याचे हे एक थरारक उदाहरण आहे.

 

*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*

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गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳 ➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿ *रामकृष्ण खत्री* (भारतीय क्रांतिकारी)

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳

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         *रामकृष्ण खत्री*

       (भारतीय क्रांतिकारी)


       *जन्म : ३ मार्च १९०२*

    (चिखली, बुलढाणा, महाराष्ट्र)


     *मृत्यु : १८ अक्टूबर १९९६*

       (लखनऊ, उत्तर प्रदेश)


पिता : शिवलाल चोपड़ा

माता : कृष्णाबाई

नागरिकता : भारतीय

उपनाम : गोविन्द प्रकाश, नरेन्द्र, गंगाराम

आन्दोलन: भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम

प्रमुख संगठन: हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन

प्रसिद्धि : स्वतंत्रता सेनानी

संबंधित लेख : रामप्रसाद बिस्मिल, काकोरी काण्ड

अन्य जानकारी : रामकृष्ण खत्री हिन्दी, मराठी, गुरुमुखी तथा अंग्रेज़ी के अच्छे जानकार थे। उन्होंने 'शहीदों की छाया में' शीर्षक से एक पुस्तक भी लिखी थी, जो नागपुर से प्रकाशित हुई थी।


रामकृष्ण खत्री भारत के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। उन्होंने हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ का विस्तार मध्य भारत और महाराष्ट्र में किया था। उन्हें काकोरी काण्ड में १० वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गयी।


हिन्दी, मराठी, गुरुमुखी तथा अंग्रेजी के अच्छे जानकार खत्री ने शहीदों की छाया में शीर्षक से एक पुस्तक भी लिखी थी जो नागपुर से प्रकाशित हुई थी। स्वतन्त्र भारत में उन्होंने भारत सरकार से मिलकर स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानियों की सहायता के लिये कई योजनायें भी बनवायीं। काकोरी काण्ड की अर्द्धशती पूर्ण होने पर उन्होंने काकोरी शहीद स्मृति के नाम से एक ग्रन्थ भी प्रकाशित किया था। लखनऊ से बीस मील दूर स्थित काकोरी शहीद स्मारक के निर्माण में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।


१८ अक्टूबर १९९६ को ९४ वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ।


💁🏻‍♂ *संक्षिप्त जीवनी*


रामकृष्ण खत्री का जन्म ३ मार्च १९०२ को ब्रिटिश राज में वर्तमान महाराष्ट्र के जिला बुलढाना बरार के चिखली गाँव में हुआ। उनके पिता का नाम शिवलाल चोपड़ा व माँ का नाम कृष्णाबाई था। छात्र जीवन में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के व्याख्यान से प्रभावित होकर उन्होंने साधु समाज को संगठित करने का संकल्प किया और उदासीन मण्डल के नाम से एक संस्था बना ली। इस संस्था में उन्हें महन्त गोविन्द प्रकाश के नाम से लोग जानते थे। क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आकर उन्होंने स्वेच्छा से हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के संगठन का दायित्व स्वीकार किया। मराठी भाषा के अच्छे जानकार होने के नाते राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने उन्हें उत्तर प्रदेश से हटाकर मध्य प्रदेश भेज दिया। व्यवस्था के अनुसार उन्हें संघ का विस्तारक बनाया गया था।


काकोरी काण्ड के पश्चात् जब पूरे हिन्दुस्तान से गिरफ़्तारियाँ हुईं तो रामकृष्ण खत्री को पूना में पुलिस ने धर दबोचा और लखनऊ जेल में लाकर अन्य क्रान्तिकारियों के साथ उन पर भी मुकदमा चला। तमाम साक्ष्यों के आधार पर उन पर मध्य भारत और महाराष्ट्र में हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ के विस्तार का आरोप सिद्ध हुआ और उन्हें दस वर्ष की सजा हुई।


पूरी सजा काटकर जेल से छूटे तो पहले राजकुमार सिन्हा के घर का प्रबन्ध करने में जुट गये फिर योगेश चन्द्र चटर्जी की रिहाई के लिये प्रयास किया। उसके बाद सभी राजनीतिक कैदियों को जेल से छुड़ाने के लिये आन्दोलन किया। काकोरी स्थित काकोरी शहीद स्मारक रामकृष्ण खत्री और प्रेमकृष्ण खन्ना के संयुक्त प्रयासों से ही बन सका।


१७, १८, १९ दिसम्बर १९७७ को लखनऊ में काकोरी शहीद अर्द्धशताब्दी समारोह, २७, २८ फरबरी १९८१ को इलाहाबाद में शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद बलिदान अर्द्धशताब्दी समारोह तथा २२,२३ मार्च १९८१ को नई दिल्ली में शहीद भगतसिंह सुखदेव राजगुरु के बलिदान के अर्द्धशताब्दी समारोह में रामकृष्ण खत्री की उल्लेखनीय भूमिका रही!


उनके पाँच पुत्र हुए प्रताप, अरुण, उदय, स्वप्न और आलोक। लखनऊ में कैसरबाग की मशहूर मेंहदी बिल्डिंग के २ नम्बर मकान में अपने तीसरे पुत्र उदय खत्री के साथ उन्होंने अपने जीवन की अन्तिम बेला तक निवास किया। लखनऊ में ही १८ अक्टूबर १९९६ को ९४ वर्ष की आयु में उनका देहावसान हुआ।


राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ ने उनके साथी, अशफाकुल्ला खान, ठाकुर रोशनसिंह,सचिंद्रनाथ बख्शी, राम कृष्ण खत्री और १४ अन्य लोगों ने वह गाना लिखा जो स्वतंत्रता युग के सबसे ज्यादा मशहूर गीतों में से एक बन गया उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार है:


“इसी रंग में रँग के शिवा ने माँ का बन्धन खोला,

यही रंग हल्दीघाटी में था प्रताप ने घोला;

नव बसन्त में भारत के हित वीरों का यह टोला,

किस मस्ती से पहन के निकला यह बासन्ती चोला।

मेरा रँग दे बसन्ती चोला….

हो मेरा रँग दे बसन्ती चोला!”


✍ *लेखन एवं प्रकाशन*


रामकृष्ण खत्री ने एक पुस्तक स्वयं लिखी और एक ग्रन्थ का प्रकाशन किया। उन दोनों कृतियों का ब्यौरा इस प्रकार है:


शहीदों की छाया में: लेखक - रामकृष्ण खत्री, विश्वभारती प्रकाशन नागपुर से १९८३ में प्रकाशित हुई। इसका विमोचन १० सितम्बर १९८४ को इन्दिरा गान्धी ने किया।

काकोरी शहीद स्मृति: सम्पादक - डॉ. भगवान दास माहौर। खत्री द्वारा प्रकाशित इस ग्रन्थ का विमोचन १९७८ में नीलम संजीव रेड्डी ने नई दिल्ली में किया।

 

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳


🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन गजानन गोपेवाड  

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

बुधवार, २ मार्च, २०२२

🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ═════════════ 📙 *गरम पाण्याचे झरे*


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   *📒📒📒 @ संकलन @📒📒📒*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *गरम पाण्याचे झरे* 

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हिमालयात प्रवासाला जाणारे परतल्यावर नेहमीच एक आश्चर्याचा किस्सा सांगतात. गंगोत्रीच्या वाटेवर वाटेत काही कुंडे लागतात. कुडकुडणारी थंडी, दूरवर डोंगरमाथ्यावर सफेद बर्फाचे थर आणि या कुंडातून मात्र पाण्यातून चक्क वाफा निघत असतात. हात बुडवला तर चटका बसतो. एवढेच नवे अनेक जण जवळचे तांदूळ त्या पाण्यात काहीवेळा कापडी पुरचुंडी बांधून धरतात व आयता शिजलेला भात खातात. हे पाणी काढून मनसोक्त आंघोळ करण्याचा मोहही कोणी आवरून धरत नाही. असाच पण जरा वेगळा अनुभव वज्रेश्वरीला महाराष्ट्रात येतो. पण येथील झऱ्यांचे पाणी गंधक मिश्रित उग्र वासाचे आहे. येथील उष्ण पाण्यात अंघोळ करून निसर्गोपचार करून घेणाऱ्यांचीही कायम गर्दी उसळलेली असते. जगात असे गरम पाण्याचे कित्येक झरे आहेत. तसेच फक्त वाफेचेही झरे आहेत. वाफेच्या झर्‍यातून फक्त जोरात वाफ उसळून एखाद्या प्रेशरकुकरप्रमाणे तेथे शिट्टीचा आवाजही येत राहतो. 


