शुक्रवार, ५ नोव्हेंबर, २०२१

भारताची पहिली मंगळ मोहीम प्रेक्षपीत

 


*🇮🇳🇮🇳५ नोव्हेंबर २०१३🇮🇳🇮🇳*

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*भारताची पहिली मंगळ मोहीम प्रक्षेपित*

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मंगळयान ही भारताची पहिली मंगळ मोहीम असून हे यान आंध्रप्रदेश राज्यातील श्रीहरिकोटा येथून सतीश धवन अंतराळ केंद्रावरून मंगळाच्या दिशेने ५ नोव्हेंबर २०१३ रोजी प्रक्षेपित केले गेले. यासाठी पीएसएलव्ही सी-२५ हे प्रक्षेपण अस्त्र वापरण्यात आले. साधारणतः २५ दिवस हे यान पृथ्वीच्या कक्षेत स्थिरावले आणि ३० नोव्हेंबरला हे यान पृथ्वीच्या कक्षेतून बाहेर पडून मंगळाकडे झेपावले आणि २४ सप्टेंबर २०१४ रोजी हे यान मंगळाच्या कक्षेत स्थिरावले. 


मंगळाभोवतीच्या लंबवर्तुळाकार कक्षेत भ्रमण करताना हे यान मंगळाच्या जमिनीपासून साधारणतः ३७१ किमी अंतरावरून भ्रमण करू शकेल.


या वेळी उपलब्ध होणारी माहिती आपल्यापर्यंत पोहोचविण्यासाठी इसरो टेलिमेट्री, ट्रॅकिंग ॲन्ड कमांड नेटवर्क व संपर्कक्षेत्राच्या बाहेर असताना नासाच्या डीप स्पेस नेटवर्कची मदत घेण्यात येणार आहे. या स्पेस नेटवर्कच्या मदतीने आंतरग्रहीय मोहीम राबविणे हेसुद्धा मोठे आव्हानच ठरणार आहे.


या अभियानात १५ किलोचे पाच प्रयोगात्मक पेलोडस् पाठवण्यात आली. मंगळयानासाठी जो मिथेन सेन्सॉर पाठवण्यात येईल त्याचे वजन ३.५९ किलो असेल. हे सेंसर पूर्ण मंगळाला सहा मिनिटांच्या आत स्कॅन करण्यात सक्षम आहे.


थर्मल इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर हे दुसरे उपकरण आहे. त्याचे वजन चार किलो आहे. मंगळाच्या पृष्ठभागाचे निरीक्षण करण्याचे काम ते करेल. मार्स कलर कॅमेरा हे आणखी एक उपकरण असून त्याचे वजन १.४ किलो आहे. लॅमेन अल्फा फोटोमीटरचे वजन १.५ किलो आहे. मंगळाच्या वातावरणातील आण्विक हायड्रोजनचा शोध घेण्याचे काम हे उपकरण करेल.


मंगळयान पीएसएलव्ही सी-२५ हे लाँचिंग व्हेईकलच्या सहाय्याने ५ नोव्हेंबर २०१३ रोजी प्रक्षेपीत केले गेले.

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

गाथा बलिदानाची चित्तरंजन दास

 




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       *गाथा बलिदानाची*

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         *देशबन्धु चितरंजन दास*

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     *जन्म : ५ नवम्बर १८७०*

(तेलीरबाग, ढाका, ब्रितानी भारत)


     *मृत्यु : १६ जून १९२५*

                     (उम्र ५५)

                  (दार्जिलिंग)


राष्ट्रीयता : भारतीय


व्यवसाय : वकील (बैरिस्टर)


पदवी : "देशबन्धु"


प्रसिद्धि कारण : भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रमुख नेताओं में से एक


राजनैतिक पार्टी : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (१९२३ से पहले)

स्वराज पार्टी (१९२३–१९२५)


जीवनसाथी : बसन्ती देवी


देशबन्धु चितरंजनदास सुप्रसिद्ध भारतीय नेता, राजनीतिज्ञ, वकील, कवि, पत्रकार तथा भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रमुख नेता थे। उन्होंने कई बड़े स्वतंत्रता सेनानियों के मुकद्दमे भी लड़े।


चितरंजन दास का जन्म ५ नवंबर १८७० को कोलकाता में हुआ। उनका परिवार मूलतः ढाका के बिक्रमपुर का प्रसिद्ध परिवार था। चितरंजन दास के पिता भुबनमोहन दास कलकत्ता उच्च न्यायालय के जाने-माने वकीलों में से एक थे। वे बँगला में कविता भी करते थे। उनका परिवार वकीलों का परिवार था।


सन्‌ १८९० ई. में बी.ए. पास करने के बाद चितरंजन दास आइ.सी.एस्‌. होने के लिए इंग्लैंड गए और सन्‌ १८९२ ई. में बैरिस्टर होकर स्वदेश लौटे। शुरू में तो वकालत ठीक नहीं चली। पर कुछ समय बाद खूब चमकी और इन्होंने अपना तमादी कर्ज भी चुका दिया।


वकालत में इनकी कुशलता का परिचय लोगों को सर्वप्रथम 'वंदेमातरम्‌' के संपादक श्री अरविंद घोष पर चलाए गए राजद्रोह के मुकदमे में मिला और मानसिकतला बाग षड्यंत्र के मुकदमे ने तो कलकत्ता हाईकोर्ट में इनकी धाक अच्छी तरह जमा दी। इतना ही नहीं, इस मुकदमे में उन्होंने जो निस्स्वार्थ भाव से अथक परिश्रम किया और तेजस्वितापूर्ण वकालत का परिचय दिया उसके कारण समस्त भारतवर्ष में 'राष्ट्रीय वकील' नाम से इनकी ख्याति फैल गई। इस प्रकार के मुकदमों में ये पारिश्रमिक नहीं लेते थे।


इन्होंने सन्‌ १९०६ ई. में कांग्रेस में प्रवेश किया। सन्‌ १९१७ ई. में ये बंगाल की प्रांतीय राजकीय परिषद् के अध्यक्ष हुए। इसी समय से वे राजनीति में धड़ल्ले से भाग लेने लगे। सन्‌ १९१७ ई. के कलकत्ता कांग्रेस के अध्यक्ष का पद श्रीमती एनी बेसंट को दिलाने में इनका प्रमुख हाथ था। इनकी उग्र नीति सहन न होने के कारण इसी साल श्री सुरेंद्रनाथ बनर्जी तथा उनके दल के अन्य लोग कांग्रेस छोड़कर चले गए और अलग से प्रागतिक परिषद् की स्थापना की। सन्‌ १९१८ ई. की कांग्रेस में श्रीमती एनी बेसंट के विरोध के बावजूद प्रांतीय स्थानिक शासन का प्रस्ताव इन्होंने मंजूर करा लिया और रौलट कानून का जमकर विरोध किया। पंजाब कांड की जाँच के लिए नियुक्त की गई कमेटी में भी इन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया। इन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह का समर्थन किया। लेकिन कलकत्ते में हुए कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में इन्होंने उनके असहयोग के प्रस्ताव का विरोध किया। नागपुर अधिवेशन में इन्होंने उनके असहयोग के प्रस्ताव का विरोध किया। नापुर अधिवेशन में ये २५० प्रतिनिधियों का एक दल इस प्रस्ताव का विरोध करने के लिए ले गए थे, लेकिन अंत में इन्होंने स्वयं ही उक्त प्रस्ताव सभा के सम्मुख उपस्थित किया। कांग्रेस के निर्णय के अनुसार इन्होंने वकालत छोड़ दी और अपनी सारी सपत्ति मेडिकल कॉलेज तथा स्त्रियों के अस्पताल को दे डाली। इनके इस महान्‌ त्याग को देखकर जनता इन्हें 'देशबंधु' कहने लगी।


असहयोग आंदोलन में जिन विद्यार्थियों ने स्कूल कॉलेज छोड़ दिए थे उनके लिए इन्होंने ढाका में 'राष्ट्रीय विद्यालय' की स्थापना की। आसाम के चाय बागानों के मजदूरों की दुःस्थिति ने भी कुछ समय तक इनका ध्यान आकर्षित कर रखा था।


सन्‌ १९२१ ई. में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के लिए दस लाख स्वयंसेवक माँगे थे। उसकी पूर्ति के लिए इन्होंने प्रयत्न किया और खादी विक्रय आदि कांग्रेस के कार्यक्रम को संपन्न करना आरंभ कर दिया। आंदोलन की मजबूत होते देखकर ब्रिटिश सरकार ने इसे अवैध करार दिया। ये सपत्नीक पकड़े गए और दोनों को छह छह महीने की सजा हुई। सन्‌ १९२१ ई. में अहमदाबाद कांग्रेस के ये अध्यक्ष चुने गए। लेकिन ये उस समय जेल में थे अतएव इनके प्रतिनिधि के रूप में हकीम अजमल खाँ ने अध्यक्ष का कार्यभार सँभाला। इनका अध्यक्षीय भाषण श्रीमती सरोजिनी नायडू ने पढ़कर सुनाया। ये जब छूटकर आए उस समय आंदोलन लगभग समाप्त हो चुका था। बाहर से आंदोलन करने के बजाए इन्होंने कांउसिलों में घुसकर भीतर से अड़ंगा लगाने की नीति की घोषणा की। गया कांग्रेस में ये अध्यक्ष थे लेकिन इनका यह प्रस्ताव वहाँ स्वीकार न हो सका। अतएव इन्होंने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और स्वराज दल की स्थापना की। कांग्रेस को उनकी नीति माननी पड़ी और उनका कांउसिल प्रवेश का प्रस्ताव सितंबर, १९२३ ई. में दिल्ली में हुए कांग्रेस के अतिरिक्त अधिवेशन में स्वीकार हो गया।


प्रस्ताव के अनुसार ये काउंसिल में घुसे। इनका दल बंगाल काउंसिल में निर्विरोध चुना गया। इन्हांने मंत्रिमंडल बनाना अस्वीकार कर दिया और मंत्रियों के वेतनों को मान्यता देना नामंजूर कर मांटफोर्ड सुधारों की दुर्गति कर डाली। सन्‌ १९२४-२५ में इन्होंने कलकत्ता नगर महापालिका में अपने पक्ष के काफी लोग घुसाए और स्वयं मेयर हुए।


इन दिनों कांग्रेस पर इनके स्वराज्य दल का पूरा कब्जा था और ये स्वयं उसके कर्ता-धर्ता थे। पटना के अधिवेशन में इन्होंने कांग्रेस की सदस्यता के लिए सूत कातने की अनिवार्य शर्त को ऐच्छिक करार दिया। लगभग इसी समय गोपीनाथ साहा नामक एक बंगाली व्यक्ति ने एक अंग्रेज की हत्या की और सरकार तथा इनके दल में झगड़ा शुरू हुआ। सरकार ने एक विज्ञप्ति प्रकाशित की और संदेह में ८० लोगों की पकड़ा। कलकत्ता कार्पोरेशन ने भी सरकार की इस नीति का विरोध किया।


सन्‌ १९२४ में बंगाल की प्रांतीय परिषद् ने गोपीनाथ साहा के त्याग की प्रशंसा की तथा अभिनंदन का प्रस्ताव स्वीकार किया और इन्होंने उसे मान्यता दी। लेकिन इनकी इस नीति का भारत में तथा इंग्लैंड में गलत अर्थ लगाया गया।


सन्‌ १९२५ में उपर्युक्त सरकारी विज्ञप्ति की मुख्य धाराएँ बंगाल क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट बिल में सम्मिलित की गईं। स्वराज्य दल ने बिल अस्वीकार कर दिया किंतु सरकार ने अपने विशेष अधिकार से कानून पास करा लिया। इन्होंने राजनीतिक शस्त्र के रूप में हिंसा का प्रयोग करने की कटु आलोचना की और इस संबंध में दो पत्रक प्रकाशित किए। साथ ही इसी प्रकार का एक पत्रक इन्होंने सरकार के पास भी भेजा। सरकार ने इसे सहयोग की ओर पहला कदम समझा। इस दृष्टि से दोनों पक्षों में कुछ वार्ता शुरू होने की संभावना समझी जा रही थी कि ६ जून १९२५ को इनका देहावसान हो गया।