या सगळ्या प्रकाराचे मूळ भूगर्भात खोलवर घडणाऱ्या घडामोडीत आहे. सुमारे तीस एक किलोमीटर खोलीवर तप्त मध्यावरणाचा पाण्याच्या वाहत्या साठ्याशी संबंध येतो. तिथे वाफ कोंडू लागते. या वाफेच्या दाबाने जमिनीतील खडकातील काही भेगांतून मार्ग काढला जाऊ शकतो. त्यातूनच हे झरे निर्माण होतात. काही ठिकाणी ज्वालामुखीच्या मुखापासून काही ठराविक अंतरावर प्रथम वाफेचे व नंतर गरम पाण्याचे झरे सलगपणे आढळतात. पण अनेक ठिकाणी ज्वालामुखीचा अलीकडच्या ज्ञात काळात कधीच संबंध आलेला नसतो. हेही लक्षात घ्यायला लागेल. यातही एक मोठा फरक आहे. वाफेचे झरे मधूनमधून नाहीसे होतात, पण गरम पाण्याचे झरे मात्र सलगपणे वर्षानुवर्षे उकळताना दिसतात. काही झर्‍यांत गंधकाचा अंश सापडतो. ते नक्कीच ज्वालामुखीच्या उगमाशी संबंधित असावेत असा संशय घ्यायला जागा आहे.


पृथ्वीचा गाभा अत्यंत गरम आहे मध्यावरणही अतितप्त आहे. पण बाह्यावरणाचा काही भाग बऱ्याच ठिकाणी भरपूर गरम आहे असेही लक्षात आले आहे. आईसलँड, न्यूझीलंड येथील काही भागात जेमतेम एक ते तीन किलोमीटर अंतर खोलवर बोअरिंगचे छिद्र पाडले असता भूगर्भातील गरम पाणी व वाफ मिळवता येते असा अनुभव आहे. जरी एवढे खोल छिद्र पाडणे अत्यंत महागडे असले तरी यातून मिळणारी ऊर्जा ही अनेक वर्षे पुरणार असल्याने हा खर्च परवडतो. हे गरम पाणी वा वाफ वापरून घरे उष्ण ठेवण्याचा वा विद्युतनिर्मिती उद्योग यातूनच केला जातो. येथेही गमतीचा भाग कसा आहे बघा. आइसलँड व न्यूझीलंडसारख्या थंड प्रदेशातही निसर्गाने ही सोय करून ठेवली आहे.

 

*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*


मंगळवार, १ मार्च, २०२२

🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ═════════════ 📙 *चक्रीवादळे का येतात ?* 📙


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   *📒📒📒 @ संकलन @📒📒📒*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *चक्रीवादळे का येतात ?* 📙 

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उन्हाळ्याचे दिवस चालू असतात. भर दुपारी उन्हाचा कडाका अंगाची लाहीलाही करत असतो. जमीन अगदी चटके बसतील, अशी तापलेली व हवा अजिबात पडलेली. झाडाचे तर पानही हलत नाही आणि बघता बघता लांबवर कुठेतरी जमिनीवरची पडलेली पाने वाऱ्याने गोलगोल भिरभिरताना दिसू लागतात. बघता बघता तीच पाने उंचावर उचलली जातात. त्यांच्याबरोबरच धुळीचा लोटही उफाळताना, गरगरताना दिसतो. काही सेकंदातच वाऱ्याची वावटळ आपल्यालाही घेरून टाकते. हेलकावणारी झाडे, वाऱ्याचा सोसाट्याचा आवाज, नाकातोंडात जाणारी धूळमाती यांमुळे सारेच कसे भीषण वाटत असते. ही असते चक्रीवादळाची सुरुवात.


चक्रीवादळ म्हणजे वातावरणातील एखाद्या विवक्षित ठिकाणी हवेचा दाब आसपासच्या काही मैलांच्या परिसरापेक्षा कमी अथवा जास्त झाल्याने दिसून येणारे वातावरणातील बदल. हे बदल फार मोठ्या वेगाने घडतात, त्यात वाऱ्याची फार मोठी ताकद सामावलेली असते. त्या विवक्षित ठिकाणी हवेचा दाब कमी होतो वाह वाढतो. तो चक्रीवादळाचा केंद्रबिंदूच असतो. दाब कमी झाल्यास तेथील हवेची पोकळी भरून काढण्याचा प्रयत्न म्हणून वातावरणातील हवेत एक प्रकारचे भोवरे तयार होतात. याउलट दाब वाढला असल्यास त्या पट्टय़ातील हवा दाबामुळे केंद्राकडे खाली दाबली जात असते. याही क्रियेमध्ये वारे वाहणे वेगाने सुरू होते, पण त्यांची तीव्रता खूपच कमी असते. बहुतेक चक्रीवादळांचा केंद्रबिंदू समुद्रावरच सुरू होतो. कसलाही अडथळा वाटेत नसल्याने हे वादळ स्वतःभोवती फिरत वेगाने घोंगावत इकडे तिकडे हेलकावत राहते. पण समुद्री वार्‍यांमुळे हलके हलके जमिनीकडे येऊ लागते. सुरुवातीला जमिनीवरचा मोठा पट्टा त्यामुळे त्याच्या तडाख्यात सापडतो, पण त्याचबरोबर त्याचा वेग हळूहळू कमी होत पसरत जातो व काही काळाने ते संपूनही जाते. समुद्रपातळीपेक्षा जमिनीची वाढलेली उंची, वाटेत येणारे अडथळे व जमिनीवरील बरेचसे स्थिर तापमान यांमुळे या चक्रीवादळांचा वेग मंदावतो.


चक्रीवादळ बहुधा स्वतःबरोबर सोसाटयाचा पाऊसही आणते. खूप मोठ्या आकारमानात हे पसरलेले असल्याने (चारशे ते सहाशे किलोमीटर) या सर्व भागातील निरनिराळे ढग यात ओढले गेलेले असतात. या ढगांचे एकत्रीकरण होताच त्यातील बाष्पही एकत्र येऊन त्यापासून पाऊस पडेल, असे मोठे बाष्पकण तयार होतात. सुरुवातीला प्रचंड वेगाने वाहणारे वारे, धुळीचे वातावरण व नंतरच्या पावसाचे तडाखे ही चक्रीवादळाची खासियतच म्हणायला हवी. चक्रीवादळांचा वेग जमिनीवर पोहोचल्यावर अनेकदा ताशी साठ ते ऐंशी किलोमीटर इतका असतो. समुद्रावरील वेग मोजण्याची पद्धत नाही, पण तो कदाचित यापेक्षाही जास्त असू शकतो.


 समुद्रावरील बोटी या वादळात सापडल्यास अनेकदा त्यांचे गंभीर नुकसान होण्याइतका त्यांना तडाखा बसलेला असतो. वादळाचा पट्टा ओलांडण्यास त्यांना एक ते चार दिवस लागत असल्याने तोवर राक्षसी लाटांचे तांडव असहाय्यपणे बघणे एवढेच त्यांच्या हातात असते. अनेकदा या लाटांची उंची तीस ते पस्तीस फुटांपर्यंतही असू शकते. ही वादळे सागरी अपघात व दुर्घटना यांचे एक मुख्य कारण असल्याने या वादळी टापूंची सतत माहिती घेऊन त्याप्रमाणे मार्ग आखणे, बदलणे बोटीच्या कप्तानाने कामच राहते. किनाऱ्यावर जेव्हा ही वादळे येतात, तेव्हा उंच झाडे उन्मळून पडणे, सागरी लाटा खोलवर घुसून त्यामुळे नुकसान होणे, घरांचे पत्रे उडणे या गोष्टी होतात. 

 

 चक्रीवादळांची सूचना हल्ली उपग्रहांमुळे खूपच लवकर मिळू शकते. उपग्रहांमधून या सर्व वादळांचा नेमका प्रवास, हवेतील घडत जाणारे बदल यांचे फोटो मिळतात. या खेरीच एक मोठी विलक्षण पद्धत चक्रीवादळांच्या अभ्यासासाठी गेली २० वर्षे वापरली जात आहे. अत्यंत धोकादायक अशा पद्धतीत लष्करी जेट विमानातून संशोधक या चक्रीवादळाच्या केंद्रबिंदूकडेच प्रवास सुरू करतात. थेट केंद्रबिंदूचा वेध घेऊन विमान वर न्यावयाचे व त्या दरम्यान विविध शास्त्रीय निरीक्षणे करायची, अशी ही पद्धत आहे. निष्णात वैमानिक व जिवावर उदार झालेले संशोधक यांचा चमू हे काम करतो. या प्रकारात विमान पार वेडेवाकडे होऊन दोन तीन हजार फूट लांबवर एखाद्या खेळण्याप्रमाणे भिरकावलेही गेले आहे. तरीही सुखरूप उतरल्यावर नवीन चक्रीवादळाची सूचना कधी मिळते, इकडेच या चमूचे लक्ष असते.

 

 धाडस व जिज्ञासा यांचा संगम काय करू शकतो, याचे हे एक थरारक उदाहरण आहे.