श्री चितरंजनदास के व्यत्तित्व के कई पहलू थे। वे उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ तथा नेता तो थे ही, वे बँगला भाषा के अच्छे कवि तथा पत्रकार भी थे। बंगाल की जनता इनके कविरूप का बहुत आदर करती थी। इनके समय के बंग साहित्य के आंदोलनों में इनका प्रमुख हाथ रहा करता था। 'सागरसंगीत', 'अंतर्यामी', 'किशोर किशोरी' इनके काव्यग्रंथ हैं। 'सांगरसंगीत' का इन्होंने तथा श्री अरविंद घोष ने मिलकर अंग्रेजी में 'सांग्ज़ आव दि सी' नाम से अनुवाद किया और उसे प्रकाशित किया। 'नारायण' नामक वैष्णव-साहित्य-प्रधान मासिक पत्रिका इन्होंने काफी समय तक चलाई। सन्‌ १९०६ में प्रारम्भ हुए 'वंदे मातरम्‌' नामक अंग्रेजी पत्र के संस्थापक मंडल तथा संपादकमंडल दोनों के ये प्रमुख सदस्य थे और बंगाल स्वराज्य दल का मुखपत्र 'फार्वर्ड' तो इन्हीं की प्रेरणा और जिम्मेदारी पर निकला तथा चला। आपने "इंडिया फार इन्डियन" नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना भी की थी।


राजनीतिक नेता के लिए आवश्यक सतत जूझते रहने का गुण इनमें प्रचुर मात्रा में विद्यमान था। ये परम त्यागी वृत्ति के महापुरुष थे। इन्होंने कवि का संवेदनक्षम हृदय और सज्जनोचित उदारता पाई थी। विरुद्ध पक्ष का मर्म-स्थान ढूँढ निकालने की असाधारण कुशलता इनमें थी। एक बार निश्चय कर लेने के बाद उसे कार्यान्वित करने के लिए ये निरंतर प्रयत्नशील रहते थे। इन्हें असाधारण लोकप्रियता मिली। बेलगाँव कांग्रेस में इन्होंने यह इच्छा व्यक्त की थी कि १४८ नंबर, रूसा रोड, कलकत्ता वाला इनका मकान स्त्रियों और बच्चों का अस्पताल बन जाए तो उन्हें बड़ी शांति मिलेगी। उनकी मृत्यु के बाद महात्मा गांधी ने सी.आर. दस स्मारक निधि के रूप में दस लाख रुपए इकट्ठे किए और भारत के इस महान्‌ सुपुत्र की यह अंतिम इच्छा पूर्ण की।


⌛ *मृत्यू*


जिस वक्त देशबंधु चितरंजन दास का राजनैतिक जीवन चरम पर था, उसी वक्त काम के बोझ तले उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। मई १९२५ में वो स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए दार्जिलिंग चले गए, लेकिन उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही चला गया। इस बीच महात्मा गांधी भी खुद उनसे मिलने दार्जिलिंग आए थे। १६ जून १९२५ को तेज बुखार के कारण उनका निधन हो गया।


चितरंजन दास की अंतिम यात्रा कोलकाता में निकाली गई, जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया। गांधी जी ने कहा, ”देशबंधु एक महान आत्मा थे। उन्होंने एक ही सपना देखा था… आजाद भारत का सपना… उनके दिल में हिंदू और मुसलमानों के बीच कोई अंतर नहीं था।”


देशबन्धु चितरंजन दास के निधन पर विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा-


एनेछिले साथे करे मृत्युहीन प्रान।

मरने ताहाय तुमी करे गेले दान॥


अपने निधन से कुछ समय पहले देशबन्धु ने अपना घर और सारी जमीन राष्ट्र के नाम कर दी। जिस घर में वे रहते थे, वहां अब चितरंजन दास राष्ट्रीय कैंसर संस्थान है। वहीं दार्जिलिंग वाला उनका निवास अब मातृ एवं शिशु संरक्षण केंद्र के रूप में राज्य सरकार द्वारा चलाया जा रहा है। दिल्ली का प्रसिद्ध आवासीय क्षेत्र 'सीआर पार्क' का नाम भी देशबंधु चितरंजन दास के नाम पर रखा गया है और यहाँ बड़ी संख्या में बंगालियों का निवास है, जो बंटवारे के बाद भारत आ गए थे। देशभर में उनके नाम पर कई बड़े संस्थानों का नाम रखा गया है। देशबंधु कॉलेज हो या फिर चितरंजन अवेन्यू ऐसे कई संस्थान हैं, जिनका देश को एक सूत्र में पिरोने वाले देशबंधु चितरंजन दास के नाम से पहचान मिली है।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

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संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

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कार्तिक मास,शुक्ल पक्ष, *प्रथम*,विशाखा नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,हेमन्त ऋतु,युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

शुक्रवार, ०५ नोव्हेंबर २०२१.

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                         *प्रभात दर्शन*

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वसुदेवसुतं देवं

             कंस चाणूरमर्दनम

देवकी परमानन्दम्

             कृष्णम् वन्दे जगद्गुरुम्


धर्म की जय हो🚩

अधर्म का नाश हो🚩

प्राणियों में सद्भावना हो🚩

विश्व का कल्याण हो.. 🚩

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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*अन्नकूट, श्री गोवर्धन पूजन*


बुधवार, ३ नोव्हेंबर, २०२१

गाथा बलिदानाची अन्नपूर्णा महाराणा ओडिया

 


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*🇮🇳🇮🇳गाथा बलिदानाची🇮🇳🇮🇳*

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            *अन्नपूर्णा महाराणा*

       *ओडिया स्वतंत्रता सेनानी*


        *जन्म : ३ नवम्बर १९१७*

                (ओडिसा, भारत)


         *मृत्यु : ३१ दिसम्बर २०१२*

                       (उम्र ९५)

            (कटक, ओडिसा, भारत)


*राष्ट्रीयता : भारतीय*

प्रसिद्धि कारण : स्वतंत्रता सेनानी,  

                  सामाजिक कार्यकर्ता

जीवनसाथी : शरत चंद्र महाराणा


बच्चे : कर्मदेव महाराणा, 

          ज्ञानदेव महाराणा


अन्नपूर्णा महाराणा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थी। इसके अलावा वह एक प्रमुख सामाजिक और महिला अधिकार कार्यकर्ता भी थीं।अन्नपूर्णा, महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी थी|


💁 *जीवनकाल*


अन्नपूर्णा महाराणा का जन्म ३ नवंबर १९१७ को ओडिशा में राम देवी और गोपाबंधू चौधरी के दूसरे बच्चे के रूप में हुआ था। उनके दोनों माता-पिता भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे। इन्होंने चौदह वर्ष की उम्र से ही स्वतंत्रता के लिए सक्रिय रूप से प्रचार करना शुरू किया, और महात्मा गांधी की समर्थक बन गई। १९३४ में, वह महात्मा गांधी के पुरी से भद्रक तक के "हरिजन पडा यात्रा" रैली में ओडिशा से जुड़ गईं। अगस्त १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन, सविनय अवज्ञा अभियान के दौरान सहित महाराणा को कई बार गिरफ्तार किया गया था।


स्वतंत्रता के बाद, महाराणा ने भारत में महिलाओं और बच्चों की ओर से आवाज बनी। उन्होंने क्षेत्र की जनजातीय आबादी के बच्चों के लिए ओडिशा के रायगडा जिले में एक स्कूल खोला। महाराणा, विनोबा भावे द्वारा शुरू किया गये भूदान आन्दोलन, या भूमि उपहार आंदोलन का भी हिस्सा बनी। उन्होंने चंबल घाटी के सक्रिय डकैतो को मुख्य धारा में लौटने के लिए अभियान चलाया।


आपातकाल के दौरान उन्होंने रामदेवी चौधरी के ग्राम सेवा प्रेस द्वारा प्रकाशित अख़बार की मदद से विरोध जताया। सरकार द्वारा समाचार पत्र पर प्रतिबंध लगा कर रामदेवी चौधरी और उड़ीसा के अन्य नेताओं जैसे नाबक्रुश्ना चौधरी, हरिकेष्णा महाबत, मनमोहन चौधरी, जयकृष्ण मोहंती और अन्य के साथ उन्हें गिरफ्तार किया गया था।


ओडिशा के केंद्रीय विश्वविद्यालय ने १९ अगस्त २०१२ को अपने कटक घर में आयोजित एक समारोह में महाराणा को ऑनोरिस कौसा (मानद उपाधि) से सम्मानित किया।


३१ दिसंबर २०१२ को, ९६ वर्ष की उम्र में बखराबाद, कटक, ओडिशा के अपने घर पर लंबी बीमारियों जुझने के बाद उनकी मृत्यु हो गई। । २ जनवरी २०१३ को कटक के खन्नागर श्मशान में उन्हें सम्मान के साथ उनका दाह-संस्कार किया गया।


ओडिशा के राज्यपाल मुरलीधर चंद्रकांत भंडारी और मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने उनकी मृत्यु को भारत और ओडिशा की "अपूरणीय हानि" के रूप में वर्णित किया था।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६




प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

आश्विन मास,कृष्ण पक्ष, *१३/१४*,हस्त नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,शरद ऋतु,युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

बुधवार, ०३ नोव्हेंबर २०२१.

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                         *प्रभात दर्शन*

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        *दूसरों से घृणा करने में अपना समय व ऊर्जा नष्ट न करें। प्रेम एवं आनंद के लिए पहले ही बहुत कम समय है। जो समय एवं ऊर्जा आप किसी से घृणा, निंदा में लगाते हैं, वह प्रेम में लगायें, जीवन स्वर्ग तुल्य हो जायेगा।"*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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*प्रातः ०९:०४ तक त्रियोदशी*

*प्रातः ०९:०४ के पश्चात नरक चतुर्दशी (छोटी दिपावली)*


सोमवार, १ नोव्हेंबर, २०२१

आजचे शास्त्रज्ञ डॉ श्रीराम अभ्यंकर

 *📐📏📐डॉ. श्रीराम अभ्यंकर📐📏📐*

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*📏📐📏गणितयोगी📏📐📏*

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*स्मृतिदिन - २ नोव्हेंबर २०१२*


डॉ. श्रीराम अभ्यंकर यांना गणिताचे बाळकडू त्यांचे वडील शंकर अभ्यंकर यांच्याकडून मिळालेले होते. त्यांचे वडील हे मध्य प्रदेशातील उज्जैन व ग्वाल्हेर येथे गणिताचे प्राध्यापक होते. डॉ. श्रीराम अभ्यंकर यांचा पुण्याशी अतूट संबंध होता. अनेकदा ते येथे त्यांच्या बंगल्यात वास्तव्यास असत व येथे आले की, मुलांना गोळा करून गणित शिकवण्याचा मोह त्यांना कधीच आवरत नसे. इतके त्यांचे गणितावर व अध्यापनावर प्रेम होते. 


पुण्यातील भास्कराचार्य प्रतिष्ठान या गणित अभ्यासाच्या संस्थेची स्थापना डॉ.श्रीराम अभ्यंकर यांनी केली होती. पुणे हे भारतातील गणित शिक्षणाचे केंद्र व्हावे अशी त्यांची मनोमन इच्छा होती. मुलांना गणित हे मराठी भाषेतून शिकता आले पाहिजे असे त्यांना वाटत होते. गणिताच्या अभ्यासक्रमासाठी प्रत्येक वर्गाकरिता वेगवेगळी पुस्तके असतात त्याऐवजी एकच पुस्तक असावे म्हणजे ज्याला जसे शक्य होईल तसे तो कुठल्याही इयत्तेच्या पातळीवरील गणिताचा अभ्यास हवा तेव्हा करू शकेल असे त्यांना वाटत असे. 