 

*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या 

शुक्रवार, २५ फेब्रुवारी, २०२२

जाडेपणा म्हणजे नेमके काय ?*


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   *📒📒📒 @ संकलन 

            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *जाडेपणा म्हणजे नेमके काय ?* 

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शरीरातील चरबीचे प्रमाण नको एवढे वाढत गेले, तर जाडी व वजन वाढते. चरबी प्रत्येकाच्या शरीरात असतेच, पण तिचे सर्व शरीरभर योग्य त्या पद्धतीत विवरण करण्याची व्यवस्था निसर्गानेच केलेली असते. जेव्हा आपण गरजेपेक्षा जास्त खाऊ लागतो, तेव्हा ही व्यवस्था बिघडायला सुरुवात होते. खाण्यात आलेल्या अन्नातून उष्मांक मिळतात. हे उष्मांक जेव्हा रोजच्या रोज खर्च होत नाहीत, तेव्हा शरीर ते साठवू लागते. ही साठवण्याची शरीराची पद्धत म्हणजे चरबीचा साठा वाढवणे.


पोटावर, मांड्यांमधील जागेत, नितंबांवरील व हातांच्या दंडामागील भागात प्रथम चरबी साठू लागते. पुरुषांमध्ये जाड माणसाला सफरचंदाचा, तर स्त्रियांमध्ये पीअर या फळाचा आकार प्राप्त होऊ लागतो. सर्वसाधारण आकडेवारीनुसार उंची, वय व वजन यांचे जेवढे प्रमाण असायला हवे, त्यापेक्षा वजन जास्त असेल, तर माणूस जात आहे, त्याने चरबी साठवायला सुरुवात केली आहे, असे समजावे. याखेरीज कातडीमधील चरबीचा साठा रास्त व जास्त आहे, हे ठरवण्यासाठी विशिष्ट पद्धतीचे चिमटेही मिळतात. या बाबतीत सोपा घरगुती अंदाज म्हणजे दंडामागील कातडी छोट्या चिमटीत पकडता आली तर चरबीचा साठा रास्त व न आली तर जास्त, असे समजावे !

प्रत्येक प्राण्यामध्ये चरबीचा साठा करणे व वापरणे यांवर निसर्ग नियंत्रण ठेवतो. पण माणूस त्याच्या अति खाण्याने व ऐदी वागणुकीने हे नियंत्रण झुगारू पाहतो. साखर, लोणी व मोटार वाहन वापर यांमुळे मानवाने स्वतःचे संतुलन घालवले आहे, असे डॉक्टर मंडळी म्हणतात. वाहनांमुळे हालचाल संपली, साखरेने नको असलेले उष्मांक पोटात वाढू लागले, तर लोण्यामुळे चक्क चरबीच पोटात वाढू लागली. विसाव्या शतकात जाड माणसांचे प्रमाण व त्यातून उद्भवणाऱ्या आजारांचे प्रमाण वाढले आहे.


जाड माणसाला जास्त घाम येतो. घामाला वास येत राहतो. थकवा जाणवतो, धाप लागते, जास्त तहान लागते, सतत खावेसे वाटते, खाऊनही समाधान होत नाही. या साध्या साध्या लक्षणानंतरही लक्ष दिले नाही, तर हळूहळू जाड माणसाच्या शरीरात मधुमेह, रक्तदाब, रक्तवाहिन्यांचे विकार व त्यांतूनच उद्भवणारा हृदयविकार यांचा शिरकाव होतो. वजन जास्त वाढल्याने सांध्यांची झीज होत जाऊन सांधेदुखी, तर पायांतील रक्तवाहिन्यांना शिथिलपणा आल्याने पायांत रक्त साचून पाय दुखणे, सूज येणे सुरू होते. जाड माणसे अपघाताला जास्त निमंत्रण देतात. रस्ता ओलांडताना अचानक आलेले वाहन धडकणे, जिन्यावर तोल न सावरता येणे यांतून हे अपघात घडतात.


पूर्ण उपवासाने जाडी कमी करणे हे सोपे आहे. पण कमी केलेली जाडी तशीच टिकवणे हे मात्र अत्यंत कठीण काम आहे. एका आकडेवारीनुसार जाडी कमी केलेल्यांतील जेमतेम ५ टक्के लोकच ती तशीच टिकवण्यात यशस्वी होतात. एकंदरीत खाण्यापिण्याच्या पद्धतीत व जीवनपद्धतीत अत्यंत नियमितपणा आणून सुयोग्य व्यायाम केला, तरच जाडी आटोक्यात राहू शकते.


स्त्रियांमध्ये प्रसूतीनंतर, विद्यार्थ्यांत बैठे काम सुरू झाल्यावर, मध्यम वयात म्हणजे चाळीस ते पन्नास या दरम्यान वजन वाढू लागते. नियमित व्यायाम केल्यास आणि तेलकट, तळकट व गोड खाणे मोजकेच ठेवल्यास जाड होण्याची भीती बाळगायची गरज नाही. हजारभर जाड माणसात एखाद्याचीच जाडी अनुवांशिक असते. ती आटोक्यात आणणे मात्र डॉक्टरांनाच शक्य असते. पण उरलेले सर्वजण मात्र 'हे कोणालाच शक्य नाही', अशा समजुतीत वावरतात.


जगातील सर्वात जाड इसम 'जॉन मुनाॅक' याचे वजन होते सहाशे पस्तीस किलोग्रॅम. १९८३ साली त्याचे जेमतेम बेचाळीसाव्या वर्षी निधन झाले. हा विक्रम आजही अबाधित आहे.


*'सृष्टी विज्ञानगाथा' 

श्री.ष.ब्र.१०८ प.पू.वसुंधरारत्न,राष्ट्रसंत, सदगुरु.डॉ.शिवलिंग शिवाचार्य महास्वामिजी* (वीरमठ अहमदपूर) यांचे आज १०५ जयंतीच्या निमित्ताने कोटी कोटी प्रणाम...!!

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*🇮🇳🚩🇮🇳गाथा बलिदानाची🇮🇳🚩🇮🇳*

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    *श्री.ष.ब्र.१०८ प.पू.वसुंधरारत्न,राष्ट्रसंत, सदगुरु.डॉ.शिवलिंग शिवाचार्य महास्वामिजी* (वीरमठ अहमदपूर) यांचे आज १०५ जयंतीच्या निमित्ताने कोटी कोटी प्रणाम...!! 


  *धन्य तुमची जीवनगाथा...!*

     *येथे झुकतो प्रत्येकाचा माथा...!!*

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   सर्व प्रथम माझे गुरुमाऊली, वसुंधरा रत्न, राष्ट्रसंत डॉ. शिवलिंग शिवाचार्य महाराज यांचा आज २५ फेब्रुवारी २०२२ ला १०६ व्या जयंती निमित्त ....सतत मनी राष्ट्रभाव ठेऊन देशासाठी तथा लिंगायत समाजाच्या ऐक्यासाठी राञदिवस समाज प्रबोधन करीत असलेले महान तपस्वी दैवी शक्तीस शत् शत् नमन्...

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       ज्या ज्या वेळेस धर्माला ग्लानी येते त्या त्या वेळेस भगवंताचा अवतार या पृथ्वीवर होतो.बाराव्या शतकामध्ये महात्मा बसवेश्वर महाराजांचा, त्यानंतर मन्मथ माऊलिंचा,आणि या कलियुगामध्ये राष्ट्रसंत शिवलिंग शिवाचार्य महाराजांचा.

    धन्य तुमची जीवनगाथा...!

येथे झुकतो प्रत्येकाचा माथा.. !!राष्ट्रसंत डॉ.शिवलिंग शिवाचार्य महाराज यांच्या दिव्य सान्निध्यात पदयात्रा मार्ग मार्गक्रमन करत आहे . ज्यानी आपल्या वयाची १०४ वर्ष केवळ जीवाचा उद्धार व भक्तांचे कल्याण करण्यासाठी चंदनाप्रमाणे झिजवली.विश्वातील समग्र मानवाला स्वतःच्या जीवनाकडे पाहण्याची अध्यात्मिक दृष्टी दिली. माऊलिंच्या वर्णणासाठी सद् गुणांचे दृष्टांतही अपूरे पडतात. त्याग,विरक्ती,ज्ञान,प्रेम,शांती, भक्ती,परोपकार,आनंद,याचेसह दृष्टांत अपूरे पडतात.अध्यात्म विकास आणि विकासाची सांगड म्हणजेच राष्ट्रसंत शिवलिंग शिवाचार्य महाराज.महाराजांची गोरगरिबाविषयी तळमळ, बंधु प्रेमाची शिकवण, 

उत्साह,संस्कार,मन मोकळे मतप्रदर्शन,आचरणशुद्धता ही गुणवैशिष्ट्ये समाजमनाला बांधणारी आदर्श आहेत.ज्ञानसूर्य प.पू.गुरूमाऊली समाजात सत्प्रेरणा,सदभाव व सत्प्रवृत्तीचा मुळ स्ञोत म्हणजेच माऊली.जे सूर्याप्रमाणे संपूर्ण सद्भक्तांना आत्मज्ञानाचा प्रकाश देत आहेत.आधुनिकतेच्या तापाने तप्त अशा मानव समाजाला चंद्रासारखी शितलता देत आहेत.प्राणीमाञाची पिडा ज्यांना स्वतःची पिडा वाटते,असे राष्ट्रसंत आज संपूर्ण समाजाला जीवनाची योग्य दिशा दाखवत होते.म्हणूनच...!!