गुरुकुल पद्धतीची शिक्षण पद्धती त्यांना आवडत असे. डॉ.श्रीराम यांनी लीलावती या गणितावरील ग्रंथाची अनेक पारायणे केली होती. टाटा मूलभूत संशोधन संस्था व इंडियन इन्स्टिटय़ूट ऑफ सायन्सेस या संस्थांत गणिताविषयी चांगले संशोधन सुरू असल्याचे मत त्यांनी व्यक्त केले होते. त्यांचे वडील डॉ.शंकर अभ्यंकर हे त्यांचे गणित विषयात पहिले आदर्श होते. नंतर न्यूटन, गॅल्वा व जॅकोबी यांच्या गणिती संशोधनाचा प्रभाव त्यांच्यावर होता. 


हार्वर्ड विद्यापीठात ऑस्कर झारिन्स्की यांच्या मार्गदर्शनाखाली त्यांनी गणितात विद्यावाचस्पती ही पदवी मिळवली. ‘लोकल युनिफॉर्मायझेशन ऑन अल्जिब्रिक सरफेसेस ओव्हर मॉडय़ुलर ग्राउंड फील्ड्स’ हा त्यांच्या संशोधनाचा विषय होता. बुलियन अल्जिब्रा विषयात त्यांनी केलेल्या गणिती संशोधनाचा वापर अमेरिकी नौदलात करण्यात आला होता. 


श्रीराम अभ्यंकर यांनी कॉन्जेंक्चर ऑफ फायनाइट ग्रुप थिअरी हा महत्त्वाचा गणिती सिद्धांत मांडला होता. बीजगणितीय भूमिती हा त्यांचा संशोधनाचा मुख्य विषय होता. १९६७ मध्ये ते पडर्य़ू विद्यापीठात गणिताचे मार्शल प्रोफेसर झाले. अखेर पर्यत ते अमेरिकेतील पडर्य़ू विद्यापीठात गणिताचे मार्शल प्रोफेसर म्हणून कार्यरत होते. तेथील संगणक विज्ञान व औद्योगिक अभियांत्रिकी शाखेतही ते प्राध्यापक होते. अखेरच्या काळात ते कॉम्प्युटेशनल अँड अलगॉरिथमिक अल्जिब्रिक जॉमेट्री व जॅकोबियन कूटप्रश्न या विषयांवर गणिती संशोधन करीत होते. 

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏

संकलन -)

गजानन गोपेवाड  

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६


Good morning

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

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आश्विन मास,कृष्ण पक्ष, *द्वादशी*,उ.फा.नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,शरद ऋतु,युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

मंगलवार, ०२ नोव्हेंबर २०२१.

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                        *प्रभात दर्शन*

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सर्वार्थसंभवो देहो

                  जनित: पोषितो यत:,

न तयोर्याति निर्वेशं

                 पित्रोर्मत्र्य: शतायुषा।।


भावार्थ - *सौ वर्ष की आयु प्राप्त करके भी माता-पिता के ऋण से उऋण नही हुआ जा सकता। वास्तव में जो शरीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का प्रमुख साधन है, उसका निर्माण तथा पालन-पोषण जिनके द्वारा हुआ है, उनके ऋण से मुक्त होना कठिन ही नही, सर्वथा असम्भव है।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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 *🪙🪙🪙🪙धनतेरस🪙🪙🪙🪙*


रविवार, ३१ ऑक्टोबर, २०२१

गाथा बलिदानाची

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🇮🇳🇮🇳 *गाथा बलिदानाची*🇮🇳🇮🇳

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            *बख़्त खान बरच*

          *भारतीय क्रांतिकारी*


      *जन्म :१ नोव्हेंबर १७९७*

  (बिजनौर,रोहिलखंड,मुगल साम्राज्य)


      *मृत्यु : १३ मई १८५९*

             बुनर,ब्रिटिश भारत 

(आज खैबर पख्तुनख्वा,पाकिस्तान)


व्यवसाय : ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में सुबेदार, भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के कमांडर-इन-चीफ 


बख्त खान  ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ १८५७ के भारतीय विद्रोह में भारतीय विद्रोही बलों के कमांडर-इन-चीफ थे। 


💁‍♂ *जीवनी*


बख्त खान बरेच रोहिल्ला जनजाति की एक शाखा से प्रमुख नजीब-उल-दौला के परिवार से संबंधित एक पश्तुन  था। उनका जन्म रोहिलखंड में बिजनौर में हुआ था और बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में एक सबेदार बन गया, बंगाल घोड़े की तोपखाने में चालीस वर्ष का अनुभव प्राप्त कर रहा था और पहले एंग्लो-अफगान युद्ध में कार्रवाई देख रहा था। १८५९ में पाकिस्तान के बुनर में उनकी मृत्यु हो गई।


⚔ *विद्रोह*


१८५७ का भारतीय विद्रोह तब शुरू हुआ जब सिपाही समूह ने राइफल कारतूस की शुरूआत के खिलाफ विद्रोह किया था, जिसे कथित रूप से दाढ़ी (सुअर की वसा) के साथ गले लगाया गया था। इसने मुस्लिम सैनिकों को नाराज कर दिया क्योंकि उन्हें इस्लाम में सुअर के मांस खाने की इजाजत नहीं है और साथ ही यह शाकाहारी हिंदू सैनिकों को नाराज करता है। अंग्रेजों के खिलाफ दिल्ली के आस-पास के इलाकों में विद्रोह तेजी से फैल गया। 


जब बख्त खान ने मेरठ में विद्रोह के बारे में सुना, तो उन्होंने मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की सेना का समर्थन करने के लिए दिल्ली जाने का फैसला किया। उस समय तक बखत खान १ जुलाई १८५७ को दिल्ली पहुंचे, बड़ी संख्या में रोहिला सिपाही के साथ, शहर को विद्रोही बलों ने लिया था और मुगल शासक बहादुर शाह जफर को भारत के सम्राट घोषित किया गया था।  सम्राट के सबसे बड़े बेटे मिर्जा मुगल को मिर्जा जहीरुद्दीन भी कहा जाता है, उन्हें मुख्य जनरल का खिताब दिया गया था, लेकिन इस राजकुमार के पास कोई सैन्य अनुभव नहीं था। यही वह समय था जब बख्तर खान अपनी सेनाओं के साथ बुधवार १ जुलाई १८५७ को दिल्ली पहुंचे। उनके आगमन के साथ, नेतृत्व की स्थिति में सुधार हुआ। बखत खान की श्रेष्ठ क्षमताओं को जल्द ही स्पष्ट हो गया, और सम्राट ने उन्हें वास्तविक अधिकार और साहेब-ए-आलम बहादुर, या भगवान गवर्नर जनरल का खिताब दिया। खान सिपाही बलों के आभासी कमांडर थे, हालांकि मिर्जा जहीरुद्दीन अभी भी कमांडर-इन-चीफ थे। 


बख्त खान को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा जिनके लिए तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता थी। पहली और सबसे बड़ी समस्या वित्तीय थी, इसे सुलझाने के लिए वह कर एकत्र करने के लिए सम्राट प्राधिकरण से प्राप्त हुआ। दूसरी समस्या आपूर्ति की तार्किक थी, जो समय बीतने के साथ और अधिक तीव्र हो गई थी, जब ब्रिटिश सेना ने सितंबर १८५७ में शहर पर हमला किया था। अंग्रेजों में शहर में कई जासूस और एजेंट थे और बहादुर पर लगातार दबाव डाल रहे थे शाह आत्मसमर्पण करने के लिए। दिल्ली के आसपास की स्थिति तेजी से बिगड़ गई; बखत खान का नेतृत्व विद्रोहियों की संगठन, आपूर्ति और सैन्य ताकत की कमी के लिए क्षतिपूर्ति नहीं कर सका। ८ जून १८५७ को दिल्ली को घेर लिया गया था। १४ सितंबर को अंग्रेजों ने कश्मीरी गेट और बहादुर शाह पर हमला किया था २० सितंबर १८५७ को बख्तर खान की अपील के खिलाफ अंग्रेजों को आत्मसमर्पण करने से पहले हुमायूं के मकबरे में भाग गए। सम्राट को गिरफ्तार कर लिया गया और मुगल ब्रिटिश नागरिकों के नरसंहार में फंस गए राजकुमारों को मार डाला गया। 


बख्त खान ने खुद दिल्ली छोड़ दी और लखनऊ और शाहजहांपुर में विद्रोही बलों में शामिल हो गए। बाद में, बहादुर शाह जफर को राजद्रोह के आरोपों पर कोशिश की गई और रंगून, बर्मा को निर्वासित किया गया जहां उनकी मृत्यु १८६२ में हुई। 


 📥 *दफन*


१३ मई १८५९ को, वह गंभीर रूप से घायल हो गया और मर गया। उन्हें नानसर के कब्रिस्तान में, फिर स्वात का हिस्सा दफनाया गया था; अब जिला बुनर, पाकिस्तान के खैबर पख्तुनख्वा प्रांत में। स्वात इतिहास के मामलों में एक विशेषज्ञ का दावा है कि युद्ध खो जाने के बाद वह स्वात आए और स्वात के अखुंड की सुरक्षा के तहत अपना बाकी जीवन बिताया।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

🙏🙏🙏शुभ प्रभात🙏🙏🙏


संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

आश्विन मास,कृष्ण पक्ष, *एकादशी*,पू.फा. नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,शरद ऋतु,युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

सोमवार, ०१ नोव्हेंबर २०२१.

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                        *प्रभात दर्शन*

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दह्यमानां सुतीव्रेण 

                 नीचाः परयशोऽग्निना।

अशक्तास्तत्पदं गन्तुं 

                 ततो निन्दां प्रकुर्वते॥


*भावार्थः- "दुष्ट व्यक्ति दूसरे की उन्नति को होते देखकर अंदर से जलता रहता है । चूंकि वह स्वयं उन्नति नहीं कर सकता, अतः वह निन्दा करने लगता है।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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*🌱🌱🌱वसुं-बारस🌱🌱🌱*


आई

 *ज्यांना*  *ज्यांना* *आई* *आहे*  *मग* *ती* *तरुण* *असो* *किंवा* *वृद्ध* *त्या* *सर्वांनी* *मुद्दाम* *खालील* *लेख* *वाचून* *तसे* *आचरण* *करण्याचा* *प्रयत्न* *करावा* *हीच* *अपेक्षा* *!*         

                                       

 पेशाने सर्जन असणा-या मुलाने लिहिलेला अतिशय सुंदर लेख -


              बीजांड ते ब्रह्मांड


वयोपरत्वे तोल जाऊन पडल्याने आई अंथरुणाला खिळली ती कायमचीच. 


सर्व अवयव नव्वदीतले. 

झिजलेल्या कंबरेवरचा मुक्कामार तिला कायमचा परावलंबी करून गेला. 

पाय उचलणं सुद्धा अशक्य झालं.


तिच्या संवेदना कमी झाल्याने सगळे सोपस्कारही कपड्यातच. 


वृद्धत्व सोडून दुसरा आजार नव्हता. 


पण म्हातारपण म्हणजे सुकून जिर्ण झालेलं बालपण. 

तोच हटवाद आणि वागणंही तसंच लहरी. 


सल्ला मसलतींचा पाउस पडला. 

लाख मोलाच्या आईसाठी काही हजाराची केअरटेकर... 

मनाला पटेना.


अनेक पर्यांयांचा उहापोह झाला. 

आम्हा दोघांची कामं अत्यावश्यक सेवेतली. 

सलग सुट्ट्यांचा दुष्काळ.