*धन्य तुमची जीवनगाथा...!!*

*येथे झुकतो प्रत्येकांचा माथा..!*

*मौलिक तुमच्या विचारधारा,सुगंधित आहे. आसंमत सारा..,*

*विनम्र होऊनी शतजन्मी,शब्दफुलांची ओंजळ वाहतोत,आज तुमच्या चरणी...!!*

प.पू.गुरूमाऊलिंना कोटी कोटी नमन्...!!

संत शिरोमणी मन्मथ स्वामी महाराज की जय...!!!

डॉ.शिवलिंग शिवाचार्य महाराज की जय....!!!!!

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संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा - यवतमाळ ४४५२०६

बुधवार, २३ फेब्रुवारी, २०२२

आयपॅड, आयफोन, स्मार्टफोनचा संशोधक*

 *📲📲📲स्टीव्ह जॉब्स📲📲📲*

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*आयपॅड, आयफोन, स्मार्टफोनचा संशोधक*

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*जन्मदिन - २४ फेब्रुवारी इ.स. १९५५*

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   स्टीव्ह जॉब्स (इंग्लिश: Steve Jobs) (२४ फेब्रुवारी इ.स. १९५५; सान फ्रान्सिस्को, कॅलिफोर्निया,अमेरिका - ५ ऑक्टोबर इ.स. २०११; पालो आल्टो, कॅलिफोर्निया, अमेरिका) हा एक अमेरिकन व्यवसायिक होता आणि तो ॲपल ह्या अमेरिकन कंपनीचा सहसंस्थापक व मुख्याधिकारी होता. जॉब्स हा काही काळ पिक्सार अ‍ॅनिमेशन स्टुडिओज‎चा मुख्य व्यवस्थापक होता आणि नंतर तो वॉल्ट डिस्ने कंपनीचा संचालक सदस्य होता. इ.स. १९७० मध्ये जॉब्स याने स्टीव्ह वॉझनियाक, माइक मारक्कुला आणि इतर (ॲपल कंपनीचे सर्व सदस्य) यांच्या समवेत व्यक्तिगत संगणक🖥️🖥️ तयार केला. ॲपल-२ या मलिकेअंतर्गत मॅकिंटॉश नावाची प्रचालन यंत्रणा तयार केली. इ.स. १९८५ मध्ये कंपनीच्या सदस्यांसमावेत झालेल्या वादामुळे त्याने राजीनामा दिला आणि नेक्स्ट या नावाने व्यवहारात आणि उच्च शिक्षणात उपयोगी होईल अशी संगणकीय यंत्रणा (संगणकाचा वापर) किंवा प्रणाली तयार करणारी कंपनी स्थापन केली. इ.स. १९९७ साली 'नेक्स्ट'चे 'ॲपल'मध्ये विलीनीकरण झाले, त्याला पुन्हा 'ॲपल'मध्ये म्हणून स्थान मिळाले. यावेळी त्याच्यावर मुख्य कार्यकारी अधिकारी पदाची जबाबदारी सोपवण्यात आली.

जॉब्स याला व्यवहारिक जगाच्या इतिहासात एक सणकी, कलंदर, सिलिकॉन व्हॅलीचे ठेकेदार म्हणून ओळखले जाते.[ संदर्भ हवा ] त्याला सौंदर्यपूर्ण वस्तू बनवण्याची व वापरण्याची आवड असून याच कामासाठी त्याने वाहून घेतले आहे. त्याने प्रकृति अस्वास्थ्य व अन्य वैयक्तिक कारणांसाठी २९ जून, इ.स. २००९ रोजी मुख्य कार्यकारी अधिकारीपदाचा राजीनामा दिला. आयफोन, 'आयपॉड', 'आयपॅड' हे लोकप्रिय, बहूपयोगी उत्पादने त्याच्यामुळेच बाजारात आले[ संदर्भ हवा ].

स्टीव जॉब्सला उपभोक्ता संगणकक्षेत्रातील नवीनतेचा व अविष्कारचा जनक म्हणून संबोधले जाते. मृत्यू स्टिव जॉब्सचा कर्क रोगामुळे मृत्यू झाला.


🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा - यवतमाळ ४४५२०६

▬▬▬▬▬❚❂❚❂❚❚❂❚❂❚▬▬▬▬▬ *📱तंत्रस्नेही शिक्षक समूह महाराष्ट्र📱* ▬▬▬▬▬❚❂❚❂❚❚❂❚❂❚▬▬▬▬▬ 🔭🇹​🇸​🇸​-🇹​🇸​🇸​-🇹​🇸​🇸🔭 ══════════════════════ *📒📒📒 @ संकलन @📒📒📒* *श्री. संदिप अंबादास शेंडे नागपूर (TSS)* ══════════════════════ 🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ══════════════════════ 🦷 *दात* 🦷 ************* कोणत्याही व्यक्तीच्या चेहऱ्यामध्ये ठळकपणे उठून दिसतात ते त्या व्यक्तीचे केस, डोळे, नाक आणि दात. या चारही घटकांपैकी केस, डोळे, नाक हे तिन्ही घटक सुंदर असले आणि दात मात्र वेडेवाकडे किंवा फारच पुढे असले तर मात्र बाकी सर्व घटक हजर असूनही वेड्यावाकड्या दातांमुळे चेहऱ्याला कुरुपता येते आणि चर्वण क्षमता कमी होते. मनुष्याचा आहार, मनुष्याची पचनक्रिया, मनुष्याची भाषा, शब्दोच्चार या गोष्टीसाठी प्रत्यक्ष आणि अप्रत्यक्षरित्या दातच कारणीभूत ठरतात म्हणूनच दातांना महत्त्व मोठं आहे. *दातांची काळजी कशी घ्यावी* *माणूस आपल्या कामात कितीही व्यस्त असला तरी तो आपल्या दातांची काळजी सहज घेऊ शकतो. त्यासाठी अगदी वेगळा वेळ काढावा असं काही नाही. दातांवर जेवणाचे कण अडकू न देणं, सकाळी आणि रात्री नियम‌ीत दात घासणं, जेवणानंतर व्यवस्थित चूळ भरणं, डॉक्टरांनी सांगितलेल्या पध्दतीनेच दात स्वच्छ करणं या सर्व गोष्टींमुळे दातांवरचे जेवणाचे कण निघून जातात. जर दातांतील जेवणाचं कण साठून राहिले तर त्याला फूड लॉजमेंट (food lodgement) म्हणतात. *मुखाचे दोन प्रकारचे आजार•दात कीडणं (झाडाला कीड लागणं)•दातांच्या हिरड्या आणि हाड खराब होणं (जमिनीला कीड लागणं) *दातांचे हाड आणि हिरड्या खराब होण्याच्या आजाराला पायोरिया (Periodontitis/Pyorrhoea) असं म्हणतात. असा हिरड्या आणि हाड खराब होण्याचे आजार जेवणाचे कण अडकल्यामुळेच होतात. जसं की हिरडीला सुज येणे, हिरड्यांमधून रक्तस्त्राव होणं, तोंडातून दुर्गंधी येणं, दात हालणं. *दात स्वच्छ करण्याची पध्दत : *१. ब्रशला दातांच्या मानेवर आणि हिरडीवर ४५ अंश कोनात १०/१५ वेळा हलक्या हाताने ब्रश मागे-पुढे करणं. *२. दातांच्या आतल्या बाजूस ब्रश करणंही आवश्यक असते. *३. दातांच्या चावण्याचा पृष्ठभागावरही (Top surface) ब्रश करणं आवश्यक असतं. *४. ब्रशच्या शेंड्याचाही वापर करणं गरजेचं असतं. *बरेच रुग्ण सांगतात की, ते २-३ वेळा दात घासूनही त्यांना दातांचा आणि हिरडीचा त्रास आहे. रुग्णांची जर दात घासण्याची पध्दतच चुकीची असेल तर अनेक वेळा दात घासूनही उपयोग नाही. दात दिवसातून २-३ वेळा डॉक्टरांनी सांगितलेल्या पध्दतीने घासले गेले पाहिजेत किंवा प्रत्येक जेवणानंतर दात घासले तर अति उत्तम. प्रॉक्सा ब्रश आणि डेंटल फ्लॉस (Proxa Brush/ Dental floss)चा उपयोग केला तर अति उत्तम. आपल्या नेहमीच्या ब्रशने दात घासल्यानंतर Dental floss किंवा Proxa ब्रशने प्रत्येक दोन दातांमधील अडकलेले जेवणाचे कण स्वच्छ करावेत. नंतर गुळणी करुन शेवटी Chlorchoxidin mouth washने गुळण्या करणं फायदेशीर ठरेल. माऊथ वॉशचा वापर केल्याने तोंडातला आम्ल‌कि PH नाहीसा होतो. त्यामुळे दातांवर आणि हिरडीवर असलेले कीडजन्य जंतू कमी होण्यास मदत होते. (डायबेटीसच्या रुग्णाने अशा पध्दतीचे अवलंब करणं गरजेचं आहे). ब्रश हिरड्यांवरुनही हलक्या हाताने फिरवला पाहिजे. जेणेकरुन हिरड्यांची मसाज होऊन हिरड्यांमधील रक्तप्रवाह वाढतो. गैरसमजूती- बऱ्याच रुग्णांमध्ये असा गैरसमज निर्माण झाला आहे की, डॉक्टरांकडून दात स्वच्छ केल्याने दात ढिले होतात. पण याउलट दात स्वच्छ केल्यानेच दात पक्के होण्यास मदत होते आणि सगळ्या रुग्णांमध्ये दात स्वच्छ करण्याची गरज नसते. दात स्वच्छ केल्यानंतर सुरुवातीला काही दिवस दात ढिले झाल्याची जाणीव होते. कारण दातांवरचे किटाणू निघाल्यानंतर दात आणि हिरड्या तात्पुरत्या स्वरुपात मोकळ्या होतात. पण काही दिवसांनी या हिरड्यांची नव्याने वाढ होऊन दात पुन्हा पक्के होण्यास मदत होते आणि दातांचे आयुष्य वाढते. हे डॉक्टरांकडून स्वच्छ केलेले दात डॉक्टरांनी सांगितलेल्या ब्रशिंग पध्दतीचाच उपयोग करुन दैनंदिन घरच्या घरी व्यवस्थ‌ति अवलंब करावा. - डॉ. विशाल ठाकूर, दंतरोग तज्ज्ञ ═══════════════════════ *📱तंत्रस्नेही शिक्षक समूह महाराष्ट्र📱* ▬▬▬▬▬❚❂❚❂❚❚❂❚❂❚▬▬▬▬▬ ⚜🇹​🇸​🇸​-🇹​🇸​🇸​-🇹​🇸​🇸​⚜ ═══════════════════════ 🎯🗝 *धरुनी कास तंत्रज्ञानाची*, *प्रगती होईल महाराष्ट्राची*🗝🎯 ═══════════════════════