मग मीच ठरवलं केअरटेकर व्हायचं. चिडक्या हट्टी म्हातारबाळाची आई व्हायचं.


   लाळेरं लावून सकाळी चमच्याने पाजलेला चहा. 

दमदाटी करत भरवलेलेचे चिऊ काऊ चे घास. 

कधी ठसका, कधी मळमळ तर कधी उलटी... 

बहाणेच बहाणे.


पेशाने सर्जन, मलमुत्र रोगांशी जुनी दोस्ती. त्यामुळे संकोच सोडणं सोपं गेलं. 


डोळे मिटून घेण्याशिवाय तिच्या संकोचाला  पर्यायच नव्हता.


वेळोवेळी डायपर बदलून, अंग पुसून, पावडर लावून कपडे घालण्यापासून तेल लावून वेणी फणी करण्यापर्यंत सगळं.


दिवसातून दोन तीनदा घर ते हाॅस्पिटल.

हाॅस्पिटल ते घर अप-डाऊन.


धावपळ होत होती; पण थकवा आला तरी जाणवत नव्हता. 


तिच्या प्रत्येक हाकेमुळे मनातल्या मनात माझाही पान्हा फुटत असावा. 


मनाच्या कुठल्यातरी पातळीवर कधीही न मिळालेलं समाधान अनुभवत होतो. 


*कुठल्याही कळा न सोसता मला तिचं आईपण मिळालं हे माझं किती मोठं भाग्य होतं.* 

पण फार काळ नाही. 


काही महिन्यांची सेवा आणि एका प्रसन्न सकाळी माझ्या हिरकणी ने गड सोडला.


मी माझं कर्तव्य समजून तिची सेवा केली. कुणीतरी म्हणालं पुण्य कमावलंस. 

त्यांचं खरं असेल तर हे छोटंसं पुण्य चित्रगुप्ताच्या डायरीतील माझं पान भरायला पुरेसं होईल.


देव आणि आई एकाच नाण्याच्या दोन बाजू.

देव खाली येऊ शकत नाही म्हणून आईला पृथ्वी वर पाठवलं। असं कुठंतरी वाचलेलं. त्या वाक्याचा प्रत्यय यावा अशी आपली आई.


रामची असो की शामची.

कैकयी असो की गांधारी.

आई सगळ्यांची सारखीच.


शरीराने आणि मनाने आपल्या गूढ देवराई तील शक्ती देवता. 

फक्त आपल्या भल्यासाठीच तिच्या ओंजळीतली माया रिकामी करणारी लक्ष्मी.


प्रत्येकाच्या छोट्याशा आकाशातील अढळ स्थानावरील ध्रुवतारा. तिचं गुरुत्वाकर्षण तर पृथ्वीपे‌क्षाही भारी. खालून वर नेणारं.

*बिजांडातून ब्रम्हांडात पोहचवणारं.*


तिच्या बिजांडात अंकुरलेला सुक्ष्म कोंब म्हणजे आपण.

एक दशांश मि.मि.पेक्षाही लहान. गर्भाशयाच्या भिंतीवर ‌मुळं पसरून, तिचंच रक्त शोषून तगणारं बांडगुळ.


मधेच केव्हातरी पारंबी फुटावी तशी नाळ फुटते बेंबीतून. 

त्यातून मिळणाऱ्या खतावर कोंबाचं रोपटं होण्याची सुरूवात होते.


चैत्राच्या पालवी सारखे हळूहळू फुटलेले कोवळे कोवळे अवयव. तिचीच उर्जा घेऊन सुरू झालेली इंजिनं... 

आदिपासून अंतापर्यंत अव्याहत पळणारी.


  नव्या फुफ्फुसाचा पहिला श्वास आणि नव्या ह्रदयाचा पहिला ठोका तिच्याच मालकीचा. 

नॅनोग्रॅम पासून ते किलोग्राम पर्यंतची वाढही तिच्याच कोठारातील.


कणाकणानं वाढणारं ओझं घेऊन तोल सांभाळणारा कणखर मणका. 

कितीही वाकला तरी पोटातल्या गोळ्याला सुरक्षित वाहणारा. 

लाथा मारणारं बाळ, आणि लाथा मारणारी परिस्थिती, दोघांना झेलत तारेवर झूलणारी डोंबारीण.


नऊ महिने नऊ दिवसांची कसरत. 

ढोलकं बडवायला नवरा आणि टाळ्या पिटायला ढिगभर जमाव. 


पण मदतीसाठी थाळी फिरवली की सगळ्यांचं घुमजाव.‌


बाळनिवासाच्या पायाभरणीत फिक्कट करणारे दिवस. 


धापा टाकत टाकत केलेलं रांधा वाढा, उष्टी काढा. 

सुजून जडावलेले पाय आणि वाढलेले श्वास म्हणजे घटीका भरल्याची नांदीच.


चंद्र, ग्रह, तारे बाळाच्या कुंडलीत स्थिरावले, कि सुरू झालेल्या प्रसव कळा.


खोल, गूढ,अगम्य कृष्ण विवरातील वादळ.

सुरुवातीला समुद्राच्या हळुवार लहरींचे हिंदोळे. 

नंतर याच लहरींवर स्वार झालेल्या भरतीच्या धडका. 

एकामागून एक. 

बाळाच्या ओढीने वाढलेल्या कळा जणू चंद्रासाठी उसळणाऱ्या पौर्णिमेच्या लाटा. काही सौम्य काही रौद्र. 

उरल्या सुरल्या शक्तीला मुठीत घट्ट आवळून घेतलेल्या, कळांवर कळा...


प्राण पुरवणारा वार जागा सोडण्यासाठी भिंतीपासून विलगू लागतो.

मुळापासून विस्थापित होण्याच्या भितीने बाळही अस्वस्थ होऊ लागते.

अशुभ संकेतांची टिटव्यांची टिवटिव.

गुदमरणाऱ्या बाळासाठी, खचलेला धीर मुठीत आवळून एक जोराची किंकाळी आणि  निकराची एक शक्तीशाली कळ.


किनारा चिरणाऱ्या पाण्याच्या लोंढयात तरंगत आलेलं आणि दाईने झेललेलं गोंडस बाळ.


मातेने सोसलेल्या यातनांना बाळाने रडून दिलेली दाद, म्हणजे बाहेरच्या जगातला पहिला श्वास.


दुपट्यातल्या सुखाला उराशी कवटाळून अमृतकुंभाला शोधणाऱ्या अधाशी ओठांना कौतुकाने पाहणारे आईचे डोळे.


फुटलेल्या पान्ह्यातून गळणारे थेंब वेदनांचा निचरा करत बाळाच्या ओठांवर विसावले की, अमृताच्या अभिषेकात न्हाऊन तिच्या काळजाचा तुकडा झोपी जातो.


माता कुराणातील असो वा पुराणातील. तिचं वात्सल्य कुणालाही नतमस्तक करणारं.

अनुसया असो कि आदिती.

दिगंबराची असो किंवा पैगंबराची.

*आई शेवटी आईच असते.*


जन्माला आलेल्या बाळासाठी तिचं त्याचं नातं अद्वैत. 

तिने शुन्य बॅलन्स वापरून उधळलेली अनमोल ममता.

त्यामुळे त्याच्या उत्पन्नात वाढणारा प्रत्येक मोठा आकडा तिच्या ममतेशी गुणला की शुन्यच. 


जगभर फिरला, पण तिच्या उपकारांची परतफेड करणाऱ्या वस्तूंचा मॅाल नाही दिसला.


डेबीट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, पास बुकं ही या नात्यात फक्त कागदं आहेत. 

आईचं कर्ज फेडण्या इतका त्यात बॅलन्स कुठे आहे ?


*या ओझ्यातून किंचित मुक्त होण्याचा एक मार्ग... 

एक उतराई... 


शक्य असेल तर जरूर बना...*

                *आईची आई...*

संकलन:)- गजानन गोपेवाड राज्य समन्वयक महाराष्ट्र राज्य 


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शनिवार, ३० ऑक्टोबर, २०२१

गाथा बलिदानाची सरदार वल्लभभाई पटेल जयंती

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*🇮🇳🇮🇳गाथा बलिदानाची🇮🇳🇮🇳*

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       *सरदार वल्लभ भाई पटेल*

भारतीय स्वातंत्र्यसेनानी,राजकारणी

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वल्लभभाई झावरभाई पटेल

       (३१ ऑक्टोबर १८७५ )

  जन्म -) ३१ ऑक्टोबर १८७५

   नाडियाड , बॉम्बे प्रेसिडेन्सी , ब्रिटिश इंडिया

मृत्यू -) १५ डिसेंबर १९५० (वय ७५) 

बॉम्बे , बॉम्बे राज्य , भारत


राष्ट्रीयत्व -)   भारतीय

राजकीय पक्ष -)  भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस

मुले -)मनिबेन पटेल , दह्याभाई पटेल

शैक्षणिक संलग्नता -) मध्यम मंदिर

व्यवसाय ,पुरस्कार, राजकारण,

जीवन परिचय -)   गुजरात एक Leva पटेल (Patidar) जात. झावरभाई पटेल आणि लाडबा देवी यांचे ते चौथे अपत्य होते. सोमाभाई, नरसिभाई आणि विठ्ठलभाई हे त्यांचे पूर्वज होते . त्यांचे शिक्षण प्रामुख्याने स्वाध्यायाचे होते. लंडनला जाऊन बॅरिस्टरचे शिक्षण घेतले आणि परत येऊन अहमदाबादमध्ये सराव केले. महात्मा गांधींच्या विचारांनी प्रेरित होऊन त्यांनी भारतीय स्वातंत्र्य चळवळीत भाग घेतला. पटेल हे सरदार पटेल म्हणून प्रसिद्ध असलेले भारतीय राजकारणी होते. त्यांनी भारताचे पहिले उपपंतप्रधान म्हणून काम केले. ते एक भारतीय वकिली आणि राजकारणी , भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेसचे ज्येष्ठ नेते आणि भारतीय प्रजासत्ताकचे संस्थापक पिता होते, त्यांनी देशाच्या स्वातंत्र्यलढ्यात अग्रगण्य भूमिका निभावली आणि एकीकृत, स्वतंत्र राष्ट्र म्हणून त्याचे एकीकरण करण्यासाठी मार्गदर्शन केले. भारत आणि इतरत्र, हिंदी, उर्दू आणि पर्शियन भाषेत त्याला सरदार म्हटले जायचे, म्हणजे "मुख्य". १९४७ च्या भारत-पाकिस्तान युद्धाच्या राजकीय एकीकरणात त्यांनी गृहमंत्री म्हणून काम केले.


सरदार वल्लभ भाई पटेल

सरदार पटेल (क्रॉप)

भारताचे उप पंतप्रधान


पंतप्रधान -) जवाहरलाल नेहरू

 

उत्तराधिकारी-) मोरारजी देसाई

गृह मंत्रालय



संघर्ष-)

स्वातंत्र्य चळवळीत सरदार पटेल यांचे पहिले आणि मोठे योगदान हे १९१८ मधील खेडा संघर्षात होते. गुजरातचा खेडा विभाग (विभाग) त्या काळात भीषण दुष्काळाच्या चक्रात होता. शेतक -यांनी ब्रिटीश सरकारकडे भारी करात सूट मिळावी अशी मागणी केली. जेव्हा हे मान्य केले गेले नाही, तेव्हा सरदार पटेल, गांधीजी आणि इतरांनी शेतक -यांचे नेतृत्व केले आणि कर न भरण्यास उद्युक्त केले. शेवटी, सरकारने खाली वाकून त्यावर्षी करामध्ये सवलत दिली. सरदार पटेल यांचे हे पहिले यश होते.


बारडोली सत्याग्रहा मध्ये वल्लभभाई पटेल यांच्या नेतृत्वात भारतीय स्वातंत्र्यलढ्यात बारडोली सत्याग्रह ही गुजरातमधील एक मोठी शेतकरी चळवळ होती. त्यावेळी प्रांतीय सरकारने शेतक-यांच्या भाड्यात तीस टक्के वाढ केली होती. या महसूल वाढीस पटेल यांनी तीव्र विरोध केला. या सत्याग्रहाच्या चळवळीला चिरडण्यासाठी सरकारने कठोर उपाययोजना केल्या, पण शेवटी शेतक-यांच्या मागण्या मान्य करण्यास भाग पाडले गेले. ब्लूमफिल्ड, एक न्यायिक अधिकारी आणि मॅक्सवेल या महसूल अधिकारी यांनी या संपूर्ण प्रकरणाची चौकशी केली आणि २२ टक्के महसूलवाढ नकारल्यामुळे ते कमी करून ६:०३ टक्के केले.


हे सत्याग्रह आंदोलन यशस्वी झाल्यानंतर तेथील महिलांनी वल्लभभाई पटेल यांना 'सरदार' ही पदवी दिली. बारडोली शेतकरी संघर्षाच्या संदर्भात शेतकरी संघर्ष आणि राष्ट्रीय स्वातंत्र्य संग्रामातील परस्पर संबंधांचे स्पष्टीकरण देताना गांधीजी म्हणाले की, असे प्रत्येक संघर्ष, प्रत्येक प्रयत्न आपल्याला स्वराज्याच्या जवळ आणत आहेत आणि आपण सर्वांना थेट स्वराज्य मजल्यापर्यंत पोहोचविण्यासाठी हा संघर्ष करतो. संघर्ष करण्यापेक्षा अधिक उपयुक्त सिद्ध करू शकता




मुख्य लेख: बारडोली सत्याग्रह


बारडोलीच्या शेतकऱ्यां समवेत

बारडोली


स्वातंत्र्यानंतर

गांधींच्या इच्छेचा मान राखून बहुतेक प्रांतीय कॉंग्रेस कमिटी पटेल यांच्या बाजूच्या होत्या, पण पटेल यांनी पंतप्रधानपदाच्या शर्यतीपासून स्वत: ला दूर ठेवले आणि त्यासाठी नेहरूंचे समर्थन केले. त्यांना उपपंतप्रधान व गृहमंत्री यांचे काम सोपविण्यात आले होते . पण तरीही नेहरू आणि पटेल यांचे नाते तणावपूर्ण राहिले. यामुळे या दोघांनीही अनेकवेळा आपली पदे मागे घेण्याची धमकी दिली होती.


गृहमंत्री म्हणून त्यांची पहिली प्राथमिकता भारतातील स्वदेशी राज्ये (राज्ये) एकत्र करणे हे होते. त्याने कोणतेही रक्त सांडल्याशिवाय ते संपादित केले. केवळ हैदराबाद स्टेट ऑफ ऑपरेशन पोलो येथे त्यांना सैन्य पाठवावे लागले. भारताच्या एकीकरणातील योगदानाबद्दल त्यांना भारतीय लोहपुरुष म्हणून ओळखले जाते. सन १९५० मध्ये त्यांचे निधन झाले. यानंतर कॉंग्रेसमध्ये नेहरूंचा फारच कमी विरोध झाला.


स्वदेशी राज्यांचे एकत्रीकरण (राज्ये)

मुख्य लेख: भारताचे राजकीय एकत्रीकरण

स्वातंत्र्याच्या वेळी भारताकडे ५६ देशी राज्ये होती. त्यांचे क्षेत्र भारतातील ४० टक्के होते. सरदार पटेल यांनी व्ही.पी. मेनन यांच्यासमवेत स्वातंत्र्यापूर्वी (संक्रमणापूर्वी) अनेक देशी राज्ये भारतात विलीन करण्याचे काम सुरू केले. पटेल आणि मेनन यांनी स्थानिक राजांना मोठ्या प्रमाणात स्पष्ट केले की त्यांना स्वायत्तता देणे शक्य होणार नाही. परिणामी, तीन सोडून इतर सर्व राजवाड्यांनी स्वेच्छेने भारतामध्ये विलीन होण्याचा प्रस्ताव स्वीकारला. फक्त जम्मू-काश्मीर , जुनागड आणि हैदराबाद राज्यराजांनी तसे करण्यास मान्य केले नाही. जुनागड हे सौराष्ट्राजवळ एक छोटेसे राज्य होते आणि चारही बाजूंनी भारतीय मातीने वेढलेले होते. ती पाकिस्तान जवळ नव्हती. तेथील नवाबाने १ ऑगस्ट १९४७ रोजी पाकिस्तानमध्ये प्रवेश करण्याची घोषणा केली. राज्यातील बहुतेक लोक हिंदू होते आणि त्यांना भारतात विलीन करायचे होते. जेव्हा नवाबाविरोधात बरीच निषेध नोंदला गेला, तेव्हा भारतीय सैन्य जुनागडमध्ये घुसले. नवाब पाकिस्तानमध्ये पळाला आणि ९ नोव्हेंबर १९४७ रोजी जूनागड देखील भारतात सापडला. फेब्रुवारी  मध्ये तेथे जनमत आयोजित करण्यात आले होते. हैदराबाद हे भारतातील सर्वात मोठे राज्य होते, ज्याने चारही बाजूंनी भारतीय भूमीला वेढले. तिथल्या निजामाने पाकिस्तानच्या प्रोत्साहनाने स्वतंत्र राज्याचा दावा केला आणि आपली सेना वाढवण्यास सुरुवात केली. तो खूप शस्त्रे आयात करत राहिला. पटेल काळजीत पडले. अखेर १३ सप्टेंबर १९४८ रोजी भारतीय सैन्याने हैदराबादमध्ये प्रवेश केला. तीन दिवसांनी निजामाने आत्मसमर्पण केले आणि १ नोव्हेंबर १९४८ मध्ये भारतातील विलीनीकरणाचा प्रस्ताव मान्य केला. ही समस्या आंतरराष्ट्रीय समस्या असल्याचे सांगून नेहरूंनी काश्मीरला स्वत: कडे ठेवले. काश्मीरची समस्या संयुक्त राष्ट्राकडे नेली गेली आणि फुटीरतावादी शक्तींमुळे काश्मीरची समस्या दिवसेंदिवस वाढत गेली. ५ ऑगस्ट २०१९ रोजी पंतप्रधान मोदीजी आणि गृहराज्यमंत्री अमित शहा यांच्या प्रयत्नांसह, अनुच्छेद 370 आणि 35 (ए) ने काश्मिरला विशेष राज्याचा दर्जा देण्याचा शेवट केला. काश्मीर हा भारताचा अविभाज्य भाग झाला आणि सरदार पटेल यांचे भारत अखंड करण्याचे स्वप्न साकार झाले. ३१ ऑक्टोबर २०१९ रोजी जम्मू-काश्मीर आणि लडाख म्हणून दोन केंद्रशासित प्रदेश अस्तित्त्वात आले. आता जम्मू-काश्मीर केंद्राच्या खाली राहील आणि तिथे भारताचे सर्व कायदे लागू होतील. पटेल यांच्या आभारी राष्ट्रासाठी ही खरी श्रद्धांजली आहे.


*गांधीजी, पटेल आणि मौलाना आझाद*

स्वतंत्र भारताचे पहिले पंतप्रधान पं. नेहरू आणि पहिले उपपंतप्रधान सरदार पटेल यांच्यात आकाशातील फरक होता. जरी ते दोघे इंग्लंडमध्ये गेले आणि त्यांनी बॅरिस्टीची पदवी मिळविली तरी सरदार पटेल वकिलीत पं. नेहरूंपेक्षा खूप पुढे होते आणि संपूर्ण ब्रिटीश साम्राज्यातील विद्यार्थ्यांमध्ये तो पहिला होता. नेहरू सहसा विचार करायचा, सरदार पटेल त्यांना कर आकारतात. नेहरू धर्मग्रंथांचे अभ्यासक होते, पटेल शस्त्रांचे पुजारी होते. पटेल यांचेही उच्च शिक्षण होते परंतु त्यांना थोडा अहंकारही नव्हता. ते स्वत: म्हणायचे, "मी कला किंवा विज्ञान या महान आकाशात उंच उडले नाही. गरीब शेतकर्‍यांच्या शेतात मी कच्च्या झोपड्यांमध्ये आणि शहरांच्या घाणेरड्या घरात विकसित केले आहे." पंडित नेहरू गावच्या घाणेरड्या आणि जीवनामुळे चिडले होते. पं. नेहरू यांना आंतरराष्ट्रीय कीर्तीची आवड होती आणि त्यांना समाजवादी पंतप्रधान व्हायचे होते.


देशाच्या स्वातंत्र्यानंतर सरदार पटेल हे उप-पंतप्रधानांसमवेत पहिले गृह, माहिती आणि प्रधानमंत्रीही होते. सरदार पटेल यांची सर्वात मोठी भेट म्हणजे ५६ मोठ्या व लहान राज्यांचे भारतीय संघात विलीन करून भारतीय ऐक्य निर्माण करणे. जगाच्या इतिहासामध्ये असा एकाही व्यक्ती नव्हता ज्याने इतक्या मोठ्या संख्येने राज्ये एकत्रित करण्याचे धाडस केले असेल. ५ जुलै १९४७ रोजी एक रियासत विभाग स्थापन झाला. एकदा त्याने ऐकले की बस्तर राज्याकडे कच्चे सोन्याचे प्रचंड क्षेत्र आहे आणि हैदराबादच्या निजाम सरकारला ही जमीन दीर्घकालीन भाडेपट्टीवर खरेदी करायची आहे. त्याच दिवशी तो अस्वस्थ झाला. त्याने आपली बॅग व्ही.पी. उचलली. मेननला बरोबर घेतले आणि तेथून निघून गेले. तो ओरिसाला पोहोचला आणि तेथील २३ राजांना म्हणाला, “विहिरीचे बेडूक बनू नकोस, समुद्रात ये.” ओरिसाच्या लोकांची जुनी इच्छा काही तासातच पूर्ण झाली. त्यानंतर नागपुरात पोहोचले, येथून ३८ राजांना भेटले. त्यांना सॅल्यूट स्टेट असे म्हटले गेले, म्हणजे जेव्हा जेव्हा कोणी त्यांच्या भेटीला गेले तेव्हा तोफेला सलाम करण्यात आला. पटेल यांनी या राजांच्या राजाला शेवटचा सलाम केला. त्याचप्रमाणे तो काठियावाडला पोहोचला. तिथे २५० राज्ये होती. काही फक्त २०-२० गावप्रसिद्धी होते. सर्वकाही समाकलित केले. एका संध्याकाळी मुंबई गाठली. जवळच्या राजांशी बोललो आणि त्यांची पिशवी त्यांच्या राजवटीत घालून गेली. पटेल पंजाबला गेले. पटियालाचा खजिना रिकामा होता. फरीदकोटच्या राजाने काही निष्काळजीपणा केला. सरदार पटेल यांनी फरीदकोटच्या नकाशावर आपली लाल पेन्सिल गुंडाळताना फक्त "इच्छा काय आहे?" राजा थरथर कापला. १५ ऑगस्ट १९४७  पर्यंत काश्मीर, जुनागड आणि हैदराबाद सोडून त्या लोखंडी माणसाने सर्व राजे भारतात विलीन केली.१ नोव्हेंबर १९४७ रोजी जुनागडलाही या तीन राज्यांमध्ये ताब्यात घेण्यात आले आणि जुनागडचे नवाब पाकिस्तानमध्ये पळून गेले. १ नोव्हेंबरला सरदार पटेल यांनी पंडित नेहरूंच्या तीव्र विरोधानंतरही बांधलेले सोमनाथ मंदिर भग्न मंदिर पुन्हा बांधण्याचे आश्वासन दिले. १९४८ मध्ये, हैदराबादलाही केवळ ४ दिवसांच्या पोलिस कारवाईने जोडले गेले. तेथे कोणताही बॉम्ब किंवा कोणतीही क्रांती घडली नव्हती, म्हणून घाबरुन जात होते.