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   *📒📒📒 @ संकलन @📒📒📒*

  *श्री. गजानन गोपेवाड 

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            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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🦷 *दात* 🦷

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कोणत्याही व्यक्तीच्या चेहऱ्यामध्ये ठळकपणे उठून दिसतात ते त्या व्यक्तीचे केस, डोळे, नाक आणि दात. या चारही घटकांपैकी केस, डोळे, नाक हे तिन्ही घटक सुंदर असले आणि दात मात्र वेडेवाकडे किंवा फारच पुढे असले तर मात्र बाकी सर्व घटक हजर असूनही वेड्यावाकड्या दातांमुळे चेहऱ्याला कुरुपता येते आणि चर्वण क्षमता कमी होते. मनुष्याचा आहार, मनुष्याची पचनक्रिया, मनुष्याची भाषा, शब्दोच्चार या गोष्टीसाठी प्रत्यक्ष आणि अप्रत्यक्षरित्या दातच कारणीभूत ठरतात म्हणूनच दातांना महत्त्व मोठं आहे.


*दातांची काळजी कशी घ्यावी*


*माणूस आपल्या कामात कितीही व्यस्त असला तरी तो आपल्या दातांची काळजी सहज घेऊ शकतो. त्यासाठी अगदी वेगळा वेळ काढावा असं काही नाही. दातांवर जेवणाचे कण अडकू न देणं, सकाळी आणि रात्री नियम‌ीत दात घासणं, जेवणानंतर व्यवस्थित चूळ भरणं, डॉक्टरांनी सांगितलेल्या पध्दतीनेच दात स्वच्छ करणं या सर्व गोष्टींमुळे दातांवरचे जेवणाचे कण निघून जातात. जर दातांतील जेवणाचं कण साठून राहिले तर त्याला फूड लॉजमेंट (food lodgement) म्हणतात.

*मुखाचे दोन प्रकारचे आजार•दात कीडणं (झाडाला कीड लागणं)•दातांच्या हिरड्या आणि हाड खराब होणं (जमिनीला कीड लागणं)

*दातांचे हाड आणि हिरड्या खराब होण्याच्या आजाराला पायोरिया (Periodontitis/Pyorrhoea) असं म्हणतात. असा हिरड्या आणि हाड खराब होण्याचे आजार जेवणाचे कण अडकल्यामुळेच होतात. जसं की हिरडीला सुज येणे, हिरड्यांमधून रक्तस्त्राव होणं, तोंडातून दुर्गंधी येणं, दात हालणं.

*दात स्वच्छ करण्याची पध्दत :

*१. ब्रशला दातांच्या मानेवर आणि हिरडीवर ४५ अंश कोनात १०/१५ वेळा हलक्या हाताने ब्रश मागे-पुढे करणं.

*२. दातांच्या आतल्या बाजूस ब्रश करणंही आवश्यक असते.

*३. दातांच्या चावण्याचा पृष्ठभागावरही (Top surface) ब्रश करणं आवश्यक असतं.

*४. ब्रशच्या शेंड्याचाही वापर करणं गरजेचं असतं.


*बरेच रुग्ण सांगतात की, ते २-३ वेळा दात घासूनही त्यांना दातांचा आणि हिरडीचा त्रास आहे. रुग्णांची जर दात घासण्याची पध्दतच चुकीची असेल तर अनेक वेळा दात घासूनही उपयोग नाही. दात दिवसातून २-३ वेळा डॉक्टरांनी सांगितलेल्या पध्दतीने घासले गेले पाहिजेत किंवा प्रत्येक जेवणानंतर दात घासले तर अति उत्तम. प्रॉक्सा ब्रश आणि डेंटल फ्लॉस (Proxa Brush/ Dental floss)चा उपयोग केला तर अति उत्तम. आपल्या नेहमीच्या ब्रशने दात घासल्यानंतर Dental floss किंवा Proxa ब्रशने प्रत्येक दोन दातांमधील अडकलेले जेवणाचे कण स्वच्छ करावेत. नंतर गुळणी करुन शेवटी Chlorchoxidin mouth washने गुळण्या करणं फायदेशीर ठरेल. माऊथ वॉशचा वापर केल्याने तोंडातला आम्ल‌कि PH नाहीसा होतो. त्यामुळे दातांवर आणि हिरडीवर असलेले कीडजन्य जंतू कमी होण्यास मदत होते. (डायबेटीसच्या रुग्णाने अशा पध्दतीचे अवलंब करणं गरजेचं आहे). ब्रश हिरड्यांवरुनही हलक्या हाताने फिरवला पाहिजे. जेणेकरुन हिरड्यांची मसाज होऊन हिरड्यांमधील रक्तप्रवाह वाढतो.


गैरसमजूती-


बऱ्याच रुग्णांमध्ये असा गैरसमज निर्माण झाला आहे की, डॉक्टरांकडून दात स्वच्छ केल्याने दात ढिले होतात. पण याउलट दात स्वच्छ केल्यानेच दात पक्के होण्यास मदत होते आणि सगळ्या रुग्णांमध्ये दात स्वच्छ करण्याची गरज नसते. दात स्वच्छ केल्यानंतर सुरुवातीला काही दिवस दात ढिले झाल्याची जाणीव होते. कारण दातांवरचे किटाणू निघाल्यानंतर दात आणि हिरड्या तात्पुरत्या स्वरुपात मोकळ्या होतात. पण काही दिवसांनी या हिरड्यांची नव्याने वाढ होऊन दात पुन्हा पक्के होण्यास मदत होते आणि दातांचे आयुष्य वाढते. हे डॉक्टरांकडून स्वच्छ केलेले दात डॉक्टरांनी सांगितलेल्या ब्रशिंग पध्दतीचाच उपयोग करुन दैनंदिन घरच्या घरी व्यवस्थ‌ति अवलंब करावा.


- डॉ. विशाल ठाकूर, दंतरोग तज्ज्ञ

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जायरोस्कोप म्हणजे काय ?*


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📙 *जायरोस्कोप म्हणजे काय ?* 

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होकायंत्र ज्यावेळी स्थिर राहू शकत नाही, हेलकावे, वळणे, हिंदकळणे यांमुळे त्याचा लोहचुंबक दिशा नीट दाखवायला जेव्हा असमर्थ ठरू लागतो, त्या वेळी जाइरोस्कोप वापरावा लागतो. जमिनीला समांतर स्वरूपात होकायंत्र स्थिर असेल, तेव्हा त्यावरून नेमकी दिशा ज्ञात करून घेता येते. पण पाण्यावर जेव्हा एखादे जहाज वादळात सापडून सतत हेलकावू लागते, तेव्हा आपण पकडलेली दिशा कोणती, असा प्रश्न उद्भवतो. अशीच काहीशी स्थिती विमानात येते.