म्हणून आतापर्यंत संस्थान राज्य काश्मीर आहे संबंधित, तो त्याच्या स्वत: च्या उजव्या पंडित नेहरू यांनी केले, परंतु तो सरदार पटेल हे खरे आहे फार रागावला होता काश्मीरमध्ये सार्वमत आणि काश्मीर मुद्दा घेऊन युनायटेड नेशन्स . निःसंशयपणे, सरदार पटेल यांनी ५६ राज्ये एकत्र केल्याने जगाच्या इतिहासाचे आश्चर्य होते. ही भारताची रक्तहीन क्रांती होती. महात्मा गांधींनी सरदार पटेल यांना या राज्यांविषयी लिहिले की, "रियासतांची समस्या इतकी गुंतागुंतीची होती की केवळ आपणच त्याचे निराकरण करू शकाल."


परराष्ट्र विभाग पंडित नेहरूंचे क्षेत्र कार्यालय असले तरी त्यांना उप-पंतप्रधान म्हणून बहुधा मंत्रिमंडळाच्या परराष्ट्र व्यवहार समितीकडे संबोधले जात असे. त्या काळात त्याच्या दूरदृष्टीचा लाभ घेतला असता तर बर्‍याच सद्य समस्या उद्भवल्या नसत्या. पंडित नेहरूंना लिहिलेल्या पत्रामध्ये पटेल यांनी चीन आणि तिबेटविषयीच्या त्याच्या धोरणाबाबत सावधगिरी बाळगली आणि चीनच्या या वृत्तीला कपटपूर्ण व विश्वासघातकी असल्याचे सांगितले. त्यांच्या पत्रात चीनला आपला शत्रू, त्याचे वागणे अशोभनीय आणि चीनच्या पत्रांची भाषा मित्राची नसून भविष्यातील शत्रूची भाषा असे म्हटले होते. चीनने तिबेटवर कब्जा केल्यामुळे नवीन समस्या उद्भवतील असेही त्यांनी लिहिले.  नेपाळच्या संदर्भात लिहिलेल्या पत्रांशी पं. नेहरू सहमत नव्हते. १९५० मध्येच गोवाभारताच्या स्वातंत्र्या संदर्भात झालेल्या दोन तासांच्या मंत्रिमंडळ बैठकीत झालेल्या प्रदीर्घ चर्चे ऐकल्यानंतर सरदार पटेल यांनी "आपण गोव्याला जाऊ या, दोन तासांची बाब आहे," एवढेच सांगितले. यावर नेहरू खूप रागावले. पटेल यांनी आज्ञा पाळली असती तर गोव्याला स्वातंत्र्यासाठी पर्यंत थांबण्याची गरज नव्हती.


गृहमंत्री म्हणून भारतीय नागरी सेवा (आयसीएस) चे भारतीयकरण करणारे ते पहिले व्यक्ती होते आणि त्यांना भारतीय प्रशासकीय सेवा (आयएएस) बनविणारे होते. ज्यांनी इंग्रजांची सेवा केली त्यांच्यावर विश्वास ठेवून ते देशभक्तीकडे देशभक्तीकडे वळले. सरदार पटेल काही वर्षे जगले असते तर नोकरशाहीचा संपूर्ण कायाकल्प झाला असता.


सरदार पटेल हे पाकिस्तानच्या छद्म युक्ती आणि सावधगिरीविषयी सावध असतांना त्यांनी देशातील विघटनकारी घटकांबद्दलही काळजी घेतली. विशेषत: मुस्लिम लीग आणि भारतातील कम्युनिस्टांमधील भेदभाव आणि रशियाबद्दलची त्यांची श्रद्धा याची त्याला जाणीव होती. बर्‍याच विद्वानांनी असे म्हटले आहे की सरदार पटेल बिस्मार्कसारखे होते. पण टाईम्स ऑफ लंडनने लिहिले की, "बिस्मार्कचे यश पटेल यांच्यासमोर महत्त्वाचे राहिलेले नाही. काश्मीर, चीन, तिबेट आणि नेपाळमधील परिस्थिती आजची परिस्थिती नसती तर पटेल यांनी मनुच्या राजवटीची कल्पना केली असती." त्यांच्यात कौटिल्य यांची मुत्सद्दी होती आणि महाराज शिवाजींची दूरदृष्टी होती.ते फक्त सरदारच नव्हते तर भारतीयांच्या हृदयाचे प्रमुख होते.


लेखन कार्य आणि पुस्तके प्रकाशित केली

पटेल यांचा सन्मान


सरदार पटेल राष्ट्रीय स्मारकाची मुख्य खोली

अहमदाबाद विमानतळाचे नाव सरदार वल्लभभाई पटेल आंतरराष्ट्रीय विमानतळ आहे .

वल्लभ विद्यानगर , गुजरातमधील सरदार पटेल विद्यापीठ मध्ये मरणोत्तर भारतरत्नने सन्मानित

स्टॅच्यू ऑफ युनिटी

मुख्य लेख: स्टॅच्यू ऑफ युनिटी

त्याची उंची २४० मीटर आहे, ज्याचा आधार ५८ मीटर आहे. पुतळा १८२ मीटर उंच असून तो स्टॅच्यू ऑफ लिबर्टीच्या उंचीपेक्षा दुप्पट आहे.३१ ऑक्टोबर २०१३, सरदार वल्लभभाई पटेल, नंतर प्रमुख १३७ व्या जन्म वर्धापन दिनानिमित्त मंत्री गुजरात, नरेंद्र मोदी सरदार वल्लभभाई पटेल एक नवीन स्मारक भूमिपूजन गुजरातच्या नर्मदा जिल्हा . येथे लोखंडापासून बनविलेले सरदार वल्लभभाई पटेल यांचा एक विशाल पुतळा बसवण्याचा निर्णय घेण्यात आला, म्हणून या स्मारकाला ' स्टॅच्यू ऑफ युनिटी ' ( स्टॅच्यू ऑफ युनिटी ) असे नाव देण्यात आले .  प्रस्तावित पुतळा केवडियामधील सरदार सरोवर धरणाच्या समोरील नर्मदा नदीच्या मध्यभागी असलेल्या 'साधू बेट' या छोट्या खडकाळ बेटावर स्थापित आहे .


२०१८ मध्ये तयार केलेला हा पुतळा पंतप्रधान मोदींनी ३१ ऑक्टोबर २०१८ रोजी देशाला समर्पित केला होता. हा पुतळा ५ वर्षात सुमारे ३००० कोटी रुपये खर्चून बनविला गेला आहे. 

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संकलन -)गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६


प्रभात दर्शन

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

आश्विन मास,कृष्ण पक्ष, *दशमी*,मघा नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,शरद ऋतु,युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

रविवार, ३१ आॕक्टोबर २०२१.

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                         *प्रभात दर्शन*

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          *पानी का जहाज़ समुद्र के किनारे सर्वाधिक सुरक्षित रहता है। किन्तु यह सर्वविदित है कि उसे किनारे के लिए नहीं, अपितु समुद्र के बीच में जाने एवं लहरों से संघर्ष के लिए बनाया गया है। इसी प्रकार हमारा भी जीवन है। सही दिशा में संघर्षरत व्यक्ति ही जीवन मे अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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डॉ. होमी जहांगीर भाभा

 *🔬🔬होमी जहांगीर भाभा🔬🔬*

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*भारतीय अणुभौतिकशास्त्रज्ञ*

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*जन्मदिन -३० ऑक्टोबर  इ.स. १९०९*


होमी भाभा (इ.स. १९०९ - इ.स. १९६६) भारतीय अणुभौतिकशास्त्रज्ञ होते. भारताच्या अणुऊर्जा विकासकार्यक्रमाचा पाया रचण्याच्या कामगिरीमुळे त्यांना भारताच्या अणुऊर्जा व अण्वस्त्र विकासकार्यक्रमाचे प्रणेता मानले जाते.

जीवन

भाभा यांचा जन्म सधन पारशी कुटुंबात झाला. वडील जहांगीर भाभा हे बॅरीस्टर होते. पुस्तकांची आवड असल्यामुळे घरातच खूप पुस्तके गोळा केली होती. त्यात विज्ञान विषयाचीही पुस्तके होती. होमी भाभा यांना या पुस्तकांमुळे विज्ञानात स्वाभाविकपणेच आवड निर्माण झाली. शिवाय त्यांना कवितेचा आणि चित्रकलेचा छंद होता. अतिशय सुंदर, देखणे व्यक्तीमत्त्व लाभालेले होमी भाभा उत्तम वक्ताही होते.

त्यांचे प्राथमिक ते पदवी पर्यंतचे शिक्षण मुंबई येथे झाले. होमी यांनी पुढे इंजिनियर व्हावे असे त्यांच्या वडिलांना वाटत होते. पण होमी यांनी वडिलांना आपल्याला गणित आणि भौतिक शास्त्रातच विशेष आवडतात असे ठामपणे सांगितले. वडिलांनी हो-ना करत गणिताचा सखोल अभ्यास करण्यास परवानगी दिली पण आधी प्रथम श्रेणीत इंजिनियरींगची पदवी प्राप्त करण्याची अट घालून दिली. वडिलांनी परवानगी दिल्यावर होमी भाभा केंब्रीज विद्यापिठातून इ.स. १९३० साली प्रथम श्रेणीत इंजिनियर झाले. तसेच पॉल डिरॅक यांच्या मार्गदर्शनाखाली गणिताचा अभ्यासही करीत राहिले. त्या काळात त्यांना शिष्यवृत्ती आणि अनेक बक्षीसेही मिळाली.

इ.स. १९४० साली भारतात परत आल्यावर काही काळ डॉ. भाभा यांनी भारतीय विज्ञान संस्था, बंगलोर येथे प्रोफेसर म्हणून काम केले. इ.स. १९४५ साली टाटा मूलभूत संशोधन संस्थेची स्थापना करण्यात मदत केली आणि आपले संशोधन कार्य संभाळून डॉ. भाभा टाटा मूलभूत संशोधन संस्थेचे संचालक झाले. भारताच्या स्वातंत्र्यानंतर इ.स. १९४८ साली त्यांच्या पुढाकाराने अणु उर्जा आयोगाची स्थापना करण्यात आली. याही संस्थेचे तेच संचालक म्हणून काम पाहू लागले. त्यांच्या अथक परिश्रमांमुळेच भारत देशात अणु भट्टी ची स्थापना होऊ शकली. अणुचा वापर शांततेच्या मार्गानेच व्हावा असे ठाम मत संयुक्त राष्ट्रच्या सभेत मांडणारे भाभा हे पहिले वैज्ञानिक. डॉ. भाभा यांनी पाया रचला म्हणूनच भारताने अनेक ठिकाणी अणु भट्या सुरू करून त्यांचा विज निर्मितीसाठी उपयोग केला तसेच १८ मे, इ.स. १९७४ या दिवशी भारताने पोखरण येथे पहिला अणुस्फोट घडवून आणला.

संयुक्त राष्ट्रच्या सभेला जातांना २४ जानेवारी, इ.स. १९६६ या दिवशी फ्रान्सच्या हद्दीत असतांना त्यांचे विमान अपघातात निधन झाले. त्यांच्या मृत्यु नंतर ट्रॉम्बे येथील अणु संशोधन केंद्राचे नाव बदलून भाभा अणु संशोधन केंद्र असे ठेवण्यात आले ,

*🙏🌞🙏 शुभ प्रभात🙏🌞🙏*

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा - यवतमाळ ४४५२०६


Good morning

 🌳⛳ *शुभ प्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳🌳

🦋🦚🌹🌻🦢🛕🦢🌻🌹🦚🦋

आश्विन मास,कृष्ण पक्ष, *नवमी*,अश्लेषा नक्षत्र,सूर्य दक्षिणायन,शरद ऋतु, युगाब्द ५१२३,विक्रम संवत-२०७८, 

शनिवार, ३० आॕक्टोबर २०२१.

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                         *प्रभात दर्शन*

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शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः,

           यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्।

सुचिन्तितं चौषधम् आतुराणां,

          न नाममात्रेण करोत्यरोगम्॥"


*भावार्थः- यदि ज्ञान को व्यवहार में नहीं लाया जाए तो शास्त्र पढ़ चुके लोग भी मूर्ख ही रह जाते हैं। जिस प्रकार औषधि का सेवन करके व्यक्ति रोगमुक्त होता है, केवल औषधि का नाम लेकर नही।*

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*🚩🐅आपका दिन मंगलमय हो🐅🚩*

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शुक्रवार, २९ ऑक्टोबर, २०२१

पुणे येथील रहिवासी

 नमस्ते मित्रांनो ,

प्रति,

 शिक्षण विभागातील सर्व अधिकारी ,

प्राथमिक / माध्यमिक / उच्च . माध्यमिक सर्व शिक्षक व शिक्षकेत्तर कर्मचारी*

       आपणास कळविण्यास आनंद होतो कि  शिक्षण विभागातील काम करणाऱ्या प्रत्येक अधिकारी /शिक्षक / शिक्षकेत्तर कर्मचारी यांना  पुण्यात आपल्या प्रशासकिय कामासाठी यावे लागते अशावेळी बऱ्याचवेळा मुक्काम करावा लागतो परंतु मुक्कामास स्वच्छ किफायतशीर किंमतीत सोय होत नसल्याने बऱ्याचजणांची गैरसोय होते त्यासाठी आपल्या सर्वांच्या सोयीकरता पुणे शहरात मध्यवर्ती ठिकाणी ( स्वारगेटपासून पाच मिनिटाच्या अंतरावर )मुक्कामाची  अगदी नाममात्र शुल्कात ( प्रत्येकी १०० रू . )सोय आपल्या *शिक्षक भवन* , *१९२ , नवी पेठ , गांजवे चौक , पत्रकार भवन, शेजारी , निवारा वृध्दाश्रमासमोर ,पुणे ३०  फोन नं. 02024537867* होते .


 *शिक्षक भवन वैशिष्टये :* 

१ ] *पुण्यात मध्यवर्ती ठिकाणी उत्तम निवास व्यवस्था .* 

 २ ) *प्रशस्त पार्किंग व्यवस्था .* 

३ ) *अंगोळीसाठी गरम पाणी* 

४ ) *केवळ ओळखपत्राच्या / मुख्याध्यापक पत्राच्या आधारे प्रवेश* 


५ ) *प्रतिदिन प्रतिव्यक्ती केवळ १०० रु. निवास व्यवस्था.* 


६ ) *वैद्यकिय कारणास्त कुटुंबासह निवास व्यवस्था .* 

तरी सर्व शिक्षण विभागातील काम करणाऱ्या प्रत्येक अधिकारी / कर्मचाऱ्याने एक वेळ आवश्य भेट दया .

  इतर संपर्क क्रमांक 

स्वप्निल कांबळे सकाळी १० ते ६ भ्रमणध्वनी  9579252295

 सतिश मेंगडे  संध्याकाळी ६ ते ११ 

 भ्रमणध्वनी 9096392517

रात्री विनय काका 8669226259

      


सहायक संचालक , ( विद्या शाखा )

माध्यमिक व उच्च माध्यमिक शिक्षण संचालनालय , पुणे ०१ 


( *सदरची पोष्ट शिक्षण विभागातील प्रत्येक गटावर / प्रत्येक शिक्षक , कर्मचारी , अधिकारी यांचेपर्यंत पोहचवावी ही विनंती .* )

कंम्पुटर आणि माउस


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🔅 *संकलन:*🔅


*श्री गजानन गोपेवाड 

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*Computer आणि mouse जोडी आहे  खास ! या उपकरणला उंदराच नाव पडलं तरी कसं?*




संगणकावर काम करण्यासाठी (Comuter must need Mouse) आपण सर्वजण माउसचा वापर करतो. बघायला गेलं तर माऊस शिवाय संगणकाचे काहीच काम होऊ शकत नाही. आपल्याला स्क्रीनवर काहीही हालचाल करायची किंवा आयकॉनवर क्लिक करायचे असेल तर आपल्याला 'माऊस' ची गरज लागते. पण आपल्या मनात एकदा तरी शंका आलीच असेल, की  या उपकरणाला उंदराचं नाव कसं काय बरं ठेवण्यात आलं असेल! बरीच नाव देण्यात आली असती, पण उंदराची उपमा देऊन याचं नामकरण 'Mouse' असं कुणी ठेवलं? चला जाणून घेऊया संगणकाच्या या माऊसबद्दल...



फार काळपूर्वी संगणकाला लागणाऱ्या माऊस ( Computer's Mouse ) चे नाव वेगळे होते. 1960 च्या दशकात ( Douglas Engelbart) डग्लस कार्ल एंगेलबार्टने याचा शोध लावला होता. सर्वप्रथम ज्यावेळी ' माऊस 'चा शोध लागला त्यावेळेस त्या उपकरणाला पॉइंटर डिव्हाइस (Pointer Device) असे नाव देण्यात आले. हा माऊस त्यांनी लाकडापासून तयार केलेला होता. ज्याला मात्र 2 धातूची चाके होती. आणि काळात संगणकाचा आकार जवळपास खोलीएवढा होता.



संगणकाच्या या उपकरणला ' Mouse ' असे यावरून म्हंटले गेले. याचे कारण आळसे ज्यावेळेस माउस या उपकरणाला बनवण्यात आले, त्यावेळी त्या दिसणार्‍या उपकरणाचा आकार आणि शेप साधारण छोट्या दिसणार्‍या उंदरासारखा होता आता. आपण पाहिले असता, उंदीर कुठेही एखाद्या छोट्या जागेवर उंदीर जसा दडून राहतो तसा माउस बनवण्यात आला होता. म्हणून त्याला 'माउस' असे नाव देण्यात आले होते. याअगोदर 'mouse' ला कासवाचे 'turtle' असेही ठेवण्यात आले होते.


गुरुवार, २८ ऑक्टोबर, २०२१

पोपट नक्कल का करतो


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   *📒📒📒 @ संकलन @📒📒📒*

  *श्री. गजानन गोपेवाड *

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               🌎 *ज्ञान-विज्ञान* 🌎

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🦜 *पोपट नक्कल का करतो?* 🦜

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'पोपटपंछी चतुरकी जान, पढे पहाटे श्रीभगवान' असं आपण कितीही पोपटाचं कौतुक केलं, तरी पोपटपंची का केली जाते, याविषयीच्या आपल्या काही समजुती भ्रामकच आहेत. कारण आपल्या बोलांची सही सही नक्कल करण्यासाठी पोपटांच्या अंगी स्वरयंत्रच नसतं; पण त्यांची श्वासनलिका दुतोंडी असते. त्यामुळे तिच्यातून श्वास आत घेताना किंवा बाहेर सोडताना त्या नलिकेच्या स्वरूपात बदल करून पोपट आवाज काढू शकतात. थोडक्यात, ते शीळ घालत असतात. या शीळेचंच नियंत्रण करून ते निरनिराळे आवाज काढू शकतात. ऐकलेल्या आवाजाची नक्कल करण्याची क्षमता मुळातच पोपटांमध्ये असते. त्यामुळे रानावनात असताना ते इतर पक्ष्यांच्या आवाजाची नक्कलही करू शकतात. यात पोपटांच्या निरनिराळ्या जातींचा, तसंच त्यांच्या स्वतःच्या जातीचाही समावेश असतो. त्यामुळे मग कोणत्या पक्ष्याला साद घालून जवळ करायचं किंवा कोणाला किंवा डावलून दूर निघून जायचं, हे ठरवणं त्यांना शक्य होतं. आपल्याच जातीच्या दुसऱ्या पोपटाला साद घालून प्रतिसाद देत ते स्वतःच्या प्रदेशांचं रक्षणही करू शकतात. तसंच विणीच्या हंगामात आपला जोडीदार शोधण्यासाठीही त्यांना या क्षमतेची मदत होते.

जेव्हा असे पोपट घरात पाळले जातात तेव्हा ऐकलेल्या आवाजाची नक्कल करण्याच्या त्यांच्या अंगभूत क्षमतेपोटी मानवी आवाजाची नक्कल करणं त्यांना शक्य होतं. अर्थात, असं करताना ते शब्द मुळात मानवप्राण्याकडून काढले गेले आहेत, अशी मात्र त्याची समजूत नसते. तेराव्या शतकातल्या एका फारसी ग्रंथात, पोपटांना बोलायला कसं शिकवावं, हे सांगितलं आहे. त्यात असं म्हटलं आहे, की ज्या पोपटाला बोलायला शिकवायचं त्याच्यासमोर एक आरसा धरावा. त्या आरशाच्या आड मग त्याच्या मालकानं स्वतःला लपवावं. त्या पोपटाला त्यामुळे आपल्या मालकाचं दर्शन होत नाही. समोरच्या आरशात मात्र त्याला स्वतःचंच प्रतिबिंब दिसतं. त्यामुळं जेव्हा तो मालक काही शब्द उच्चारतो तेव्हा पोपटाला दुसरा एक आपल्यासारखा पक्षीच बोलत असल्याचं वाटून तो त्यांची नक्कल करण्याचा प्रयत्न करतो. त्यापोटीच काही शब्द असे पोपट तसेच्या तसे आपल्या गळ्यातून काढू शकतात. मानवीआवाजाची नक्कल करून आपलं मन रिझवण्याचं काम ते जरूर करतात; पण त्यापायी इतर पक्ष्यांची नक्कल करण्याची किमया ते हरवून बसल्याचं दिसून आलं आहे.

पोपटच फक्त असं करू शकतात, असं नाही. मैना पक्षीही अशी नक्कल करू शकतात. झालंच तर मॉकिंगबर्ड जातीचे इवलेसे पक्षी तर इतर कितीतरी पक्ष्यांची नक्कल करतात. तरीही पोपटांची बुद्धिमत्ता इतर पक्ष्यांच्या मानानं जास्त असल्याचा दावा काही मज्जाशास्त्रज्ञांनी केला आहे. त्यामुळेच काही पोपट केवळ शब्दच नव्हे, तर वाक्यंच्या वाक्य बोलू शकतात. एवढंच नाही, तर त्यांचा अर्थही त्यांना समजत असल्यासारखी त्यांची वागणूक असते.


*-डॉ.बाळ फोंडके यांच्या 'का?'या पुस्तकातून*


कुतुहल अल्गोरिदमचे विश्व


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           *🤔 【 कुतूहल 】 🤔*  

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*🖥️✒️संकलन✒️💻*

_*श्री.गजानन गोपेवाड *_


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*कुतूहल : अल्गोरिदमचे विश्व*


साधी बेरीज-वजाबाकी ते क्लिष्ट समीकरणे सोडवण्यासाठी आपण वेगवेगळ्या पद्धती शिकतो. मात्र संगणकाला त्यातील एकूण एक बारकावे स्पष्टपणे सांगणे आवश्यक असते. औपचारिक भाषेत त्या पद्धतीला, रीत म्हणजे ‘अल्गोरिदम’ म्हटले जाते. संगणकाच्या संदर्भात प्रोग्रामिंग अल्गोरिदम म्हणजे प्रश्नाची उकल करण्यासाठी प्रत्येक पायरीवर काय प्रक्रिया करायची हे सविस्तरपणे सांगणे. त्याप्रमाणे दिलेल्या निविष्टीवर (इनपुट) प्रक्रिया करून संगणक निष्पत्ती (आऊटपुट) देतो. अल्गोरिदमची मुख्य वैशिष्टय़े अशी: प्रत्येक पायरी आणि प्रक्रिया नि:संदिग्ध असते, प्रत्येक पायरी पारदर्शक व तर्कशास्त्राधारित असते, प्रत्येक पायरीवर एकमेव उत्तर मिळते, सान्त (फायनाइट) वेळा प्रक्रिया केल्यावर अल्गोरिदम थांबतो, अल्गोरिदम दिलेल्या प्रकारच्या कितीही मोठय़ा प्रमाणातील आधारसामग्रीवर वापरता येतो, आणि तो कुठल्याही एका विशिष्ट संगणकीय भाषेवर अवलंबून नसतो.