जायरोस्कोप म्हणजे एक जड, स्वतःभोवती फिरणारे चक्रच असते. एका विशिष्ट अक्षाभोवती हे चक्र अत्यंत वेगाने फिरू शकते. या अक्षाची दिशा त्याभोवती असलेल्या मोजपट्टीवर पाहिजे त्या ठिकाणी स्थिर करून मग हे चक्र फिरवायला सुरुवात करतात. थोडक्यात म्हणजे होकायंत्रावरून प्रवासाचे अक्षांश रेखांश पक्के ठरले की सुकाणूची दिशा पकडण्यासाठी जायरोस्कोप स्थिर करून त्याचे चक्र फिरवायला सुरुवात केली जाते. एकदा का चक्र वेगाने फिरू लागले की, याची दिशा हलवणे व त्याचा फिरणारा चक्राचा पृष्ठभाग अक्ष बदलून फिरणे ही जवळपास न होणारी गोष्ट बनते.


चक्राने घेतलेला स्वतः भोवतीचा वेग केंद्रीभूत होऊन अशी काही अक्षाभोवती पकड घेतो की ती पकड हलणे व्यवहारत: अशक्य असते. यालाच जायरोस्कोपिक इनर्शिया' किंवा 'जडत्व' असे म्हणतात. यासाठी एकाच गोष्टीची आवश्यकता असते, ती म्हणजे चक्राचा फिरण्याचा वेग अबाधित राखणे. हा वेग जर काही कारणाने कमी होऊ लागला, तर मात्र ज्या आधारावर जायरोस्कोप उभा केलेला, आधारलेला असतो, त्यालाच तो संथपणे गोलाकार फेरी घालू लागतो.


 जायरोस्कोपचा वापर होकायंत्राच्या जोडीला सर्व प्रकारच्या लांब पल्ल्याच्या जल व हवेतील प्रवासासाठी केला जातो. होकायंत्र वाचणे व त्याचा वापर करणे हे तल्लख खलाशाचे व अधिकाऱ्याचे काम; पण या ऐवजी जाइरोस्कोप दाखवेल ती दिशा पकडणे ही मात्र कोणाही माणसाला जमणारी गोष्ट असू शकते. हाही महत्त्वाचा उपयोग नाही काय ? 

 

 अंतराळ प्रवासात होकायंत्र बिनकामी ठरते; पण जाइरोस्कोप वापरता येतो.


*'सृष्टी विज्ञानगाथा' या पुस्तकातून*


मंगळवार, २२ फेब्रुवारी, २०२२

🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎 ════════════ 📙 *जायरोस्कोप म्हणजे काय ?*


            🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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📙 *जायरोस्कोप म्हणजे काय ?* 

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होकायंत्र ज्यावेळी स्थिर राहू शकत नाही, हेलकावे, वळणे, हिंदकळणे यांमुळे त्याचा लोहचुंबक दिशा नीट दाखवायला जेव्हा असमर्थ ठरू लागतो, त्या वेळी जाइरोस्कोप वापरावा लागतो. जमिनीला समांतर स्वरूपात होकायंत्र स्थिर असेल, तेव्हा त्यावरून नेमकी दिशा ज्ञात करून घेता येते. पण पाण्यावर जेव्हा एखादे जहाज वादळात सापडून सतत हेलकावू लागते, तेव्हा आपण पकडलेली दिशा कोणती, असा प्रश्न उद्भवतो. अशीच काहीशी स्थिती विमानात येते.

जायरोस्कोप म्हणजे एक जड, स्वतःभोवती फिरणारे चक्रच असते. एका विशिष्ट अक्षाभोवती हे चक्र अत्यंत वेगाने फिरू शकते. या अक्षाची दिशा त्याभोवती असलेल्या मोजपट्टीवर पाहिजे त्या ठिकाणी स्थिर करून मग हे चक्र फिरवायला सुरुवात करतात. थोडक्यात म्हणजे होकायंत्रावरून प्रवासाचे अक्षांश रेखांश पक्के ठरले की सुकाणूची दिशा पकडण्यासाठी जायरोस्कोप स्थिर करून त्याचे चक्र फिरवायला सुरुवात केली जाते. एकदा का चक्र वेगाने फिरू लागले की, याची दिशा हलवणे व त्याचा फिरणारा चक्राचा पृष्ठभाग अक्ष बदलून फिरणे ही जवळपास न होणारी गोष्ट बनते.


चक्राने घेतलेला स्वतः भोवतीचा वेग केंद्रीभूत होऊन अशी काही अक्षाभोवती पकड घेतो की ती पकड हलणे व्यवहारत: अशक्य असते. यालाच जायरोस्कोपिक इनर्शिया' किंवा 'जडत्व' असे म्हणतात. यासाठी एकाच गोष्टीची आवश्यकता असते, ती म्हणजे चक्राचा फिरण्याचा वेग अबाधित राखणे. हा वेग जर काही कारणाने कमी होऊ लागला, तर मात्र ज्या आधारावर जायरोस्कोप उभा केलेला, आधारलेला असतो, त्यालाच तो संथपणे गोलाकार फेरी घालू लागतो.


 जायरोस्कोपचा वापर होकायंत्राच्या जोडीला सर्व प्रकारच्या लांब पल्ल्याच्या जल व हवेतील प्रवासासाठी केला जातो. होकायंत्र वाचणे व त्याचा वापर करणे हे तल्लख खलाशाचे व अधिकाऱ्याचे काम; पण या ऐवजी जाइरोस्कोप दाखवेल ती दिशा पकडणे ही मात्र कोणाही माणसाला जमणारी गोष्ट असू शकते. हाही महत्त्वाचा उपयोग नाही काय ? 

 

 अंतराळ प्रवासात होकायंत्र बिनकामी ठरते; पण जाइरोस्कोप वापरता येतो.


*'सृष्टी विज्ञानगाथा' 

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

माघ मास,कृष्ण पक्ष,*सप्तमी*,विशाखा नक्षत्र,सूर्य उत्तरायण,बसन्त ऋतु, युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

बुधवार, २३ फेब्रुवारी २०२२.

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                         *प्रभात दर्शन*

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          *"हर विषय, वस्तु, कार्य का श्वेत एवं श्याम पक्ष दोनों होता है। यह देखने वाले के ऊपर निर्भर है कि वो कौन सा पक्ष देखता है। हर कार्य में कुछ त्रुटि भी हो सकती है किन्तु जिसका स्वभाव आलोचनात्मक हो तो उससे आप अपने किसी भी कार्य की प्रशंसा की अपेक्षा नही कर सकते। स्मरण रहे कि आप कितना भी अच्छा कार्य का प्रयास करें किन्तु नकारात्मक व्यक्ति आपकी गलती ढूंढने के लिए अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा लगा देंगे। अतः श्रेष्ठ यही है कि ऐसे व्यक्तियों की बातों पर ध्यान न दें, सहज एवं सरल रहें।"*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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वैज्ञानिक दृष्टिकोन असलेले प्रसिद्ध समाजसुधारक* *स्वच्छतेचे पुजारी* *संत गाडगे महाराज*

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              *गाथा बलिदानाची*

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*वैज्ञानिक दृष्टिकोन असलेले प्रसिद्ध समाजसुधारक*


               *स्वच्छतेचे पुजारी*  

             *संत गाडगे महाराज*


       *डेबूजी झिंगराजी जानोरकर*

                 (समाज सुधारक)


  *जन्म : २३ फेब्रुवारी १८७६*

 (शेणगाव,महाराष्ट्र,ब्रिटिश भारत)


 *निधन : २० डिसेंबर १९५६* 

                (वय ८०)

    ( वलगाव,अमरावती,महाराष्ट्र )


मुख्य स्वारस्ये : धर्म,कीर्तन,नीतिशास्त्र


प्रभाव : डाॕ. बाबासाहेब आंबेडकर , कर्मवीर भाऊराव पाटील , भाऊराव कृष्णाजी गायकवाड , तुकडोजी महाराज आणि मेहेर बाबा


गाडगे महाराज हे गाडगे बाबा म्हणून ओळखले जाणारे महाराष्ट्र राज्यातील एक कीर्तनकार, संत आणि समाजसुधारक होते. त्यांनी स्वेच्छेने गरीब रहाणी स्वीकारली होती. ते सामाजिक न्याय देण्यासाठी विविध गावांना भटकत असत. गाडगे महाराजांची सामाजिक न्याय, सुधारणा आणि स्वच्छता या विषयांत जास्त रुची होती. विसाव्या शतकातील समाजसुधार आंदोलनांमध्ये ज्या महापुरुषांचा सहभाग आहे, त्यापैकी एक महत्त्वाचे नाव गाडगे बाबा यांचे आहे.