प्रोग्रामिंग अल्गोरिदम्स पुढील प्रक्रिया प्रामुख्याने करतात, विल्हेवारी लावणे (सॉर्टिग), शोध घेणे (सर्चिग), संकीर्णीकरण करणे (हॅशिंग), गतिमान प्रायोजन (डायनॅमिक प्रोग्रामिंग), अक्षर वा अंकमालिका समुचितपणे खंडित करणे (स्ट्रिंग पार्सिग). विल्हेवारी लावण्यासाठी ‘बबल सॉर्टिग’ अशी खास रीतही उपलब्ध आहे. संगणकावर अल्गोरिदम कसा कार्यान्वित करावा यासाठी सोबतच्या आकृतीत दाखवल्याप्रमाणे प्रवाह किंवा प्रक्रियादर्शक तक्ता (फ्लोचार्ट) प्रथम तयार केला जातो. हा तक्ता प्रमाणित (स्टॅण्डर्ड) आकृत्या वापरतो जसे की, वर्तुळ म्हणजे प्रारंभ किंवा समाप्ती, आयत म्हणजे प्रक्रियेचे वर्णन, समभुज चौकोन (रॉम्भस) म्हणजे प्रश्न इत्यादी. त्या सर्वातील संबंध बाणांनी जोडून विशद केले जातात. नंतर या तक्त्यातील प्रत्येक प्रक्रियेला अनुरूप सूचना, निवडलेल्या संगणक भाषेच्या ओळींमध्ये (कोडिंग लाइन्स) लिहून संपूर्ण आज्ञावली (प्रोग्राम) काटेकोरपणे तयार होते.


‘अधाशी’ (ग्रीडी) अल्गोरिदम हा आणखी एक महत्त्वाचा प्रकार आहे. यात अधिक पुढचा विचार न करता लगेच जी गोष्ट इष्टतम असेल, ती केली जाते. अर्थातच सदर रीत दर वेळी यशस्वी ठरत नाही, पण सहसा वाईट निष्कर्षही देत नाही. कित्येकदा अल्गोरिदमच्या काही पायऱ्यांत सर्व शक्यता तपासणे बराच वेळ घेऊ शकते, तरी त्या सर्व न तपासता यादृच्छिक निवड (रॅण्डम सिलेक्शन) अनेक वेळा करून निर्णय घेण्याची पद्धत वापरली जाते. याला ‘माँटे कार्लो’ अल्गोरिदम असे नाव आहे. प्रत्यक्षात अनेक प्रश्नांसाठी ही रीत प्रभावी ठरते, असा अनुभव आहे.


संगणकशास्त्रात अल्गोरिदमबाबत मोठय़ा प्रमाणात संशोधन होत आहे. उदा. त्यात अल्गोरिदमची संरचना आणि तिची कार्यक्षमता अभ्यासली जाते. तसेच उद्भवणारे संभाव्य स्थूलांकन दोष (राऊंडिंग एरर) संख्यात्मक विश्लेषण (न्यूमरिकल अ‍ॅनेलेसिस) या गणिती शाखेमार्फत तपासले जातात.


–डॉ. विवेक पाटकर

मराठी विज्ञान परिषद, मुंबई.

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कुतूहल ऐकावे ते नवलच चित्रलेखा


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           *🤔 【 कुतूहल 】 🤔*  

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*🖥️✒️संकलन✒️💻*

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_*श्री गजानन गोपेवाड *_

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*कुतूहल : चित्रालेखाचे भौमितिक रूपांतर*


संगणकाच्या साहाय्याने चित्रालेख (ग्राफिक्स) गतिक (डायनॅमिक) करण्यासाठी सारणी बीजगणिताचा (मॅट्रिक्स अलजिब्रा) प्रामुख्याने उपयोग होतो. चित्रांचा आकार-प्रकार, रूप, स्थान व दिशानिदेशन (ओरिएन्टेशन) बदलताना मूलत: भौमितिक रूपांतरण केले जाते. उदाहरण म्हणून त्रिकोण या द्विमितीय आकृतीचे स्थानांतरण (ट्रान्सलेशन), परिवलन (रोटेशन), परावर्तन (रिफ्लेक्शन), आकारमान रूपांतरण (स्केलिंग) व वितलीयकरण (स्क्यू) सारणीच्या नियमांनुसार कसे होईल ते पाहू. सोबत दिलेल्या आकृतीत अबक त्रिकोणाचे ‘अ’, ‘ब’ आणि ‘क’ शिरोबिंदू आहेत. ‘अ’चे मूळ निर्देशांक (क्ष, य) तर रूपांतरित निर्देशांक अ’(क्ष’, य’) होतील. त्याचप्रमाणे आकृतीतील इतर बिंदूंचे रूपांतर होईल. सारणीतील घटक रूपांतरणाचे सहगुणक दर्शवतात. आकृतीचे ‘स्थानांतरण’ करताना (आकृती १), प्रत्येक बिंदू ठरावीक ‘ड’ अंतराने पूर्वनिर्धारित दिशेने सरकवला जातो.‘परिवलन’ करताना (आकृती २) आकृती धन ड० कोनातून फिरवण्यात येते. आकृतीचे परावर्तन (आकृती ३) केल्यावर प्रतिबिंबित चित्र अशा प्रकारे दिसेल. आकृती ठरावीक ‘ड’ पटीने लहान किंवा मोठी करणे म्हणजेच ‘आकारमान रूपांतरण’ (आकृती ४) होय. आकृती भूपृष्ठाला समांतर किंवा लंबरेषेत, ‘ड’ घटकाने ओढून तिरकस केल्यास ‘वितलीयकरण’ (आकृती ५) होईल. अशाप्रकारे त्रिमितीय चित्रांचेही रूपांतरण केले जाते. संगणकामध्ये चित्र-रूपात साठवलेला डेटा, सारणी बीजगणिताच्या नियमांनुसार सहजतेने हाताळण्यासाठी; चित्राच्या दृश्य रूपाबरोबरच भौमितिक माहिती असणे आवश्यक ठरते. संगणकीय चित्र, निर्देशक प्रणालीत (को-ऑर्डिनेट सिस्टीम) रूपांतरित करताना भौमितिक सिद्धांतांचा वापर होतो. त्यामुळेच स्थिरचित्रांबरोबरच प्रगत आणि संमिश्र चित्रालेख, संगणकीय सरूपीकरण (सिम्युलेशन) आणि चित्रे गतिमान करण्यासाठी चेतनीकरण (अ‍ॅनिमेशन) करणे सुलभ 

पोलीओ लस संशोधक जोनास साँल्क

 *🔬🔬जोनास सॉल्क🔬🔬*

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*पोलिओ लस संशोधक*

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*जन्मदिन - २८ ऑक्टोबर १९१४*


जोनास सॉल्क एक अमेरिकी चिकित्सा शोधकर्ता और विषाणुशास्त्री थे, जिन्हें पोलियो के पहले सुरक्षित और प्रभावी टीके के विकास के लिए जाना जाता है। रूसी यहूदी अप्रवासी की संतान जोनास का जन्म न्यूयॉर्क शहर में हुआ था। माता-पिता ने हालांकि औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, लेकिन वे अपने बच्चों को सफल देखने चाहते थे। न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में मेडिकल स्कूल में पढ़ते हुए उन्होंने एक चिकित्सक बनने की बजाए चिकित्सा अनुसंधान की ओर कदम बढ़ा कर अपने लिए अलग राह चुनी।


पोलियो अथवा पोलियोमायलिटिस हा एक विषाणू मुळे बालकांना होणारा आणि अपंग करणारा संसर्गजन्य रोग आहे. पोलियोमायलिटिस या शब्दाची व्युत्पत्ती ग्रीक भाषेमधील पोलियो म्हणजे ग्रे अथवा भुरा, मायलॉन म्हणजे मज्जारज्जू, तर आयटिस म्हणजे सूज या शब्दांपासून झाली आहे. पोलियोच्या उपसर्गाच्या ९०% घटनांमध्ये काहीच लक्षणे आढळून येत नाहीत, परंतु विषाणूनी रक्तप्रवाहामध्ये प्रवेश केल्यास पोलियो रुग्णांमध्ये बऱ्याच वेगवेगळ्या प्रकारची लक्षणे दिसून येतात. १% पेक्षा कमी रुग्णांच्याबाबतीत हा विषाणू मध्यवर्ती मज्जासंस्थे मध्ये प्रवेश करतो व शरीरातील स्नायूंच्या हालचालीस कारणीभूत असणाऱ्या 'गतिप्रेरक न्यूरॉनना' अपाय करतो. याचे पर्यवसान स्नायू दुर्बल होण्यामध्ये व शेवटी पक्षाघातामध्ये होते.


हजारो वर्षे पोलियो सक्रिय परंतु स्थिर अवस्थेत अस्तित्वात होता. १८८० नंतर पोलियोच्या साथींचे युरोपामध्ये मोठे उद्रेक होऊ लागले आणि नंतर लगेचच अमेरिकेतपोलियोच्या साथीचा प्रसार झाला. १९१० पर्यंत जगात पोलियोचा खूपच प्रसार झाला होता, आणि त्याच्या साथींचा उद्रेक ही अगदी नेहेमीची घटना होऊ लागली. या साथींमुळे हजारो मुले आणि प्रौढ व्यक्ती अपंग झाल्या, व यामुळे पोलियोवर उपायकारक लस शोधण्यासाठी 'महाशर्यत' सुरू होण्यास जोर मिळाला. 


पोलियोच्या लसी विकसित करण्याचे श्रेय जोनस सॉल्क (१९५२) व अल्बर्ट सेबिन (१९६२) यांच्याकडे जाते. यांच्या प्रयत्नांमुळे पोलियोच्या रुग्णांची संख्या प्रतिवर्षी अनेक लाखांवरून काही हजारांवर आली आहे. जागतिक आरोग्य संघटना (WHO), युनिसेफ व रोटरी इंटरनॅशनल या संस्थांच्या पोलियो निर्मूलनाच्या प्रकल्पांमुळे पोलियोचे जगातून लवकरच संपूर्ण उच्चाटन होईल अशी आशा निर्माण झाली आहे.


२००० मध्ये प्रशांत महासागराच्या पश्चिमेकडील चीन आणि ऑस्ट्रेलिया मिळून इतर ३६ देशांमध्ये पोलियोचे निर्मूनल झाले. २००२मध्ये युरोप पोलियोमुक्त जाहीर करण्यात आला. आता (२००६ नंतर) पोलियोच्या साथींचे उद्रेक फक्त भारत, पाकिस्तान, नायजेरिया, व अफगाणिस्तान या चार देशांमध्येच आढळून येत होते. (मार्च २७,२०१४ ला) जागतिक आरोग्य संघटना (WHO) द्वारे भारत देशाला १०० प्रतिशत पोलियोमुक्त जाहीर करण्यात आले. भारतात सरकारने (१९९५) साली सुरू करण्यात आलेल्या पल्स पोलियो योजने मुळे भारत देश पूर्णपणे पोलियोमुक्त झाला.

*🙏🌞🙏शुभ प्रभात🙏🌞🙏*

संकलन -)

गजानन गोपेवाड 

उमरखेड जिल्हा- यवतमाळ ४४५२०६

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