संत गाडगे महाराजांच पूर्ण नाव डेबूजी झिंगराजी जानोरकर होते. त्यांच्या वडिलांचे नाव - झिंगराजी राणोजी जाणोरकर तर आईचे नाव - सखुबाई झिंगराजी जणोरकर हे होते. गाडगे महाराज हे वैज्ञानिक दृष्टिकोन असलेले प्रसिद्ध समाजसुधारक होते. दीनदलित आणि पीडितांच्या सेवेमध्ये आपलं संपूर्ण आयुष्य व्यतीत करणारे गाडगेबाबा हे संता मधील सुधारक आणि सुधारकां मधील संत होते. त्यांच कीर्तन म्हणजे लोक प्रबोधनाचा एक भाग असे. आपल्या कीर्तनातून समाजातील दांभिकपणा रूढी परंपरा यावर ते टीका करत. समाजाला शिक्षणाचे महत्त्व पटवून देताना स्वच्छता आणि चारित्र्य याची शिकवण गाडगेबाबा देत. गाडगेबाबा म्हणजे एक चालती-बोलती पाठशाळा होती.


गाडगे महाराज हे गोरगरीब, दीनदलित यांच्यामधील अज्ञान, अंधश्रद्धा, अस्वच्छता यांचे उच्चाटन करण्यासाठी तळमळीने कार्य करणारे समाजसुधारक होते. तीर्थी धोंडापाणी देव रोकडा सज्जनी |" असे सांगत दीन, दुबळे, अनाथ, अपंगांची सेवा करणारे थोर संत म्हणजे गाडगेबाबा. "देवळात जाऊ नका, मूर्तिपूजा करू नका, सावकाराचे कर्ज काढू नका, अडाणी राहू नका, पोथी-पुराणे, मंत्र-तंत्र, देवदेवस्की, चमत्कार असल्या गोष्टींवर विश्वास ठेऊ नका." अशी शिकवण आयुष्यभर त्यांनी लोकांना दिली. माणसात देव शोधणार्‍या या संताने लोकांनी दिलेल्या देणग्यांतील पैशातून रंजल्या-गांजल्या, अनाथ लोकांसाठी महाराष्ट्रात ठिकठिकाणी धर्मशाळा, अनाथालये, आश्रम, व विद्यालये सुरू केली. रंजले-गांजले, दीन-दुबळे, अपंग-अनाथ हेच त्यांचे देव. या देवांतच गाडगेबाबा अधिक रमत असत. डोक्यावर झिंज्या, त्यावर खापराच्या तुकड्याची टोपी, एका कानात कवडी, तर दुसर्‍या कानात फुटक्या बांगडीची काच, एका हातात झाडू, दुसर्‍या हातात मडके असा त्यांचा वेश असे.


समाजातील अज्ञान, अंधश्रद्धा, भोळ्या समजुती, अनिष्ट रूढी-परंपरा दूर करण्यासाठी त्यांनी आपले पूर्ण आयुष्य वेचले. यासाठी त्यांनी कीर्तनाच्या मार्गाचा अवलंब केला. आपल्या कीर्तनात ते श्रोत्यांनाच विविध प्रश्न विचारून त्यांना त्यांच्या अज्ञानाची, दुर्गुण व दोषांची जाणीव करून देत असत. त्यांचे उपदेशही साधे, सोपे असत. चोरी करू नका, सावकाराकडून कर्ज काढू नका, व्यसनांच्या आहारी जाऊ नका, देवा-धर्माच्या नावाखाली प्राण्यांची हत्या करू नका, जातिभेद व अस्पृश्यता पाळू नका असे ते आपल्या कीर्तनातून सांगत. देव दगडात नसून तो माणसांत आहे हे त्यांनी सर्वसामान्यांच्या मनावर ठसविण्याचा प्रयत्न केला. ते संत तुकाराम महाराजांना आपले गुरू मानीत. ‘मी कोणाचा गुरू नाही, मला कोणी शिष्य नाही’ असे ते कायम म्हणत. आपले विचार साध्या भोळ्या लोकांना समजण्यासाठी ते ग्रामीण भाषेचा (प्रामुख्याने वऱ्हाडी बोलीचा) उपयोग करत असत. गाडगेबाबांनी संत तुकारामांच्या नेमक्या अभंगांचा मुबलक वापरही वेळोवेळी केला. ‘देवभोळ्या माणसापासून ते नास्तिकापर्यंत, कोणत्याही वयोगटातील लोकांना गाडगेबाबा आपल्या कीर्तनात सहजपणे गुंतवून ठेवत, आपले तत्त्वज्ञान पटवून देत. त्यांच्या कीर्तनाचे शब्दचित्र उभे करणे माझ्या ताकदीबाहेरचे काम आहे .’ असे उद्‌गार बाबांचे चरित्रकार प्रबोधनकार ठाकरे यांनी काढले होते. संत व सुधारक या दोन्हीही वृत्ती गाडगेमहाराजांत होत्या. तुकारामांप्रमाणे ठणकावून् सत्य सांगण्याचे धैर्य बाबांमध्ये होते. जनसंपर्क होता. समाजाचा अर्धा भाग जो स्त्रिया व अतिशूद्र या सर्वांना व सुशिक्षित समाजथरातील जे येतील अशा स्त्रीपुरुषांना एकत्र बसवून, म्हणजे भेदाभेद, स्पृश्यास्पृश्यता संपूर्ण बाजूस घालवून हरिभक्तीचा रस चाखण्यास सर्व वर्गातील, सर्व थरातील बायाबापडी, श्रीमंत व गरीब वगैरे सर्व एकत्र होत. बाबांची कीर्तने एकल्यानंतर तुकाराम व जोतीबाची शिकवण लोकांप्रत वाहात आहे, असे दिसते.

 

👬 *गाडगेबाबा आणि बाबासाहेबांची भेट*


१४ जुलै १९४१ मध्‍ये संत गाडगेबाबा यांची प्रकृती ठीक नव्‍हती. ते मुंबईत होते. ही माहिती एका सहका-याने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांच्‍यापर्यंत पोहोचवली. बाबासाहेब तेव्‍हा कायदेमंत्री होते. त्‍याच दिवशी सायंकाळी कामानिमित्‍त त्‍यांना दिल्‍लीला जायचे होते. पण गाडगेबाबांच्‍या प्रकृतीची बातमी ऐकताच त्‍यांनी सर्व कार्यक्रम बाजूला ठेवले. दोन घोंगड्या विकत घेऊन ते महानंदसामी या बातमी घेऊन येणा-या सहका-यासोबत हॉस्‍पिटलमध्‍ये पाहोचले. गाडगेबाबा कधीही कुणाकडून काही स्‍वीकारत नसत. पण त्‍यांनी बाबासाहेबांकडून घोंगड्या स्‍वीकारल्‍या.

गाडगेबाबा तेव्‍हा म्‍हणाले होते, "डॉ. तुम्ही कशाला आले? मी एक फकीर, तुमचा एक मिनिट महत्त्वाचा आहे. तुमचा किती मोठा अधिकार आहे."

डॉ. बाबासाहेब म्हणाले, "बाबा माझा अधिकार दोन दिवसाचा. उद्या खुर्ची गेल्यावर मला कोणी विचारणार नाही. तुमचा अधिकार मोठा आहे." या प्रसंगी बाबासाहेबांच्या डोळ्यांत अश्रू होते. कारण हा प्रसंग पुन्हा जीवनात येणार नाही हे दोघेही जाणत होते.


📚 *गाडगे महाराजांची चरित्रे*


असे होते गाडगेबाबा (प्राचार्य रा.तु. भगत)

ओळख गाडगेबाबांची (प्राचार्य रा.तु. भगत)

कर्मयोगी गाडगेबाबा (मनोज तायडे)

गाडगेबाबा (चरित्र, प्रबोधनकार ठाकरे)

गाडगे बाबांचा पदस्पर्श (केशव बा. वसेकर)

श्री गाडगेबाबांचे शेवटचें कीर्तन (गो.नी. दांडेकर)

Shri Gadge Maharaj (इंग्रजी, गो.नी. दांडेकर)

गाडगेबाबांच्या सहवासात (जुगलकिशोर राठी)

गाडगे माहात्म्य (काव्यात्मक चरित्र, नारायण वासुदेव गोखले)

गोष्टीरूप गाडगेबाबा (विजया ब्राम्हणकर)

निवडक गाडगेबाबा (प्राचार्य रा.तु. भगत)

मुलांचे गाडगेबाबा (प्राचार्य रा.तु. भगत)

लोकशिक्षणाचे शिल्पकार (रा.तु. भगत)

लोकोत्तर : गाडगेबाबा जीवन आणि कार्य (डॉ. द.ता. भोसले)

The Wandering Saint (इंग्रजी, वसंत शिरवाडकर)

संत गाडगेबाबा (गिरिजा कीर)

संत गाडगेबाबा (दिलीप सुरवाडे)

संत गाडगेबाबा (प्राचार्य रा.तु. भगत)

Sant Gadagebaba (इंग्रजी, प्राचार्य रा.तु. भगत)

संत गाडगेबाबांची भ्रमणगाथा (प्राचार्य रा.तु. भगत)

श्रीसंत गाडगे महाराज (मधुकर केचे)

श्री संत गाडगे महाराज ऊर्फ गोधडे महाराज यांचे चरित्र (पां.बा. कवडे, पंढरपूर)

संत श्री गाडगे महाराज (डॉ. शरदचंद्र कोपर्डेकर)

गाडगे महाराजांच्या गोष्टी (सुबोध मुजुमदार)

समतासूर्य गाडगेबाबा (प्राचार्य रा.तु. भगत )

स्वच्छतासंत गाडगेबाबा (प्राचार्य रा.तु. भगत)

🎥 *गाडगेबाबांच्या जीवनावरील  चित्रपट*


डेबू : हा चित्रपट गाडगे महाराजांच्या जीवनावर आहे. दिग्दर्शक - नीलेश जलमकर

देवकीनंदन गोपाळा : हाही चित्रपट गाडगे महाराजांच्या जीवनावर आहे. दिग्दर्शक - राजदत्त


📖 *साहित्य संमेलन*


महाराष्ट्रात गाडगेबाबा विचार साहित्य संमेलन नावाचे संमेलन भरते.


⏳ *मृत्यू*


गाडगे महाराजांचे अमरावती जवळ पेढी नदीच्या काठावर, वडगाव जि. अमरावती २० डिसेंबर १९५६ रोजी निधन झाले. 


🏵 *सन्मान* 


त्यांच्या सन्मानार्थ महाराष्ट्र सरकारने संत गाडगे बाबा ग्राम स्वच्छता अभियान प्रकल्प २०००-०१ मध्ये सुरू केला. हा कार्यक्रम स्वच्छ गावे सांभाळणार्‍या ग्रामस्थांना बक्षिसे देतो.  याव्यतिरिक्त, भारत सरकारने त्यांच्या सन्मानार्थ स्वच्छता व पाणी यासाठी राष्ट्रीय पुरस्काराची स्थापना केली.  त्यांच्या सन्मानार्थ अमरावती विद्यापीठाला त्यांचे नाव देण्यात आलेले आहे.



🏵 *सन्मान*

भारताच्या टपाल खात्याने त्यांच्या नावावर स्मारक शिक्के जारी करुन गाडगे महाराजांचा गौरव केला होता.


*🙏🌹 गोपाला... गोपाला... देवकीनंदन गोपाला... 🌹🙏*

        

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

स्वातंत्र्य भारताचे पहिले शिक्षणमंञी* *भारतरत्न* *अबुल कलाम आज़ाद*

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🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

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*स्वातंत्र्य भारताचे पहिले शिक्षणमंञी*

                  *भारतरत्न*

         *अबुल कलाम आज़ाद*

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     *जन्म : ११ नवम्बर १८८८*

            (मक्का,सउदी अरब)

✒️✒️✒️✒️✒️✒️✒️✒️✒️✒️✒️

    *मृत्यु : २२ फेब्रुवारी  १९५८*

                   ( दिल्ली)


पुर्ण नाव : मौलाना अबुलकलाम मुहीउद्दीन अहमद


अभिभावक : मौलाना खैरूद्दीन और आलिया


पत्नी : ज़ुलैख़ा


नागरिकता : भारतीय


प्रसिद्धि : स्वतंन्त्रता सेनानी, क्रांन्तिकारी, पत्रकार, समाजसुधारक, शिक्षा विशेषज्ञ


पार्टी : कांग्रेस


पद : भूतपूर्व शिक्षा मंत्री


भाषा : उर्दू, फ़ारसी और अरबी


पुरस्कार-उपाधि : भारत रत्न


विशेष योगदान : वैज्ञानिक शिक्षणाला प्रोत्साहन, नविन विश्वविद्यालयांची स्थापना, उच्च शिक्षण  आणि संशोधनाला प्रोत्साहन, स्वाधीनता संग्राम


रचना : इंडिया विन्स फ्रीडम अर्थात् भारतीय स्वातंत्र्याचा विजय, क़ुरान शरीफ़ चा अरबी मधून उर्दू मध्ये भाषांतर, तर्जुमन-ए-क़ुरान, ग़ुबारे-ए-खातिर, हिज्र-ओ-वसल, खतबात-ल-आज़ाद, हमारी आज़ादी और तजकरा


मौलाना अबुल कलाम आझाद  हे एक भारतीय प्रमुख राजकीय पुढारी होते. त्यांचे मूळ नाव मोहिउद्दीन अहमद असे असून अबुलकलाम म्हणजे वाचस्पती ही त्यांची पदवी होती. पुढे ‘आझाद’ (स्वतंत्र) हे टोपणनावही त्यांना ही उपाधि मिळाली. त्यांचा जन्म मक्केला झाला. वडिलांबरोबर १८९० साली ते कलकत्याला आले. पारंपरिक मुसलमानी शिक्षणपद्धतीप्रमाणे मौ. आझादांनी फार्सी, उर्दू व अरबी या भाषांचे प्रथम अध्ययन करून नंतर तर्कशास्त्र, इस्लाम धर्म, तत्त्वज्ञान व गणित ह्यांचा अभ्यास केला. पुढे सर सय्यद अहमदखान ह्यांच्या लेखांचा परिणाम होऊन मौलानांनी इंग्रजीचा अभ्यास स्वतंत्रपणे सुरू केला.१९०८ मध्ये ईजिप्त, अरबस्तान, तुर्कस्तान, फ्रान्स इ. देशांना त्यांनी भेटी दिल्या. तेथील क्रांतिकारकांच्या संपर्कामुळे त्यांची राजकीय मते बदलू लागली आणि कलकत्त्यास परत येताच हिंदी मुसलमानांनी स्वातंत्र्यसंग्रामात पुढाकार घ्यावा, हे मत त्यांनी प्रतिपादिले. लोकजागृतीसाठी १९१२ साली कलकत्ता येथे त्यांनी अल्-हिलाल हे उर्दू साप्ताहिक सुरू केले. अनेक वृत्तपत्रांतून ‘आझाद’ ह्या टोपणनावाने ते लेखन करीत. अल्-हिलालमधील प्रखर राजकीय टीकेमुळे ब्रिटिश सरकारने त्यांच्याकडून १०,००० रुपयांचा जामीन मागितला. आझादांनी तो दिला नाही, म्हणून ते वृत्तपत्र बंद पडले. १९१५ साली त्यांनी अल्-बलाघ हे दुसरे वृत्तपत्र काढले. त्यामुळे आझादांना अनेक प्रांतांत जाण्यास बंदी घालण्यात आली; पुढे त्यांना सांचीला स्थानबद्ध करण्यात आले. मुसलमानांत त्यांच्या अटकेमुळे नवे वारे संचारले. १९२० साली त्यांची सुटका झाली. ते असहकाराच्या चळवळीत सामील झाले. १९२१ मध्ये पुन्हा त्यांना अटक करण्यात आली; पण एका वर्षानंतर त्यांना मुक्त करण्यात आले; १९२३ च्या दिल्ली येथील काँग्रेसच्या विशेष अधिवेशनाचे ते अध्यक्ष झाले. १९३० मध्ये त्यांना पुन्हा कैद झाली. ह्या वेळी मुसलमान जमातीस सत्याग्रहात सामील करून घेण्याचे मुख्य श्रेय आझादांनाच मिळाले. आझाद १९३९ ते ४६ पर्यंत काँग्रेसचे अध्यक्ष होते. १९४२ च्या चले जाव आंदोलनाच्या वेळी त्यांना पुन्हा तुरुंगवास भोगावा लागला. १९४५ साली सर्व नेत्यांबरोबर त्यांची सुटका झाली. १९४२ ची क्रिप्सयोजना, १९४५ ची वेव्हेलची सिमला परिषद व १९४६ मधील ब्रिटिश मंत्र्यांचे शिष्टमंडळ इ. प्रसंगीच्या सर्व वाटाघाटींत काँग्रेसतर्फे अध्यक्ष ह्या नात्याने त्यांनीच पुढाकार घेतला. स्वातंत्र्यानंतर ते केंद्रीय मंत्रिमंडळात सामील झाले आणि अखेरपर्येत शिक्षणमंत्री म्हणून राहिले. आझाद प्रभावी वक्ते होते. त्यांचे इंग्रजी, उर्दू, अरबी व फार्सी भाषांवर चांगले प्रभुत्व होते; त्यांनी अनेक वृत्तपत्रांतून स्फुट लेखन केले आणि उर्दूत काही पुस्तके लिहिली आहेत. त्यांतील तजकेरा,गुब्बारे खातिर्, कौले फैसल, दास्ताने करबला, तरजुमानुल कोरान ही प्रसिद्ध आहेत. तरजुमानुल कोरान म्हणजे कुराणचा सटीप उर्दू अनुवाद असून तो फार लोकप्रिय आहे. ह्याशिवाय त्यांचे इंडिया विन्स फ्रीडम (१९५९) हे आत्मचरित्र त्यांच्या मृत्यूनंतर प्रसिद्ध झाले आहे;  मात्र त्यातील अप्रकाशित तीस पाने १९८८ मध्ये प्रसिद्ध करण्यात आली. त्यांची भाषणेही पुस्तकरूपाने अलीकडे प्रसिद्ध झाली आहेत.

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा - यवतमाळ ४४५२०६

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